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आलोचना

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली
भाग 6
विश्वप्रपंच

रामचंद्र शुक्ल
संपादन - ओमप्रकाश सिंह

अनुक्रम दूसरा प्रकरण - हमारा शरीर पीछे     आगे

जीवों के समस्त व्यापारों और धर्मों के अन्वेषण के लिए हमें पहले शरीर को लेना चाहिए जिसमें जीवनसम्बन्धी भिन्न भिन्न क्रियाएँ देखी जाती हैं। शरीर के केवल बाहरी भागों की परीक्षा से हमारा काम नहीं चल सकता। हमें अपनी दृष्टि भीतर धाँसाकर शरीररचना के साधारणा विधानों तथा सूक्ष्म ब्योरों की जाँच करनी चाहिए। जो विद्या इस प्रकार का मूल अन्वेषण करती है उसे अंगविच्छेदशास्त्र1 कहते हैं।
मनुष्य के शरीर की जाँच का काम पहले पहल चिकित्सा में पड़ा, अत: तीन चार हजार वर्ष पहले के प्राचीन चिकित्सकों को मनुष्य के शरीर के विषय में कुछ न कुछ जानकारी हो गई थी। पर ये प्राचीन शरीरविज्ञानी अपना ज्ञान मनुष्य के शरीर की चीरफाड़ द्वारा नहीं प्राप्त करते थे; क्योंकि तत्कालीन व्यवस्था के अनुसार मनुष्य का शरीर चीरना फाड़ना बड़ा भारी अपराध गिना जाता था। बन्दर आदि मनुष्य से मिलते जुलते जीवों के शरीर की चीड़फाड़ द्वारा ही वे शरीर सम्बन्धिनी बातों का पता लगाते थे। सन् 1543 में विसेलियस ने मनुष्य शरीर रचना पर एक बड़ी पुस्तक लिखी और शरीर विज्ञान की नींव डाली। स्पेन में उस पर जादूगर होने का अपराध लगाया गया और उसे प्राणदंड की आज्ञा मिली। अपना प्राण बचाने के लिए वह ईसा की जन्मभूमि यरूशलम तीर्थ करने चला गया; वहाँ से वह फिर न लौटा।
उन्नीसवीं शताब्दी में यह विशेषता हुई कि शरीर की बनावट की छानबीन के लिए दो प्रकार की परीक्षाएँ स्थापित हुईं। तारतम्यिक अंगविच्छेद विज्ञान2 और शरीराणु विज्ञान। तारतम्यिक अंगविच्छेद विज्ञान की स्थापना सन् 1803 में हुई जब कि फ्रासीसी जंतुविद् क्यूवियर ने अपना वृहद् ग्रंथप्रकाशित करके पहले पहल मनुष्य

1 वह विद्या जिससे शरीर के भिन्न भिन्न भीतरी अवयवों के स्थान और उनकी बनावट का बोध होता है। इसमें चीरफाड़ कर अंगों की परीक्षा की जाती है इससे इसे अंगविच्छेदशास्त्र कहते हैं।
2 भिन्न भिन्न जंतुओं के अंगों को चीरफाड़ कर उनकी परीक्षा और उनका परस्पर मिलान।

