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आलोचना

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली
भाग 6
विश्वप्रपंच

रामचंद्र शुक्ल
संपादन - ओमप्रकाश सिंह

अनुक्रम सत्रहवाँ प्रकरण -विज्ञान और ईसाई मत पीछे     आगे

विगत शताब्दी से विज्ञान और ईसाई मत के बीच विरोध बढ़ता चला जाता है। ज्यों ज्यों विज्ञान की उन्नति होती जाती है त्यों त्यों उन मतों की असारता प्रमाणित होती जाती है जो दिव्य दृष्टि या दैवी आभास के बल पर बुद्धि का दमन करके उसे बन्धन में रखते आए हैं। ऐसे ही मतों में से एक ईसाई मत भी है। जितनी ही दृढ़ता के साथ आधुनिक ज्योतिर्विज्ञान, भौतिक विज्ञान और रसायन शास्त्र ने समस्त जगत् के चलानेवाले नियमों का निरूपण किया है और उदि्भद्विज्ञान, जंतुविज्ञान और मानवविज्ञान ने इन नियमों की चरितार्थता सजीव सृष्टि के बीच दिखलाई है, उतने ही कट्टरपन के साथ ईसाई मत ने द्वैतवादी दर्शन का सहारा लेकर 'आध्यात्मिक क्षेत्र' में अर्थात मस्तिष्क व्यापार के एक विभाग में, इन प्राकृतिक नियमों की चरितार्थता अस्वीकार की है।
आधुनिक विज्ञान द्वारा निश्चित बातों और ईसाई मत की पुरानी सड़ी गली बातों के बीच कितना गहरा विरोध है, इसे कई लेखक अच्छी तरह दिखा चुके हैं। ईसाई मत ने अपनी स्थिति के लिए विज्ञान से जो लड़ाई ठानी उसके द्वारा उसने अपने विनाश के सामान और भी अधिक इक्कट्ठे कर लिए। दार्शनिक रीति से इस बात को हार्टमान ने अपने 'ईसाई मत का आत्मविनाश' नामक ग्रंथ में अच्छी तरह दिखाया है। इस मत का संसार के एक बड़े भाग की सभ्यता पर कितना प्रभाव पड़ता है इसको देखते हुए उसके इतिहास पर दृष्टि डालना आवश्यक है। ईसाई मत के चार रूप कहे जा सकते हैं जो उसे आंरभ से अब तक प्राप्त हुए हैं-
(1) प्राचीन ईसाई मत ईसवी सन् की पहली से तीसरी शताब्दी तक, 
(2) पोपों द्वारा परिचालित महन्ती ईसाई मत चौथी से पन्द्रहवीं शताब्दी तक, 
(3) पुन: संस्कार प्राप्त ईसाई मत सोलहवीं से अठारहवीं शताब्दी तक और 
(4) आजकल का नाम मात्र का ईसाई मत।
प्राचीन ईसाई मत
ईसाई मत अपने आदि रूप में 300 वर्ष तक रहा। ईसा, जिसने ईसाई मत चलाया, दया और प्रेम से परिपूर्ण था पर उस समय की यूनानी, मिश्री आदि सभ्य जातियों के ज्ञान विज्ञान से कोसों दूर था। यहूदियों में प्रचलित किस्से कहानियों के अतिरिक्त वह और कुछ भी नहीं जानता था। वह अपनी लिखी एक पंक्ति भी नहीं छोड़ गया। यूनानी दर्शन और विज्ञान उससे 500 वर्ष पहले ही किस उन्नत अवस्था को पहुँच चुके थे इसका उसे कुछ भी परिज्ञान न था।
