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आलोचना

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली
भाग 6
विश्वप्रपंच

रामचंद्र शुक्ल
संपादन - ओमप्रकाश सिंह

अनुक्रम ग्यारहवाँ प्रकरण -आत्मा का अमरत्व पीछे     आगे

अब हम आत्मा के अमरत्वसम्बन्धी सिद्धांत की परीक्षा में प्रवृत्त होते हैं जिसकी नींव पर अनेक प्रकार के अन्धविश्वासों का गढ़ खड़ा किया गया है। यह एक ऐसा विषय है जिस पर दार्शनिक विचार करते समय प्राय: लोग अपने व्यक्तित्व के राग में फँस जाते हैं। वे चाहते हैं कि किसी न किसी प्रकार उन्हें यह विश्वास दिलाया जाय कि उनकी सत्ता जीवन के उपरान्त भी बनी रहेगी। यह वासना ऐसी प्रबल है कि इसके सामने कोई तर्क या युक्ति नहीं चल सकती। अत: आत्मा के सम्बन्ध में इस प्रबल वितंडावाद की सूक्ष्म परीक्षा करके आधुनिक शरीरविज्ञान के प्रत्यक्ष प्रमाणों द्वारा इसकी असारता दिखा देना हमारा काम है।
मृत्यु के उपरान्त भी मनुष्य का व्यक्तित्व या उसकी पृथक् आत्मा का अस्तित्व बना रहता है; इस मत को अमर्त्यवाद कह सकते हैं। इसी प्रकार उस सिद्धांत को हम मर्त्यवाद कहेंगे जिसमें यह माना जाता है कि मनुष्य के मरने पर उसके और शारीरिक व्यापारों के साथ ही साथ अन्त:करण के सारे व्यापार भी नष्ट हो जाते हैं, अर्थात आत्मा भी नहीं रह जाती।
किसी विशेष प्राणी के समस्त सजीव व्यापारों के सब दिन के लिए बन्द हो जाने को मृत्यु कहते हैं। जिस समय मनुष्य का व्यक्तित्व नहीं रह जाता वह मृत कहलाता है, चाहे उसका वंश चलता रहे। वंशपरम्परा के नियमानुसार किसी किसी के गुण और लक्षण उसकी अगली पीढ़ी में बहुत दिनों तक दिखाई पड़ते हैं। पर ऐसा होना दूसरी बात है। कई अच्छे शरीर विज्ञानी यह कहने लगे हैं कि सबसे क्षुद्र जीव ही अमर होते हैं और जीव नहीं। उनका यह कथन इस आधार पर है कि एक घटक अणुजीव अपनी वंशवृद्धि अमैथुनीय रीति पर विभाग या विच्छेद द्वारा करते हैं। अणुजीव का सारा शरीर दो या कई बराबर भागों में विभक्त हो जाता है और प्रत्येक भाग बढ़कर एक स्वतन्त्र जीव हो जाता है। पर यह समझ रखना चाहिए कि जिस घड़ी अणुजीव के दो भाग होकर अलग अलग हो जाते हैं उसी क्षण उसका व्यक्तित्व नष्ट हो जाता है।
'अमर' या 'नित्य' शब्द का प्रयोग समस्त विश्व के लिए ही किया जा सकता है। जो कुछ है, समष्टि रूप में उसकी सत्ता सदा रहेगी, यह परमतत्व का धर्म है। विश्व की अनश्वरता का सिद्धांत मैं आगे चलकर कहूँगा जब कि द्रव्य और शक्ति की अक्षरता का विवेचन करूँगा। यहाँ पर तो मैं इस प्रचलित भ्रान्त मत की ही परीक्षा करूँगा कि एक एक व्यक्ति की आत्मा अमर है। पहले मैं इस अन्धविश्वास के मूल आदि का निरूपण करूँगा, फिर यह दिखलाऊँगा कि युक्ति और प्रमाण से मर्त्यवाद ही सिद्ध होता है। मर्त्यवाद दो रूपों में मिलता है-आदिम और उत्तर। आदिम रूप में यह असभ्य जंगली जातियों में पाया जाता है जिनमें आत्मा के अमरत्व की भावना का उदय ही नहीं हुआ रहता, उसका आंरभ ही से अभाव रहता है। उत्तर रूप में यह सभ्य और ज्ञानवृद्ध लोगों के बीच पाया जाता है जिनमें