और पशुशरीर सम्बन्धी कुछ सामान्य नियम स्थिर किए। उसने समस्त जीवों को चार प्रधान भागों में विभक्त किया- मेरुदंड या रीढ़वाले जीव, कीटवर्ग मकड़ी, केकड़े, बिच्छू, गुबरैले आदि शुक्तिवर्ग - घोंघे आदि और उदि्भदाकार कृमि1। यह बड़ा भारी काम हुआ क्योंकि इससे मनुष्य रीढ़वाले जीवों की कोटि में रखा गया। इसके उपरान्त अनेक शरीर विज्ञानियों ने इस विद्या में बहुत उन्नति की और अनेक नई नई बातों का पता लगाया। जर्मनी के कार्ल जिजिनबावर ने तारतम्यिक शरीरविज्ञान पर डारविन के विकासवाद के नियमों को घटाकर इस शास्त्र की मर्यादा बहुत बढ़ा दी। उसके पिछले ग्रंथ'मेरुदंड जीवों की तारतम्यिक अंगविच्छेद परीक्षा' के आधार पर ही मनुष्य में मेरुदंड जीवों के सब लक्षण निर्धारित किए गए।
शरीराणु विज्ञान का प्रादुर्भाव एक दूसरी ही रीति से हुआ। सन् 1802 में एक फ्रांसीसी वैज्ञानिक ने मनुष्य के अवयवों के सूक्ष्म विधान का खुर्दबीन द्वारा विश्लेषण करने का प्रयत्न किया। उसने शरीर के सूक्ष्म तन्तुओं के सम्बन्ध को देखना चाहाँ पर उसे कुछ सफलता न हुई क्योंकि वह समस्त जंतुओं के उस एक समवाय कारण से अनभिज्ञ था जिसका पता पीछे से चला। सन् 1838 में श्लेडेन ने उदि्भद् सृष्टि में समवाय रूप घटक का पता पाया जो पीछे से जंतुओं में भी देखा गया। इस प्रकार घटकवाद की स्थापना हुई। सन् 1860 में कालिकर और विरशो ने घटक तथा तन्तुजाल सम्बन्धी सिध्दान्तों को मनुष्य के एक एक अवयव पर घटाया। इससे यह भलीभाँति सिद्ध हो गया कि मनुष्य तथा और सब जीवों का शरीरतन्तुजाल अत्यंत सूक्ष्म; खुर्दबीन से भी जल्दी न दिखाई देनेवाले घटकों से बना है। ये ही घटक वे स्वत: क्रियमाण जीव हैं जो करोड़ों की संख्या में व्यवस्थापूर्वक बस कर शरीररूपी विशाल राज्य की योजना करते हैं। इन्हीं की बस्ती या समवाय को शरीर कहते हैं। ये सब के सब घटक एक साधारणा घटक से जिसे गर्भांड कहते हैं, उत्तरोत्तर विभागक्रम द्वारा उत्पन्न होते हैं। मनुष्य तथा और दूसरे रीढ़वाले जीवों की शरीररचना और योजना एक ही प्रकार की होती है। इन्हीं में स्तन्य या दूधा पिलानेवाले जीव हैं जिनकी उत्पत्ति पीछे हुई है और जो अपनी उन विशेषताओं के कारण जो पीछे से उत्पन्न हुईं, सबसे उन्नत और बड़े चढ़े हैं।
कालिकर के सूक्ष्मदर्शक यत्रों के अन्वेषण द्वारा हमारा मनुष्य और पशुशरीर सम्बन्धी ज्ञान बहुत बढ़ गया और हमें घटकों और तन्तुओं के विकास क्रम का बहुत कुछ पता चल गया। इस प्रकार सिबोल्ड (1845) के उस सिद्धांत की पुष्टि हो गई कि सबसे निम्न श्रेणी के कीटाणु एक घटक अर्थात जिनका शरीर एक घटक मात्र है; जीव हैं।

1 बहुत से ऐसे जीव होते हैं जो देखने में पौधों की डाल, पत्तियों के रूप में होते हैं। मूँगा इसी प्रकार का कृमि है जो समुद्र में पाया जाता है।

