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आलोचना

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली
भाग 6
विश्वप्रपंच

रामचंद्र शुक्ल
संपादन - ओमप्रकाश सिंह

अनुक्रम बारहवाँ प्रकरण - मूलप्रकृति की व्यवस्था पीछे     आगे

प्रकृति का सर्वव्यापक गुण, समस्त विश्व का एक अखंड धर्म परमतत्व का धर्म है। इस गुण का पता लगना ज्ञानक्षेत्र में सबसे बड़ी विजय है क्योंकि प्रकृति के और नियम इसके वशवर्ती हैं। इस मूलप्रकृति या परमतत्व के धर्म के अन्तर्गत दो अखंड नियम हैं एक तो द्रव्य की अक्षरता का और दूसरा शक्ति का अक्षरता का। यदि विचारपूर्वक देखा जाये तो ये दोनों नियम परस्पर अभिन्न हैं; ये एक दूसरे से अलग नहीं किए जा सकते। कुछ लोग ऐसे भी हैं जो इस अभिन्नता को नहीं मानना चाहते। पर शुद्ध तत्वदृष्टि रखनेवाले दार्शनिकों के निकट यह प्रत्यक्ष है। अब संक्षेप में इन दोनों नियमों का उल्लेख किया जाता है।
द्रव्य की अक्षरता या अनश्वरता का नियम, जिसका अनुसंधान और जिसकी व्याख्या लवायशियर नामक एक फ्रांसीसी वैज्ञानिक ने पहले पहल सन् 1789 में की, इस प्रकार है। द्रव्य जो अनन्त दिक् में व्याप्त है उसका योग सदा समान रहता है, उसमें किसी प्रकार की घटती बढ़ती नहीं हो सकती। द्रव्य का कोई पिंड जो हमारे देखने में लुप्त हो जाता है, वह वास्तव में नष्ट नहीं होता, केवल अपना रूप बदल देता है। जब कपूर जल जाता है तब उसके अणुओं का नाश नहीं होता, उसके अणु धुएँ, काजल या अन्य किसी रूप में बने रहते हैं। जब मिट्टी की डली पानी में घुल जाती है तब वह स्थूल से तरल रूप में हो जाती है। इसी प्रकार जहाँ कोई नया पदार्थ उत्पन्न होता दिखाई देता है वहाँ भी रूप परिवर्तन मात्र ही समझना चाहिए। मेह की झड़ी वायु में मिली भाप है जो बूँदों के रूप में होकर गिरती है। लोहे के ऊपर जो मुरचा लग जाता है वह उसी धातु की एक तह है जो पानी और हवा में मिली आक्सिजन के साथ मिलकर मुरचे के रूप में हो जाती है। प्रकृति के बीच कभी किसी नए अर्थात अतिरिक्त द्रव्य की उत्पत्ति या सृष्टि नहीं होती और न द्रव्य के किसी एक कण का भी नाश या प्रधवंसाभाव होता है। यह बात निर्विवाद है और इसी पर आधुनिक रसायनशास्त्र की स्थिति है। इसका निश्चय हम जब चाहें तब वैज्ञानिकों के मानयत्रों तराजू द्वारा कर सकते हैं। 'द्रव्य की नित्यता' का निश्चय अब वैज्ञानिक मात्र को है।
शक्ति की अक्षरता या नित्यता का सिद्धांत इस प्रकार है। शक्ति अर्थात गतिशक्ति जो अनन्त दिक् में कार्य करती है और समस्त व्यापार जिसके परिणाम हैं उसका योग सदा समान रहता है। उसमें किसी प्रकार की घटती बढ़ती नहीं होती। गतिशक्ति का न कभी क्षय होता है और न कोई अतिरिक्त नई शक्ति विश्व में उत्पन्न होती है। एंजिन जब तक खड़ा रहता है तब तक भाप की गतिशक्ति निहित या संचित रहती है। जब वह दौड़ता है तब भाप की वही निहित शक्ति व्यक्त या क्रियमाण शक्ति के रूप में परिवर्तित हो जाती है। यह व्यक्त या क्रियामाण शक्ति कई रूपों में दिखाई पड़ती है। ताप, पिंडगति, शब्द, प्रकाश विद्युत् आदि व्यक्त शक्ति के ही भिन्न भिन्न रूप हैं। भौतिक विज्ञान ने एक रूप की शक्ति को दूसरे रूप की शक्ति में परिणत करके दिखा दिया है। ताप पिंडों को गति के रूप में परिवर्तित किया जा सकता है, पिंडों की गति