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आलोचना

आचार्य रामचंद्र शुक्ल ग्रंथावली
भाग 6
विश्वप्रपंच

रामचंद्र शुक्ल
संपादन - ओमप्रकाश सिंह

अनुक्रम छठाँ प्रकरण - आत्मा का स्वरूप पीछे     आगे

'आत्मा की क्रिया' या मानसिक व्यापार1 से जिन व्यापारों का ग्रहण होता है वे जिस प्रकार अत्यंत कौतूहलप्रद और महत्व के हैं उसी प्रकार अत्यंत जटिल और दुर्बोध हैं। प्रकृति का परिज्ञान आत्मा के व्यापार का ही अंग है और इस व्यापार की यथार्थता पर ही जंतुविज्ञान, सृष्टिविज्ञान आदि अवलम्बित हैं इसलिए यह निश्चयपूर्वक कहा जा सकता है कि मनोविज्ञान आत्मा के व्यापारों का बोध करानेवाला शास्त्र और सब विज्ञानों का आधारस्वरूप है या यों कहिए कि वह दर्शन, शरीरविज्ञान, जंतुविज्ञान, आदि का अंग ही है।
मनोविज्ञान के सिद्धांत के वैज्ञानिक रूप से प्रतिपादन में बड़ी भारी अड़चन यह पड़ती है वह बिना शरीर के भीतरी अवयवों, विशेषकर मस्तिष्क का सूक्ष्म ज्ञान प्राप्त किए ठीक ठीक हो नहीं सकता। पर अधिकांश मनोविज्ञानी आत्मा के व्यापारों के विधायक अवयवों का बहुत कम परिज्ञान रखते हैं। इसी से दर्शन और मनोविज्ञान में जितना मतभेद देखा जाता है उतना और किसी विज्ञान में नहीं।
जिसे आत्मा कहते हैं वह, मेरी समझ में, एक प्राकृतिक व्यापार मात्र है। अत:मनोविज्ञान को मैं आधिभौतिक शास्त्रों की ही एक शाखा और शरीरविज्ञान का ही एक अंग समझता हूँ। मैं इस बात को जोर देकर कहता हूँ कि इस विज्ञान के तत्वों का अन्वेषण भी उन्हीं प्रणालियों से हो सकता है जिन प्रणालियों से और विज्ञानों के तत्वों का हो सकता है। पहले तो हमें प्रत्यक्षनुभव से परीक्षा करनी चाहिए, फिर विकास सिद्धांत का आरोप करना चाहिए। इसके उपरान्त शुद्ध तर्क के आधार पर चिन्तन करना चाहिए। मनोविज्ञान के सम्बन्ध में पहले द्वैत और तत्वाद्वैत सिध्दान्तों 

1 यद्यपि न्याय और विशेषिक ने आत्मा के जो लक्षण कहे हैं वे मानसिक व्यापारों से भिन्न नहीं जान पड़ते पर शेष दर्शनों के समान उन्होंने भी अन्त:करण या मन से आत्मा को भिन्न माना है। हैकल ने आधिभौतिक दृष्टि से अन्त:करण को ही आत्मा माना है।

का थोड़ा वर्णन कर देना आवश्यक है।
मानसिक व्यापार के सम्बन्ध में साधारणा विश्वास, जिसका हमें खंडन करना है, यह है कि शरीर और आत्मा दो पृथक् पृथक् सत्ताएँ हैं। ये दोनों सत्ताएँ एक दूसरे से सर्वथा पृथक् पृथक् रह सकती हैं, यह आवश्यक नहीं कि दोनों संयुक्त ही रहें। यह सावयव शरीर नश्वर और भौतिक है अर्थात कललरस तथा उसके विकारों के रासायनिक योग से संघटित है। पर आत्मा अमर तथा भूतों से परे एक ऐसी स्वतन्त्र सत्ता है जिसके गूढ़ व्यापार बोधगम्य नहीं हैं। यह मत आध्यात्मिक पक्ष का है, इसके विरुद्ध जो मत है वह आधिभौतिक पक्ष का कहा जा सकता है। यह आध्यात्मिक मत सर्वातीतवादी है क्योंकि यह ऐसी शक्तियों का अस्तित्व मानता है जो बिना भौतिक आश्रय के काम करती हैं। इसके अनुसार प्रकृति से परे और वाह्य एक अभौतिक आध्यात्मिक जगत् है जिसका हमें कुछ भी अनुभव नहीं और जिसका कुछ भी ज्ञान हम भौतिक परीक्षाओं द्वारा नहीं प्राप्त कर सकते।
यह 'आध्यात्मिक जगत्', जो भूतात्मक जगत् से सर्वथा स्वतन्त्र माना गया है और जिसके आधार पर द्वैतवाद खड़ा किया गया है, कवि कल्पना मात्र है। यही बात 'आत्मा के अमरत्व' सम्बन्धी विश्वास के विषय में भी कही जा सकती है जिसकी असारता आगे चलकर दिखाई जायगी। यदि अध्यात्मवादियों के विश्वास का कोई दृढ़ आधार होता तो मानसिक व्यापार प्रकृति या परमतत्व के नियमाधीन न होते। दूसरी बात यह कि प्रकृति के नियमबन्धानों से मुक्त सत्ता यदि मानी जाय तो यह आवश्यक है कि वह सृष्टि के पिछले कल्प में ही प्रकट हुई होगी जब कि मनुष्य आदि उन्नत जीवों का प्रादुर्भाव हो चुका होगा; क्योंकि भूतों से परे आत्मा की धारणा मनुष्य आदि कि मानसिक व्यापारों को देख कर ही हुई है। आत्मा की इच्छा किसी प्रकार के नियमों से बद्ध नहीं है, सर्वथा स्वतन्त्र है, यह मत भी भ्रान्त है।
हमारे प्रकृति निरूपण के अनुसार आत्मा की क्रिया द्रव्यशक्तिसम्भूत ऐसे व्यापारों का संघात है जो और प्राकृतिक व्यापारों के समान एक विशिष्ट भौतिक आधार पर अवलम्बित है। समस्त मनोव्यापारों के इस आधारभूत द्रव्य को हम मनोरस कहेंगे। कारण यह है कि रासायनिक विश्लेषण के द्वारा परीक्षा करने पर यह उसी कोटि का द्रव्य ठहरता है जिस कोटि के द्रव्य कललरस2 विशिष्ट कहलाते हैं। ये 

