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कविता

किन्नौर
ब्रजेंद्र त्रिपाठी


सपनों में आवाज देता है किन्नौर
किन्नौर - हिमाचल का जनजातीय प्रदेश

वैसे तो किन्नौर
खुद एक जीता-जागता सपना है
मुक्तहस्त प्रकृति ने
इस पर लुटाया है अपना ऐश्वर्य।
सुबह की धूप में चमकतीं
रजत पर्वत श्रृंखलाएँ
पहाड़ों की छाती फोड़ बहती जलधाराएँ
ऊपर आसमान छूते शिखर
नीचे अतल गहराइयाँ।

देखो यहाँ से
एक क्षीण रेखा-सी जान पड़ती है
वह पहाड़ी नदी
आगे जाकर बदलती है अपना रूप
और फिर खुलने लगती है उसकी आवाज
उसका नाम तो विस्मृत हो गया है
लेकिन कानों में अब भी गूँजता है
उसका हर हर नाद।

किन्नौर अब भी पुकारता है
बढ़ाता है अपने फलदार वृक्षों वाले हाथ
निहारता है अपने हिमशीतल नेत्रों से
आमंत्रण भेजता है नारियों की चपल मुस्कान में
कहता है -
कहाँ फँसे पड़े हो बंधु!
जीवन की किस आपाधापी में उलझे हुए हो ?
किस लिए जोड़ रहे हो यह माया ?
कौन-सा सुख पाओगे इनसे भला तुम ?
आओ, जोह रहा हूँ मैं तुम्हारी बाट !

मेरे प्राणों में स्पंदित होने लगता है
किन्नौर
आमंत्रित करता है मुझे साङ्ला गाँव
पुकारती है मुझे बास्पा नदी


2 .

याद आती है गाँव की वह अपरिचित युवती
जो यूँ ही वनवीथियों में मिल गई थी
कितनी आत्मीयता से करती रही थी बातें
और सहज भाव से आमंत्रित किया था
अपने घर, चाय के लिए
याद आती है उसकी छोटी-सी बिटिया
गोल-मटोल आँखों वाली
सेब की तरह लाल गालों वाली।

किन्नौर !
भूला नहीं हूँ मैं तुम्हें
मैं फिर आऊँगा
बार-बार आऊँगा
कोई भी
अनसुनी कैसे कर सकता है
तुम्हारी पुकार ?

 


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