शब्द या प्रकाश के रूप में और प्रकाश विद्युत् के रूप में। एक रूप से दूसरे रूप में परिवर्तित होने पर वेग की मात्र उतनी ही बनी रहती है, उसमें अन्तर नहीं पड़ता। जीती जागती गतिशक्ति का कोई अंश न कभी क्षय को प्राप्त होता है और न किसी नवीन अंश की विश्व में उत्पत्ति होती है। यह सिद्धांत सन् 1842 में पूर्णरूप से निर्धारित हो गया। शरीरविज्ञान में भी यह सिद्धांत पूर्णरूप से घटता है। पर शरीर के भीतर एक अतीत शक्ति माननेवाले शरीरविज्ञानी तथा द्वैतभावापन्न दार्शनिक अभी तक उसका विरोध करते जाते हैं। उनके मत में शरीर के भीतर चेतन व्यापार संपादन करनेवाली जो आध्यात्मिक शक्ति है वह सर्वथा स्वतन्त्र है-वह भौतिक गतिशक्ति के नियमाधीन नहीं है। वे आत्मा के इच्छा, द्वेष आदि व्यापारों को सर्वथा स्वतन्त्र मानते हैं। पर अद्वैत तत्वदृष्टिसम्पन्न वैज्ञानिक इनको भी गतिशक्ति का ही एक उन्नत रूप मानते हैं।
द्रव्य की अक्षरता का सिद्धांत और गतिशक्ति की अक्षरता का सिद्धांत दोनों वस्तुत: एक ही हैं; यह बात आधुनिक अद्वैतवाद में बड़े काम की है। इन दोनों सिध्दान्तों में उसी प्रकार नित्य सम्बन्ध है जिस प्रकार द्रव्य और शक्ति में। ये वस्तुत: अन्योन्याश्रित क्या अभिन्न हैं। अद्वैतदृष्टि के बहुत से दार्शनिकों को तो इनकी अभिन्नता या एकता सर्वथा प्रत्यक्ष है क्योंकि ये एक ही पदार्थ विश्व के दो रूपों से सम्बन्ध रखते हैं। पर प्रत्यक्ष होने पर भी यह बात सबको स्वीकृत नहीं है। शक्ति और द्रव्य, आत्मा और शरीर को पृथक् माननेवाले द्वैतवादी दार्शनिक, अतीत शक्ति माननेवाले शरीरविज्ञानी तथा शरीर और आत्मा के व्यापारों को दो सहगामी व्यापार माननेवाले मनोविज्ञानी इसका घोर विरोध करते हैं। यहाँ तक कि व्याहत दृष्टि के कुछ अद्वैतवादी दार्शनिक भी यह कहते हैं कि द्रव्य और शक्ति की एकता मानने पर भी 'चेतना' एक ऐसी वस्तु रह जाती है जो इस एकता के अन्तर्गत नहीं आती, जो द्रव्य और भौतिक शक्ति के नियमों से परे प्रतीत होती है। पर मुझे तो पूरा निश्चय है कि 'चेतना' भी द्रव्य और भौतिक शक्ति के नियमाधीन है, उससे परे नहीं। द्रव्य का नियम और गतिशक्ति का नियम दोनों अभिन्न हैं। व्यवहार के लिए उनकी अलग अलग भावना मात्र मनुष्य को होती है। दोनों नियमों के समाहार को हम 'परमतत्व का धर्म' कहते हैं जिसका वशवर्ती अखिल ब्रह्मांड है। कार्यकारण व्यवस्था इसी के अन्तर्गत है।
युरोप में स्पिनोजा (सन् 1677) पहला दार्शनिक है जिसके विचार में 'परमतत्व' की शुद्ध भावना आई। उसी ने पहले पहल ईश्वर और जगत् की एकता का प्रतिपादन किया1। इस प्रकार युरोप में शुद्ध अद्वैतवाद की नींव पड़ी। स्पिनोजा ने बतलाया कि यह 'परमतत्व' अपनी सत्ता को दो रूपों में व्यक्त करता है। एक द्रव्य के रूप में अर्थात अनन्त दिक् में व्याप्त पदार्थ या तत्व के रूप में और दो आत्मा के रूप में अर्थात सर्वव्यापिनी गतिस्वरूपा चित् शक्ति के रूप में2। संसार के सब पदार्थ, सब जीव, जिनकी हमें अलग अलग भावना होती है, इसी परमतत्व के विशेष विशेष क्षणभंगुर नाम रूप हैं3। इन नाम रूपों का जब हम विस्तार के गुणानुसार विचार करते हैं तब वे द्रव्यात्मक वस्तु कहलाते हैं, और जब चित् शक्ति या क्रियाशक्ति के रूप में विचार करते हैं तब गति या बुद्धि क्रिया कहलाते हैं। स्पिनोजा के इस गूढ़ विचार का समर्थन हम आज भी करते हैं और द्रव्य अर्थात दिक् में व्याप्त परम तत्व और शक्ति अर्थात गति या वेग को एक ही सर्वव्यापक परमतत्व की दो अभिव्यक्तियाँ मानते हैं।
