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विमर्श

भोजपुरी लोकगीतों में औरत की दुनिया
अशोक सिंह यादव

अनुक्रम

अनुक्रम लोकगीत और स्त्री     आगे

हाल के दशकों में आधुनिकता (औपनिवेशिक) का विकल्प शिद्दत से महसूस किया गया है। आधुनिकता की बहस को यूरोपीय मानदंडों से परे ले जाने की छटपटाहट देखी गई है। इस कोशिश में कुछ महत्वपूर्ण और उल्लेखनीय उपलब्धियाँ भी हासिल हुई हैं। लेकिन भारतीय संस्कृति के वैशिष्ट्य की पूरी तस्वीर गढ़ पाने में कोई कड़ी, कोई सिरा अभी भी पकड़ से बाहर है। उस कड़ी के अभाव में हम अपनी बहुत सी सांस्कृतिक उपलब्धियों पर मुग्ध होकर 'आह-वाह' तो करते हैं, लेकिन जीवन-जगत से उसके संबंध को और तमाम सांस्कृतिक घटकों/इकाइयों के आपस के संबंध को पूरी तरह समझ नहीं पा रहे हैं। फलस्वरूप ये उपलब्धियाँ टुकड़ों में बिखरी हुई और एक-दूसरे के विरोध में खड़ी जान पड़ती हैं।

दरअसल आधुनिकता की बहस को यूरोप के मानदंडों से मुक्त कराने की छटपटाहट तो दिखी है, लेकिन चीजों को आधुनिकता के चश्मे से देखने और आधुनिकता के ही मुहावरे में समझने की कोशिशें हुई हैं। तो भारतीय संस्कृति को समझने का तरीका क्या हो सकता है? इसके लिए पहले हमें ध्यान रखना होगा कि भारतीय संस्कृति के निर्माण एवं विकास का तौर-तरीका अन्य संस्कृतियों से किस तरह भिन्न है। चूँकि यह चर्चा ज्ञान एवं साहित्य के संदर्भ में छिड़ी है, इसलिए इसी बिंदु पर इसे जाँचते हैं।

पश्चिम में लिखित साहित्य की परंपरा रही है। वहाँ वाचिकता यानी मौखिक परंपरा न के बराबर है। वहाँ का अध्ययन लिखित साक्ष्य को आधार बनाकर किया गया/जाता है, जो उचित ही है। इसके उलट अफ्रीका में वाचिक परंपरा अत्यंत समृद्ध रही है, किंतु वहाँ लिखित परंपरा नहीं है। वहाँ के अध्ययन के लिए मौखिक स्रोतों का सहारा लेना ही उचित होगा। भारत में अभिजन की लिखित और लोक की मौखिक परंपराएँ लगभग समान रूप से सशक्त और समृद्ध रही हैं। मजे की बात (और शायद मुश्किल भी) यह है कि दोनों के बीच कोई स्पष्ट विभाजक रेखा तय नहीं की जा सकती। कुछ चीजें अवश्य हैं, जिन्हें पूरी तरह से लोक या शिष्ट परंपरा में रखा जा सकता है, लेकिन इन दोनों के बीच में ढेर सारी चीजें ऐसी हैं, जिन्हें दोनों में से किसी एक में न रखना असंभव है। यह भी याद रखना चाहिए कि जिन चीजों को आज हम निस्संकोच शिष्ट या लिखित परंपरा में रख सकते हैं, वह कभी वाचिक परंपरा में रही हैं।