हमारा शरीर, उसके ढाँचे का सारा ब्योरा, यदि देखा जाय तो उसमें रीढ़वाले जीवों के सब लक्षण पाए जायँगे। जीवों के इस उन्नत वर्ग का निर्धारण पहले पहले लामार्क ने 1801 में किया। इसके अन्तर्गत उसने रीढ़वाले जीवों को चार बड़े कुलों में बाँटा-दूधा पिलानेवाले, पक्षी, जलस्थलचारी1 और मत्स्य। बिना रीढ़वाले कीड़े मकोड़ों के उसने दो विभाग किए। इसमें कोई सन्देह नहीं कि सारे रीढ़वाले जीव हर एक बात में परस्पर मिलते जुलते हैं। सबके शरीर के भीतर एक कड़ा ढाँचा अर्थात तरुणास्थियों और हड्डीयों का पंजर होता है। इस पंजर में मेरुदंड और कपाल प्रधान हैं। यद्यपि कपाल की उन्नत रचना में छोटे से बड़े जीवों में उत्तरोत्तर कुछ भेद दिखाई पड़ता है पर ढाँचा एक ही सा रहता है। समस्त रीढ़वाले प्राण्श्निायों में 'अन्त:करण' अर्थात संवेदनवाहक सूत्राजाल का केन्द्रस्वरूप मस्तिष्क इस मेरुदंड के छोर पर होता है। यद्यपि उन्नति की श्रेणी के अनुसार भिन्न भिन्न जीवों के मस्तिष्क में बहुत कुछ विभिन्नताएँ दिखाई पड़ती हैं पर सामान्य लक्षण सबमें वही रहता है।
इसी प्रकार यदि हम अपने शरीर के और अवयवों का दूसरे रीढ़वाले जीवों के उन्हीं अवयवों से मिलान करें तो भी यही बात देखी जायेगी। पितृपरम्परा के कारण सबके शरीर का मूल ढाँचा और उसके अवयवों के विभाग समान पाए जाते हैं, यद्यपि स्थिति भेद के अनुसार भिन्न भिन्न जंतुओं के विशेष विशेष अंगों की बड़ाई छोटाई तथा बनावट में फर्क देखा जाता है। सबमें रक्त दो प्रधान नलों से होकर बहता है जिनमें से एक अतड़ियों के ऊपर ऊपर जाता है और दूसरा नीचे नीचे। यही दूसरा नल जिस स्थान पर चौड़ा हो जाता है वही हृदय है। हृदय रीढ़वाले जीवों में पेट की ओर होता है और कीटपतंग आदि में पीठ की ओर। इसी प्रकार ओर अंगों की बनावट भी सब रीढ़वाले जीवों की सी होती है। अस्तु मनुष्य एक रीढ़वाला जीव है।
प्राचीन लोग मनुष्य और पक्षियों के अतिरिक्त तिर्यक् पशुओं, गाय, कुत्तो आदि को चतुष्पद कहते थे। क्यूवियर ने पहले पहल यह स्थिर किया कि द्विपाद मनुष्य और पक्षी भी वास्तव में चतुष्पद ही हैं। उसने अच्छी तरह दिखलाया कि मेंढक से लेकर मनुष्य तक मस्तक स्थलचारी उन्नत रीढ़वाले जीवों के चार पैरों की रचना एक ही नमूने पर कुछ विशेष अवयवों से हुई है। मनुष्य के हाथों और चमगादर के डैनों की ठटरी का ढाँचा वैसा ही होता है जैसा कि चौपायों के अगले पैर का। यदि हम किसी मेंढक की ठटरी लेकर मनुष्य या बन्दर की ठटरी से मिलावें तो इस बात का ठीक ठीक निश्चय हो सकता है। सन् 1864 में जिजिनबावर ने यह दिखलाया कि किस प्रकार स्थलचारी मनुष्यों का पाँच उँगलियोंवाला पैर आदि में प्राचीन मछलियों 

1 इन जीवों को पानी में साँस लेने के लिए गलफड़े (जैसे मछलियों के) और बाहर साँस लेने के लिए फेफड़े दोनों होते हैं। इससे वे जल में भी और स्थल पर भी रह सकते हैं।