आधुनिक विज्ञान में परमतत्व के सम्बन्ध में जो भिन्न भिन्न सिद्धांत प्रचलित हैं उनमें मुख्य दो हैं- प्रथम अणुदोलन सिद्धांत और द्वितीय आकुंचन सिद्धांत। दोनों सिध्दान्तों के अनुसार यह निश्चय पक्का ठहरता है कि आकर्षण, विद्युत्, प्रकाश और ताप इत्यादि सब एक ही मूल गतिशक्ति के रूपान्तर हैं। पहले अणुदोलनवाले सिद्धांत को लेते हैं। इसके अनुसार मूल गतिशक्ति द्रव्य के परमाणुओं का क्षोभ है। ये परमाणु जड़ हैं और दूर से एक दूसरे पर आकर्षण प्रभाव डालकर शून्य में नाचते रहते हैं। इस सिद्धांत का प्रवर्तक न्यूटन है जिसने युरोप में आकर्षण सिद्धांत की स्थापना 

1 भारतवर्ष में ईश्वर और जगत् की एकता का सिद्धांत अत्यंत प्राचीन काल में निश्चित हुआ था। उपनिषद् की 'सर्वखल्विदं ब्रह्म' की भावना बहुत पुरानी है। वेदान्ती लोग भी ईश्वर को जगत् का 'अभिन्ननिमित्तोपादान' बतला कर ईश्वर और जगत् की एकता का आभास देते हैं।
2 द्वे बाव ब्रह्मणो रूपे मूर्त×चैवरामूत्ता×च, मर्त×चैवामृर्त×च, स्थितं च यच्च सच्च त्यच्च।-वृहदारण्यक-मूर्तामूर्त ब्राह्मण।
3 इन नाम रूपों की क्षणभंगुरता का विषय हमारे यहाँ आकाश के दृष्टान्त द्वारा समझाया गया है। जैसे घट के भीतर का आकाश विशेष रूप का दिखाई पड़ता है, पर घडे क़े फूटने पर वह घटाकाश नहीं रह जाता अर्थात आकाश का वह स्वरूप नहीं रह जाता।

की। सन् 1687 में अपने सिद्धांत ग्रंथ में उसने दिखाया कि समस्त विश्व आकर्षण 
के नियम पर चलता है। यह आकर्षण पदार्थों के गुरुत्व और उनकी बीच की दूरी के हिसाब से होता है। पिंड जितने ही भारी होंगे उतने ही अधिक वेग से आकर्षण होगा और एक दूसरे से जितने ही अधिक दूर होंगे उतना ही आकर्षण का वेग कम होगा। इसी व्यापक नियम के अनुसार फल पेड़ पर से टूटकर पृथ्वी पर गिरता है, समुद्र की लहरें ऊपर की ओर उठती हैं और ग्रह सूर्य के चारों ओर घूमते हैं। न्यूटन ही ने इस नियम के परिचालन का ठीक ठीक हिसाब गणित करके दिखाया। न्यूटन के निरूपण से इस बात का तो पता लगा कि आकर्षण किस हिसाब से होता है पर इसका पता कुछ भी न लगा कि यह होता किस प्रकार है। यह कहने से कि एक ग्रहपिंड दूर से बिना किसी मध्यवर्ती वाहक के दूसरे पिंडों में गति उत्पन्न करता है, आकर्षण का विधान कुछ भी समझ में नहीं आता। अत: यह कोई आश्चर्य की बात नहीं कि दूर से बिना किसी आधार के होनेवाली यह क्रिया न्यूटन को एक गूढ़ रहस्य या ईश्वरी माया प्रतीत हुई हो, जिसके कारण उसने अपना शेष जीवन बाइबिल की बेसिर पैर की बातों की उधोड़बुन में बिताया।
इस अणुदोलन सिद्धांत के विरुद्ध हाल का आकुंचन सिद्धांत है। इसके अनुसार जगत् की मूल गति शून्य स्थान में अणुओं का दोलन या कम्पन नहीं है बल्कि अनन्त दिक् में अखंड रूप से व्याप्त मूलद्रव्य या परमतत्व का आकुंचन या जमाव है। इस परमतत्व की मूलगति आकुंचित होने या जमने की प्रवृत्ति है जिसके कारण जमाव के अनन्त केन्द्र उत्पन्न हो जाते हैं। अखिल मूल प्रकृत्ति या परमतत्व के सूक्ष्म कण परमाणु रूप ही हैं। पर अणुदोलन सिद्धांतवाले इन परमाणुओं को जैसा मानते हैं वैसे वे नहीं होते। उनमें एक प्रकार