लोक और लिखित परंपरा में रामायण-महाभारत के सैकड़ों रूप हैं। कथासरित्सागर, पंचतंत्र, बैताल पचीसी, सिंहासन बत्तीसी को मौखिक या लिखित में से केवल किसी एक परंपरा में रख पाना आसान नहीं होगा। लोक और शास्त्र के गुणात्मक योग से फलित भक्ति साहित्य ने तो खैर एक नया त्रिकोण ही रच दिया। यदि लोक और शास्त्र को दो ध्रुव मानें, तो ये रचनाएँ इन दोनों ध्रुवों के बीच ऐसे स्थिति हैं कि लोक-मर्मज्ञ इन्हें लोक-परंपरा के ज्ञान एवं साहित्य का लिखित रूप करार देगा और शास्त्र-ज्ञानी इन्हीं रचनाओं को शास्त्रीय ज्ञान एवं शिष्ट साहित्य का लोकोपयोगी संस्करण कहेगा। लोक एवं शास्त्र दोनों बिंदुओं से देखने पर ही भारतीय साहित्य एवं संस्कृति में इन रचनाओं की सही जगह तय की जा सकती है।

दरअसल यहाँ लिखित और मौखिक परंपराएँ आपस में रगड़ खाती हुई, एक दूसरे के प्रति यथोचित आपत्ति और सम्मति प्रकट करती हुई आगे बढ़ती हैं। यही जटिलताएँ भारतीय संस्कृति को दूसरों से अलग और विशिष्ट बनाती हैं। यहीं से हमें भारतीयता को देखने की दृष्टि और समझ विकसित करनी होगी। जिस कड़ी को हम पकड़ नहीं पा रहे हैं, उसके मिलने की संभावना यहीं है।

जिस प्रकार लोक और शास्त्र को एक साथ रखकर देखने की जरूरत है, उसी प्रकार स्त्री और पुरुष की अभिव्यक्तियों को भी साथ रखकर देखने की जरूरत है। पुरुषों की आवाज तो तमाम कलारूपों में दर्ज है, लेकिन स्त्रियों की अपनी आवाज लोकगीतों में सुनाई पड़ती है। इस लेख में स्त्री-लोकगीतों के अध्ययन से लोक और स्त्री दोनों की सोच और संवेदना को महसूस करने-कराने का प्रयास किया गया है।

बेशक मनुष्य सामाजिक प्राणी है। लेकिन उसके सारे सपने और उसकी सभी इच्छाएँ समाज और इतिहास में पूरी नहीं होतीं। मनुष्य के स्वप्न और उसकी इच्छाएँ समाज और इतिहास से प्रभावित तो होती हैं, लेकिन इनसे बँधी नही होतीं। इसलिए वह 'स्वप्न लोक' रचता है, चाहे कोई काल हो, समाज में किसी भी विचारधारा का प्रभुत्व हो। स्त्रियों के सपने और उनकी इच्छाएँ लोकगीतों में दर्ज हैं, बशर्ते इन्हें समझने वाली अंतर्दृष्टि हो। यथार्थवाद का हमारी चेतना पर इतना गहरा असर है कि पूर्व औपनिवेशिक कलाओं और रचनाओं को भी इसी के पैमाने से नापने की कोशिश की जाती है। लोक साहित्य का अध्ययन भी प्रायः इसी तरह हुआ है। स्त्रियों के गीतों में 'सोने की थाली', 'महल', 'फूलों से सजी हुई सेज', पुत्र जन्म की खुशी में 'अन्न-धन, सोना-चाँदी लुटाना' इत्यादि का उल्लेख बार-बार हुआ है। लोक साहित्य के अध्येताओं ने इसका अर्थ (अनर्थ) किया है कि यह समाज की अमीरी और आर्थिक दृष्टि से भरे-पूरे एवं सुखी जीवन का चित्रण है।