के ईधर उधर निकले हुए परों ही से क्रमश: उत्पन्न हुआ है। अस्तु मनुष्य एक चतुष्पद जीव है।
रीढ़वाले जानवरों में दूधा पिलानेवाले सबसे उन्नत और पीछे के हैं। पक्षियों और सरीसृपों के समान निकले तो ये भी प्राचीन जलस्थलचारी जंतुओं ही से हैं पर इनके अवयवों में बहुत सी विशेषताएँ हैं। बाहर इनके शरीर पर रोएँदार चमड़ा होता है। इनमें दो प्रकार की चर्मग्रन्थियाँ होती हैं - एक स्वेदग्रन्थि दूसरी मेदग्रन्थि। उदराशय के चर्म में एक विशेष स्थान पर इन ग्रन्थियों की वृद्धि से उस अवयव की उत्पत्ति होती है जिसे स्तन कहते हैं और जिसके कारण इस वर्ग के प्राणी स्तन्य कहलाते हैं। दूधा पिलाने का यह अवयव दुग्धाग्रन्थियों और स्तनकोश से बना होता है। वृद्धि प्राप्त होने पर चूचुक (ढिपनी) निकलते हैं जिनसे बच्चा दूध खींचता है। भीतरी रचना में एक अन्तरपट मांस की झिल्ली और नसों का बना हुआ परदा, की विशेषता होती है जो उदराशय को वक्षाशय से जुदा करता है। दूसरे रीढ़वाले जानवरों में यह परदा नहीं होता, यह केवल दूधा पिलानेवालों में होता है। इसी प्रकार मस्तिष्क, ज्ञाणेन्द्रिय, फुप्फुस, वाह्य और आभ्यन्तर जननेन्द्रिय आदि की बनावट में भी बहुत सी विशेषताएँ दूधा पिलानेवाले जीवों में होती हैं। इन सब पर ध्यान देने से यह पता चलता है कि दूधा पिलानेवाले जीव सरीसृपों और जलस्थलचारी जीवों से उत्पन्न हुए। यह बात कम से कम 12000000 वर्ष पहले हुई होगी। अस्तु, मनुष्य एक दूधा पिलानेवाला स्तन्य जीव है।
आधुनिक जंतु विज्ञान में स्तन्य जीवों के भी तीन भेद किए गए हैं-अंडजस्तन्य1 अजरायुज पिंडज (थैलीवाले)2 और जरायुज। ये तीनों सृष्टि के भिन्न भिन्न युगों में क्रमश: उत्पन्न हुए हैं। मनुष्य जरायुज जीवों के अन्तर्गत है क्योंकि उसमें वे सब विशेषताएँ हैं जो जरायुजों में होती हैं। पहली वस्तु तो वह है जिसे जरायु3 कहतेहैं और जिसके कारण जरायुज नाम पड़ा है। इसके द्वारा गर्भ के भीतर शिशु का बहुत 

1 इस वर्ग के जीवों में एक ही कोठा होता है जिसमें मलवाहक, मूत्रावाहक और वीर्यवाहक नल गिरते हैं। मादा चिड़ियों की तरह अंडे भी देती है और स्तन्य जीवों की तरह दूधा भी पिलाती है। इस प्रकार के दो एक जानवर आस्ट्रेलिया में पाए जाते हैं। एक बत्ताखघूस होती है जिसका सब आकार घूस की तरह होता है पर मुँह बत्ताख की चोंच की तरह का और पंजे बत्ताख के पंजों की तरह के होते हैं। इसी प्रकार की एक साही भी होती है। ये पक्षियों और स्तन्य जीवों के बीच के जंतु हैं।
2 इस वर्ग के जीव भी आस्ट्रेलिया तथा उसके आसपास के द्वीपों में पाए जाते हैं। इनके गर्भ में जरायु नहीं होता जिससे गर्भ के भीतर बच्चों का पोषण होता है, अत: बच्चे अच्छी तरह बनने के पहले ही उत्पन्न हो जाते हैं और मादा उन्हें बहुत दिनों तक पेट के पास बनी थैली में लिये फिरती है। कँगारू नाम का जंतु इसी वर्ग का है।
3 जरायु के द्वारा ही भ्रूण माता के गर्भाशय से संयुक्त रहता है। यह गोल चक्र या तश्तरी के आकार का और स्पंज की तरह छिद्रमय होता है। मुख की ओर तो यह माता के गर्भाशय की दीवार से जुड़ा 

