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आलोचना

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली
भाग 6
विश्वप्रपंच

रामचंद्र शुक्ल
संपादन - ओमप्रकाश सिंह

अनुक्रम दसवाँ प्रकरण -चेतना पीछे     आगे

आत्मा या मन के व्यापारों में से चेतना से बढ़कर विलक्षण और कोई व्यापार नहीं। इसके सम्बन्ध में जिस प्रकार भिन्न भिन्न मत दो हजार वर्ष पहले प्रचलित थे उसी प्रकार अब भी हैं। इसी को देखकर आत्मा के अमर और भूतों से परे होने की कल्पना लोगों को सूझी है। यही एक ऐसा रहस्य है जिसके बल पर आत्मा और शरीर को पृथक् माननेवाले द्वैतवादी अनेक प्रकार के अन्धविश्वास ग्रहण किए हुए हैं। अत: तात्त्विक दृष्टि से चेतना का विचार परम आवश्यक है। इस दृष्टि से यदि हम विचार करेंगे तो देखेंगे कि और दूसरे मनोव्यापारों के समान चेतना भी एक प्राकृतिक गुण है तथा शरीर और अन्त:करण की अन्य वृत्तियों के समान एक प्राकृतिक व्यापार है, अर्थात प्रकृति के नियमों के सर्वथा अधीन है।
चेतना के स्वरूप और लक्षण तक के विषय में दार्शनिकों का एकमत नहीं। कोई कुछ कहता है, कोई कुछ। पर सबसे उपयुक्त परिभाषा उन दार्शनिकों की प्रतीत होती है जो चेतना को एक प्रकार की अन्तर्दृष्टि कहते हैं और उसकी उपमा दर्पण की क्रिया से देते हैं। चेतना दो प्रकार की होती है-एक अन्तर्मुख, दूसरी बहिर्मुख। अन्तर्मुख चेतना को अहंकार भी कहते हैं। अहंकार वृत्ति के द्वारा अन्त:करण अपनी ही क्रिया का निरीक्षण, अपनी ही अवस्था का बोध करता है। बहिर्मुख चेतना के द्वारा अन्त:करण को वाह्य जगत् का बोध होता है। हमारी अधिकांश चेतना वाह्यजगत्सम्बन्धी होती है। अन्तर्मुख चेतना का क्षेत्र संकुचित होता है। उसमें हमारे इन्द्रियानुभव, संस्कार और संकल्प प्रतिबिम्बित होते हैं।
बहुत से तत्वज्ञों की धारणा है कि 'चेतना' और 'मनोव्यापार' परस्पर पर्याय शब्द हैं, अर्थात जितने मनोव्यापार होते हैं सब चेतन होते हैं। पर यह धारणा ठीक नहीं। जैसा मैं पहले दिखा चुका हूँ अधिकतर अन्त:क्रियाएँ या मनोव्यापार ऐसे होते हैं जिनकी हमें कुछ भी खबर नहीं रहती। हमारी इन्द्रियों के साथ विषय का सम्पर्क होता है, अन्त:संस्कार अंकित होकर पेशियों में गति उत्पन्न करते हैं पर हम कुछ भी नहीं जानते। चेतन अन्त:संस्कार जिनके द्वारा ज्ञानकृत व्यापार होते हैं और अचेतन अन्त:संस्कार जिनके द्वारा अज्ञानकृत व्यापार होते हैं, दोनों अन्त:करण या मन ही के व्यापार हैं।
चेतना का परिज्ञान हमें चेतना ही के द्वारा हो सकता है। उसकी वैज्ञानिक परीक्षा में यही बड़ी भारी अड़चन है। परीक्षक भी वही, परीक्ष्य भी वही। द्रष्टा अपना ही प्रतिबिम्ब अपनी अन्त:प्रकृति में डालकर निरीक्षण में प्रवृत्त होता है। अत: हमें दूसरों की चेतना का परीक्षात्मक बोध पूरा पूरा कभी नहीं हो सकता। हमें उनकी चेतना का अपनी चेतना से मिलान करते हुए चलना पड़ता है। यदि यह मिलान सामान्य मस्तिष्क के मनुष्यों ही