उसके विषय में हमें जो कुछ जानकारी है वह नई बाइबिल (इंजील) के द्वारा जिसके अन्तर्गत चार सुसमाचार और प्रेरितों के पत्र हैं। पहले चार सुसमाचारों की बात लीजिए। प्रत्येक इतिहासवेत्ता जानता है कि उनका संग्रह पहली और दूसरी शताब्दी के ढेर के ढेर जाली कागजों और पोथियों में से चुन कर हुआ है। दूसरी शताब्दी में यह संग्रह धर्मशास्त्र के रूप में व्यवस्थित हुआ पर चौथी शताब्दी तक घटाने और बढ़ाने का काम थोड़ा बहुत जारी रहा। सेंट जिरोम नामक एक प्राचीन धर्माचार्य ने लिखा है कि ईसवी सन् 325 में निकेआ के धर्मसंघ में उक्त संग्रह में एक पोथी और जोड़ी गई थी। आधुनिक विद्वानों ने तीन सुसमाचारों, मत्ती, मार्क और लूक जो इन तीनों के मरने के पीछे औरों के द्वारा लिखे गए; का ईसवी सन् 65 और 100 के बीच और योहन के समाचार का ईसवी सन् 125 के कुछ पहले लिखा जाना निश्चित किया है। पर इससे यह न समझना चाहिए कि ये चारों सुसमाचार जिस रूप में आज मिलते हैं उसी रूप में पहले भी थे। इनमें न जाने कितना फेरफार हुआ है। ईसा की मृत्यु के 150 वर्ष तक तो इन सुसमाचारों का पुस्तक रूप में संकलन हुआ ही नहीं था। सेंट जस्टिन के समय से ही इनका एक सम्बद्ध ग्रंथ के रूप में होना पाया जाता है। उसके पहले इनके कुछ वाक्य ही ईधर उधर उध्दृत पाए जाते हैं, पुस्तकों के रूप में इनका उल्लेख नहीं मिलता। अस्तु, इन सुसमाचारों में जो कथाएँ पाई जाती हैं उनका यदि कोई इन पुस्तकों के संकलन के पहले प्रमाण ढूँढ़ना चाहे तो नहीं मिल सकता। ईसा की मृत्यु के 100-125 वर्ष पीछे ही इन कथाओं का प्रचार पाया जाता है। किसी महात्मा या मतप्रवर्तक के सम्बन्ध में कितनी जल्दी जल्दी अलौकिक कथाएँ जुड़ती जाती हैं इसका जिन्हें अनुभव है वे कदापि इतने पीछे संकलित की हुई पुस्तकों में लिखी हुई बातों को ठीक नहीं मान सकते1। 

1 भारतवर्ष में तो साधुओं और महात्माओं के सम्बन्ध में अलौकिक कथाओं का जोड़ा जाना एक बहुत साधारण बात है। सारा भक्तमाल ऐसी ही अलौकिक और अप्राकृतिक कथाओं से भरा पड़ा है। मुर्दे जलानेवाले, लड़की से लड़का कर देनेवाले, नदी के जल से घी का काम लेनेवाले न जाने कितने हुए हैं। अयोध्या में बाबा रघुनाथ दास, बाबा माधोदास अभी हाल में ही हुए हैं। एक जीवित महात्मा 

सबसे पहले लिखी जानेवाली पोथी (मार्क) का काल यदि हम ईसवी सन् 70 मान लें तो भी कथाओं के जुड़ने और फैलने के लिए यथेष्ट समय माना जा सकता है।
पाल प्रेरित के पत्रों से भी ईसा के जीवनवृत्तान्त का कुछ विशेष पता नहीं लगता। अस्तु, ईसाई मत का प्रवर्तक कैसा था, उसने क्या क्या काम किए, यह ठीक ठीक नहीं कहा जा सकता। उसके सम्बध में जो अनेक प्रकार की कथाएँ पीछे लिखी गई हैं उन्हें माननेवाले अब दिन दिन कम होते जा रहे हैं। पवित्रात्मा द्वारा क्वारी कन्या के गर्भ से ईसा की अलौकिक उत्पत्तिवाली कथा अब इंगलैंड, जर्मनी आदि देशों में प्रक्षिप्त कह कर टाली जा रही है। इसी प्रकार कब्र से उठना, सदेह स्वर्ग जाना, मुर्दे जलाना इत्यादि जो अलौकिक बातें धर्म पुस्तक में पाई जाती हैं, उनकी चर्चा अब पढ़े-लिखे लोगों के बीच नहीं होती। इस प्रकार ईसा का जो चित्रा बाइबिल ने जनसाधारण के चित्ता में अंकित कर रखा था वह क्रमश: हवा होता जाता है।
