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कविता

दोपहर की रात
अभिमन्यु अनत


यहाँ दोपहर में रात हो गयी
गूलर का फूल खिलकर काफूर हो गया
गिद्ध के डैनों के नीचे
गोरैया की जिंदगी कानून बन गयी
कैक्ट्स के दाँतों पर खून का दाग आ गया।
पंखुड़ी से फिसल कर
चाँदनी अटक गयी है काँटों की नोक पर
ओस की लाल बूँदों पर
काली रात तैरती रह गयी।

उजाले के गल गये तन पर
काला कुत्ता जीभ लपलपाता रहा
गंधलाती रही सूरज की लाश
काली चादर के भीतर
अंधे दुल्हे ने काजल से
भर दी माँग दुल्हन की
यहाँ दोपहर में रात हो गयी
सुहाग-रात बंद रह गयी
सिदरौटै के भीतर

 


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