1 भारतीय तत्ववेत्ताओं ने मनुष्य से लेकर कीटपतंग तक में आत्मा को माना है। डेकार्ट आदि कुछ पाश्चात्य दार्शनिकों ने मनुष्य में ही 'आत्मा' मानी है, पश्वादिकों में नहीं।
2 कललरस प्रोटोप्लाज्म एक चिपचिपा कुछ दानेदार पदार्थ है जो जीवन का मूल द्रव्य समझा जाता है। प्राणियों और उद्भिदों के सूक्ष्म घटक इसी के होते हैं। आहारग्रहण, वृद्धि स्वेच्छा गति, संवेदन आदि व्यापार इसमें पाए जाते हैं। रसायनिक विश्लेषण द्वारा यह कललरस आक्सीजन, डाइड्रोजन, नाइट्रोजन और कार्बन के विलक्षण अण्वात्मक योग से संघटित पाया जाता है। जल और लवण का भी इसमें मेल रहता है। पर संयोजक मूल द्रव्यों को जान लेने पर भी मनुष्य कललरस नहीं बना सका है।

द्रव्य अंडसाररस और अंगारक1 के रासायनिक संयोग से बनते हैं और समस्त चेतन व्यापारों के मूल हैं। उन्नत जीवों में जिन्हें संवेदन सूत्राजाल और अनुभवात्मक इन्द्रियाँ होती हैं उपर्युक्त मनोरस से ही संवेदन सूत्रारस अर्थात संवेदनसूत्रा निर्मित करनेवाली धातु का विधान होता है। इस विषय में हमारा यह निरूपण भौतिक है। इसे प्राकृतिक और परीक्षात्मक भी कह सकते हैं क्योंकि विज्ञान ने अभी तक किसी ऐसी शक्ति का अस्तित्व नहीं प्रतिपादित किया है जिसका कुछ भौतिक आधार न हो। प्रकृति से परे किसी आध्यात्मिक जगत् का पता नहीं लगा है।
और प्राकृतिक व्यापारों के समान मनोव्यापार या आत्मव्यापार भी परमतत्व या मूलप्रकृति के अटल और सर्वव्यापक नियम के अधीन हैं। एक घटक अणुजीवों तथा दूसरे अत्यंत क्षुद्रकोटि के जीवों में जो मनोव्यापार देखे जाते हैं - जैसे उनका संक्षोभ, उनकी संवेदना, उनकी प्रतिक्रिया2 उनकी आत्मरक्षण प्रवृत्ति इत्यादि वे घटक के भीतर के कललरस की क्रिया के अनुसार अर्थात वंशपरम्परा और स्थितिसामंजस्य द्वारा उपस्थित भौतिक और रासायनिक विकारों के अनुसार ही होते हैं। यही बात मनुष्य तथा दूसरे उन्नत प्राणियों के उन्नत मनोव्यापारों के सम्बन्ध में भी कही जा सकती है क्योंकि वे ऊपर कहे हुए क्षुद्र मनोव्यापारों ही से क्रमश: स्फुरित हुए हैं। उनमें जो पूर्णता आई है वह अधिक मात्रा में समन्वय होने के कारण - उन व्यापारों की विशेष संगति और योजना के कारण जो पहले पृथक् पृथक् थे। सारांश यह कि क्षुद्रकोटि के मनोव्यापारों और उन्नत कोटि के मनोव्यापारों में - मनुष्यबुद्धि और पशुबुद्धि में केवल न्यूनाधिक का भेद है, वस्तुभेद नहीं।
प्रत्येक विज्ञान का पहला काम यह है कि जिस वस्तु के सम्बन्ध में उसे अन्वेषण करना हो उसकी स्पष्ट परिभाषा या व्याख्या कर ले। पर मनोविज्ञान के सम्बन्ध में यह प्रारम्भिक कार्य अत्यंत कठिन है। सबसे विलक्षण बात यह है कि मनोविज्ञान के सम्बन्ध में आज तक नए पुराने दार्शनिकों ने जो मत प्रकट किए हैं उनका परस्पर 

