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कविता

कहाँ छिपकर बैठे हो
सुरजन परोही


कहाँ छिपकर बैठे हो प्रभु जी, जरा आजा पास हमारे
तेरे बिना तरस रहे हैं, ये दो नैन बेचारे

बड़ी देर कर दी भगवन, मेरे घर आने में -

तूने अहिल्या को मुक्त किया
सबरी के बेर भी खा लिया
सूरदास को तार दिया, उनके तार बजाने में
बड़ी देर कर दी भगवन, मेरे घर आने में -

गणिका की भक्ति अपार
कुबेर का भर दिया भंडार
हनुमान को कर दिया पार, उनके शीश झुकाने में
बड़ी देर कर दी भगवन, मेरे घर आने में -

जब द्रौपदी का चीर हरण हुआ
रो-रो किया पुकार मन-ही-मन
तब कृष्ण का डोल गया आसन, न किया देर उनका चीर बढ़ाने में
बड़ी देर कर दी भगवन, मेरे घर आने में -

 


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हिंदी समय में सुरजन परोही की रचनाएँ