मैंने इसे देखने का अलग तरीका अपनाया। दरअसल व्यक्ति अपने जीवन-जगत से नाखुश होकर ही 'स्वप्न लोक' रचता है। यह स्वप्नलोक असल जीवन-जगत से जितने अंशों में भिन्न और श्रेष्ठ होता है, उसी अनुपात में असल जीवन-जगत की आलोचना प्रस्तुत करता है। यह पहले से मौजूद लकीर को 'छोटी' कहने के बजाय उसके बरक्स बड़ी और आदर्श लकीर खींचने जैसा है, वह लकीर अपने आप छोटी साबित हो जाएगी। यह विशेषता लोक साहित्य और भक्तिसाहित्य में लगभग समान रूप से पाई जाती है। इसका अर्थ यह कतई नहीं कि लोकसाहित्य (भक्तिसाहित्य भी) में मौजूदा लकीर को छोटी कहने का चलन नहीं है, बल्कि लोक साहित्य में यह विवेकदृष्टि है कि किन चीजों की सीधे आलोचना करनी है, किन चीजों की प्रकारांतर से आलोचना करनी है।

ऐसा नहीं कि लोकगीतों का संग्रह शुरू करने के साथ ही मैंने इनका मर्म समझ लिया। लोकगीतों को बार-बार सुनकर और इनमें आए मुद्दों पर औरतों से चर्चा करके धीरे-धीरे मैं औरतों की सोच और उनकी संवेदना 'चीन्ह' (Trace) पाया। तब जाकर लोकगीतों में छिपा रहस्य धीरे-धीरे समझ में आया। इसी के साथ मुझे यह एहसास हुआ कि भक्तिकाल के बहुतेरे कवियों सूर, जायसी, चैतन्य का अंतर्मन नारी हो चुका था। काफी हद तक कबीर और एक हद तक तुलसी को भी इसमें गिन सकते हैं। इसके बिना नारी हृदय की इतनी सटीक अभिव्यक्ति संभव नहीं। शायद यह मेरा व्यक्तिगत एहसास हो, लेकिन मुझे यकीन है कि लोकगीतों का मर्म समझने वाला हर शख्स इस एहसास से गुजरेगा। भक्त कवियों के स्तर तक न सही, लेकिन स्त्री की सोच और संवेदना से अनुप्राणित हुए बिना लोकगीतों को नहीं समझा जा सकता। मुझे इस स्थिति तक आने में लंबा समय लगा। संभव है कि महिला शोधार्थी को इन मुश्किलों से न गुजरना पड़े, बशर्ते वह आधुनिकता के ज्ञान-रथ पर आरूढ़ होकर लोकगीतों का अध्ययन करने न जाए।

लोकगीतों, विशेषकर स्त्री लोकगीतों, का स्वभाव है कि उसमें बहुत बड़ी बातें प्रायः साधारण घटना प्रसंगों के जरिए, लेकिन अनुभूति की गहनता के साथ, कही जाती हैं। गीत के अंत में एक-दो ऐसी पंक्तियाँ आ जाती हैं, जो पहले के साधारण घटना प्रसंगों को असाधारण रूप से महत्वपूर्ण बना देती हैं। लोकगीतों में जीवन-जगत के बड़े रहस्य वस्तुनिष्ठ सहसंबंध के सहारे कहे जाते हैं। उदाहरण के लिए, एक गीत में औरत अपने भाई से कहती है, 'भइया, मैं नौ मन कूटती हूँ, नौ मन पीसती हूँ, नौ मन रसोई पकाती हूँ। बचे हुए आटे (पैथन) से बनाई गई छोटी रोटी मुझे खाने के लिए मिलती है। उस रोटी में भी छोटे देवर, छोटी ननद, घर के कुत्ते-बिल्ली इत्यादि को खिलाना पड़ता है।' गीत के इस विषय को घटना के रूप में नहीं, भावना के रूप में समझने की जरूरत है। नौ मन कूटने-पीसने-पकाने का मतलब है कि औरत अपनी सभी जिम्मेदारियाँ पूरी करती है। अपने थोड़े-से खाने में से देवर-ननद, कुत्ते-बिल्ली को खिलाने का मतलब है कि वह घर-परिवार के सभी लोगों की इच्छाओं और जरूरतों का ख्याल रखती है। खाने के लिए 'पिछली टीकरी' मिलने का मतलब कि इतना करने के बावजूद उसकी इच्छाओं और जरूरतों की परवाह किसी को नहीं। बेशक यह दुख पेट न भरने के दुख से ज्यादा तकलीफदेह है। इस प्रकार गीत में सीधे-सीधे कही गई बात किसी बड़ी एवं जटिल बात की ओर इशारा करती है। इस गीत में कुत्ते-बिल्ली का भी ध्यान रखने का जिक्र आया है। भारतीय समाज में पालतू पशु परिवार का हिस्सा माने जाते रहे हैं। उनके साथ घर वालों का रागात्मक-भावनात्मक संबंध होता रहा है। औपनिवेशिक आधुनिकता के पहले सृष्टि और समाज तो क्या, परिवार की भारतीय अवधारणा भी केवल मनुष्य केंद्रित नहीं रही है। इसी कारण इनसान की भौतिक सुख-समृद्धि के लिए तमाम प्राकृतिक उपादानों के बेहिसाब दोहन की परंपरा भी नहीं रही, बल्कि प्राकृतिक अवयवों के संग प्रेम, पारस्परिकता एवं सहनिर्भरता का जीवन जीने पर जोर रहा है। इसीलिए हमारे यहाँ गंगा मइया हैं, विंध्याचल देवी हैं और लगभग सभी प्रजाति के पेड़ों में किसी देवता का वास माना जाता है। हिमालय तो खैर इस तरह के प्रतीकों का 'हिमालय' ही है।