तक रखा जाय तब तो हम कुछ थोड़े बहुत सिद्धांत उनकी चेतना के सम्बन्ध में निश्चय के साथ स्थिर कर सकते हैं। पर यदि हम असामान्यमस्तिष्क के मनुष्यों, जैसे प्रतिभाशाली, सनकी, जड़ या विक्षिप्त लोगों को लेकर विचार करने जाते हैं तो हमारे सिद्धांत या तो अपूर्ण या सर्वथा भ्रान्त निकलते हैं। यही बात मनुष्यों की चेतना को जंतुओं, विशेषत: क्षुद्र जंतुओं की चेतना के साथ मिलाने से होती है। ऐसा करने में इतनी भारी कठिनाइयाँ सामने आती हैं कि चेतना के सम्बन्ध में भिन्न भिन्न शरीर विज्ञानियों और दार्शनिकों के मतों में आकाश पाताल का अन्तर पड़ जाता है। मुख्य मुख्य मतों का नीचे उल्लेख किया जाता है-
1. चेतना केवल मनुष्य ही में होती है- इस सिद्धांत का प्रवर्तक फ्रांसीसी तत्ववेत्ता डेकार्ट है जिसके अनुसार विचार और चेतना मनुष्य ही के गुण हैं और अमर आत्मा केवल मनुष्य ही में होती है। इस तत्ववेत्ता ने मनुष्य के व्यापार और पशु के मनोव्यापार में भेद किया है। इसके मत में मनुष्य की आत्मा एक विचार करनेवाली अभौतिक सत्ता है जो भौतिक शरीर से सर्वथा पृथक् है। पर पृथक् होते हुए भी वह मस्तिष्क के एक विशिष्ट अंश के साथ लगी रहती है जिसमें वह वाह्य जगत् के विषयों को संस्कार के रूप में ग्रहण करे और कर्मेन्द्रियों को प्रवृत्त करे। पशुओं में विचार करने की शक्ति नहीं होती, आत्मा नहीं होती। वे कौशल के साथ बैठाए हुए, पुरजों की मशीन की तरह हैं। उनके इन्द्रियसंवेदन, अन्त:संस्कार और प्रवृत्ति जड़ व्यापार मात्र हैं जो भौतिक नियमों के अनुसार होते हैं। अस्तु, डेकार्ट मनुष्य के सम्बन्ध में तो द्वैतवादी था, पर पशुओं के सम्बन्ध में अद्वैतवादी। मनुष्यों के सम्बन्ध में तो वह शरीर और आत्मा को दो पृथक् वस्तुएँ मानता था पर पशुओं के सम्बन्ध में दोनों को एक ही मानता था। डेकार्ट के इस दोरंगे सिद्धांत का फल यह हुआ कि सत्तारहवीं और अठारहवीं शताब्दी के भूतवादी तो मनोव्यापारों को भौतिक क्रिया मात्र सिद्ध करने के लिए उसकी पशुसम्बन्धी विवेचना का सहारा लेने लगे और अध्यात्मवादी लोग उसके मनुष्यसम्बन्धी विवेचन को आगे करके आत्मा का अमरत्व और शरीर से उसका पृथक्त्व सिद्ध बलताने लगे। पर मनुष्य की आत्मा के सम्बन्ध में डेकार्ट का यह विवेचन उन्नीसवीं शताब्दी के गम्भीर और सूक्ष्म अनुसंधानों से सर्वथा भ्रान्त सिद्ध हुआ।
2. चेतना संवेदन सूत्रावाले जीवों ही में होती है- मनुष्य तथा और उन्नत जीवों ही में चेतना होती है जिन्हें केन्द्रीभूत संवेदनसूत्रा विधान अर्थात विज्ञानमय कोश होता है। यही सिद्धांत आजकल जंतुविज्ञान, शरीरविज्ञान और अद्वैत मनोविज्ञान में माना जाता है। प्राणिविज्ञान की भिन्न भिन्न शाखाओं में जो अपूर्व उन्नति हुई है उससे इसी सिद्धांत का समर्थन होता है। हजारों वर्ष से लोग देखते आते हैं कि बन्दर, कुत्तो आदि जो उन्नत कोटि के पशु हैं उनकी बुद्धि बहुत सी बातों में मनुष्य की बुद्धि से मिलती जुलती होती है। उनके