ज्यों ज्यों विद्वान् लोग ईसा के वास्तविक चरित्र और उपदेश के सम्बन्ध में ऐतिहासिक छानबीन करते जाते हैं और कुछ कुछ असल बातों का पता लगता है त्यों त्यों मतभेद बढ़ता जाता है। दो तत्व निर्विवाद ठहरते हैं, दया दाक्षिण्य का सिद्धांत और आचरण का प्रधान नियम अर्थात दूसरों के साथ तू वैसा ही कर जैसा तू चाहता है कि दूसरे तेरे साथ करें। पर धर्म के ये दोनों तत्व ईसा से हजारों वर्ष पहले प्राचीन सभ्य जातियों के बीच पूर्णरूप से प्रतिष्ठित थे1A

महन्ती या रोमक मत
कैथलिय सम्प्रदाय में धर्माचार्य पोप की आज्ञा सब बातों में मान्य समझी जाती है। पुराने समय में पोप लोगों का प्रताप और वैभव बहुत बढ़ा चढ़ा था। युरोप के बड़े बड़े बादशाह उनके डर से काँपते थे। राजाओं को राजसिंहासन से च्युत करना, धर्मद्रोह का अपराध लगा कर लोगों को चिता पर बिठा कर भस्म करना उनके लिए एक साधारण बात थी। ईसाई मत ईसा के शिष्यों द्वारा पहले यूनान में पहुँचा, वहाँ से फिर रोम में गया। रोम ही से वह इंगलैंड आदि देशों में फैला। अत: महन्त की 

 का जीवनचरित उनके कुछ भक्तों ने लिखा है जिसमें बहुत से चमत्कार वर्णन किए गए हैं, जैसे आँख मूँदते ही सैकड़ों कोस दूर एक स्टेशन से दूसरे स्टेशन पर पहुँच जाना, ईश्वर का आकर सरकारी काम पूरा कर जाना इत्यादि। किसी साधारण आदमी से पूछिए वह किसी न किसी करामाती बाबा का नाम जरूर जानता होगा। पर ऐसे ऐसे करामातियों की कथाएँ मूर्ख सम्प्रदायों या पन्थों ही में विशेषत: प्रचलित हैं। शंकराचार्य का अनुयायी कोई वेदान्ती ऐसी बातों की चर्चा नहीं करेगा।
1 शरशय्या पर भीष्म ने जो उपदेश दिए हैं उनमें एक यह भी है कि जो अपने को अच्छा लगे उसे दूसरों के लिए भी अच्छा समझे और जो अपने को अप्रिय है उसे दूसरों के लिए भी अप्रिय समझे। 
जैगीषव्य ने इसी प्रकार देवल से कहा था कि 'जो उनके ऊपर आघात करते हैं उनसे वे (मनीषी) बदला लेने की भी इच्छा नहीं रखते।'

गद्दी वहीं स्थापित हुई। रोमक सम्प्रदाय के ईसाई सब बातों में पुरानी पद्धति के अनुयायी हैं। उनके यहाँ जो प्रार्थना होती है वह लैटिन भाषा में। उनके गिरजों में ईसा की माता मरियम तथा अनेक महात्माओं या सन्तों की मूर्तियाँ होती हैं। 1200 वर्ष तक युरोप का आध्यात्मिक शासन इसी सम्प्रदाय के हाथ में रहा। अब भी इसको मानने वाले संसार में बहुत अधिक हैं। 50 करोड़ ईसाइयों में से 25 करोड़ रोमक मत के हैं। सबसे अधिक ध्यान देने की बात यह है कि इतने दिनों के बीच यह एशिया के प्राचीन धर्मों पर कुछ भी प्रभाव न डाल सका। अब भी वहाँ साढ़े पचास करोड़ बौद्ध और बीस बाईस करोड़ हिन्दू वर्तमान हैं।
