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कहानी

बचपन
प्रेमपाल शर्मा


बंटी ने अभी कलम भी नहीं खोली होगी कि नीटू की आवाज खिड़की पर हाजिर थी - 'बंटी भइया! क्या खा रहे हो?'

बंटी तुरंत खिड़की पर थे। बंटी ने होठों पर उँगली रखकर उसे चुप रहने का इशारा किया।

'क्यों? बंटी भइया, ऐसा क्यों कर रहे हो?' नीटू कहाँ मानने वाले थे। 'बताओ न क्या कर रहे हो?'

'मैं बताती हूँ।' मम्मी रसोई से दौड़ती हुई आईं।

मम्मी जब तक पहुँचती, नीटू लापता थे और बंटी कूदकर अपनी मेज पर।

मम्मी ने तुरंत खिड़की बंद की। नीटू को न पाकर डाँट फिर बंटी पर ही पड़ी, 'अब खिड़की खोली तो तेरी खैर नहीं।'

बंटी ने गणित का पन्ना खोल लिया। बंटी की समझ में नहीं आता कि मम्मी-पापा क्यों उसे इस काम में जोते रहते हैं।

'जब देखो तब मैथ-मैथ! क्या हो जाएगा मैथ से?'

'बेटा, सवाल करने से अक्ल तेज हो आती है। जब दो में दो की गुणा करते हैं तो दिमाग की नसें पहले उलट-पुलट होती हैं, फिर सीधी हो जाती हैं। साफ सड़क की तरह। बस, फिर दिमाग तेजी से दौड़ने लगता है।' पापा ने हाथों के इशारे से बंटी को समझाया।

बंटी सोचता रह गया - उलट-पुलट जैसे वह चीटू-नीटू और जय के साथ पार्क में करता है!

'लेकिन मेरी तो नहीं होतीं।'

बंटी की आँखें तो किताब में हैं। पर दिमाग पार्क में दौड़ रहा है।

फूल-पत्तियों से विशेष प्रेम है बंटी को, 'मम्मी! मम्मी! देखों इसमें अब चार पत्तियाँ हो गईं। पहले सिर्फ दो थीं। मम्मी, दो और कैसे आ गईं?'

'जैसे हम बढ़ते हैं। तुम पहले इतने-से थे।' मम्मी ने दोनों हाथों को गोल करके बताया।

'हैं!' उसे यकीन नहीं आया, 'मैं इतना-सा था! इतना-सा?' उसने भी हाथ से अपना पैमाना बनाया। 'झूठ बोलती हो।'

'पापा से पूछ लो!'

'आप ही बताओ न, इतना छोटा था जितना ये पौधा।' उसकी आँखें खुली हुई हैं आश्चर्य से। पौधा उसके सिर्फ घुटनों तक आता है। 'तो फिर मैं और बड़ा हो जाऊँगा। शक्तिमान की तरह।'

'शक्तिमान से भी ज्यादा। इसीलिए तो मैं दूध पिलाती हूँ। दही-फल खाओगे तो और जल्दी बड़े हो जाओगे।'

'च्च! च्च! दही! दही तो मैं कभी नहीं खा सकता। इतना खट्टा होता है। इतना खट्टा - आय!' उसने उल्टी के अंदाज में जीभ निकाली।

मम्मी अपने काम में व्यस्त हो गई हैं। बंटी बरामदे में रखे गमलों में देखता रहा। उसके बोए चने तो अंकुर देने लगे हैं, पर कपास के बिनोले का पता नहीं चल रहा। वह मिट्टी को रोज उलट-पुलटकर देख लेता है।

बालकनी में सोते-सोते चिड़ियों की आवाजें आने लगती हैं, तब उठता है बंटी। वो भी मम्मी के जगाने पर। मम्मी को पता है उसे जगाने का ढंग। 'बंटी! बंटी! देखो, तोता। देख-देख! इसकी चोंच कितनी लाल है। पापा की नाक जैसी।'

तोता, चिड़िया, मोर, बंदर, लंगूर बिल्ली-कुछ भी नाम लीजिए। बंटी आपकी सारी बातें मानने लगेगा।

'दूध फटाफट पी ले, फिर घूमने चलते हैं। कल जहाँ मोर थे वहीं चलेंगे।' बंटी ने दूध पी लिया है और जूते भी खुद ही पहन लिए हैं। अब देरी मम्मी की तरफ से है।

'चलते हैं, भई, चलते हैं। बंटी, पापा को भी ले लें?'

