hindisamay head
डाउनलोड मुद्रण

अ+ अ-

कविता

खामोशी
अभिमन्यु अनत


मेरे पूर्वजों के साँवले बदन पर
जब बरसे थे कोड़े
तो उनके चमड़े
लहूलुहान होकर भी चुप थे
चीत्कारता तो था
गोरे का कोड़ा ही
और आज भी
कई सीमाओं पर
बंदूकें ही तो चिल्ला-कराह रही हैं
भूखे नागरिक तो
शांत सो रहे हैं
गोलियाँ खाकर।

 


End Text   End Text    End Text

हिंदी समय में अभिमन्यु अनत की रचनाएँ