चौथी शताब्दी से सोलहवीं शताब्दी तक युरोप में रोमक मत का एकाधिपत्य रहा। उस बीच में घोर अन्धाकार छाया रहा। पोपों के अत्याचार से स्वतन्त्र विचार का अवरोध रहा, ज्ञान विज्ञान का मार्ग बन्द रहा, अन्याय और व्यभिचार का प्रचार रहा। ईसा के पूर्व यूनान और रोम आदि की प्राचीन सभ्यता के प्रभाव से जो जातियाँ ज्ञान के उन्नत सोपान पर आरूढ़ हो चुकी थीं वे ईसाई मत के कुप्रभाव के कारण एकदम पतित होकर बर्बरावस्था को प्राप्त हो गईं। विश्वास को बुद्धि पर प्रधानता दी गई। बुद्धि के द्वारा तत्वचिन्तन और वैज्ञानिक अनुसंधान का कुछ महत्त्व ही न रह गया क्योंकि सब लोग ईसाई धर्माचार्यों के उपदेशानुसार कल्पित परलोक की तैयारी ही में हैरान रहने लगे।
सन् 325 में पोप कांस्टेंटाइन की अध्यक्षता में निकेआ के धर्मसंघ की बैठक हुई थी। तभी से प्राचीन काल के दर्शन और साहित्य पर प्रहार आंरभ हुआ। उनका प्रचार बन्द किया गया। यहाँ तक कि बहुत से ग्रंथनष्ट कर दिए गए। स्वतन्त्र दर्शन और विज्ञान की चर्चा ही उठ गई। जो कोई सृष्टिविज्ञान आदि के सम्बन्ध में अपना स्वतन्त्र विचार प्रगट करता था वह जींदा जला दिया जाता था। इस प्रकार 1200 वर्ष तक परम शक्तिशाली पोपों के अत्याचार से सारा युरोप अज्ञान के बन्धन में पड़ा रहा।
ईसाई धर्म के जो मुख्य तत्व हैं वे सदाचार सम्बन्धी हैं। उनकी रक्षा लोकरक्षा के लिए परम आवश्यक है। अत: यह बात नहीं है कि ईसाई मत ने ही पहले पहल उन तत्त्वों का उद्धाटन किया, ईसा के पहले किसी को उनका ज्ञान नहीं था। ईसा के कई हजार वर्ष पहले से धर्म के वे आदर्श भारतीय आर्यों, पारसियों, चीनियों, मिश्रियों, यूनानियों तथा और दूसरी सभ्यताप्राप्त जातियों के बीच पूर्णरूप से प्रतिष्ठित थे। इन प्राचीन जातियों के बीच उनकी स्थापना अत्यंत दृढ़ नींव पर थी। पोपों के आडम्बर के आगे धर्म के वास्तव अंग छिप गए। स्वर्गप्राप्ति कराने का ठेका होने लगा, मुक्ति बिकने लगी। अधर्मियों अर्थात पोप की इच्छा के प्रतिकूल चूँ करनेवालों के लिए स्थान स्थान पर विशेष न्यायालय (या अन्यायालय) खुल गए। सन् 1481 और 1498 के बीच अकेले स्पेन में 8000 मनुष्य जींदे जलाए गए, 900 मनुष्यों की जायदाद जब्त की गई। इसी प्रकार हालैंड में पाँचवें चार्ल्स के राजत्वकाल में पादरियों की रक्तपिपासा यहाँ तक बढ़ी कि 500 मनुष्यों के प्राण अनेक प्रकार की दुर्दशा से लिए