की संवेदना या प्रवृत्ति जिसे मूल वासना या मनोगति कह सकते हैं, होती है। अत: इन अणुओं को एक प्रकार की मूल आत्मा1 से युक्त मानना चाहिए। एक बात और है। आत्माओं से युक्त ये परमाणु शून्य में नहीं फिरते हैं बल्कि एक अत्यंत सूक्ष्म और प्रवाह रूप मध्यवर्ती द्रव्य में घूमते हैं जो जमा नहीं रहता। मूलद्रव्य के जमने में जो क्षोभ होता है उससे क्षोभ के बहुत से केन्द्र बनते हैं जिनके चारों ओर असंख्य परमाणु एकत्र होकर परस्पर मिलते हैं और आसपास के द्रव्य से अधिक स्थूलता प्राप्त करते हैं। इस रीति से मूलप्रकृति या परमतत्व जो अपनी मूल साम्यवस्था में सर्वत्रा एकरस रहता है, दो रूपों में हो जाता है। क्षोभ के केन्द्र जिनका घनत्व साम्यवस्था के मूलद्रव्य के सामान्य घनत्व से अधिक हो जाता है, पिंडों के स्थूल उपादान होते हैं; और उनके बीच के स्थानों में व्याप्त सूक्ष्म मध्यवर्ती जिनका घनत्व साम्यवस्था के मूलद्रव्य के सामान्य घनत्व 

1 आत्मा से अभिप्राय यहाँ चैतन्य का नहीं है, केवल जड़ प्रवृत्ति का है। चेतना को हैकल गुणविकास मानते हैं।

से कम हो जाता है, वह ईथर या सूक्ष्म अगोचर आकाशद्रव्य हो जाता है। एक मूलतत्व के पिंड और ईथर इन दो पदार्थों में विभक्त हो जाने से दोनों पदार्थों में निरन्तर विरोध चलता रहता है। यही विरोध समस्त भौतिक व्यापारों का कारण है। इच्छा या प्रवृत्तियुक्त स्थूल द्रव्य निरन्तर संयुक्त और घनीभूत होने का प्रयत्न करता रहता है और इस व्यापार द्वारा विपुल मात्र में निहित गतिशक्ति का संचय करता है। उसके विरुद्ध सूक्ष्म अग्राह्य द्रव्य निरन्तर इस बात का प्रयत्न करता रहता है कि उस पर और अधिक खिंचाव न पड़े और इस प्रकार वह अधिक से अधिक व्यक्त या क्रियामाण गतिशक्ति का संचय करता है।
यह आकुंचन सिद्धांत मूल प्रकृति की एकता का निश्चय रखनेवाले जीवविज्ञानियों को अणुदोलन सिद्धांत की अपेक्षा अधिक मान्य है। पर अणुदोलन सिद्धांतवाले वैज्ञानिक आकुंचन सिद्धांत स्वीकार नहीं करते। दोनों अनुमानमूलक सिध्दान्तों में जो विरोध है वह केवल गति के प्रकार में है, मूल प्रकृति या परमतत्व की गति दोनों मानते हैं। आकुंचन सिद्धांत चाहे अभी अपूर्ण हो, उसमें बहुत सी त्रुटियाँ हों, पर यह मानना ही पड़ेगा कि अणुदोलन सिद्धांत में जो दोष थे वे इसके द्वारा बहुत कुछ स्पष्ट हो गए हैं। आज इसी सिद्धांत का अनुसरण करके मैं अद्वैतदृष्टि से परमतत्व के सम्बन्ध में ये बातें निश्चित करता हूँ-
1. परमतत्व के ये दोनों रूप अर्थात द्रव्य और ईथर जड़ नहीं हैं। वे किसी बाहरी शक्ति के द्वारा परिचालित नहीं होते बल्कि उनमें स्वयं संवेदन और इच्छा अत्यंत निम्न श्रेणी की होती है। एक में जमाव की इच्छा और दूसरे में खिंचाव की अनिच्छा होती है।
2. विश्व में कहीं कोई स्थान शून्य नहीं। जो स्थान स्थूल परमाणुओं से पूर्ण नहीं, वह ईथर से व्याप्त है।
3. एक पिंड दूसरे में जो गति आदि उत्पन्न करता है वह या तो संसर्ग द्वारा अथवा ईथर की मध्यस्थता द्वारा।