इन्द्रियसंवेदन, अन्त:संस्कार, सुख दु:ख आदि का अनुभव, इच्छा, द्वेष आदि मनोव्यापार बहुत कुछ मनुष्यों के से होते हैं। यहाँ तक कि इतना सब होने पर भी यह ठीक ठीक नहीं कहा जा सकता कि उन्नतिक्रम के अनुसार जीवों की वर्गपरम्परा में किसी विशेष वर्ग से चेतना का प्रादुर्भाव होता है। मुझे तो इसी सिद्धांत के सत्य होने की सम्भावना अधिक प्रतीत होती है जिसके अनुसार चेतना संवेदनसूत्रों के केन्द्रीभूत होने पर उत्पन्न होती है। छोटे जीवों में संवेदनसूत्रा एक स्थान पर केन्द्रीभूत नहीं होते, उनमें पूर्ण विज्ञानमय कोश नहीं होता। जिन जीवों में संवेदनसूत्रों का केन्द्ररूप अवयव या अन्त:करण होता है, उन्नत ज्ञानेन्द्रियाँ होती हैं अर्थात जिनमें विज्ञानमय कोश होता है उन्हीं में चेतना होती है।
3. चेतना सब प्राणियों में होती है- छोटे बड़े जितने जीव हैं सब चेतन होते हैं। यह सिद्धांत उदि्भदों और जंतुओं के आन्तरिक व्यापारों में भेद करता है। प्राचीनों का भी यही विश्वास था कि जंतुओं में इन्द्रियानुभव और चेतना होती है, लेकिन पौधों में नहीं। पर उन्नीसवीं शताब्दी के मध्यभाग में जब स्पंज आदि क्षुद्र जंतुओं की आन्तरिक क्रियाओं की परीक्षा की गई तब इस विश्वास की असारता प्रकट हो गई। स्पंज आदिकों के स्थावर जंतु होने में कोई सन्देह नहीं, पर उनमें चेतना का कोई आभास उसी प्रकार नहीं पाया जाता जिस प्रकार पौधों में। एक घटक अणुजीवों की जब सूक्ष्म परीक्षा की गई तब उनकी और एक घटक अणूदि्भदों की आन्तरिक क्रियाओं में कोई विशेष अन्तर नहीं पाया गया।
4. चेतना सब शरीरियों में होती है, क्या उदि्भद् क्या जंतु- इस मत के अनुसार जीव जंतु, पेड़ पौधो सब चेतन हैं, पर मिट्टी के ढेले आदि निर्जीव पदार्थों में चेतना नहीं होती। इस सिद्धांत का यह भाव भी निकलता है कि सब देहवान् (उदि्भद् और जंतु) पदार्थों में आत्मा होती है। इस मत को माननेवाले प्राण, चेतना और आत्मा को परस्पर सहगामी समझते हैं। उनकी समझ में जहाँ एक रहेगा वहाँ दूसरा भी अवश्य रहेगा। फेक्नर नामक तत्ववेत्ता ने यह सिद्ध करने तक का प्रयत्न किया है कि पौधों में भी उसी प्रकार आत्मा होती है जिस प्रकार जंतु में, और पौधो की आत्मा में भी उसी प्रकार चेतना होती है जिस प्रकार मनुष्य की आत्मा में। बात यह है कि जब क्षुद्र जंतुओं की अन्त:क्रियाओं को चेतना कह सकते हैं तब पौधों की अन्त:क्रियाओं को चेतना कहना ही पड़ेगा। लजालू, मक्खी पकड़नेवाले पौधो आदि की गतिविधि अत्यंत क्षुद्र जंतुओं की गतिविधि के समान ही होती है।