गए। एक ओर तो निरअपराध प्राणी घोर यन्त्रणा से हाहाकार करते थे दूसरी ओर सारे युरोप का धन धर्मदंड के रूप में पोप के खजाने में जाता था और अनेक प्रकार के उपभोगों से ईसा के अनुयायी धर्माचार्यों की आत्माएँ तुष्ट होती थीं। उपदंसग्रस्त पोप दसवें लिओ ने एक बार मौज में आकर कह ही डाला कि 'ये सब अधिकार और उपभोग हम लोगों को ईसा की कहानी की बदौलत ही प्राप्त हैं।'
रोमक मत के प्रताप से समाज की दशा एकदम बिगड़ गई, उसकी सारी व्यवस्था नष्ट हो गई। अज्ञान, दारिद्रय और अन्धविश्वास के साथ साथ व्यभिचार खूब बढ़ा। क्वारे रहने का जो नियम चलाया गया उससे व्यभिचार में पूरी सुगमता हो गई। एक एक मठ में हजारों क्वारे बाबा और क्वारी संन्यासिनें रहने लगीं। अनेक प्रकार के छल, पाखंड और मिथ्या प्रवादों के द्वारा व्यभिचार लीला होने लगी। अनीश्वरवादी ईश्वर के न होने के जो अनेक प्रमाण दिया करते हैं उनमें यह भूल जाते हैं कि 1200 वर्ष तक 'ईसा के नायब' ने जो अनेक प्रकार के घृणित अत्याचार प्रजा पर किए वे सब ईश्वर के नाम पर ही। मुहम्मद के अनुयायियों ने जो इतने प्राणियों की हत्या की वह अल्लाह के नाम पर ही।
संस्कारप्राप्त ईसाई मत
सोलहवीं शताब्दी के आंरभ के साथ ही युरोप में एक नया युग उपस्थित हुआ। जर्मनी के लूथर ने ईसाई मत का संस्कार किया। पोप द्वारा प्रचारित व्यवस्था का खंडन किया गया। उसका एकाधिपत्य अस्वीकृत किया गया। छापे के प्रचार और देशों के संसर्ग से विद्या की चर्चा पहले ही से हो चली थी। अत: संशोधित मत के प्रचार में बड़ी सुगमता हुई। जो पोपों के अत्याचार से दबे हुए थे वे इस नए सम्प्रदाय का सहारा पाकर बहुत प्रबल हुए। संस्कृत सम्प्रदाय दिन दिन बढ़ता गया। लोगों की बुद्धि, जो इतने दिनों तक कड़े बन्धन में पड़ी थी, कुछ कुछ मुक्त हो कर ईधर उधर दौड़ने लगी। सृष्टि के वास्तव तत्त्वों की ओर ध्यान जाने लगा। लूथर ने पोपों के पाखंड का तो खंडन किया पर जिस घोर अन्धविश्वास का सहारा लेकर ईसाई मत खड़ा हुआ था उससे वह अपने को मुक्त नहीं कर सका था। वह जिन्दगी भर बाइबिल की बातों को ईश्वरवाक्य कहता रहा। ईसा का कब्र से जी उठना, मनुष्य जाति का शापवश मूल ही से पापग्रस्त होना, संसार में होनेवाली छोटी से छोटी बात का पूर्व ही से निश्चित होना, केवल विश्वास द्वारा ही धर्मसम्बन्धी बातों का समाधान तथा इसी प्रकार की ओर दूसरी कल्पनाओं का वह कट्टर समर्थक था। कोपरनिकस के भूभ्रमणसिद्धांत को उसने मूर्खता बतलाया क्योंकि बाइबिल में जोशुवा ने सूर्य को ठहर जाने के लिए कहा है पृथ्वी को नहीं। सुधारे हुए ईसाई मत के अनुयायियों का कट्टरपन भी कुछ कम नहीं था। उन्हीं में से एक ने एक डॉक्टर को इसलिए जलवा दिया कि