परमतत्व के सम्बन्ध में ऊपर जिन दोनों सिध्दान्तों का उल्लेख हुआ है वे दोनों अद्वैत सत्ता सूचित करते हैं; क्योंकि परमतत्व के जो दो अवस्था भेद हैं- द्रव्य और ईथर, वे उसके मूल रूप नहीं हैं। पर अध्यात्मपक्ष के दार्शनिकों का द्वैतमत कुछ और ही है। वे दो प्रकार के तत्व मानते हैं- भौतिक और अभौतिक। भौतिक तत्व उन पदार्थों का उपादान है जो भौतिक विज्ञान और रसायनशास्त्र के नियमाधीन हैं। अभौतिक तत्व आध्यात्मिक जगत् में है जो समस्त भूतों से परे है, अत: भौतिकविज्ञान के नियमों के बाहर है। इस अध्यात्म जगत् में 'आत्मशक्ति', 'अबाधा इच्छाशक्ति' या इसी प्रकार का कोई हौवा काम करता है। इन विचारों के खंडन में प्रवृत्त होने की कोई आवश्यकता नहीं, क्योंकि आजतक अनुभव द्वारा न तो किसी अभौतिक तत्व का पता लगा है न और किसी ऐसी क्रिया या शक्ति का जो द्रव्याश्रित न हो। यहाँ तक कि गतिशक्ति अर्थात क्रियाशक्ति के सबसे जटिल और विशद भेद जो जीवधारियों के बुद्धि आदि व्यापार हैं, वे भी भूतात्मक द्रव्य विधान के आश्रित हैं; मस्तिष्क के अवयवों की परिस्थिति और रसविकार पर अवलम्बित हैं। इन अवयवों और रसविकारों से पृथक् उनकी भावना हो नहीं सकती।
स्थूल द्रव्य का विश्लेषण आदि रसायन शास्त्र का विषय है। रसायन शास्त्र ने ईधर जो आश्चर्यजनक उन्नति की है वह किसी से छिपी नहीं है। प्रकृति में जितने पदार्थ हैं विश्लेषण करने पर वे कुछ मूलद्रव्यों के योग से बने पाए गए हैं। मूलद्रव्य का अभिप्राय यह है कि यदि उसका और विश्लेषण किया जाय तो उसमें और किसी भिन्न द्रव्य का योग पाया जायेगा। अब तक सत्तर या पचहत्तर मूलद्रव्यों में से केवल चौदह ऐसे हैं, जो इस पृथ्वी पर बहुत अधिक व्याप्त हैं। बाकी जो हैं उनमें से अधिकांश धातुएँ हैं; जैसे लोहा, सोना, सीसा इत्यादि। मेंडालायक नामक एक रूसी रसायनवेत्ता ने इन मूलद्रव्यों को परमाणुओं के गुरुत्व के अनुसार वर्गों में बाँटा है। इस वर्गीकरण में समान गुणवाले मूलद्रव्य एक वर्ग में आ जाते हैं। इन वर्गों में जो परस्पर सम्बन्ध है उसे देखने से प्राणिवर्गों और वनस्पति वर्गों के परस्पर सम्बन्ध की ओर ध्यान जाता है। अत: जिस प्रकार एक मूलरूप से सम्पूर्ण प्राणिवर्गों की उत्पत्ति हुई है उसी प्रकार मूलद्रव्य के इन वर्गों की भी उत्पत्ति समझी जा सकती है। क्रुक्स आदि रसायनज्ञों ने सूचित किया है कि समस्त मूलद्रव्यों का विकास एक आदिम मूलद्रव्य से हुआ है।
दार्शनिकों का अणुवाद तो बहुत पुराना है। पर रसायन शास्त्र में परमाणुवाद की स्थापना डाल्टन नामक एक वैज्ञानिक ने की। उसी ने पहले पहल प्रत्येक मूलद्रव्य के परमाणुओं का गुरुत्व निश्चित किया1 जिसके आधार पर आधुनिक रसायन शास्त्र के सिद्धांत स्थिर किए गए हैं। ये सिद्धांत परमाणुमूलक हैं क्योंकि इनमें प्रत्येक मूलद्रव्य एक ही प्रकार की सूक्ष्मअतिसूक्ष्म कणिकाओं के योग से बना माना गया है। ये परमाणुमूलक सिद्धांत परीक्षात्मक या अनुभवसिद्ध हैं क्योंकि ये ठीक ठीक बतलाते हैं कि किस हिसाब से एक मूलद्रव्य के परमाणु दूसरे मूलद्रव्य के परमाणुओं के साथ मिलते हैं। रसायनशास्त्र इसके आगे नहीं जाता। वह यह नहीं बतलाता कि परमाणुओं की आकृति, प्रकृति, अन्त:क्रिया आदि कैसी हैं। 2
भिन्न भिन्न मूलद्रव्यों का भिन्न भिन्न मूलद्रव्यों के साथ जो परस्पर प्रीतिसम्बन्ध है वह ध्यान देने योग्य है। यह प्रीतिसम्बन्ध कुछ मूलद्रव्यों के रासायनिक रीति से मिलने और कुछ के न मिलने में देखा जाता है। मूलद्रव्यों के व्यापार में उदासीनता 

1 गुरुत्व से यह न समझना चाहिए कि परमाणुओं की ठीक ठीक तौल बतला दी गई। उनके गुरुत्व का केवल सम्बन्ध बताया गया कि यदि एक का गुरुत्व एक माना जाय तो दूसरे का दो होगा और तीसरे का चार होगा।