1 एक गाढ़ा चिपचिपा पदार्थ जो अंडों की जर्दी, जीवों के रक्त आदि में रहता है। यह आक्सीजन, कार्बन, नाइट्रोजन और हाइड्रोजन और कुछ गन्धक के मेल से बना होता है।
2 क्षुद्र जीवों के शरीर पर बाहरी सम्पर्क या उत्तेजन से उत्पन्न क्षोभ प्रवाह के रूप में कललरस के अणुओं द्वारा भीतर केन्द्र में पहुँचता है और वहाँ से प्रेरणा के रूप में बाहर की ओर पलट कर शरीर में गति उत्पन्न करता है। वस्तु सम्पर्क के प्रति यह एक प्रकार की अचेतन क्रिया है जो ज्ञानकृत वा इच्छाकृत नहीं होती, केवल कललरस के भौतिक और रासायनिक गुणों के अनुसार होती है, जैसे छूने से लजालू की पत्तियों का सिमटना, उँगली रखने से क्षुद्र कीटों का अंग मोड़ना इत्यादि। चेतना विशिष्ट मनुष्य आदि बड़े जीवों में भी यह अचेतन प्रतिक्रिया होती है। उनमें क्षोभ अन्तर्मुख संवेदनसूत्रों द्वारा भीतर की ओर जाता है पर मस्तिष्क तक नहीं पहुँचता बीच ही से मेरुरज्जु या किसी और स्थान से पलट पड़ता है। आँख के पास किसी वस्तु के आते ही पलकें आप से आप, बिना इच्छा या संकल्प के गिर पड़ती हैं।

विरोध देखकर बुद्धि चकरा जाती है। आत्मा क्या है? इन्द्रियानुभव और भावना में क्या अन्तर है? मन में कोई बात किस प्रकार उपस्थित होती है? बुद्धि और विचारों में क्या अन्तर है। मनोवेगों राग, द्वेष, क्रोध आदि का वास्तविक रूप क्या है? अन्त:करण की इन समस्त वृत्तियों का शरीर से क्या सम्बन्ध है? इन अनेक प्रश्नों के तथा इसी प्रकार के और प्रश्नों के जो उत्तर दार्शनिकों ने दिए हैं वे परस्पर विरुद्ध हैं। यही नहीं, एक ही वैज्ञानिक वा दार्शनिक ने पहले कुछ और विचार प्रकट किया, पीछे और। इस प्रकार मनोविज्ञान भानमती का पिटारा बन गया है। जितनी गड़बड़ी इस विज्ञान में दिखाई देती है उतनी और किसी में नहीं।
कुछ दृष्टान्त लीजिए। जर्मनी के सबसे प्रसिद्ध दार्शनिक कांट ने पहले अपनी युवावस्था में यह स्थिर किया कि परोक्षवाद के तीन बड़े विषय-ईश्वर, आत्मस्वातन्त्रय और आत्मा का अमरत्व-शुद्धबुद्धि1 के निरूपण से असिद्ध हैं। पीछे वृध्दावस्था में उसी ने यह कहा कि ये तीनों बातें व्यवसायात्मिका बुद्धि2 के स्वयंसिद्ध निरूपण हैं और अनिवार्य हैं। इसी प्रकार विरचो और रेमण्ड नामक प्रसिद्ध जर्मन वैज्ञानिकों ने पहले बहुत दिनों तक भूतातिरिक्त शक्ति, शरीर और आत्मा की पृथक् भावना आदि का घोर विरोध किया, पर पीछे उन्होंने चेतना को भूतातिरिक्त व्यापार कहा।
अन्त:करण की वृत्तियों की, विशेषत: चेतना की, परीक्षा के लिए वैज्ञानिक अनुसंधानप्रणाली में कुछ फेरफार करना पड़ता है। वैज्ञानिक अनुसंधान बहिर्मुख दृष्टि से होती है अर्थात उसमें मन अपने से भिन्न विषयों का निरीक्षण और विचार करता है। मनोव्यापारों के अनुसंधान में हमें इन बहिर्मुख निरीक्षण के अतिरिक्त अन्तर्मुख निरीक्षण या आत्मनिरीक्षण भी बहुत अधिक करना पड़ता है। इस स्वानुभूति या आत्मनिरीक्षण में मन अपना ही अर्थात अपने ही व्यापारों का चेतना के दर्पण में निरीक्षण करता है3। अधिकांश मनोविज्ञानी केवल इसी आत्मनिश्चय या अहंकारवृत्ति 

1 प्योर रीजन।
2 प्रैक्टिकल रीजन।
3 कांट आदि प्रत्यक्षवादी दार्शनिकों ने स्वानुभूति या आत्मनिरीक्षण असम्भव कहा है। वे उसके सम्बन्ध में यह बाधा उपस्थित करते हैं-'निरीक्षण करने के लिए तुम्हारी बुद्धि को अपनी क्रिया रोकनी पड़ेगी और उसी क्रिया का तुम निरीक्षण करना चाहते हो। यदि तुम क्रिया रोकते हो तो निरीक्षण करने के लिए कोई वस्तु ही नहीं रह जाती'। यह बाधा तो आधिभौतिक मनोविज्ञानक्षेत्र की हुई जिसमें जैसे अन्त:करण की और सब वृत्तियों का निरूपण होता है वैसे ही चेतना का भी। भारतीय दार्शनिकों ने भी मन की युगपत् क्रिया असम्भव बतलाई है, अर्थात मन एक ही समय एक साथ दो व्यापारों में प्रवृत्त नहीं हो सकता, पर उन्होंने सब व्यापारों के द्रष्टा आत्मा को मन या अन्त:करण से भिन्न माना है। अध्यात्म या परविद्या के क्षेत्र में भी आत्मबोध के सम्बन्ध में इस कठिनाई का सामना पड़ा है। चैतन्य या आत्मा ही ज्ञाता, द्रष्टा या विषयी है अत: अपने ज्ञान के लिए उसे ज्ञेय, दृश्य वा विषय होना पड़ेगा। पर न विषयी विषय हो सकता है, न विषय विषयी। शंकर स्वामी अपने भाष्य में कहते हैं।