उसने ईसाई मत की त्रिदेव कल्पना पर अविश्वास प्रकट किया था। पर इन दोषों के रहते हुए भी ईसाई मत के संस्कार द्वारा बड़ा काम हुआ। पोपों का भय हट जाने से लोगों की बुद्धि बन्धनमुक्त हो गई और अनेक विषयों पर स्वतन्त्र विचार प्रकट किए जाने लगे। दर्शन और विज्ञान की उन्नति का रास्ता खुल गया और थोड़े ही दिनों में उस नवीन युग का आंरभ हो गया जो 'विज्ञानयुग, कहलाता है।
आजकल का ईसाई मत
अठारहवीं शताब्दी के आंरभ ही से विद्या के विविध अंगों की उन्नति आंरभ हुई। प्रकृति के अनेक विभागों की छानबीन में लोग अग्रसर हुए। उन्नीसवीं शताब्दी ने तो ज्ञान के अनेक नए क्षेत्र खोल दिए। अंगविच्छेद शास्त्र की सहायता से भिन्न भिन्न जंतुओं की शरीररचना का मिलान किया गया। भिन्न भिन्न जीवों की उत्पत्ति किस क्रम से हुई इसके निर्धारित हो जाने पर मनुष्य की उत्पत्ति का सिद्धांत स्थिर किया गया। सन् 1838 में शरीरसंयोजक घटकों का पता लग जाने से यह प्रत्यक्ष हो गया कि सब प्राणियों के शरीर इन्हीं घटकों या जीवाणुओं की व्यवस्थित योजना से बने हैं। भौतिक कारणों से ही पृथ्वी की उत्पत्ति सिद्ध हो गई। द्रव्य और शक्ति की अक्षरता के सिद्धांत द्वारा सृष्टि के समस्त व्यापारों की व्याख्या की गई। लोकों की उत्पत्ति और लय का व्यापार नित्य स्थिर किया गया। अन्त में डारविन ने अपने विकास सिद्धांत द्वारा सजीव सृष्टि में होनेवाले व्यापारों का समाधान भौतिक रीति से करके इन सबका एक में समाहार कर दिया।
अब देखना चाहिए कि इस विज्ञान की इस अपूर्व उन्नति के आगे आधुनिक ईसाई मत की स्थिति क्या है? ईसाई मत की बातें तो वैज्ञानिक अनुसंधान से सर्वथा असंगत और नि:सार प्रमाणित हुईं। इससे रोमक सम्प्रदाय ने तो हताश होकर अपना कट्टरपन और भी अधिक बढ़ा दिया। वह अब तक अपने अन्धविश्वासों का समर्थन तथा दिन दिन बढ़ते हुए विज्ञान का विरोध तन मन से करता चला आ रहा है। रहा संस्कार प्राप्त (प्रोटेस्टांट) उदार ईसाई मत, उसने सर्वात्मवाद या अद्वैतवाद की शरण ली और विरोधों के परिहार की नाना युक्तियाँ ढूँढ़ने में लगा। वैज्ञानिक अन्वेषणों द्वारा जो प्राकृतिक नियम स्थिर हुए और उन नियमों को लेकर जो दार्शनिक तत्व निरूपित हुए, उनके साथ वे ऐसी परिमार्जित धर्मभावना का अविरोध दिखाने में तत्पर हुए जिसमें अन्य मतों से भिन्न कोई विशेष लक्षण ही न रह गया। सामान्य धर्म जिसे हम ईसाई या इस्लाम किसी एक नाम से नहीं पुकार सकते; ही को लेकर यह भी ठीक वह भी ठीक वाला वितंडावाद कुछ चल सकता था अत: उसी को उन्होंने ग्रहण किया। पर यह बात लोगों पर अच्छी तरह खुल गई कि जिसे हम ईसाई मत कहते हैं उसका प्रत्येक आधार खंडित हो गया, अब केवल उसकी सदाचार सम्बन्धिनी