आत्मा के अमरत्व की भावना का प्रधवंसभाव रहता है, अर्थात प्रकृति के निरीक्षण और सूक्ष्म विवेचन द्वारा उसका निराकरण हुआ रहता है। जिस प्रकार आदिम रूप में मर्त्यवाद आदिम और असभ्य दशा के मनुष्यों के बीच पाया जाता है उसी प्रकार उत्तर रूप में वह ज्ञान के उन्नत होने पर सभ्य मनुष्यों के बीच पाया जाता है। अमर्त्यवाद के प्रचलित हो जाने पर प्राचीन काल के बहुत से स्वतन्त्र विचारवाले दार्शनिकों ने उसका घोर प्रतिवाद किया। पर संसार के भिन्न भिन्न धार्मिक मतों के साथ इस अमरत्व के भाव का गहरा लगाव रहने के कारण वे अधर्मी, नास्तिक आदि नामों से पुकारे गए। उनके मत की भरपूर निन्दा की गई। यह दशा प्राय: सब सभ्य देशों में हुई1। युरोप में डॉक्टरों के बीच सैकड़ों वर्ष पहले से यह विचार उठ रहा था कि मनुष्य की मृत्यु के साथ ही आत्मा का भी अन्त हो जाता है, पर उसे वे स्पष्ट शब्दों में प्रकट नहीं करते थे। उन्नीसवीं शताब्दी के मध्यभाग में जब शरीरविज्ञान की विशेष उन्नति हुई तब आत्मा के अमरत्व का सिद्धांत बिलकुल निर्मूल पाया गया। पीछे विकास द्वारा मनुष्य जाति की उत्पत्ति के स्थिर हो जाने, गर्भस्फुरण का क्रम निर्धारित हो जाने तथा सूक्ष्मदर्शक यत्रों के प्रयोग द्वारा मस्तिष्क के पुरजों की छानबीन हो जाने पर उक्त सिद्धांत के लिए कहीं कोई आधार नहीं रह गया। अब कहीं सौ में कोई एक शरीर विज्ञानी आत्मा के अमरत्व का राग अलापता सुनाई देता है। उन्नीसवीं शताब्दी के प्राय: सब अद्वैतवादी दार्शनिक मर्त्यवादी थे।
कुछ लोगों का ख्याल है कि आत्मा के अमरत्व का भाव सारे प्रचलित धर्मों का एक मुख्य अंग है। पर यह ख्याल ठीक नहीं। पूर्वीय देशों के समुन्नत धर्मों में इस भाव का कहीं समावेश नहीं। न तो बौद्ध धर्म में, जिसको एक तिहाई दुनिया मानती है, यह भाव है, न चीन के कनफूची धर्म में। 

1 भारतवर्ष में आत्मा की पृथक् सत्ता और उसकी अमरता को न माननेवाले दार्शनिकों में चार्वाक प्रधान हुआ है जिसके अनुयायी लोकायतिक और नास्तिक कहलाते हैं।

यह रहस्यमय विचार कि मरने के पीछे भी मनुष्य की आत्मा सदा बनी रहेगी, पृथ्वी के भिन्न भिन्न स्थानों में मनुष्यों के बीच आपसे आप उत्पन्न हुआ। अत्यंत प्राचीन युग के असभ्य मनुष्यों में यह विचार नहीं था। पीछे बुद्धि के कुछ बढ़ने पर जब जीवन और मरण, निद्रा और स्वप्न आदि को देख, उनके सम्बन्ध में विचार उठने लगे, तब मनुष्य की दोहरी सत्ता की धारणा भिन्न भिन्न स्थानों पर आप से आप उत्पन्न हुई। पितरों की पूजा, कुटुम्बियों का प्रेम, जीवन से आसक्ति, मरने के पीछे अधिक सुखपूर्ण जीवन की आशा, अच्छे कर्मों से अच्छे फल और पाप से दंड की प्राप्ति, इन्हीं सब बातों के प्रभाव से यह धारणा और भी प्रबल होती गई। इसी धारणा के अनुकूल बहुत सी विलक्षण विलक्षण बातें बहुत से धार्मों में प्रचलित पाई जाती हैं। अधिकांश धार्मिक अपने ईश्वर ही से मिलती जुलती वस्तु अपनी अमर आत्मा को भी मानते हैं। ईसाइयों ही को लीजिए, जो समझते हैं कि जैसे ईसा कब्र से उठ बैठे थे, वैसे ही वे भी कयामत के दिन अपनी अपनी कब्रों से उठेंगे और अपने किए कर्मों का फल पावेंगे। यह विचार भी वैसा ही है जैसा कि असभ्य जंगलियों का होता है।