कान में कहता है, 'नहीं, पापा को नहीं।'

सबसे बुरी लगती है बंटी को सुबह-सुबह पापा की आवाज। 'उठो फटाफट! सात बज गए।'

'बस एक मिनट, पापा।' आवाज खत्म भी नहीं होती कि उनके ठंडे हाथ बंटी के गालों पर हैं।

'संडे के दिन तो सो लेने दिया करो, पापा।'

बंटी को पता है कि पापा आते ही दौड़ने के लिए कहेंगे। 'दौड़ने से टाँगें मजबूत हो जाती हैं, ताकत आती है। दौड़ो और घर चलो जल्दी। समाचार भी सुनने हैं।' यह भी कोई सैर हुई। जबकि मम्मी के साथ वह चींटियों को घर बनाते हुए देखेगा। दबे पाँव चलकर चिड़ियों को पकड़ने की कोशिश करेगा। चि‎ड़ियों की किसी नई आवाज को कान से सूँघता हुआ मम्मी को बताएगा या पूछेगा, 'मम्मी, ये कौन-सी चिड़िया है?'

मम्मी को किसी चिड़िया का ज्ञान नहीं है। इसके बावजूद वह यकीन मम्मी पर ही करेगा।

'इसको गटगटिया कहते हैं, क्योंकि यह गटगट की आवाज करती है।'

मम्मी ने तुक्का मारा।

'कितना सुंदर नाम है, गटगटिया।' उसने दोहराया। 'मम्मी एक पेड़ पर कितनी चिड़िया रहती होंगी?'

'सौ।'

'सौ! कैसे रहती होंगी? एक के ऊपर एक! इतनी तो डालियाँ भी नहीं होतीं।'

मम्मी कहीं और खोई हुई हैं घर पर दूधवाला दूध रख गया होगा... आज शाम को एक शादी में जाना है, उसकी तैयारी भी करनी पड़ेगी। पहले जाते ही बालों में मेहँदी लगाऊँगी। कम-से-कम दो घंटे चाहिए तब कहीं जाकर मेहँदी का असर होता है। साड़ी पर प्रेस करानी है। कौन-सी साड़ी पहनूँ? ये भी एक मुसीबत है। 'बंटी चलते हैं, चलो।' वे उसे वहीं खड़े-खड़े बुला रही हैं।

'मम्मी, बस एक चक्कर और, उधर स्विमिंग पूल की तरफ बहुत अच्छी-अच्छी चिड़िया होती हैं। मोर के बच्चे भी ठुमक-ठुमककर चलते हैं। मम्मी, प्लीज!' उसे मम्मी को मनाना खूब आता है।

'मम्मी! आपको तो आता है न तैरना। कहाँ सीखा आपने?'

'गंगा में।' मम्मी बचपन को छूकर बंटी की उम्र में लौट आती हैं, 'हम इतनी-इतनी दूर तक गंगा में निकल जाते थे। हमारी नानी डरी हुई, आवाज देती रह जाती थी -'अरे बिटिया! लौट आओ। लौट आओ। हम किसी को मुँह दिखाने के लायक नहीं रहेंगे।' पर हम पूरी नदी पार कर जाते थे।'

बंटी आश्चर्य में खड़ा हो गया है सुनने के लिए।

'आपको डर नहीं लगता था? खूब गहरे पानी में चली जाती थीं?'

'खूब गहरे में। एक बार तो नीलम मौसी डूबते-डूबते बचीं।'

'हूँउ, नीलम मौसी। भइया, मैं नहीं जाता कभी गहरे पानी में। मुझे बहुत डर लगता है।'

'बेटा! गहरे पानी में नहीं जाना चाहिए, एक बार एक बच्चा डूब गया था।'

बंटी डरा हुआ-सा खड़ा है। 'मम्मी, फिर आप क्यों जाती थीं? बताओ न?'

'चलो तो! रास्ते में बताऊँगी।'

घर की तरफ का रुख होते ही बंटी को होमवर्क की याद हो आई, 'मम्मी, आपकी ड्राइंग भी बहुत अच्छी थी न?'

'बहुत अच्छी। हर बार 'सुंदर' मिलता था।'

'आज मेरे कुछ साइंस के चित्र बना दो, मम्मी! बनवा दो न प्लीज।'

सवाल करते-करते सपनों की परछाइयाँ उसके जेहन में तैरने लगती हैं।

'पापा, हम नहीं उड़ सकते क्या?'

