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कविता

नेवता-हकारी
प्रकाश उदय


आजु तिलक में छौड़ा के, कल छौड़ी के बरियात में
दिनभर मँड़वाने-भतवाने जबरन जगरम रात में

नेवता पर नेवता पर नेवता एक लगन में चरि चरि गो
एने लूक लहरिया मारे रोके पत पीपर-बर हो
ए चाचा तू ओहिजा होल, ए बाचा तू होहिजा में
दिनभर मँड़वाने-भतवाने....

ओइजा नेवता नगद चलेला, होइजा धोती आ साड़ी
हो हितई त चहुँपावे के बाटे दही भरल हाँड़ी
छूटे मत हिल हिंड़ा न जाये भुला न जाए बात में
दिनभर मँड़वाने-भतवाने....

पाँच बजियवा बस के सट्टा, सात बजियवा बिगड़ल बा
आठ बजियवा दस पर पहुँचल, चवा-चूल ले ठकचल बा
जिपिया माँगे एबरी-दोबरी दे द जिउआ जाँत के
हब उहँवा नस्ता सँपरा के, हुँहवा पहुँचब पाँत में

लागल खोंच नया कुर्ता में, फाटल गंजी झाँकत बा
कवन सफाई लंगड़इला के, माँगल पनही काटत बा
ई सुख का जाने जे सरवा, खेलत बा अफरात में
दिनभर मँड़वाने-भतवाने....

 


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