5. चेतना प्रत्येक घटक में होती है- जिस प्रकार हम सजीव घटक को अनेकघटक जंतुओं और पौधों के शरीर के मूल अणु मानते हैं, जिनके संयोग से उनके शरीर संघटित हैं, उसी प्रकार हम घटकात्मा अर्थात घटक की अन्त:क्रिया को भी शरीर की आत्मा अर्थात उसके उन्नत मनोव्यापारों की समष्टि की व्यष्टि मान सकते हैं। हम कह सकते हैं, कि चेतना, धारणा आदि उन्नत कोटि के मनोव्यापार सूक्ष्म घटकों की क्षुद्र अन्त:क्रियाओं के योगफल हैं। मैंने समुद्री अणुजीवों की परीक्षा करके दिखलाया था कि उनमें भी उन्नत जंतुओं से मिलती जुलती इन्द्रियसंवेदना, प्रवृत्ति और गति आदि होती है। अत: यदि हम समस्त शरीरियों में चेतना मानने वालों की बात मानें तो शरीर को संघटित करनेवाले अणुरूप घटकों में भी चेतना का कुछ अंश हमें मानना ही पड़ेगा। पहले मैं भी ऐसा ही मानता था, पर अब विवश होकर मुझे स्वीकार करना पड़ता है कि अणुजीवों में आत्मबोध नहीं होता, उनके इन्द्रिय संवेदन और अंगसंचालन आदि अचेतन अर्थात अज्ञानकृत होते हैं।
6. चेतना द्रव्य के परमाणुमात्र में होती है- इस सिद्धांत ने चेतना को सबसे आगे बढ़ाया है, इसकी दौड़ सबसे लम्बी है। इसे माननेवाले यह समस्या हल करने से बच जाते हैं कि चेतना की उत्पत्ति कब और कहाँ से होती है। अन्त:करण की यह वृत्ति ऐसी विलक्षण है कि इसे किसी और वृत्ति से उत्पन्न बतलाना अत्यंत कठिन है। अत: इस कठिनता से बचने का सीधा रास्ता यही दिखाई पड़ा कि चेतना द्रव्य मात्र का एक वैसा ही अनर्तव्याप्त गुण मान ली जाय जैसे कि आकर्षण, रासायनिक प्रवृत्ति आदि हैं। ऐसा मानने पर हमें मूल चेतना उतने प्रकार की माननी पड़ती है जितने रासायनिक मूल द्रव्य1, आक्सिजन, कार्बन आदि होते हैं।
यह सब गड़बड़ चेतना का लक्षण निर्दिष्ट न करने के कारण होता है। मेरे मत में तो चेतना मनुष्य आदि उन्नत प्राणियों के मनोव्यापारों या अन्त:क्रियाओं का एक अंश मात्र है, अधिकतर अन्त:क्रियाएँ जिन्हें मनोव्यापार भी कहते हैं, अचेतन होती हैं अर्थात वे होती हैं पर हमें उनकी खबर नहीं होती।
चेतना की उत्पत्ति और लक्षण के सम्बन्ध में चाहे जितने मतभेद हों पर उसके 

1- मूलद्रव्य वे हैं जिनमें विश्लेषण करने पर और किसी द्रव्य का योग नहीं पाया जाता। अब तक ऐसे 77 या 78 तत्त्वों का पता लगा है। इनके सबसे सूक्ष्म टुकड़ों को परमाणु कहते हैं क्योंकि पहले लोग समझते थे कि उनका और विभाग नहीं हो सकता। पर कुछ नए मूल द्रव्य मिले जिनके परमाणु और भी सूक्ष्म अणुओं के योग से बने पाए गए जिन्हें विद्युतअणु (इलेक्ट्रॉन) कहते हैं। पहले लोग, जल, वायु आदि को मूलभूत समझते थे, पर वे कई मूलभूतों के योग से संघटित द्रव्य हैं। उनके संयोजक मूल द्रव्य विश्लेषण द्वारा अलग अलग किए जा सकते हैं।

विषय में दो सिद्धांत मुख्य हैं-एक अतीतवाद दूसरा शरीरधर्मवाद। अतीतवाद चेतना को शरीर या भूतों से अतीत वस्तु (आत्मा) का धर्म मानता है और शरीर धर्मवाद शरीर ही का धर्म मानता है। मैं इसी दूसरे सिद्धांत को सत्य मानता हूँ। मैं चेतना को शरीर ही का एक धर्म मानता हूँ जो भौतिक और रासायनिक नियमों के अधीन है, उनसे परे नहीं। मैं उसे संवेदनसूत्रों ही की एक विशेषता मानता हूँ जो उनके केन्द्रीभूत होने पर उत्पन्न होती है। संवेदनसूत्रों का केन्द्ररूप अवयव (अन्त:करण) और उन्नतिक्रम द्वारा पूर्णता प्राप्त ज्ञानेन्द्रिय विधान विशेष करके