दिनों तक पोषण होता है। यह गर्भ को आवृत करने वाली झिल्ली से नल के रूप में निकल कर माता के गर्भाशय की दीवार से संयुक्त रहता है। इसकी बनावट इस प्रकार की होती है कि माता के रक्त का पोषण द्रव्य शिशु के रक्त में जाकर मिलता रहता है। गर्भपोषण की इस विलक्षण युक्ति के बल से शिशु को गर्भ के भीतर बहुत दिनों तक रहकर वृद्धि प्राप्त करने का अवसर मिलता है। यह बात बिना जरायु के गर्भ में नहीं पाई जाती। इसके अतिरिक्त मस्तिष्क की उन्नत रचना आदि के कारण भी जरायुज जीव अपने पूर्वज अजरायुज जीवों की अपेक्षा बढ़े चढ़े होते हैं। अस्तु, मनुष्य एक जरायुज जीव है।
जरायुज जीव भी अनेक शाखाओं में विभक्त किए गए हैं जिनमें से चार प्रधान हैं-छेद्यदन्त (कुतरनेवाले1), खुरपाद2, मांसभक्षी3 और किंपुरुष। इसी किंपुरुष शाखा के अन्तर्गत बन्दर, बनमानुस और मनुष्य हैं। इन तीनों में दूसरे जरायुज जीवों से बहुत सी विशेषताएँ समानरूप से पाई जाती हैं। तीनों के शरीर में लम्बी लम्बी हड्डियां होती हैं जो इनके शाखाचारी जीवन के अनुकूल हैं। इनके हाथों और पैरों में पाँच पाँच उँगलियाँ होती हैं। लम्बी लम्बी उँगलियाँ पेड़ों की शाखाओं को पकड़ने के उपयुक्त होती हैं। नख चौड़े होते हैं, टेढ़े नुकीले नहीं। तीनों की दन्तावली पूर्ण होती है अर्थात इन्हें चारों प्रकार के दाँत होते हैं - छेदनदन्त, कुकुरदन्त, अग्रदन्त और चर्वणदन्त (चौभर)। किंपुरुष शाखा के प्राणियों के कपाल और मस्तिष्क की रचना में भी विशेषता होती है। उन प्राणियों में जो काल पाकर अधिक उन्नत हो गए हैं और जिनका प्रादुर्भाव इस पृथ्वी पर पीछे हुआ है विशेषता अधिक होती गई है। सारांश यह कि मनुष्य शरीर में भी किंपुरुष शाखा के सब लक्षणा विद्यमान हैं। अस्तु, मनुष्य किंपुरुष शाखा का एक जीव है।
ध्यानपूर्वक देखने से इस किंपुरुष शाखा के भी दो भेद हो जाते हैं-एक बन्दर दूसरे पूरे बनमानुस। बन्दर निम्न श्रेणी के और पहले के हैं, बनमानुस अधिक उन्नत और पीछे के हैं। बन्दर माता का गर्भाशय और दूसरे स्तन्य जीवों की तरह दोहरा होता है। इसके विरुद्ध पूरे बनमानुस के दाहिने और बाएँ दोनों गर्भाशय मिले होते हैं और इस मिले हुए गर्भाशय का आकार वैसा ही होता है जैसा मनुष्य के गर्भाशय का। नर कपाल के समान बनमानुस के कपाल में भी नेत्रों के गोलक कनपटी के गङ्ढों से हवी के एक परदे के द्वारा विच्छिन्न होते हैं। पर साधारणा बन्दरों में या तो यह परदा
 रहता है, पृष्ठ की ओर इसमें एक लम्बा नाल निकल कर भ्रूण की नाभि तक गया रहता है। जरायुचक्र में बहुत से सूक्ष्म घट या उभरे हुए छिद्र रहते हैं जो गर्भाशय की दीवार के छिद्रों में घुसे होते हैं। इसी के द्वारा भ्रूण के शरीर में रक्त संचार, पोषक द्रव्यों का समावेश और श्वास विधान होता है। जरायु या उल्वनाल केवल पिंडजों अर्थात सजीव डिम्भ प्रसव करनेवाले जीवों में ही होता है, अंडजों आदि में नहीं।
1 चूहे, गिलहरी, खरगोश आदि। 2 गाय, बकरी, हिरन आदि। 3 भेड़िया, बाघ इत्यादि।