का अनुसरण करके चले हैं, जैसे डेकार्ट ने स्पष्ट कहा है कि 'मैं सोचता हूँ इसलिए मैं हूँ।' अत: पहले इस आत्मनिरीक्षण प्रणाली पर कुछ विचार करके तब हम दूसरी वाह्यनिरीक्षण प्रणाली की व्याख्या करेंगे।
इन दो हजार वर्षों के बीच आत्मा के सम्बन्ध में जितने सिद्धांत उपस्थित किए गए हैं सब इसी अन्तर्मुख प्रणाली के अनुसार स्वानुभूति या आत्मनिरीक्षण के आधार पर। अपनी आत्मा में जिस प्रकार के अनुभव हुए उनकी संगति और आलोचना द्वारा किए हुए निश्चय ही दार्शनिक प्रकट करते रहे हैं।
बात यह है कि मनोविज्ञान के एक प्रधान अंग का विचार, विशेषकर चेतना के धर्म आदि का निरूपण, केवल इसी एक प्रणाली से हो सकता है। मस्तिष्क की एक वृत्ति (चेतना) विशेष रूप की है। इसके कारण जितने दार्शनिक भ्रम हुए हैं उतने और किसी वृत्ति के कारण नहीं। मन की इस स्वनिरीक्षण क्रिया को ही मनोविज्ञान के निरूपण का एकमात्र साधान समझना, जैसा कि बहुतेरे दार्शनिकों ने किया है, बड़ी भारी भूल है। मन के बहुत से व्यापारों का, जैसे इन्द्रियों और वाणी की क्रिया आदि का, निरूपण उसी रीति से हो सकता है जिस रीति से शरीर के और व्यापारों का, अर्थात पहले तो भीतरी अवयवों की सूक्ष्म विश्लेषणपरीक्षा से और फिर उनके आश्रय से होनेवाले व्यापारों के जीवविज्ञाननुकूल निरीक्षण से। अत: बिना इस प्रकार के वाह्य निरीक्षण के केवल आत्मनिरीक्षण द्वारा निश्चित मनोव्यापार सम्बन्धिनी बातें पक्की नहीं समझी जा सकतीं। पर वाह्यनिरीक्षण की पूर्णता के लिए शरीरविज्ञान, अंगविच्छेदशास्त्र, शरीराणुविज्ञान1, गर्भविज्ञान और जीवविज्ञान इत्यादि का यथावत् ज्ञान होना चाहिए। मनोविज्ञानवेत्ता कहलानेवालों में से अधिकांश का नरतत्वशास्त्र2 की आधार स्वरूपिणी इन विद्याओं में कुछ भी प्रवेश नहीं होता। अत: वे अपनी आत्मा के गुण धर्म की विवेचना करने के भी अयोग्य हैं। एक और बात ध्यान में रखने की यह है कि इन मनोविज्ञानवेत्ताओं का अन्त:करण एक सभ्यजाति के उन्नत अन्त:करण का नमूना है जो अनेक पूर्ववत्तरी अवस्थाओं में वंशपरम्पराक्रम से होता हुआ वर्तमान उन्नत अवस्था को प्राप्त हुआ है। अत: उसके गुणधर्म को ठीक ठीक समझने के लिए असंख्य क्षुद्र कोटि के पूर्वरूपों का विचार आवश्यक है। यह मैं मानता 

 हैं-'युष्मदस्मत्प्रत्ययगोचरयो: विषयविषयिनो: स्तम:प्रकाशवद्विरुद्धस्वभावयोरितरेतरभावानुपत्तौ सिध्दायाम् '।
हर्बर्ट स्पेंसर ने भी यही कहा है-
शंकराचार्य ने तो यह कहकर उक्त बाधा दूर की कि चैतन्य वा आत्मा 'कूटस्थनित्यचैतन्यज्योति' है, वह ज्ञानस्वरूप है उसे ज्ञेय होने की आवश्यकता नहीं। पर हर्बर्ट स्पेंसर आदि पश्चिमी तत्ववेत्ताओं ने इसी विरोध को लेकर आत्मा, परमात्मा आदि को अज्ञेय ठहराया और संशय की स्थिति में रहना ही ठीक समझा।
1 हिस्टोलाजी
2 एन्थ्रापोलाजी