यह तो हुआ धार्मिकों का विचार जिसमें भौतिक और अभौतिक का भेद उतना नहीं है; जिसके अनुसार स्वर्ग में भी जाकर मनुष्य वही सुख भोगेगा जो भूतात्मक शरीर से भोगता है। शरीर और आत्मा को पृथक् माननेवाले दार्शनिक अपना सिद्धांत कुछ अधिक स्पष्ट रूप में प्रकट करते हैं। वे शरीर को नश्वर और भौतिक मानते हैं और आत्मा को अमर, अभौतिक और चिन्मय। थोड़े काल के लिए दोनों का संयोग हो जाता है। युरोप के देशों में इस सिद्धांत का प्रचार पहले पहल प्लेटो (अफलातून) नामक यूनान देश के दार्शनिक ने किया। उसने शरीर के साथ संयोग होने के पहले और वियोग होने के उपरान्त प्रत्येक आत्मा को शुद्ध रूप में मानकर 'आवागमन' के सिद्धांत का समर्थन किया। उसने बतलाया कि एक शरीर छोड़कर आत्मा अपने अनुकूल दूसरे शरीर में जाती है। पुण्यात्माओं की आत्मा अच्छी योनि में जाती है और पापियों की बुरी योनि में। शरीरविज्ञान, अंगविच्छेदशास्त्र गर्भविज्ञान आदि की दृष्टि से यदि विचार किया जाय तो यह बात बच्चों की सी जान पड़ती है।
कुछ दार्शनिक आत्मा को एक पृथक् तत्व मानते हुए भी उसका ठीक ठीक लक्षण नहीं बतला सकते। कभी तो वे उसकी सत्ता भावरूप में मानते हैं और कभी वस्तुरूप में। वैज्ञानिक अद्वैत दृष्टि से यदि हम परमतत्व का निरूपण करते हैं तो उसमें द्रव्य और शक्ति (गति) को ओतप्रोत भाव में लेते हैं क्योंकि दोनों का नित्य सम्बन्ध है। अत: आत्मतत्व के अन्तर्गत भी ये हैं- आत्मशक्ति अर्थात इन्द्रियसंवेदन, अन्त:संस्कार, प्रवृत्ति आदि गत्यात्मक व्यापार, और आत्मद्रव्य अर्थात सजीव कललरस जो कि शक्ति या मनोव्यापारों का आधार है। मनुष्य आदि उन्नत प्राणियों में यह आत्मद्रव्य संवेदनसूत्रों का अंग है और संवेदनसूत्रा विहीन क्षुद्र जीवों में उनके कललरसमय शरीर का। आत्मा के व्यापार के लिए वाह्यकरण अर्थात ज्ञानेन्द्रियाँ और अन्त:करण आवश्यक हैं। बिना इन भूतात्मक अवयवों के किसी प्रकार का आत्मव्यापार नहीं हो सकता। पर आत्मा की एक निर्दिष्ट सत्ता है, वह शरीर की अन्त:क्रियाओं की निर्दिष्ट समष्टि है।
आत्मा और शरीर को परस्पर निरपेक्ष मानने वाले द्वैत दृष्टि के दार्शनिकों का भाव आत्मतत्व के सम्बन्ध में ऐसा नहीं है। वे अमर आत्मा को द्रव्य मानते हुए भी उसे अगोचर और गोचर शरीर से भिन्न मानते हैं। अत: अगोचरता आत्मा की एक विशेषता मान ली गई है। कुछ लोग तो आत्मा को ईथर वा आकाशद्रव्यवत् एक अत्यंत सूक्ष्म, अगोचर पदार्थ मानते हैं। यही धारणा प्राचीनों की भी थी। वे समझते थे कि मरने पर शरीर तो जड़ द्रव्य के रूप में रह जाता है और आत्मा निकलकर उड़ जाती है।
ईथर से आत्मा की तुलना ईधर थोड़े ही दिनों से होने लगी है जब से विद्युत् और प्रकाश की गति आदि के सम्बन्ध में परीक्षा द्वारा बहुत सी बातें प्रकट हुई हैं। पर ईथर का विचार मैं आगे चलकर करूँगा जिससे प्रकट हो जायेगा कि आत्मा को ईथरवत् बतलानेवाला चिदाकाशवाद भी ठीक नहीं है। जिस प्रकार ईथर वा आकाशद्रव्य समस्त विश्व में स्थूल पिंडों और परमाणुओं के बीच व्याप्त है उसी प्रकार कललरस या मस्तिष्क के अणुओं के बीच आकाशरूप आत्मा को व्याप्त मानने पर भी मनोव्यापारों के हेतु का निरूपण नहीं होता।