2 परमाणु की ईधर और परीक्षा हुई है। दे भूमिका।

से लेकर प्रबल से प्रबल प्रीति का उसी प्रकार दृष्टान्त मिलता है जिस प्रकार मनुष्यों, विशेषकर स्त्री पुरुषों के व्यापार में। वह प्रबल प्रेम जिससे स्त्री पुरुष एक दूसरे की ओर आकर्षित होते हैं वही प्रबल चेतनानिरपेक्ष 'अचेतन' आकर्षण है, जिसकी प्रेरणा से शुक्रकीटाणु गर्भकीटाणु में प्रवेश करता है और हाइड्रोजन के परमाणु आक्सिजन के परमाणुओं के साथ मिलते और जलकणिका की सृष्टि करते हैं। इसका समर्थन शरीराणुरूप घटकों की अन्त:क्रिया या मनोव्यापार की परीक्षा द्वारा भी होता है। इन बातों के आधार पर हमारा यह निश्चय है कि द्रव्य के एक परमाणु में भी मूलरूप की संवेदना और इच्छा अथवा अनुभूति और प्रवृत्ति होती है। उसमें भी एक अत्यंत मूलरूप की अत्यंत सादे ढंग की आत्मा होती है। इन परमाणुओं के योग से बने हुए अणुओं में भी इसी प्रकार की अल्प आत्मा होती है। भिन्न भिन्न प्रकार के अणु मिलकर ऐसे रासायनिक द्रव्य या रस जैसे कललरस हो जाते हैं जिनमें ऊपर लिखे अनर्तव्यापार भी अधिक गूढ़ और जटिल रूपधारणा कर लेते हैं। प्राणियों के व्यापार इसी प्रकार के अनर्तव्यापार हैं।
यहाँ तक तो स्थूल द्रव्य की बात हुई। अब अत्यंत सूक्ष्म द्रव्य ईथर को लीजिए जो भौतिक विज्ञान का विषय है। प्रकाश किस प्रकार एक पिंड से निकलकर दूसरे पिंड पर जाता है, इसके समाधान के लिए एक अत्यंत सूक्ष्म और पतले मध्यवर्ती द्रव्य का अस्तित्व भौतिक विज्ञान में कुछ दिनों से माना जाने लगा था। पर उसका विशेष रूप से परिचय तब हुआ जब विद्युत् के तत्त्वों की छानबीन की गई, उसके अनेक प्रकार के प्रयोग किए गए और उसकी गति आदि की मीमांसा की गई। अब ईथर की वास्तविक सत्ता वैज्ञानिकों में सर्वत्रा मानी जाती है। पर अभी कुछ लोग ऐसे भी हैं जो कहते हैं कि ईथर एक अनुमान मात्र है। ऐसा कहनेवाले सृष्टितत्व से अनभिज्ञ दार्शनिक और चलते हुए साधारण लेखक ही नहीं, कुछ वैज्ञानिक लोग भी हैं। पर यह कोई आश्चर्य की बात नहीं, क्योंकि ऐसे करामाती दार्शनिक भी हुए हैं जिन्होंने इस दृश्य जगत् तक की सत्ता अस्वीकार की है। उनकी समझ में केवल एक ही वास्तविक सत्ता है, वही उनकी परम प्रिय अमर आत्मा। युरोप में डेकार्ट, बक्र्ले और फिक्ट इसी प्रकार के दार्शनिक हुए हैं। कई एक ने तो इस आत्माद्वैतवाद को तत्वज्ञवर कांट के इस कथन का ठीक अभिप्राय न समझने के कारण ग्रहण किया है कि वाह्य जगत् का हमें जो बोध होता है वह प्रतीतिमूलक है, अर्थात उन्हीं रूपों में होता है जिन रूपों में इन्द्रियों के सहित हमारे मन को दिखाई पड़ता है। कांट का कहना है कि वस्तुओं का चित्तानिरपेक्ष वास्तव स्वरूप मनुष्य नहीं जान सकता। 

1 ध्यान रखना चाहिए कि आत्मा से हैकल का अभिप्राय चेतना का नहीं है। चेतना को वे एक ऐसी वृत्ति मानते हैं जो मस्तिष्क या अन्त:करण के कुछ उन्नत होने पर उत्पन्न होती है।
2 भारतवर्ष में इनके बहुत पहले यह मत प्रकट हुआ था।