हूँ कि आत्मनिरीक्षण प्रणाली परम आवश्यक है, पर साथ ही और दूसरी प्रणालियों (वाह्यनिरीक्षण आदि) की सहायता भी निरन्तर अपेक्षित है1A
आधुनिक काल में ज्यों ज्यों मनुष्यों का ज्ञान बढ़ता गया और भिन्न भिन्न विज्ञानों की अनुसंधानप्रणाली पूर्णता को पहुँचती गई त्यों त्यों यह इच्छा बढ़ती गई कि उन विज्ञानों के निरूपण बिलकुल ठीक ठीक नपे तुले हों, उनमें रत्ती भर का भी बल न पड़े, अर्थात व्यापारों का निरीक्षण जहाँ तक हो सके प्रत्यक्षनुभव के रूप में हो और जो नियम निरूपित किए जाएँ वे जहाँ तक हो सकें ठीक ठीक और स्पष्ट हों जैसे कि गण्श्नित के होते हैं। पर इस प्रकार का नपा तुला ठीक ठीक निरूपण कुछ थोड़े से शास्त्रों में ही सम्भव है, विशेषत: उन विद्याओं में जिनमें परिमेय, गिनती या माप के योग्य, परिमाण का विचार होता है, जैसे गणित में तथा ज्योतिष, कलाविज्ञान, भौतिकविज्ञान, और रसायनशास्त्र के बहुत से अंशों में। इसी से ये सब विद्याएँ 'ठीक नपी तुली विद्याएँ' कहलाती हैं। पर समस्त भौतिक विद्याओं को बिलकुल ठीक और नपी तुली समझ कर उन्हें इतिहास, तर्क, आचारशास्त्र आदि से सर्वथा भिन्न कोटि में रखना भूल है। भौतिक विज्ञान का बहुत सा अंश ऐसा है जिसकी बातों को हम इतिहास की बातों से अधिक ठीक और नपी तुली नहीं कह सकते। यही प्राणिविज्ञान और उससे सम्बद्ध मनोविज्ञान के सम्बन्ध में भी कहा जा सकता है। जब कि मनोविज्ञान शरीरविज्ञान का ही एक अंग है तब उसका निरूपण भी उसी प्रणाली से होना चाहिए जिस प्रणाली से शरीरविज्ञान का होता है। अस्तु, मनोविज्ञान में पहले तो हमें प्रत्यक्षनुभव प्रणाली का अनुसरण करके जहाँ तक हो सके इन्द्रिय, संवेदनसूत्र, मस्तिष्क आदि की क्रियाओं का निरीक्षण और परीक्षा करनी चाहिए, उसके पीछे फिर मन के व्यापारों का आत्मनिरीक्षण करके उनके नियमों को तर्क द्वारा स्थिर करना चाहिए। पर यह समझ रखना चाहिए कि इस प्रकार के नियम गणित के समान ठीक ठीक नाप तौल के साथ सर्वत्रा नहीं स्थिर किए जा सकते। शरीरविज्ञान में केवल इन्द्रियों के व्यापारों का निरूपण गणित की रीति से कुछ हो सकता है, मस्तिष्क के और व्यापारों का नहीं।
प्राणिविज्ञान के एक छोटे से अंग का गणित की रीति से कुछ प्रतिपादन हो सका है और उसका नाम मनोभूतविज्ञान (साइकोफिजिक्स) रखा गया है। इस विज्ञान के प्रतिष्ठाता फेक्नर और वेवर नामक वैज्ञानिकों ने पहले यह पता लगाया कि सब प्रकार के इन्द्रियानुभव बाहरी विषयसम्पर्क की उत्तोजना पर निर्भर हैं और जिस हिसाब से विषयसम्पर्क की उत्तोजना घटती या बढ़ती है उसी हिसाब से इन्द्रियसंवेदन भी घटता या बढ़ता है। उन्होंने स्थिर किया कि कम से कम इतनी मात्र की उत्तोजना 

1 जो लोग समझते हैं कि आँख मूँदकर ध्यान या समाधि लगाने से भूत, भविष्य, वर्तमान तीनों काल की बातें सूझने लगती हैं उन्हें इस पर ध्यान देना चाहिए।

होगी तभी इन्द्रियसंवेदन होगा, और प्राप्त उत्तोजना में इतनी मात्र का अन्तर पड़ेगा तब संवेदन में कुछ अन्तर जान पड़ेगा। दर्शन, श्रवण, स्पर्श (दबाव) संवेदनों के विषय में यह निर्दिष्ट नियम है कि उनमें अन्तर उत्तोजना के सम्बन्ध के अन्तर के हिसाब से पड़ता है। अस्तु, फेक्नर ने अपने मनोभूतविज्ञान का एक प्रधान नियम स्थिर किया कि संवेदना की वृद्धि संख्योत्तार क्रम जैसे 2,4,6,8,10 से होती है और उत्तोजना की गुणोत्तार क्रम से जैसे, 2,4,8,16,32। 1 पर फेक्नर के ये भौतिक निरूपण सर्वांश में स्वीकृत नहीं हुए हैं। मनोभूतविज्ञान से जैसी सफलता की आशा की गई थी वैसी नहीं हुई। वह आगे नहीं बढ़ सका। उसका विस्तार बहुत ही थोड़ा है। उससे इतना अवश्य सिद्ध हुआ है कि कम से कम आत्मा के एक व्यापार पर भौतिक नियम घटाए जा सकते हैं। पर कहना यही पड़ता है कि मनोव्यापारों को तौलने का प्रयत्न निष्फल हुआ है, उससे कुछ विशेष परिणाम नहीं निकला है विज्ञान का लक्ष्य तो यही होना चाहिए कि सर्वत्रा साध्य नहीं है। अत: जीवसृष्टि, मनोव्यापार आदि के सम्बन्ध में तारतम्यिक-परम्परा मिलान करने की; और गर्भ विधान निरीक्षण, प्रणाली ही विशेष उपयोगी है।
मनुष्य और दूसरे उन्नत जंतुओं जैसे कुत्तो, बन्दर आदि के मनोव्यापारों में जो विलक्षण सादृश्य है वह सब पर प्रकट है। प्राचीन दार्शनिक मनुष्य की आत्मा और पशु की आत्मा में कोई 'वस्तुभेद' नहीं समझते थे, केवल मात्रभेद समझते थे। ईसाई मत के कारण युरोप में लोग मनुष्य की अमर आत्मा और पशु की नश्वर आत्मा में भेद मानने लगे। इस भेद पर डेकार्ट आदि द्वैतवादी दार्शनिकों ने और भी लोगों का विश्वास जमा दिया। डेकार्ट (सन् 1643) कहता था कि केवल मनुष्य ही को वास्तविक आत्मा है, मनुष्य ही में संवेदन और स्वतन्त्र इच्छा, प्रयत्न आदि होते हैं। पशु केवल जड़ मशीन के तुल्य हैं, उनमें किसी प्रकार की संवेदना या इच्छा, प्रयत्न आदि नहीं। 2 डेकार्ट के पीछे युरोप में बहुत दिनों तक लोगों की यही धारणा रही।

