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कहानी

संतरे वाली
वनमाली


(1)

चंदा को लोग संतरेवाली के ही नाम से जानते हैं, पर वह सिर्फ संतरे नहीं बेचती, उसकी डलिया में अमरूद भी होते हैं, केले व सेब भी रहते हैं और कभी-कभी वह आम और अंगूर भी ले आती है।

चंदा घर में अकेली औरत है। माँ-बाप थे कभी, सो न जाने कब कूच कर गए। वह अपने स्वामी को भी खो चुकी थी। अब सब खोकर चंदा केवल अपने रूप को ही लक्का-चोरी से समेट कर अपना बना सकी है। सो चंदा उसकी कदर जानती है और इसी से वह उसे बड़े सँवार कर व निखारकर रहती है।

चंदा में गर्व है, इसी से उसमें हिंसा है। माया-मोह का नाता तोड़कर अब उसने संसार से हिंसा का नाता जोड़ा है। चंदा इसलिए संसार को कोरा सहती नहीं, वह उसे पूरे बल से अपनी ओर खींचकर कलपाना चाहती है। इतवार के दिन जब चंदा कालेजों के होस्टलों में फल पहुँचाने जाती है, तब वह अपनी चुहल में हृदय की आग भर उसे बिछुड़े हुओं के हृदय में पहुँचा देती है और उन्हें सुलगा देती है।

पर जहाँ चंदा जलाती है, वहाँ जलना भी जानती है। इसी से कड़ी है। कालेज के लड़के उसे देख अपना सब भूल जाते हैं और चंदा भी उनसे खूब हँसती-बोलती है, खूब कस-कसकर मोल-भाव करती है। किंतु मजाल क्या कि चंदा से कोई फोस बात कह दे। सभी जैसे चंदा को अपना मानकर भी अपने से दूर मानते हैं। जहाँ चंदा इन भटके हुओं को हँसाकर-रुलाकर सुख पाती है। वहीं वह घर आ खोई-सी, फटी चटाई पर बड़ी रात तक अपने टूटे छप्पर के सुराखों से ऊपर जलते हुए आसमान को देखा करती है और बिसूरा करती है।

(2)

इस बार चंदा के रूप के लोभी लड़के उसकी याद करते, गरमी की छुट्टियों के बाद अपने घरों से यहाँ आए हैं, तब उनके समूह में एक नया लड़का आकर समा गया है। वह है अबनि कुमार या अबनि। अबनि स्वभाव का इतना भोला व सरल है कि जब छुट्टी के दिन चंदा होस्टल में फल बेचने आती है, तब वह और लड़कों के साथ छेड़खानी में नहीं शरीक होता। लड़के उसकी यह कमजोरी देख हँसते हैं और उस पर ताने बरसाते हैं, पर उसे अपने में समेट नहीं पाते।

अबकी बार जब चंदा फल बेचने आई, तब अबनि भी सेब खरीदने की गरज से बाहर निकल आया। उसे आता देख लड़कों ने ताने कसे। किसी ने पानी बरसाया और किसी ने अबनि के पास जाकर उसे अपनी कमजोरी पर विजय प्राप्त कर लेने पर बधाई दे डाली। चंदा इन सब बातों का कुछ अर्थ न लगा सकी। वह सिर्फ अपने सामने एक सरल सुख को सिमटते देख सकी और समझ सकी कि आज कोई नया अपरिचित उसके रूप का लोभी विद्यार्थी यहाँ आकर फँस गया है। इसलिए उसकी इतनी पूजा है।

अबनि किसी की कुछ परवाह न कर सीधा चंदा के सामने जा खड़ा हुआ और बोला - 'मुझे सेब चाहिए। सेब कैसे दिए?'

चंदा ने अपनी मदभरी आँखों से एक झकोला दिया और डलिया में से सेब उठाते हुए उसके ऊपर का गुलाबी कागज उतारते हुए कहा - 'बाबूजी, यह कश्मीरी सेब है। दो आने का एक दिया है।'

चंदा के इसी लहजे पर लड़के लोटपोट हो जाते। पर अबनि तो जरा नहीं उकसा। उसने उससे कोई भाव-ताव नहीं किया और चट कह दिया - 'अच्छा मुझे दो सेब दे दो।'

और वह चवन्नी फेंक चलता हुआ।

अब यह बात कुछ अच्छी नहीं हुई। चंदा जो यहाँ आती है, पैसे कमाने नहीं आती। वह तो लड़कों से लड़ने-झगड़ने आती है। वह चुहल करती है और चाहती है कि दूसरे भी उससे चुहल करें। इन लड़कों को अपनी करारी चितवन से उभारकर वह जो कुछ पाती है, वही उसकी सच्ची कमाई होती है। वह इनसे अलग रहकर भी इन पर सत्ता चाहती है।

पर यह हार कैसी?