जरायुज जंतुओं ही में होता है। बनमानुस, कुत्तो, हाथी आदि की चेतना में और मनुष्य की चेतना में केवल न्यूनाधिक का भेद है, कोई वस्तुभेद नहीं। इन पशुओं की चेतना और मनुष्य की चेतना में उससे अधिक अन्तर नहीं होता जितना अत्यंत असभ्य जंगली मनुष्यों की चेतना और सभ्य जाति के दार्शनिकों और तत्वचिन्तकों की चेतना में। अस्तु, चेतना मन की समुन्नत क्रिया ही का एक अंग है और मस्तिष्क की बनावट पर निर्भर है।
सूक्ष्मदर्शक यत्रों आदि की सहायता से मस्तिष्क का जो वैज्ञानिक अन्वीक्षण किया गया उससे पता लगा कि चेतना का अधिष्ठान मस्तिष्क के भूरे मज्जापटल का एक विशेष भाग है। इस क्षेत्र में बड़ा भारी काम फ्लेशजिक नामक एक जर्मन वैज्ञानिक ने किया जिसने मस्तिष्क के भीतर चिन्तन करने के अवयवों का पता लगाया। उसने सिद्ध किया कि मस्तिष्क के भूरे मज्जाक्षेत्र में इन्द्रियानुभव के केन्द्ररूप चार अधिष्ठान या भीतरी गोलक हैं जो इन्द्रिय संवेदनों को ग्रहण करते हैं। स्पर्श ज्ञान का गोलक मस्तिष्क के खड़े लोथड़े में, घ्राण का सामने के लोथड़े में, दृष्टि का पिछले लोथड़े में और श्रवण का कनपटी के लोथड़े में रहता है। इन चारों भीतरी इन्द्रियगोलकों के बीच में चार विचारगोलक हैं जिनके द्वारा भावों की योजना और विचार आदि जटिल मानसिक व्यापार होते हैं। ये ही गोलक चेतना और विचार के कारण अर्थात प्रधान अन्त:करण हैं। फ्लेशजिक ने दिखलाया है कि मनुष्य के मस्तिष्क के इन गोलकों के कुछ अंशों में विशेष प्रकार की रचनाएँ होती हैं जो और दूसरे दूधा पिलानेवाले जीवों में नहीं होतीं। इन्हीं विशेषताओं के कारण मनुष्य मानसिक शक्तियों में सब प्राणियों से बढ़ाचढ़ा है।
आधुनिक शरीरविज्ञान की इन बातों का समर्थन चिकित्साशास्त्र के अनुसंधानों द्वारा भी होता है। जब रोग के कारण मस्तिष्क का कोई भाग नष्ट हो जाता है तब उस भाग के द्वारा होनेवाला मानसिक व्यापार भी शिथिल या नष्ट हो जाता है। इस बात से हम मन या अन्त:करण की भिन्न भिन्न वृत्तियों के स्थान बहुत कुछ निर्दिष्ट कर सकते हैं। अन्त:करण की किसी विशेष वृत्ति का ध्यान यदि रुग्ण हो जाता है तो साथ ही वह वृत्ति भी नष्ट हो जाती, जैसे मस्तिष्क के भीतर वाणी का जो केन्द्र है यदि वह नष्ट हो जाय तो आदमी गूँगा हो जायेगा। इस बात का प्रमाण तो हम नित्य ही पाते हैं कि मस्तिष्क के द्रव्य में किसी प्रकार का रासायनिक परिवर्तन उपस्थित होने पर चेतना पर पूरा पूरा प्रभाव पड़ता है। कुछ पीने की चीजें, जैसे चाय और कहवा ऐसी हैं जिनसे इमारी विचारशक्ति कुछ उत्तोजित होती है, कुछ ऐसी हैं, जैसे मद्य, भांग आदि जिनसे हमारे मनोवेग उत्तोजित होते हैं। कपूर और कस्तूरी से मुरूच्छा या बेहोशी दूर होती है, ईथर और क्लोरोफार्म बेहोशी लाता है। यदि चेतना मस्तिष्क के अवयवों से सर्वथा स्वतन्त्र कोई अभौतिक सत्ता होती तो ऐसा कैसे होता? जब मस्तिष्क के अवयव काम के नहीं रहते तब 'अमर आत्मा' की चेतना क्या होती है?