1 मान लीजिए कि आँख पर पहले एक दरजे का प्रकाश पड़ा फिर तुरन्त 100 दरजे का अर्थात उससे सौ गुना प्रकाश पड़ा और हमें एक विशेष अन्तर जान पड़ा। अब यदि एक दरजे के स्थान पर 2 दरजे का प्रकाश पहले पड़े तो फिर 200 दरजे का प्रकाश पड़ने से, अर्थात दो का सौ गुना प्रकाश पड़ने से, उतना ही अन्तर जान पड़ेगा। इसी प्रकार 3 और 300 में वही अन्तर जान पड़ेगा। तात्पर्य यह कि पहली उत्तोजना जितनी गुनी अधिक होगी दूसरी के भी उतनी ही गुनी अधिक होने से उतना ही अन्तर जान पड़ेगा। 14 रत्ती का बोझ यदि हाथ पर (हाथ स्थिर और किसी वस्तु के आधार पर रहे) रखा जाय तो फिर उस पर एक रत्ती और रखने से बोझ में कुछ अन्तर न जान पड़ेगा। जब 5 रत्ती और रखा जायेगा तब जान पड़ेगा। अब यदि पहले 30 रत्ती का बोझ रखा जाय तो फिर 5 रत्ती और रखने से अन्तर न जान पड़ेगा, 10 रत्ती और रखने से जान पड़ेगा। गुरुत्व और शब्द संवेदना में 3-4 का अन्तर पड़ने से भेद मालूम होता है, पेशी के तनाव में 15-16, दृष्टि में 100-101 का।
2 न्याय और विशेषिक ने इच्छा, द्वेष, प्रयत्न आदि को आत्मा का लिंग या लक्षण माना है।