यह लेख लिखते हुए मुझे बार-बार लोकसाहित्य एवं लोकजीवन से भक्तिकाव्य एवं भक्तकवियों का सहज ही संवेदनात्मक एवं कलात्मक समीकरण बनता दीखता। मगर, चूँकि यह लेख मुख्यतः लोकगीतों पर ही केंद्रित रखना था, इसलिए मैंने भक्तिकाव्य या भक्तकवियों वहीं जिक्र किया है, जहाँ ऐसा करना जरूरी जान पड़ा। हालाँकि लोकसाहित्य और भक्तिसाहित्य को एक साथ रखकर गंभीर शोध करने की जरूरत है। ऐसे शोध से न सिर्फ लोकसाहित्य का महत्व समझ में आएगा, बल्कि भक्तिकाल के भी तमाम अनसुलझे रहस्य समझ में आ सकेंगे और भारतीयता की अवधारणा विकसित करने में भी सहूलियत होगी।

इस लेख में औरत के पैदा होने से लेकर वृद्ध होने तक के विभिन्न पहलुओं की झलक आपको मिलेगी। लोकगीतों में आए स्त्री-जीवन के विभिन्न पहलुओं को विन्यस्त करके मैंने 'औरत की दुनिया' पहचानी है। लेख में इस्तेमाल किए गए सभी लोकगीत मैंने खुद गाँव-देहात में जाकर संग्रह किए हैं। फील्ड-वर्क (गीत-संग्रह) के दौरान मैंने बार-बार ये महसूस किया कि मुझे गीतों और स्त्रियों को समझने की दृष्टि से बहुत सारी ऐसी चीजें फील्ड में मिलीं, जो अन्यथा इन लोकगीतों को किसी किताब में पढ़कर मेरे दिमाग में कभी आ ही नहीं सकती थीं। लोकगीतों को उनके संदर्भ से काटकर नहीं देखा जा सकता और मैंने गीतों को प्रायः गीत गाने वाली स्त्रियों की कायिक-वाचिक प्रतिक्रिया के साथ जोड़कर देखा-समझा है। उनकी टिप्पणियों और प्रतिक्रियाओं का यथानुकूल उल्लेख आप लेख में भी पाएँगे। लेख में गीतों के उद्धृत अंशों, गीतों के भाव या अर्थ के आगे दर्ज संख्या के सहारे परिशिष्ट में वह पूरा गीत उसी क्रम पर आप देख सकते हैं।

