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कविता

आहो आहो
प्रकाश उदय


रोपनी के रऊँदल देहिया, सँझही निनाला तनि जगइह पिया
जनि छोड़ि के सुतलके सुति जइह पिया
आहो आहो
हर के हकासल देहिया, सँझही निनाला तनि जगइह धनी
जनि छोड़ि के सुतलके सुति जइह धनी
आहो आहो
चुल्हा से चऊकिया तकले, देवरू ननदिया तकले
दिनवा त दुनिया भरके, रतिये हऊवे आपन जनि गँवइह पिया
धईके बहिंया प माथ, बतिअइह पिया
आहो आहो
घर से बधरिया तकले, भइया भउजईया तकले
दिनवा त दुनिया भरके, रतिये हऊवे आपन जनि गँवइह धनी
धईके बहिंया प माथ, बतिअइह धनी
आहो आहो
दुखवा दुहरवला बिना, सुखवा सुहरवला बिना
रहिये ना जाला कि ना, कईसन दो त लागे जनि सतइह पिया
कहियो रुसियो फुलियो जाईं, त मनइह पिया
आहो आहो
काल्हु के फिकिरिये निनिया, उड़ि जाये जो आँखिन किरिया
आ के पलकन के भिरिया, सपनन में अँझुरइह-सझुरइह धनी
जनि छोड़ि के जगलके सुति जइह धनी
जनि छोड़ि के जगलके सुति जइह पिया
जनि छोड़ि के जगलके सुति जइह धनी

 


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