'क्यों नहीं, तुम तो पहले से ही उड़ना जानते हो।'

'बताओ न, सचमुच।' वह ल‎‎ड़ियाता हुआ पास आ गया।

'सच ही तो बता रहा हूँ। मम्मी-पापा जैसे ही छत पर गए तुम उड़ जाओगे। इन्हीं टाँगों से। ये पंखों का काम भी करती हैं। कभी फुर्र से राजाबाग, कभी बैडमिंटन कोर्ट, कभी क्रिकेट ग्राउंड।'

अपना मजाक बनता जानकर वह वापस अपने होमवर्क में मशगूल हो गया।

'जब इन सवालों को कर लोगे, हम तब बताएँगे, तुम कैसे उड़ सकते हो।'

'सही में?'

'बिल्कुल।'

बंटी आयुष को बता रहा था, 'पापा कह रहे थे - जो बच्चा चिड़ियों के साथ उठता है सुबह-सुबह, केवल उसे ही चिड़ियाँ उड़ना सिखाती हैं। तू उठ सकता है?'

'हाँ, क्यों नहीं। मैं अलार्म लगाकर सोऊँगा।'

'मुझे भी जगा लेना। हम दोनों साथ-साथ चलेंगे और सुन! किसी और को नहीं बताना।'

अगले दिन सुबह दोनों साथ थे। जूते कसे हुए। घने पार्क में इस कोने से उस कोने तक तरह-तरह के पंख बटोरते।

'मम्मी, इस कोने में हमारे पंख हैं। हटाना नहीं।'

कोने में तरह-तरह के पंखों का ढेर बढ़ता जा रहा है - मोर, कबूतर, तोता, चिड़िया के छोटे-ब‎ड़े, कई रंगों के।

सुबह उठने का जो काम पापा-मम्मी की हजार डाँटें नहीं कर पाईं, वह चिड़ियों के पंख ने एक दिन में कर दिया।

सबसे अच्छा लगता है बंटी को चित्र बनाना। बहुत बचपन से ही। मानो हर चिड़िया, जानवर को छू सकता है। वह अपने कागज पर बनाता नदी-नाले, झोंपड़ी और ऊपर उड़ती चिड़िया। वाटर कलर और ब्रुश मिल जाए तो कहना ही क्या! पानी के रंग-ब्रुश के साथ कोई उसे बिस्तर पर या सोफे पर नहीं बैठने देता। रंग बिखर जाए या पानी फैल जाए तो डाँट और पड़े। फर्श पर ही लगा रहेगा। कभी-कभी तो पूरी दोपहरी जब सारा घर सन्नाटे में डूबा होता है, उसे कागज और रंगों के साथ खुसर-पुसर करते देखा जा सकता है।

ड्राइंग के लिए उसकी आँखों से नींद एकदम गायब हो जाती है। लेकिन मम्मी कंजूस है। उसे रंग नहीं दिलातीं। वह तो मामा अच्छे हैं जो बर्थ-डे पर केमल के रंग दे गए।

'तुम तो मक्खीचूस हो।' वह मम्मी से कहता है, 'रंग भी नहीं दिला सकती हो।' उसे ये बातें मामा ने रटाई हैं।

जो कोई ‎घर में आता है, मम्मी तुरंत उसके चित्रों को उनके सामने रख देती हैं। सिहाती हुई। सबकी शाबासी से बंटी और कुलाँचें भरने लगते हैं। रंग और कागज लिए फिर दौड़ गए। आज खेलना भी नहीं।

पूरे कमरे को स्टूडियो बना रखा है। पड़ोस के बच्चे भी देखा-देखी उसके पास बैठकर रंगों से खेल रहे हैं। फर्श भी जगह-जगह रंग-बिरंगा हो गया है।

'बंटी, तुम दिन-भर यही करते रहोगे! स्कूल का काम कौन करेगा? तुम्हारी मैम उस दिन झींक रही थीं कि इसे ए-बी-सी भी लिखना नहीं आता।' दफ्तर से लौटते ही मम्मी की भृकुटि तनी हुई है।

अभी तीन साल तीन महीने का हुआ है बंटी। रोते-रोते स्कूल की बस में छोड़कर आते हैं बाबाजी।

'पता नहीं क्या स्कूल है। ये बच्चे अभी स्कूल जाने लायक हैं?'