चंदा के जीवन में आज एक संधि-क्षण आकर उपस्थित हुआ, जब वह जान पाई कि उसके रूप-यौवन के अभेद्य दुर्ग को भेद कर कोई भीतर घुस आया है और उसे खंड-खंड कर गया है। चंदा आज टूट चुकी है।

(3)

चंदा उस दिन से बिखरी-बिखरी हो रही है। वह अपने को बटोरकर समेट लेना चाहती है, पर समेट लेने की शक्ति जैसे उसने एक दम खो दी है। वह टूक-टूक चंदा को जोड़कर फिर अखंड चंदा बन जाना चाहती है; किंतु उसमें जैसे सामर्थ्य नहीं, साहस नहीं, त्याग नहीं। बंधन की गाँठ खोल दी गई है और चंदा खुलकर फैल गई है। वह अब नहीं बटोरी जा सकती।

चंदा जब ऐसी छलना में फँसी हुई है, तब एक दिन सड़क पर फल बेचते भेंट हो गई उसकी अबनि से। चंदा धीरे से बोली - 'कहाँ चले बाबू साब।'

अबनि सिर नीचा किए चला जा रहा था। एकाएक आवाज सुन उसने अपना सिर उठाया, तो देखा उसी दिन की संतरेवाली को। वह बड़ी आफत में फँसा। इस बीच खड़े होकर किसी स्त्री से बातचीत करना उसे भद्दा जँचा। तब उसने छूटने की गरज से कहा - 'क्यों, क्या-क्या फल हैं? मुझे तो अंगूर और सेब चाहिए।'

चंदा को अबनि की परेशानी पर हँसी-सी छूटी।

वह मीठे स्वर में बोली - 'क्या बाबू साब, कहीं दूर-दूर से खड़े होकर सौदे की बातें पूछी जाती हैं? जरा पास आइए, माल देखिए और तब सौदा कीजिए। आप कालेज वालों को तो नेक शउर नहीं होता।'

अबनि को इस युवती नारी की बात में कुछ स्वाद-सा आया। वह उसकी अवहेलना न कर सका। वह कुछ पास खिसक आया। तब चंदा ने बताया - 'यह देखिए बाबू साब, रस के भरे बद्दीदार संतरे हैं। ये ताजे काश्मीरी सेब हैं और ये चमन के अंगूर हैं। जो चीज मन पड़े, ले जाइए। विश्वास न हो, तो थोड़ी सब चीज चख लीजिए।' और वह झटपट एक संतरे को खोलकर उसकी फाँकें अबनि को देने लगी।

अबनि को उसके खरेपन पर थोड़ा प्रेम-सा उपजा। वह बोला - 'मुझे तुम्हारा विश्वास है। तुम झटपट दो संतरे, एक सेब और पाव भर अंगूर बाँध दो।'

चंदा ने कहा - 'सब चीजें बाँध दीं।'

अबनि ने पूछा - 'दाम कितने हुए।'

चंदा ने बताया - 'आठ आने।'

अबनि पैसे निकाल कर देने लगा।

चंदा तब ठुड्डी पर हाथ रखकर हँसने लगी। बोली - 'वाह बाबू साब, बाजार में चीजें इस तरह खरीदी जाती हैं? जो दाम माँगे सो उठाकर दे दिए। पैसे की आप लोगों को जरा कसक नहीं होती। मेरे तो कुल पाँच आने हुए।'

अबनि रोज की भाँति आज भी चंदा को नहीं समझ सका। पर और दिन की भाँति उसकी आज चंदा को बुरा समझने की हिम्मत नहीं हुई। आज उसने चंदा में जो सरलता, सहृदयता और नारीपन देखा, उससे वह सहज में मोहित हो गया। तब उसने चंदा को बताया कि वह बहुत जल्दी ही होस्टल छोड़कर कहीं बाहर मकान लेने की सोच रहा है। होस्टल में उसे खाना अच्छा नहीं मिलता और भोजन बनाने के लिए वह घर से कोई आदमी बुला लेगा। इसलिए वह आज मकान की तलाश में निकला था। पर कोई अच्छा मकान उसे नहीं मिल सका।

चंदा चुपचाप अबनि की बातें सुनती रही और तब बोली - 'बाबू साब, मेरी निगाह में एक मकान है। दो दिन बाद इतवार है। यदि आप आवें, तो मैं मकान दिखा दूँ।'

आज जब अबनि इतवार को आने की कह होस्टल की तरफ चला, तो वह रास्ते भर इस अपरिचित, सहृदय, चुहल से भरी नारी की बात सोचता रहा। और जब वह होस्टल पहुँचा, तब उसे मालूम हुआ कि उसकी तबियत अलील है। उससे आज कुछ पढ़ाई नहीं हो सकेगी। वह तब थोड़ा-सा अन्न पेट में डाल कर पलंग पर लेट गया।