बातों को ही लोग स्वीकार कर सकते हैं। लोगों के विचारों में तो इस प्रकार का परिवर्तन हुआ पर आधुनिक राज्यों में ईसाई मत के ऊपरी आडम्बर ज्यों के त्यों बने हुए हैं जिसके कारण शिक्षितों के बीच ईसाई मत मिथ्याडंबर के रूप में पाया जाता है। अब सभ्य देशों में ईसाई मत एक कृत्रिम और दिखाऊ रीति रस्म के ही रूप में रह गया है। भीतर भीतर तो आधुनिक विद्यालयों के प्रभाव से लोगों के विचार बिलकुल बदल गए हैं पर ऊपर से दिखाने के लिए वे अपने को ईसाई मत के अनुयायी प्रकट करते हैं। यह पाखंड या कपटधर्म समाज के लिए अनिष्टकर है। यह मिथ्या व्यवहार बहुत दिनों तक चल नहीं सकता।
ईधर यह कृत्रिम ईसाई मत इतना ढीला है कि इससे ज्ञानार्जन में किसी प्रकार की बाधा अब नहीं पड़ती है। उधर रोमक सम्प्रदाय ने ज्ञान का जो खुल्लम-खुल्ला विरोध आंरभ किया उससे शिक्षितों में बड़ी खलबली मची और उन पर उसका कुछ भी प्रभाव न रह गया। सन् 1854 में पोप ने मरियम की निर्दोष भावना के सिद्धांत1 की घोषणा की। 1864 में पोप की ओर से जो धर्माज्ञा निकली उसमें जितने वैज्ञानिक और दार्शनिक सिद्धांत निकले थे उन सबकी निन्दा की गई और उनका मानना धार्मिकों के लिए पाप ठहराया गया। 6 वर्ष पीछे पोप ने मूर्खता की हद कर दी और यह घोषणा प्रचलित की कि पोप दोष और भ्रम से परे है, उसके कार्य में कभी दोष और भ्रम हो ही नहीं सकता। वर्तमान समय में ऐसी ऐसी घोषणाओं का शिक्षित समुदाय पर क्या प्रभाव पड़ सकता है यह समझने की बात है।
अब रही अप्राकृतिक रीति से कुमारी मरियम के गर्भ से ईसा के जन्मवाली कथा। जो भिन्न भिन्न मतों की पौराणिक कथाओं से परिचित हैं वे अच्छी तरह जानते हैं कि इस प्रकार की जन्मकथाएँ ईसा के जन्म से बहुत पहले से प्राचीन जातियों में प्रचलित थीं। हिन्दूधर्म, बौद्धधर्म, पारसीधर्म, सबमें ऐसी कथाएँ पाई जाती हैं। जब किसी राजा या बड़े आदमी की कोई कन्या कुमारिकावस्था में ही गर्भवती हो जाती थी तब इस बात का प्रचार किया जाता था कि उसे किसी देवता, जैसे सूर्य, इन्द्र आदि से गर्भ रहा। ईसाइयों ने भी इसी प्रकार की कथा गढ़ी और ईसा की उत्पत्ति पवित्रात्मा से बतलाने लगे। इस प्रकार के 'देवपुत्र' प्राय: बड़े प्रतापी, यशस्वी और बुद्धिमान हुआ करते थे। यवन (यूनानी) और रोमक (रोमन) लोगों की प्राचीन कथाओं में इस प्रकार के देवपुत्रों के बहुत से वृत्तान्त हैं।

1 ईसाइयों के सिद्धांत के अनुसार पाप आदि ही से मनुष्य जाति के साथ लगा हुआ है। प्रत्येक मनुष्य पाप के साथ उत्पन्न होता है। ईसा की माता मरियम ही पाप से सर्वथा निर्लिप्त उत्पन्न हुईं। युक्तिपूर्वक विचार किया जाय तो पाप के साथ उत्पन्न होना और पाप से सर्वथा निर्लिप्त होना ये दोनों बातें कपोलकल्पना के अतिरिक्त और कुछ नहीं।