इन सब बातों से सिद्ध होता है कि मनुष्य तथा और स्तन्य जीवों की चेतना परिणामी है। उसमें भीतरी कारणों, जैसे रक्त का चढ़ाव उतार और बाहरी कारणों, जैसे आघात, उत्तोजन से फेरफार हो सकता है। बहुत सी बीमारियाँ ऐसी होती हैं जिनमें अन्त:संस्कारों अर्थात अन्त:करण में उपस्थित प्रतिबिम्बों के उलटफेर से मनुष्य की चेतना दो चार दिन एक प्रकार की रहती है, दो चार दिन दूसरे प्रकार की दो चार दिन वह अपने को कुछ और समझता है, दो चार दिन कुछ और।
प्राय: सब लोग देखते हैं कि तुरन्त के उत्पन्न बच्चे में चेतना नहीं होती1। प्रेयर नामक शरीरविज्ञानी ने दिखलाया है कि चेतना बच्चे में उस समय स्फुरित होती है जब वह बोलना आंरभ करता है। बहुत दिनों तक वह अपने लिए किसी सर्वनाम आदि शब्द का प्रयोग नहीं करता। जिस घड़ी वह 'मैं' शब्द का उच्चारण करता है और उसमें अहंकार वृत्ति स्पष्ट होती है उसी घड़ी से उसमें आत्मचेतना का आंरभ समझना चाहिए। 10 वर्ष की अवस्था तक उसके ज्ञान की वृद्धि बहुत जल्दी जल्दी होती है; उसके पीछे वृद्धि की गति कुछ मन्द होती है। ज्ञानवृद्धि की यह गति चेतना और उसके करण मस्तिष्क की वृद्धि के अनुसार होती है। पूर्ण वयस्क होते ही मनुष्य की चेतना पूर्णता को नहीं पहुँच जाती; वह संसार के अनेक रूप के व्यवहारों द्वारा, समाज के संसर्ग द्वारा, परिपक्व होती है। 20 वर्ष की अवस्था के उपरान्त 30 वर्ष की अवस्था के भीतर ही भीतर उसके विचार परिपक्व हो जाते हैं और 60 वर्ष की अवस्था तक पूरा काम देते हैं। 60 वर्ष की अवस्था के उपरान्त जरावस्था के लक्षण दिखाई पड़ने लगते हैं, धीरे धीरे मानसिक शक्तियों का द्दास होने लगता है, स्मरणशक्ति, ग्रहणशक्ति, विशेष विशेष वस्तुओं की और प्रवृत्ति क्षीण होने लगती है। हाँ, उद्भावना की शक्ति, चेतना की परिपक्वता और दार्शनिक सिद्धांत तत्त्वों की ओर अभिरुचि कुछ दिनों तक और बनी रहती है।
मनुष्य ने चेतना की जो उच्च अवस्था प्राप्त की है वह भी क्रम क्रम करके। ज्यों ज्यों सभ्यता बढ़ती गई त्यों त्यों उसकी चेतना भी उन्नत होती गई। यह बात 

1 छांदोग्योपनिषद् में बच्चों में मन का अभाव माना गया है। यथा बाला अमनस: प्राणन्त: प्राणेन, वदन्तो वाचा, पश्यन्श्चक्षुषा, शृण्वन्त: श्रात्रोणै वमिति'।-प्रपाठक 5, खंड 1।

जंगली जातियों की ओर ध्यान देने से, उनकी भाषाओं का मिलान करने से, स्पष्ट हो जाती है। भावग्रहण की शक्ति ज्यों ज्यों मनुष्यों में बढ़ती जाती है त्यों त्यों वे 
सामने आनेवाले अनेकानेक विशेष पदार्थों के बीच सामान्य लक्षणों को ढूँढ़ निकालने और उन्हें सामान्य प्रत्ययों अर्थात भावनाओं के रूप में ग्रहण करने में समर्थ होते जाते हैं। इस प्रकार उनकी चेतना गूढ़ होती जाती है1A

1 जैसे गाय, भैंस, बकरी, हिरण इत्यादि बहुत से विशेष जानवरों को देख मनुष्य सींग को सामान्य लक्षण पाकर 'सींगवाले जंतु' की एक सामान्य भावनाधारणा करता है।


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