अबनि की इतवार को घर देखने आने की बात ने चंदा के जीवन की धारा को एकाएक, एकदम बदल दिया। चंदा कभी कड़ी थी, इसलिए आज इतनी सरल है। कड़ाई को दबाकर जैसे सरलता ऊपर आई है। उसमें क्रोध नहीं, हिंसा की ज्वाला नहीं, पाप का परिताप नहीं और वह बोझिल हो पैर की बेड़ी नहीं। वह तो फूल की सुगंध की भाँति सब ओर व्याप्त है। चंदा जानती है कि एक बार उसकी अवहेलना हो चुकी है। वह कड़ी होकर एक बार अपने स्तुत्य को खो चुकी है। इसी से इस बार वह ज्वाला लेकर नहीं आई है। वह तो सेवा-भाव से सहज में पा गए इस सरल से खोटे अबनि को लूट लेना चाहती है।

इसी बीच आ गया इतवार।

अबनि देर करके आया।

चंदा ने ताना मारते हुए कहा - 'वायदे के तो आप पूरे हैं, बाबू साब। अब मैं भी कह दूँ कि आज मुझे फुरसत नहीं, आप कल आइए तो?'

अबनि ने जवाब दिया - 'तो लो चला जाता हूँ। कल आऊँगा।'

चंदा क्षण भर अबनि का मुँह जोहती रही। यह अबनि भी चुहल करना सीख गया। पर अब चंदा दोष नहीं देखेगी। वह तो अब अबनि की पूजा करेगी। अपने हृदय में बंद किए हुए देवता को भोग लगाएगी।

वह बोली - 'आप भूल कर सकते हैं, पर मैं कैसे भूल करूँगी? आज आप मेरे मेहमान हैं। आप यों ही सूखे थोड़े ही लौटने पाएँगे।' और चंदा ने अबनि के सामने कुछ संतरे की फाँकें, एक सेब व थोड़े अँगूर रख दिए।

अबनि ने टालना चाहा। बताया कि उसे भूख नहीं। वह होस्टल से खाकर चला है और उसे जल्दी है।

किंतु चंदा कब उसे जल्दी छोड़ने लगी। उसने मुस्कुराकर कहा - 'वह तो मैं भी देख रही हूँ कि आपको जल्दी है। यदि सचमुच जल्दी है, तो आप खा क्यों नहीं लेते। अपनी देर के लिए आप नाहक मुझे दोष मत दीजिए।'

अबनि ने आखिर झटपट संतरे की फाँक मुँह में भर ली और दो चार अँगूर मुँह में डाल लिए। तब बोला - 'लो, अब चलो।'

चंदा अबनि को मकान दिखाने ले गई।

अबनि को मकान पसंद आया। वह जल्दी ही वहाँ उठ आने की कहकर चला आया। पर उसने अपने को एक पहेली में उलझा पाया। यह चंदा, जो इतना अपनापन दिखलाती है, सो उसका प्रयोजन क्या है? प्रयोजन नहीं है, तभी तो उसको लज्जा नहीं है, तभी तो वह भटकती नहीं है। अबनि अपने हृदय के विकार से इसका मिलान कर अपने को खींचना चाहता है, अपने को छिपाना चाहता है। इसी से वह छोह करता है। वह देखता है कि वह प्रबल वेग से चंदा की ओर आकृष्ट हो रहा है। इस कारण वह समझता है कि चंदा भी उसी वेग से उसकी ओर बढ़ी चली आ रही है। पर इन दो शक्तियों के महाघर्षण का क्या फल होगा, अबनि यह समझ नहीं पाता। भोले अबनि का यह बंधन है, इसलिए इसमें छलक नहीं है, प्रवाह नहीं है, उन्माद नहीं है, सुप्त हृदय की मीठी व्यथा है।

रात भर अबनि सोया नहीं। वह इन्हीं विचारों से अपने को लपेटे रहा और सबेरा होने पर होस्टल छोड़कर अपने नए मकान में उठ आया।

(5)

तब से अब और अब से तब यह चंदा और अबनि की कहानी एक बड़ा परिवर्तन लाँघ आगे बढ़ गई है। जहाँ चंदा अबनि को पाकर दूर हो गई है और स्थिर बन गई है, वहाँ अबनि चंदा को खोकर पास आ गया है। और अस्थिर हो उठा है।

यह संतरेवाली का जो खंड-खंड रूप चंदा है, सो अबनि को पाकर फिर समविष्ट का रूप धारण करने लगा है। चंदा के लिए अब इस समस्त संसार में जैसे कहीं भी कोई रंध नहीं, कहीं भी कोई अभाव नहीं। उसके लिए सभी कुछ भावपूर्ण हो एक सरल भाव से जागरित हो उठा है। चंदा आज रोती नहीं, हँसकर आज जलाती नहीं। वह तो अब सब कुछ सह-झेलकर दुनिया पार करना चाहती है और जीने का मजा लूटना चाहती है।