आत्मा को वायुरूप समझनेवालों की संख्या बहुत अधिक है। यह समझ बहुत पुरानी है। प्राण शब्द वायुवाचक है जिसके कारण जीव प्राणी कहलाते हैं। श्वासरूपिणी जीवन शक्ति का नाम प्राण रखा गया था। पर साधारणा जनों के बीच वह जीवात्मा ही के रूप में माना जाता है। वे किसी के मरने पर कहते हैं कि उसका प्राण निकल गया। मृत पुरुषों की आत्माओं या प्रेतों को वे वायुरूप ही मानते हैं। वायुरूप मानते हुए भी वे उनमें शरीरवयवयुक्त जीवों के से व्यापार मानते हैं। किसी किसी आध्यात्मिक मंडली ने तो उनके फोटो तक तैयार किए हैं।
परीक्षात्मक भौतिक विज्ञान ने समस्त गैसों या वायु पदार्थों को द्रवरूप में और बहुतों को स्थूलरूप तक में परिणत करके दिखा दिया है। इस प्रकार वायु जो अपनी सूक्ष्मता के कारण अग्राह्य वा अदृश्य मानी जाती थी वह दृश्य और ग्राह्य करके दिखा दी गई। अब यदि आत्मा वायुरूप पदार्थ होती तो उसे भी द्रव रूप में ला सकते। किसी मुनष्य के मरने के समय उसमें से निकलनेवाली वायुरूपी आत्मा को पकड़कर हम उसे द्रवरूप में एक शीशी के भीतर बन्द करके दिखाते कि यह लो 'अमृतरस' तैयार है। यहीं तक नहीं, उस रसपर और भी अधिक ठंडक और दबाव डालकर हम एक बरफ की टिकिया बनाते और उसे 'आत्मा की बरफ' कहते। पर आज तक किसी ने भी ऐसा करके दिखाया नहीं।
आत्मा की अमरता के जितने प्रमाण दिए जाते हैं उनमें सत्य के अनुसंधान का कोई प्रयत्न नहीं पाया जाता, केवल एक प्रकार का राग या मन:प्रवृत्ति पाई जाती है। जैसा कि कांट ने कहा है आत्मा का अमरत्व शुद्धबुद्धि का निरूपण नहीं है, व्यवसायात्मिका बुद्धि की धारणा है। पर सत्य के अन्वेषण में हमें शुद्धबुद्धि को छोड़ और किसी बुद्धि से काम न लेना चाहिए। सत्य का निरूपण जब होगा तब शुद्ध बुद्धि के द्वारा, किसी प्रकार की अभिरुचि वा वासना के द्वारा नहीं। सत्य कैसा ही अप्रिय हो उसे ग्रहण करना ही पड़ेगा।
आत्मा के अमरत्व के जितने प्रमाण दिए जाते हैं उनमें से एक भी वैज्ञानिक कोटि का नहीं, एक भी ऐसा नहीं जो शरीरविज्ञानानुसारी मनोविज्ञान और जंतुओं की उत्पत्तिपरम्परा सम्बन्धी सिद्धांत के आधार पर हो। मतवादियों और धर्मवादियों की यह बात कि ईश्वर आत्माओं को कुछ काल तक के लिए पहले से तैयार शरीरों में भेजा करता है, अथवा सृष्टि के आदि में उसने मनुष्यरूपी पुतले के शरीर में अपनी रूह फूँक दी थी, कपोलकल्पना मात्र है। कुछ लोगों का यह कथन कि यदि आत्मा नित्य न होती तो संसार में धर्म की व्यवस्था न रहती सर्वथा निर्मूल है। यह विचार कि मनुष्य की आत्मा अपनी 'परमगति' को इस पार्थिव जीवन में नहीं प्राप्त कर सकती, उसकी पूर्णता के लिए उत्क्रमण आवश्यक है, मनुष्य के महत्त्व की झूठी भावना पर अवलम्बित है। यह समझना कि सांसारिक जीवन में जो अनेक प्रकार के अन्याय होते हैं, अनेक प्रकार की इच्छाएँ अपूर्ण रह जाती हैं, उन सबका प्रतिकार या पूर्ति परलोक या परजन्म में होगी, दुराशा मात्र है। यह बात भी प्रमाणविरुद्ध है कि मनुष्य मात्र में आत्मा के अमरत्व या ईश्वर के अस्तित्व की भावना स्वाभाविक है। बहुत सी ऐसी जातियाँ हैं जिनमें इस प्रकार की कोई भावना नहीं। आत्मा के अमरत्व की सिद्धि के लिए उपस्थित की जाने वाली ये सब युक्तियाँ वैज्ञानिक अनुसंधानों से नि:सार प्रमाणित हो चुकी हैं।