उन्नीसवीं शताब्दी के पिछले भाग में जीवनसृष्टिविज्ञान और शरीरविज्ञान की उन्नति के साथ पशुओं के मनोव्यापारों की ओर तत्ववेत्ताओं का ध्यान गया। मूलर ने अपने शरीर विज्ञान के गूढ़ अन्वेषणों द्वारा पशुबुद्धिपरीक्षा का मार्ग सुगम कर दिया। डारविन के पीछे उसके विकाससिद्धांत का प्रयोग मनोविज्ञान के क्षेत्र में भी किया गया।
वुंट जर्मनी के सबसे बड़े मनोविज्ञानवेत्ता हैं। और दार्शनिकों से उनमें यह विशेषता है कि उन्हें प्राणिविज्ञान, अंगविच्छेदशास्त्र और शरीरव्यापारविज्ञान का भी पूरा पूरा अभ्यास है। उन्होंने भौतिक विज्ञान और रसायन के नियमों का बहुत कुछ प्रयोग शरीरविज्ञान और उससे सम्बद्ध मनोविज्ञान के क्षेत्र में करके दिखाया है। 1863 में उन्होंने अपना 'मानव और पाश्व मनोविज्ञान पर व्याख्यान' प्रकाशित किया और सिद्ध किया कि मुख्य मनोव्यापार 'अचेतन आत्मा' में होते हैं। वुंट ने मस्तिष्क के उन पुरजों को दिखाया जो आत्मा के अचेतन पट पर वाह्य विषय सम्पर्क से उत्पन्न उत्तोजना के प्रभावों को अंकित करते हैं। सबसे बड़ा काम वुंट ने यह किया कि उन्होंने वेगसम्बन्धी भौतिक नियम पहले पहल मनोव्यापारों के क्षेत्र में घटाए और मनस्तत्त्व के प्रतिपादन में शरीरगत विद्युद्विधान की बहुत सी बातों का प्रयोग किया।
30 वर्ष पीछे 1892 में वुंट ने जब अपने ग्रंथ का दूसरा परिवर्तित और संक्षिप्त संस्करण निकाला तब उसमें अपना सिद्धांत एकदम बदल दिया। पहले संस्करण में जो महत्त्व के सिद्धांत निरूपित किए गए थे वे सब परित्यक्त कर दिए गए और अद्वैत भाव के स्थान पर द्वैतभाव स्थापित किया गया। वुंट ने इस दूसरे संस्करण की भूमिका में साफ कहा है कि-'पहले संस्करण में जो भ्रम मुझसे हुए थे उनसे मैं मुक्त हो गया। कुछ दिनों पीछे जब मैंने विचार किया तब मालूम हुआ कि पहले जो कुछ मैंने कहा था वह सब युवावस्था का अविवेक था, वह मेरे चित्ता में बराबर खटकता रहा और मैं जहाँ तक शीघ्र हो सके उस पाप से मुक्त होने के लिए देखता रहा।' इस प्रकार वुंट के ग्रंथके दो संस्करणों में किए हुए मनस्तत्वनिरूपण एक दूसरे के सर्वथा विरुद्ध हैं। पहले संस्करण के निरूपण तो सर्वथा भौतिक हैं और अद्वैतवाद लिये हुए हैं और दूसरे संस्करण के निरूपण आध्यात्मिक और द्वैतभावापन्न हैं। पहले में तो मनोविज्ञान को वुंट ने एक भौतिक विज्ञान मानकर उसका निरूपण उन्हीं नियमों पर किया है जिन नियमों पर शरीरविज्ञान के और सब अंगों का होता है। पर 30 वर्ष पीछे उन्होंने मनोविज्ञान को आध्यात्मिक विषय कहा और उसके तत्त्वों और सिध्दान्तों को भौतिक विज्ञान के तत्त्वों और सिध्दान्तों से सर्वथा भिन्न बतलाया। अपनी मन:शरीर सम्बन्धी व्याख्या में उन्होंने कहा है कि प्रत्येक मनोव्यापार का कुछ न कुछ सहवर्ती भौतिक या शारीरिक व्यापार अवश्य होता है, पर दोनों व्यापार सर्वथा स्वतन्त्र हैं, उनमें कोई प्राकृतिक कार्य कारण आदि सम्बन्ध नहीं। वुंट ने जो इस प्रकार शरीर और आत्मा को पृथक् बतलाकर द्वैतवाद का डंका बजाया उससे दार्शनिक मण्डली में बड़ा आनन्द फैला। द्वैतवादी दार्शनिक यह देखकर कि इतना बड़ा और प्रसिद्ध वैज्ञानिक पहले विरुद्ध मत प्रकट करके पीछे अनुकूल मत प्रकाशित कर रहा है एक स्वर से कहने लगे कि मनोविज्ञान की उन्नति हुई। पर लगातार 40 वर्ष के अध्ययन के उपरान्त अब भी मैं उसी 'अविवेक' में पड़ा हूँ। लाख चेष्टा करने पर भी उससे मुक्त नहीं हो सका हूँ। अत: मैं जोर के साथ कहता हूँ कि जिसे वुंट ने अपनी युवावस्था का 'अविचार' कहा है वही सच्चा विचार है, वही सच्चा ज्ञान है। उस सच्चे विचार का समर्थन बुङ्ढे दार्शनिक वुंट के मत के विरुद्ध मैं बराबर करता रहूँगा।
वुंट, कांट विरशो, रेमण्ड, बेयर इत्यादि का इस प्रकार अपने सिध्दान्तों को बदलना ध्यान देने योग्य है। युवावस्था में तो ये योग्य तत्ववेत्ता जीवविज्ञान के सम्पूर्ण क्षेत्र में अत्यंत विस्तृत अन्वेषण करते रहे और सब तत्त्वों की एक मूल प्रकृति ढूँढ़ने के प्रयत्न में लगे रहे, पर पीछे बुढ़ापा आने पर उसे पूर्णतया साध्य न समझ इन्होंने अपना उद्देश्य ही परित्यक्त कर दिया-अपना रंग ही बदल दिया। इस परिवर्तन का कारण लोग यह कह सकते हैं कि युवावस्था में बुद्धि के अपरिपक्व होने के कारण इन्होंने सब बातों की ओर पूरा पूरा ध्यान नहीं दिया था, पीछे बुद्धि के परिपक्व होने पर और अनुभव बढ़ने पर इन्हें अपना भ्रम मालूम हुआ और इन्होंने वास्तविक ज्ञान का मार्ग पाया। पर यह क्यों न कहा जाय कि युवावस्था में अन्वेषण श्रम की शक्ति अधिक रहती है, बुद्धि अधिक निर्मल और विचार अधिक स्वच्छ रहता है, पीछे बुढ़ाई आने पर जैसे और सब शक्तियाँ शिथिल हो जाती हैं वैसे ही बुद्धि भी सठिया जाती है, जीर्ण हो जाती है। जो कुछ हो, पर वैज्ञानिकों का यह सिद्धांत परिवर्तन मनोविज्ञान में मनन करने योग्य विषय है। इससे यह सूचित होता है कि जीवों के और व्यापारों के समान मनोव्यापार या आत्मव्यापार भी अपना रूप बदलते रहते हैं अर्थात आत्मा भी सदा एकरूप नहीं रहती।
भिन्न भिन्न श्रेणियों के जीवों के मनोव्यापारों को परस्पर मिलान करनेवाली विद्या को तारतम्यिक मनोविज्ञान कहते हैं। इसके लिए यह आवश्यक है कि जिस प्रकार जीवसृष्टिविज्ञान1 में जीवों की ऊँचीनीची परम्परा का क्रम स्थिर है उसी प्रकार मनोव्यापारों की ऊँचीनीची परम्परा का क्रम भी स्थिर किया जाये। ऐसा होने से ही हम समझ सकते हैं कि किस प्रकार एक घटक अणुजीव के क्षुद्र व्यापारों से लेकर मनुष्य के उन्नत मनोव्यापारों तक एक अखंडित शृंखला बँधी हुई है। मनोव्यापारों का यह श्रेणीभेद मनुष्य की भिन्न जातियों में भी परस्पर देखा जाता है। एक अत्यंत असभ्य जाति के जंगली मनुष्य की बुद्धि में और एक अत्यंत सभ्य जाति के मनुष्य की बुद्धि में बड़ा भारी भेद होता है। इसी भेदपरम्परा के अन्वेषण के विचार से असभ्य 