बिलकुल नहीं होता अथवा अपूर्ण रूप में होता है। इसके अतिरिक्त बन्दर का मस्तिष्क या तो बिलकुल समतल होता है अथवा बहुत थोड़ा खुरदुरा या ऊँचा नीचा होता है और कुछ छोटा भी होता है। बनमानुस का मस्तिष्क बड़ा, उसके तल की रचना अधिक जटिल होती है। जितना ही जो बनमानुस मनुष्य के अधिक निकट तक पहुँचा हुआ होता है उसके मस्तिष्क के तल में उतने ही अधिक उभार, अखरोट की गिरी के समान होते हैं। अस्तु, मनुष्य में बनमानुस के सब लक्षण पाए जाते हैं।
बनमानुसों के दो विलक्षण विभाग देश के अनुसार किए गए हैं। पश्चिमी गोलार्ध या अमेरिका के बनमानुस चिपटी नाकवाले कहलाते हैं और पूर्वीयगोलार्ध या पुरानी दुनिया के पतली नाकवाले। चिपटी नाकवाले बनमानुसों का वंश ईधर के पतली नाकवाले बनमानुसों से बिलकुल अलग चला है। वे पुरानी दुनियाँ (एशिया, अफ्रिका) के बनमानुसों की अपेक्षा अनुन्नत हैं। अत: मनुष्य एशिया और अफ्रिका के पतली नाकवाले बनमानुसों ही की किसी अप्राप्य श्रेणी से उद्भूत हुए हैं।
एशिया और अफ्रिका में अब तक पाए जानेवाले पतली नाकवाले बनमानुसों के भी दो भेद हैं, पूँछवाले बनमानुस और बिना पूँछवाले नराकार बनमानुस। बिना पूँछवाले मनुष्य जाति से अधिक समानता रखते हैं। नराकार बनमानुसों के पुट्ठे की रीढ़ पाँच कशेरुकाओं के मेल से बनी होती है और पूँछवाले बनमानुसों की तीन कशेरुकाओं के मेल से। दोनों के दाँतों की बनावट में भी अन्तर होता है। सबसे बढ़कर बात तो यह है कि यदि हम गर्भाशय की झिल्ली तथा जरायुज आदि की बनावट की ओर ध्यान देते हैं तो नराकार बनमानुस में भी वे ही विशेषताएँ पाई जाती हैं जो मनुष्य में। एशियाखंड के ओरंगओटंग और गिबन तथा अफ्रिका के गोरिल्ला और चिंपाजी नामक बनमानुस मनुष्य से सबसे अधिक समानता रखते हैं। अस्तु, मनुष्य और बनमानुस का निकट सम्बन्ध अब अच्छी तरह सिद्ध हो गया है।
इस बात के प्रमाण में अब कोई सन्देह नहीं रह गया है कि मनुष्य और बनमानुस के शरीर का ढाँचा एक ही है। दोनों की ठटरियों में वे ही 200 हड्डियां समान क्रम से बैठाई हैं, दोनों में उन्हीं 300 पेशियों की क्रिया से गति उत्पन्न होती है, दोनों की त्वचा पर रोएँ होते हैं, दोनों के मस्तिष्क उन्हीं संवेदनात्मक तन्तुग्रन्थियों के योग से बने हुए होते हैं, वही चार कोठों का हृदय दोनों में रक्तसंचार का स्पन्दन उत्पन्न करता है, दोनों के मुँह में 32 दाँत उसी क्रम से होते हैं, दोनों में पाचन ष्ठीवन ग्रन्थि1, यकृद्ग्रन्थि और क्लोमग्रन्थि2 की क्रिया से होता है, उन्हीं जननेन्द्रिय से दोनों के वंश की वृद्धि होती है। यह ठीक है कि डीलडौल तथा अवयवों

1 अत्यंत सूक्ष्म छोटे छोटे दाने जिनसे थूँक निकलता है।
2 आमाशय की त्वचा पर के सूक्ष्म दाने जिनसे पित्ता के समान एक प्रकार का अम्ल रस निकलता है जो भोजन के साथ मिल कर उसे पचाता है।

की छोटाई बड़ाई में दोनों में कुछ भेद देखा जाता है पर इस प्रकार का भेद तो मनुष्यों की ही समुन्नत और बर्बर जातियों के बीच परस्पर देखा जाता है, यहाँ तक कि एक ही जाति के मनुष्यों में भी कुछ न कुछ भेद होता है। कोई दो मनुष्य ऐसे नहीं मिल सकते जिनके ओंठ, आँख, नाक, कान आदि बराबर और एक से हों। और जाने दीजिए दो भाइयों की आकृति में इतना भेद होता है कि जल्दी विश्वास नहीं होता कि वे एक ही माता पिता से उत्पन्न हैं। पर इन व्यक्तिगत भेदों से रचना के मूल सादृश्य के विषय में कोई व्याघात नहीं होता।


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