पवित्रात्मा द्वारा कुमारी मरियम के गर्भाधान की जो कथा है उस पर थोड़ा विचार आवश्यक है। बाइबिल की केवल दो पोथियों-मत्ती और लूक में इस कथा का उल्लेख पाया जाता है। पर इन दोनों पोथियों में शेष पोथियों के अनुकूल यह भी लिखा है कि मरियम की मँगनी यूसफ नाम के बढ़ई के साथ हो चुकी थी पर संयोग के पूर्व ही पवित्रात्मा द्वारा मरियम गर्भवती हो गई। पर जैसा पहले कहा जा चुका है ये चारों पोथियाँ ढेर पोथियों में से अधिक प्रामाणिक समझी जाकर चुन ली गई थीं। शेष पोथियाँ अत्यंत अधिक असम्बद्ध बातों और असम्भव वृत्तान्तों के कारण प्रक्षिप्त और अग्राह्य मानी गईं, जैसे; जेम्स, टामस और निकोडेमस रचित सुसमाचार। पर उनमें कई ऐसी हैं जो चार गृहीत सुसमाचारों से प्राचीनता में कम नहीं हैं। अत: ऐतिहासिक दृष्टि से जैसे ये चार सुसमाचार वैसी ही वे अगृहीत पोथियाँ जिन्हें प्रक्षिप्त बतलाकर लोगों ने अलग कर दिया है। उन अगृहीत पुस्तकों में से निकोडेमस रचित सुसमाचार है जिसका ईसा से 100-150 वर्ष बाद लिखा जाना विद्वानों ने निश्चित किया है। उसमें लिखा है कि यहूदियों ने ईसा पर व्यभिचार से उत्पन्न होने का दोष लगाया था। इस बात का समर्थन सेल्सस नामक एक यूनानी लेखक ने भी किया है जो ईसा की दूसरी शताब्दी में अर्थात निकोडेमसकी पोथी लिखे जाने के थोड़े ही आगे पीछे हुआ था। उसने लिखा है कि ईसा की माता को यूसफ नाम से बढ़ई ने तलाक देकर इसलिए छोड़ दिया था कि उस पर व्यभिचार का अभियोग लगाया गया था और पांथरास नामक एक सैनिक से उसे एक लड़का पैदा हुआ था। यह कथा यहूदियों के यहाँ भी पाई जाती है कि रोमन सेना के एक अफसर और मरियम के अनुचित सम्बन्ध से ईसा की उत्पत्ति हुई।
पर बाइबिल सम्बन्धी अनुसंधान करनेवाले अधिकांश विद्वानों ने ईसा को उस बढ़ई का पुत्र मानना ही अधिक उपयुक्त ठहराया है। कई देशों में यूसफ और मरियम के विवाह के पूर्व की प्रेमलीला बड़ी भावभक्ति के साथ कही-सुनी जाती है। पवित्रात्मा वाली अप्राकृतिक कथा का अब विद्वानों में आदर नहीं रहा है। अत: जब इस अप्राकृतिक कल्पना का परित्याग हो ही रहा है तब इसका पता लगा तो क्या, न लगा तो क्या कि ईसा का बाप यथार्थ में था कौन। बाइबिल में औदार्य, दया, परोपकार और प्रेमभाव आदि के जो धर्मोपदेश हैं वे इन अप्राकृतिक और असंगत कल्पनाओं के आधार के बिना भी ज्यों के त्यों मान्य बने रह सकते हैं। यह मानने की आवश्यकता नहीं है कि वे ईश्वर द्वारा कहे गए या आभास के रूप में प्रकट किए गए। इस प्रकार की बातें विज्ञान द्वारा निश्चित सिध्दान्तों के सर्वथा विरुद्ध पड़ती हैं।


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