इन नि:सार युक्तियों के विरुद्ध जो वैज्ञानिक प्रमाण मिलते हैं वे ये हैं। शरीरविज्ञान से इस बात का पूरा प्रमाण मिलता है कि आत्मा शरीर से स्वतन्त्र कोई अभौतिक सत्ता नहीं है। मस्तिष्क के व्यापारों की समष्टि का नाम ही आत्मा है और ये व्यापार भी शरीर के और व्यापारों के समान भौतिक और रासायनिक नियमों के अधीन हैं। मस्तिष्क के सूक्ष्म अन्वीक्षण द्वारा आत्मव्यापार के साधक अवयवों का पता लगता है। परीक्षा द्वारा यह देखा गया है कि आत्मा के भिन्न भिन्न व्यापार मस्तिष्क के भिन्न भिन्न भागों पर अवलम्बित हैं। यदि वे भाग नष्ट हो जाते हैं तो उनके द्वारा होनेवाले व्यापार भी बन्द हो जाते हैं। इस बात का प्रमाण प्रकृति हमें बराबर देती रहती है। भ्रूणवृद्धि और शिशुवृद्धि आदि के क्रम को देखने से हमें पता चलता है कि किस प्रकार मनुष्य की आत्मा भी क्रमश: बढ़ती जाती है और प्रौढ़वस्था में परिपक्व हो जाती है। इतना ही नहीं, जरावस्था में वह शिथिल और क्षीण भी होती है। जीवों की वर्गोत्पत्ति परम्परा की ओर ध्यान देने से पता लगता है कि मनुष्य का मस्तिष्क और उसका व्यापार आत्मा, और दूसरे स्तन्य जीवों के मस्तिष्क से उन्नत होते होते बना है। इसी प्रकार स्तन्य जीवों का मस्तिष्क दूसरे क्षुद्र कोटि के रीढ़ वाले जंतुओं के मस्तिष्क से उन्नत होते होते बना है। आत्मा की घटती बढ़ती उत्पत्तिधर्म और अनित्यता का प्रमाण है, अमरत्व का नहीं।
आधुनिक विज्ञान के अन्वेषणों से आत्मा के अमरत्व का सर्वथा खंडन हो गया है। कुछ दिनों पीछे इसकी चर्चा वैज्ञानिक क्षेत्र से बिलकुल उठ जायेगी, केवल आँख मूँदकर विश्वास करनेवालों में रह जायेगी। आत्मा के अमरत्व का विश्वास एक अन्धविश्वास मात्र रह जायेगा। पर अभी सभ्य से सभ्य देश के करोड़ों मनुष्य इस अन्धविश्वास को अपनी 'परमनिधि' समझते हैं। इसे वे कदापि छोड़ना नहीं चाहते। पर मैं इस बात को दृढ़ता के साथ कहता हूँ कि आत्मा के अमरत्व की भावना मोह के अतिरिक्त और कुछ नहीं। इसे त्यागने से मनुष्य जाति की हानि कुछ नहीं, और लाभ बहुत है।
आत्मा को अमर मानने की प्रबल वासना का कारण क्या है? क्यों लोगों की यह इच्छा रहती है कि आत्मा अमर सिद्ध हो? इसके मुख्य कारण दो हैं- एक तो यह आशा कि परलोक में अधिक सुख मिलेगा, दूसरी यह आशा कि मृत्यु के कारण जिन प्रिय जनों का वियोग हुआ है वे फिर देखने को मिलेंगे। इस संसार में बहुत सी भलाईयाँ हम दूसरों के साथ करते हैं जिनके बदले की कोई आशा यहाँ नहीं होती। अत: हम एक ऐसे अनन्त जीवन की वांछा करते हैं जिसमें सब बदले पूरे हो जायें और सदा सुख और शान्ति बनी रहे। भिन्न भिन्न जातियों में स्वर्ग की भावना उसकी सुख की भावना के अनुसार