और यह अबनि यहाँ आकर खाने को तो ठीक-ठाक पाता है, क्योंकि घर से एक आदमी आ गया है, जो समय-समय पर मनचाही वस्तु बनाकर देता है, पर वह यहाँ आकर एक दूसरी ही बीमारी में गिरफ्तार हो गया है। एक दिन उसकी जो मीठी-मीठी व्यथा थी, वह अब खूब कड़वी हो उठी है। अबनि जानता है कि चंदा ने उसे कहीं से आकर लूट लिया है, मगर इसके लिए वह उसे दोष नहीं दे पाता। वह इसके लिए अपने आपको ही दोषी पाता है और दोषी ठहराकर भी वह बदले में जैसे कोई बहुमूल्य वस्तु पाने का अनुभव करता है।

इसी बीच एक दिन चंदा चली आई। पूछने लगी - 'कहिए बाबू साब, मजे में तो हैं? किसी बात की तकलीफ तो नहीं?'

अबनि अपने नित्य के हर्ष-विवाद से, प्राणों के हाहाकार और तुमुल संग्राम के बीच से गुजर रहा था। एकाएक उसका हृदय चंदा की आवाज सुन धड़कन से भर गया। हृदय के सब तार उसके गले में आकर अटक गए और उसके मुँह से कोई बात न निकली।

चंदा ने पूछा - 'मेरे आने से आपकी पढ़ाई में हर्ज पड़ा क्या?'

अबकी बार अबनि का मुँह खुला - 'सो बात नहीं।'

चंदा ने प्रश्न किया - 'तो क्या बात है?'

अबनि साहस खोने लगा। बोला - 'कोई बात तो नहीं। यही पढ़ाई लिखाई की चिंता मन को खा रही थी।'

चंदा अबनि के चेहरे से पढ़ सकी कि उससे कोई बात छिपाई जा रही है। उसने चुटकी ली - 'तो न बताइए। और मेरा हक ही क्या, जो मैं आपकी सब बातें जानूँ।'

अबनि को शायद यह बात लगी। उसने इस बार अपना सब कुछ खोकर कर कह दिया - 'चंदा, सच पूछो, तो मैं तुम्हारी ही बात सोच रहा था।'

चंदा एक बार लाल हो उठी। बोली - 'मेरी बात! छिः बाबू साब, आप भी किस गलीज औरत की बात को लेकर माथापच्ची कर रहे थे। आप पढ़े लिखे आदमी हैं। अपनी पढ़ाई करिए और मौज से रहिए।'

जब चंदा अबनि के कमरे में खड़ी हो, उसे उपदेश देकर झोपड़े में चली आई, तब वह एकाएक फफक-फफक कर रो उठी। आज उसका रूप हृदय के सब तारों को दबाकर गर्वीले स्वर में वही पुरातन का गीत गाने लगा। आज उसके हृदय ने अपने आकर्षण के लिए प्रयोजन ढूँढ़ लिया। आज चंदा के जीवन में फिर एक संधि क्षण आकर उपस्थित हुआ, जब उसने देखा कि यह अबनि एक शुभ मुहूर्त की भाँति उसके जीवन में आ जड़ित हो रहा है। और अबनि किसी के लिए नहीं है, उस पर और किसी दूसरे का अधिकार नहीं है। उसे तो भगवान ने पूर्णतः उसी के लिए उसके पास भेज दिया है। यह सोच चंदा विकट रूप हँसी।

तभी आया अबनि।

अबनि चंदा से बोला - 'चंदा मुझे माफ करना। मुझसे अपराध हुआ है। मैं तुम्हें नहीं समझ सका।'

चंदा समझ गई कि अबनि आज भी उसे नहीं समझ सका। पर वह उसे यह न बता सकी। वह अपने उस प्रथम मिलन के अबनि के सरल मुख की सोच काँप उठी। आज भी अबनि ने देवता के समान ही उसके जीवन में प्रविष्ट होकर उसे खींच लिया। चंदा धोखा न दे सकी।

चंदा ने कहा - 'नहीं बाबू साब, मैं ओछी जाति की औरत ठहरी। एक आध ऐसी-वैसी बात आपके मुँह से निकल गई तो उसका क्या सोच? आप अपने को इस तरह छोटा न बनाइए।'

और, जब अबनि चंदा के उत्तर से संतुष्ट होकर खुशी-खुशी घर लौट आया, तब उसी रात को चंदा अपने घर में ताला-कुण्डी लगा न जाने कहाँ चली गई।

(1936)


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