इस लेख में शामिल सभी गीत गाजीपुर (पश्चिम), बलिया (पश्चिम-उत्तर) और देवरिया जिले से फील्ड वर्क के दौरान मैंने रिकार्ड किए हैं। इन क्षेत्रों में भोजपुरी का रूप अवधी के करीब पड़ता है। यहाँ से पूरब के भोजपुरी-रूप पर अवधी का प्रभाव क्रमशः हल्का होता जाता है और भोजपुरी अपने उच्चतम बिंदु की ओर पहुँचती जाती है। इसी प्रकार ऊपर गिनाए गए जिलों से पश्चिम की भोजपुरी के रूप पर अवधी के तात्विक लक्षणों का प्रभाव धीरे-धीरे गहराता जाता है, किंतु अभी भी यह भोजपुरी ही होती है, जैसे आजमगढ़ की भोजपुरी। इससे और आगे बढ़ने पर एक ऐसा भाषिक क्षेत्र आता है, जहाँ की बोली/भाषा भोजपुरी और अवधी के लगभग समान लक्षणों से युक्त है। इसे भोजपुरी वाले भोजपुरी मानते हैं, अवधी वाले अवधी। जौनपुर के काफी हिस्से की बोली/भाषा ऐसी ही है। इसके और आगे बढ़ने पर अवधी का रूप धीरे-धीरे साफ तौर पर उभरने (फेड इन होने) लगता है। अवधी के लक्षण क्रमशः गहरे होते जाते हैं और भोजपुरी का प्रभाव धुँधला होता जाता है। भोजपुरी के धुँधले प्रभाव के बावजूद अब यह अवधी भाषा होती है। दरअसल, इन बोलियों/भाषाओं का व्यवहार न तो किसी निर्दिष्ट क्षेत्र से अचानक शुरू होता है और न ही अचानक बंद होता है। इनका व्यवहार क्रमशः गहराते हुए एवं अनिर्दिष्ट क्षेत्र से शुरू होता है और क्रमशः धुँधलाते हुए एवं अनिर्दिष्ट क्षेत्र से खत्म। भाषाओं/बोलियों के इस स्पेक्ट्रम के कारण ही भारतीय साहित्य (लोक एवं शिष्ट दोनों) एक भाषा/बोली-क्षेत्र से दूसरी भाषाओं/बोलियों तक सहज ही संचरण करता रहा है।

इस लेख में आई कथा उन परिवारों की है, जिनमें स्त्री-पुरुष की स्थिति में बहुत ज्यादा फर्क नहीं होता। जाहिर है, समाज के पुरुषप्रधान होने के कारण स्त्री की तुलना में पुरुष की स्थिति तनिक बेहतर होती है। लेकिन इनकी स्थितियों में यह फर्क इतना बड़ा नहीं होता कि इन्हें एक-दूसरे का वर्गशत्रु मान लिया जाए और स्त्री के दुख-उत्पीड़न के लिए उस परिवार के पुरुषों को पूरी तरह से जिम्मेदार ठहरा दिया जाए। यह मुख्यतः वृहत्तर किसान परिवारों की कथा है। इसमें खेती एवं पशुपालन के अलावा इन्हीं के समकक्ष कहार, कुम्हार, बढ़ई, बनिया, नाई, धोबी इत्यादि पेशेवर जातियों की औरतों की जीवन-गाथा है। इस लेख को पढ़ते हुए यह बात ध्यान में रखें कि इन परिवारों के लिए न्यामत बस यही (या इसी के बराबर) होती है :

दो जोड़ी बैल हों और उनके जोत भर खेत हों, दो गायें हों ताकि घर में बारहों मास दूध उपलब्ध रहे, प्रिय वचन बोलने वाली पत्नी हो। यदि गृहस्थ को ये सब प्राप्त हों, तो वह हाथी-घोड़े पालने की इच्छा क्यों करे! (अपभ्रंश के एक दोहे का भावानुवाद)


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