1 जूलाजी।

बर्बर जातियों की जाँच की ओर विशेष ध्यान दिया जाने लगा है और मनोविज्ञान के तत्त्वों के निरूपण के लिए भिन्न भिन्न मनुष्य जातियों का विवरण बड़े काम का माना जाने लगा है।
मनोविज्ञान में आत्मा के क्रमविकास का निरीक्षण बहुत जरूरी है। इसके द्वारा जितनी जल्दी हम मिथ्या धारणाओं और भ्रमों को हटाकर आत्मवृत्तियों के यथार्थ रूप का आभास पा सकते हैं उतनी जल्दी और किसी प्रणाली के द्वारा नहीं। विकास के दो रूप मैं पहले बतला चुका हूँ-गर्भविकास और जातिविकास। आत्मा का गर्भविकास या स्फुरण क्रम देखने से यह पता चलता है कि किस क्रम से एक व्यक्ति की आत्मा गर्भकाल से लेकर बराबर वृद्धि को प्राप्त होती जाती है और किन नियमों के अनुसार उसका विधान होता है। शिशु का अन्त:करण किस प्रकार क्रमश: पुष्ट और उन्नत होता जाता है। मातापिता, शिक्षक आदि अत्यंत प्राचीन समय से देखते आ रहे हैं, पर उनके चित्ता में आत्मा की पूर्णता, अमरता आदि की जो धारणा बँधी चली आ रही है उससे उनका देखना और न देखना बराबर हो जाता है। पर अब ईधर कुछ दिनों से बालक की आत्मा के विकासक्रम का विचार होने लगा है। इस विषयपर पुस्तकें भी लिखी गई हैं।
पहले कहा जा चुका है कि जीवसृष्टि में गर्भविकास और जाति विकास का क्रम एक ही है। डारविन ने जीवों की भिन्नभिन्न योनियों के विकास की परम्परा का क्रम दिखाकर उसी क्रम से मनोवृत्तियों के विकास का होना भी दिखाया है। उसने अनेक प्रमाणों द्वारा सिद्ध किया है कि जंतुओं की अन्त:प्रवृत्ति भी जीवों की ओर बातों के समान वृद्धिपरम्परा के नियमाधीन है। विशेष विशेष जीवों में अन्त:प्रवृत्ति की जो विशेषता देखी जाती है वह स्थितिसामंजस्य या अवस्थानुरूप परिवर्तन के कारण होती है। यह विशेषता पैतृक परम्परा द्वारा बराबर आगे की पीढ़ियों में चली चलती है। जीवों की अन्त:प्रवृत्ति का निर्माण और संरक्षण भी उसी प्रकार ग्रहण सिद्धांत1 के नियमानुसार होता है जिस प्रकार और शारीरिक शक्तियों का। डारविन ने कई पुस्तकें लिखकर दिखाया है कि 'मनोविकास' सम्बन्धी वे ही नियम समस्त जीवसृष्टि पर घटते हैं - क्या मनुष्य, क्या पशु, क्या उदि्भद्। जिस प्रकार भिन्न भिन्न जीवों की एक मूल से उत्पत्ति देखने से समस्त जीवसृष्टि की एकता प्रमाणित होती है उसी प्रकार अणुजीव से लेकर मनुष्य तक मनस्तत्तव की एकता भी सिद्ध होतीहै।
रौमेंज ने डारविन के मनोविज्ञान को और प्रवर्द्धित किया। उसने दो ग्रंथविकासक्रमबद्ध मनोविज्ञान पर लिखे जो अपने ढंग से निराले हुए। पहला ग्रंथजंतुओं के मनोविकास पर है। उसमें उसने क्षुद्र जंतुओं के संवेदन व्यापार और अन्त:प्रवृत्ति 

1 दे प्रकरण पाँचवाँ।

से लेकर उन्नत जीवों की चेतना और बुद्धि तक की शृंखलाबद्ध परम्परा दिखाई है। दूसरे ग्रंथमें उसने मनुष्य के अन्त:करण का विकास और उसकी शक्तियों का उद्भव दिखाया है। उसमें पूर्णरूप से सिद्ध किया गया है कि मनुष्य और पशु के अन्त:करण या आत्मा में कोई तत्वभेद नहीं है। मनुष्य में संकल्पविकल्पात्मक विचार और प्रत्याहार आदि करने की जो शक्ति है वह दूधा पिलानेवाले मनुष्येतर जीवों के अकल्पनात्मक कोटि के अन्त:संस्कारों से ही क्रमश: स्फुरित और विकसित हुई है। मनुष्य की बुद्धि, वाणी, और आत्मबोध आदि की उन्नत शक्तियाँ किंपुरुष, बनमानुस आदि पूर्वजों की मानसिक शक्तियों से उन्नत होते होते उद्भूत हुई हैं। मनुष्य की अन्त:करण शक्ति और दूसरे जीवों की अन्त:करण शक्ति में केवल मात्रभेद है, तत्वभेद नहीं। शक्ति वही है, पर मनुष्य में वह अधिक है और दूसरे जीवों में कम।


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