पर यदि अन्त:करण द्वारा हमें भूतात्मक जगत् का अपूर्ण और परिमित ज्ञान ही प्राप्त हो सकता है, तो यह कोई ऐसा कारण नहीं जिससे हम एकदम जगत् का अस्तित्व ही न मानें। अस्तु, ईथर का होना उसी प्रकार निश्चित है जिस प्रकार स्थूल द्रव्य का होना। जिस प्रकार गुरुत्व आदि के अनुभव द्वारा हमें स्थूल द्रव्य के अस्तित्व का निश्चय होता है उसी प्रकार विद्युत्क्रिया और रश्मिविश्लेषण की परीक्षा और अनुभव द्वारा हमें ईथर के अस्तित्व का निश्चय होता है।
यद्यपि ईथर का अस्तित्व अब प्राय: सब वैज्ञानिक मानते हैं और उसके बहुत से गुणों का परिचय विद्युत् की क्रिया और प्रकाश की किरनों की विविध परीक्षाओं द्वारा सब को हो गया है, पर उसके वास्तविक रूप और प्रकृति के सम्बन्ध में कोई एक निश्चित मत नहीं। जिन वैज्ञानिकों ने ईथर के विषय में विशेष रूप से विचार किया है उनके मत परस्पर विभिन्न और विरुद्ध हैं। अत: जो मत मुझे सबसे ठीक जान पड़ा है उसे मैं नीचे देता हूँ-
1. आकाश द्रव्य ईथर एक अखंड और अनवच्छिन्न द्रव्य है अर्थात अण्वात्मक नहीं है और सम्पूर्ण दिक् में व्याप्त है; यहाँ तक कि परमाणुओं के बीच जो अन्तर होता है वह भी ईथर से परिपूर्ण रहता है।
2. ईथर के अण्वात्मक न होने से उसमें कोई रासायनिक गुण नहीं माना जा सकता, वह सर्वत्रा एकरस रहता है। क्योंकि यदि ईथर को भी अत्यंत सूक्ष्म अणुओं के द्वारा संयोजित मानें तो फिर इन ईथराणुओं के बीच कोई और भी सूक्ष्म तत्व अखंड रूप से व्याप्त मानना पड़ेगा। पर इस प्रकार बराबर मानते चले जाने से अनवस्था आती है। अत: कहीं न कहीं चलकर हमें एक अखंड, अनवच्छिन्न तत्व मानना ही पड़ेगा।
3. जब कि शून्य स्थान की भावना हो नहीं सकती और एक पिंड का दूसरे पिंड पर दूर से बिना किसी मध्यस्थ के, आकर्षण आदि प्रभाव डालना सम्भव नहीं, तब ईथर के विषय में यही मानना उचित है कि स्थूल द्रव्य के समान उसका ढाँचा अणुघटित नहीं, बल्कि आकाशीय या गत्यात्मक अर्थात प्रकाश आदि की किरणों का वाहकस्वरूप और आकर्षणशक्ति का प्रवर्तकस्वरूप है। ईथर वायु से कहीं अधिक सूक्ष्म आकाशरूप तत्व है।
4. ईथर को हम अग्राह्य द्रव्य कह सकते हैं क्योंकि उसकी तौल आदि जानने का कोई साधान हमारे पास नहीं है। यदि उसमें कुछ गुरुत्व हो तो भी उसको जानना वैज्ञानिकों के सूक्ष्म से सूक्ष्म मानयत्रों की शक्ति के बाहर है।
5. आकुंचन सिद्धांत के अनुसार द्रव्य ईथर या आकाशीय रूप से उत्तरोत्तर जमाव की प्रक्रिया द्वारा वायु रूप में आ सकता है, ठीक उसी प्रकार जैसे वायु द्रव्य द्रवरूप में, और द्रव स्थूल या ठोसरूप में परिणत हो सकता है।
6. अत: उत्तरोत्तर रूपप्राप्ति क्रम के अनुसार द्रव्य की पाँच अवस्थाएँ कही जा सकती हैं- ईथरीय या आकाशीय, वायु, द्रव, कणात्मक, जैसे कललरस की होती है, और ठोस।
7. ईथर दिक् के समान अनन्त और अपरिमेय है। वह सदा गति में रहता है। पिंडगति अर्थात आकर्षण के साथ परस्पर कार्य करती हुई ईथर की यही नित्यगति, चाहे यह क्षोभ के रूप में मानी जाय अथवा खिंचाव या जमाव के रूप में; जगत् के सम्पूर्ण व्यापारों का मूल कारण है।
व्यक्त प्रकृति; जगत्
ईथर (आकाशरूप द्रव्य)-अग्राह्य पिंड-ग्राह्य
1 स्वरूप 1 स्वरूप
आकाशीय (अर्थात न वायु , ठोस, द्रव व वायु 
न द्रव, न ठोस)
2 विधान 2 विधान 
अण्वात्मक नहीं, अखंड अण्वात्मक, अत्यंत सूक्ष्म
और व्यापक परमाणुओं से संघटित और खंडित
3 गुण 3 गुण
प्रकाश, ज्योतिर्मय ताप, विद्युत् गुरुत्व, अधिचलल, 
और चुम्बक अण्वात्मक ताप, रासायनिक प्रवृत्ति