है। मुसलमानों के बिहिश्त में सुन्दर छायादार बगीचे हैं, मीठे पानी के चश्मे जारी हैं, हूर और गिलमा सेवा के लिए हैं। ईसाइयों का स्वर्ग भी सुखसंगीतपूर्ण है, अमेरिका के आदिम निवासियों के स्वर्ग में शिकार खेलने के लिए बड़े बड़े मैदान हैं जिनमें असंख्य भैंसे और भालू फिरा करते हैं। ध्यान देने की बात है कि लोग स्वर्ग में उन्हीं सब सुखों को भोगने की कामना करते हैं जिन्हें वे यहाँ अपनी इन्द्रियों के द्वारा भोगते हैं। वे कानों से स्वर्गीय संगीत सुनेंगे, आँखों से अप्सराओं का नृत्य देखेंगे और रसना से अमृत का स्वाद लेंगे। इन सब सुखों को वे अनन्त काल तक भोगेंगे। आत्मा को अभौतिक आदि मानते हुए भी उसे परलोक में भौतिक सुखों का भोक्ता माने बिना नहीं रह सकते।
अमर्त्यवाद मानने की इच्छा सबसे बढ़कर इसलिए होती है कि उससे उन प्रियजनों से फिर मिलने की आशा बँधाती है जिनसे इस जीवन में वियोग हो जाता है। पर यदि ऐसा होना मान भी लें तो भी हमारी स्थिति कुछ विशेष सुखदायक नहीं हो सकती क्योंकि जिस प्रकार प्रियजन मिल सकते हैं उसी प्रकार वे शत्रु भी तो मिल सकते हैं जिन्होंने यहाँ नाक में दम कर रखा था। ऐसे करोड़ों आदमी मिलेंगे जो स्वर्ग का सारा सुख छोड़ने के लिए तैयार हो जायँगे यदि वे समझें कि ऐसा करने से स्त्री या नानी से भेंट हो जायेगी।
अमरवादियों से एक बात और पूछने की है। वह यह कि स्वर्ग का सुख भोगने वाली आत्मा किस अवस्था की होगी, शैशवावस्था की, तरुणावस्था की या जरावस्था की1। यदि किसी बालक की आत्मा शरीर से मुक्त होकर स्वर्ग को गई तो क्या उसे उसी प्रकार धीरे धीरे परिपक्व होना पड़ेगा जिस प्रकार यहाँ अपने अनुभव की उत्तरोत्तर वृद्धि और गुरुजनों की शिक्षा द्वारा वह परिपक्व होती है? क्या बुङ्ढे की आत्मा वहाँ जाकर निरन्तर क्षीयमाण ही रहेगी?
ईसाइयों, मूसाइयों आदि का कयामत का ख्याल तो सबसे गया बीता है। वे समझते हैं कि मनुष्यों की आत्माएँ शरीर से निकल निकल कर बराबर जमा होती जायेगी और सृष्टि के अन्तिम दिन में दो दलों में बाँटी जायेगी। एक दल तो स्वर्ग में अनन्तकाल का सुख भोगने के लिए जायेगा, दूसरा नरक में चिरकाल तक के लिए यन्त्रणा भोगने के लिए जायेगा। यह सब करेगा कौन? दयामय आसमानी बाप। वही क्षणिक जीवन के बीच किए हुए पुण्य के लिए अनन्त सुख और पाप के लिए अनन्त दु:ख देगा?
आध्यात्मिक दर्शन धर्माचार्यों की इन स्थूल पौराणिक कल्पनाओं को न मानकर आत्मा की सत्ता सब भूतों से परे मानता है। पर आजकल के परीक्षात्मक तत्ववाद में इस प्रकार की ऊटपटाँग भावना के लिए कोई जगह नहीं। सारांश यह कि आत्मा के अमरत्व का प्रवाद आधुनिक विज्ञान के परीक्षात्मक निश्चयों के सर्वथा विरुद्ध है।


1 जो लोग आत्मा को अजर आदि मानते हैं वे यह प्रश्न सुनकर चौंकेंगे। पर हैकल ने पहले ही कह दिया है कि आत्मा भी विविध अवस्थाओं को प्राप्त होती है, अर्थात वह भी जवान और बुङ्ढी होती है। हिन्दुओं की स्वर्गसम्बन्धिनी भावना कुछ समाधान कारक है। वे स्वर्गवासी अमरों को अजर मानते हैं।


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