ईथर अर्थात आकाश द्रव्य और ग्राह्य अर्थात स्थूल द्रव्य सदा एक दूसरे के लगाव में ही नहीं रहते बल्कि एक दूसरे पर अपनी क्रिया करते हैं। प्रकृति के गुणों और व्यापारों को हम दो वर्गों में बाँट सकते हैं-ईथर के गुण और व्यापार, स्थूल द्रव्य के गुण और व्यापार।
द्रव्य के गुणों और व्यापारों के ये दोनों वर्ग द्रव्य के उन्नति विधान में आदि कार्यविभाग हैं। पर कार्यत: अलग होते हुए भी ये दोनों वर्ग सदा सम्बन्धसूत्रा में बँधे रहते हैं और एक दूसरे पर कार्य क्रिया करते हैं। यह जानी हुई बात है कि विद्युत् और रश्मिसम्बन्धी व्यापारों और ग्राह्य द्रव्य के भौतिक और रासायनिक विकारों में घनिष्ठ सम्बन्ध होता है। ईथर का ज्योतिर्मय ताप भौतिक पिंड के ताप के रूप में परिणत किया जा सकता है। इसी प्रकार एक रूप की गतिशक्ति दूसरे रूप की गतिशक्ति में परिवर्तित हो सकती है। इन बातों से स्पष्ट है कि परमतत्व के दोनों रूप, ईथर और पिंड, सदा मिलकर कार्य किया करते हैं।
जैसा कि पहले कहा जा चुका है कि विश्व में गतिशक्ति का योग सदा एक ही रहता है, हमारे चारों ओर चाहे जो उलटफेर हों उसमें कुछ भी अन्तर नहीं पड़ता। गतिस्वरूपा शक्ति भी उस द्रव्य के समान, जो उसका आश्रय है, नित्य और अनन्त है। प्रकृति का सारा रंगस्थल चराचर का खेल है। उसमें पदार्थ कभी चल और कभी अचल होते रहते हैं। जो पदार्थ स्थिर या अचल रहते हैं उनमें उसी प्रकार गतिशक्ति रहती है जिस प्रकार चलायमान् पदार्थों में, अर्थात वह निहित या संचित रहती है। यही निहित शक्ति जब व्यक्त हो जाती है तब वे पदार्थ गति में होते हैं। इस भौतिक जगत् में निहित शक्ति की और व्यक्त शक्ति की मात्र अक्षुण्ण और एकरस रहती है। निहित गतिशक्ति व्यक्त गतिशक्ति के रूप में या व्यक्त शक्ति निहित के रूप में एक ठीक बँधे हुए हिसाब से परिवर्तित होती है। जिस हिसाब से एक ओर एक की वृद्धि होती है उसी हिसाब से दूसरी ओर दूसरी का ह्रास होता है। अत: अन्त में शक्ति की मात्र उतनी ही रहती है, उसमें अन्तर नहीं पड़ता।
भौतिक विज्ञान में जब परमतत्वसम्बन्धी नियम निश्चित हो गए तब शरीर विज्ञानियों ने उनकी चरितार्थता शरीरियों में भी दिखलाई। उन्होंने सिद्ध किया कि जड़ पदार्थों के नियमित व्यापार जैसे गतिशक्ति की विविध क्रियाओं के अनुसार होते हैं वैसे ही जीवों के सब शरीर व्यापार, जैसे एक धातु से दूसरी धातु में परिवर्तन आदि, गतिशक्ति की नियमित क्रियाओं के अनुसार होते हैं। उदि्भदों और जंतुओं की वृद्धि और पोषण आदि व्यापार ही नहीं, बल्कि उनके संवेदन और अंगसंचालन, उनके इन्द्रिय व्यापार और अन्त:करण व्यापार भी, निहित गतिशक्ति के व्यक्त गतिशक्ति में और व्यक्त गतिशक्ति के निहित गतिशक्ति में परिवर्तित होने पर अवलम्बित हैं। मनुष्य तथा दूसरे उन्नत प्राणियों में जो मन या बुद्धि की वृत्तियाँ कहलाती हैं वे भी परमतत्व के इन्हीं नियमों के अधीन हैं।
भौतिक अद्वैतदृष्टि से देखा जाय तो यह स्पष्ट है कि परमतत्वसम्बन्धी नियम विश्व में सर्वत्रा चलता है। यह बात ध्यान देने योग्य है, क्योंकि इससे विश्व की एकमूलता का और उसके अन्तर्गत होनेवाली सारी बातों के कार्यकारण सम्बन्ध का निरूपण ही नहीं होता बल्कि ईश्वर, आत्मस्वातन्त्रय और अमरत्व इन तीन काल्पनिक प्रवादों का एकदम निराकरण भी हो जाता है।


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