'आपके जमाने की बात और थी। इतनी मुश्किल से तो एडमिशन हुआ है। अच्छे-अच्छे लोग धक्के खा रहे हैं इस पब्लिक स्कूल के लिए।'

'इतनी दूर है स्कूल भी। दोपहर को जब लौटता है तो मुँह निकला होता पडुकिया-सा।'

दादी पुचकारती हैं बंटी को, 'हमारौ तो कोई बालक छह-सात से कम कौ ना गयौ स्कूल।' बंटी दादी की गोद में बैठा है चिड़िया के बच्चे-सा।

'तुम अपने बच्चों की बात मत किया करो। ये गाँव नहीं है। चलो बंटी, दूध पियो, फिर होमवर्क करते हैं।' मम्मी में तुरंत उबाल आ गया।

दूध पीते-पीते उल्टी आती है बंटी को। दूध पचता नहीं है। सुबह इतना जल्दी उठना पड़ता है सर्दी में। क्लास में मैम बिल्कुल शोर नहीं मचाने देती। बोल भी नहीं सकते। कहती है, हिंदी बोली तो मुर्गा बना दूँगी। 'मे आई गो टू टॉयलेट, मैम' - मरी-मरी सी आवाज में इतना रट पाया है छह महीने में अभी तक। कल गेम के पीरियड में बच्चों की लाइन टूट गई तो सभी की पिटाई हुई। कुछ के माँ-बाप को बुलाया भी है मैम ने, मिलने को। बंटी भी उनमें से एक है।

'बहुत ऊधम मचाता है आपका बेटा। डिसिप्लीन बचपन से ही आता है, बोलो! अब तो शोर नहीं करोगे?'

मैम ने बच्चे की तरफ देखा तो बंटी की आँखों में आँसू चू आए। वह मम्मी से चिपक गया।

'कहो, सॉरी, मैम! अब नहीं करूँगा।'

'इंग्लिश बहुत कमजोर है इसकी। आप लोग इससे अंग्रेजी में ही बोला करो।' मैम की हिकारत और नसीहत दोनों साथ-साथ।

'बंटी, क्या कहा था मैम ने! चलो, चुप बैठो। नहीं तो हम आपको बाजार नहीं ले जाएँगे।'

'सिट डाउन।' उन्हें मैम की नसीहत याद आई।

घर में भी मैम हर समय बनी रहती है - ए फॉर एप्पिल, बी फॉर बैट, ओके, टाटा, थैंक्यू, माई नेम इज बंटी...।

मम्मी घर ही रहे तो साँस भी नहीं लेने दे। पहले मम्मी जब ऑफिस जाती थी तो बंटी रोता था। अब उसे राहत मिलती है।

ज्यों-ज्यों मम्मी और मैम की साँठ-गाँठ बढ़ रही है, बंटी की मुसीबत भी। ए-बी-सी उसकी समझ में नहीं आती और ड्राइंग मम्मी नहीं बनाने देती।

मम्मी दो दिन से छुट्टी लिए बैठी है, 'मुझे चाहे नौकरी छोड़नी पड़े। पढ़ाना है, बिना पढ़ाए कैसे काम चलेगा? सभी में 'पूअर-पूअर' सिर्फ ड्राइंग में ठीक-ठाक है। ड्राइंग से क्या होता है!'

'कम, सिट हेअर, एंड डोंट मेक ए नोइस।'

'ओ.के., पापा।' एक बच्चा तुतलाया।

'देखा, बंटी! कितनी अच्छी अंग्रेजी बोलता है हाइकू।'

मम्मी की मित्र आई हुई थी अपने पति और पुत्र के साथ।

'ये तो इससे अंग्रेजी में ही बात करते हैं, चाहे कहीं भी हों।'

पतिदेव फूल रहे हैं। मम्मी ने पापा की तरफ देखा, जैसे कह रही हों - 'यह आदमी किसी काम का नहीं।'

उनके जाने के बाद उन्होंने पापा को हाँक लगाई, 'इन पोथन्नाओं में आग लगा दो।'

बंटी की पढ़ाई राष्ट्रीय समस्या बनती जा रही है। अनुपात में शीतयुद्ध शुरू हो गया है। एक तरफ मम्मी, दूसरी तरफ पापा और बाबा-दादी समेत सभी।

'इतनी चिंता क्यों कर रही हो? अभी है ही कितना बड़ा! सब ठीक हो जाएगा।' पापा ने समझाने की कोशिश की।

'हें-हें! सब ठीक हो जाएगा, तुम्हारे कहने से। उसे ए-बी-सी तक तो बता नहीं सकते।'

मम्मी की आवाज को दूर-दूर तक सुना जा सकता है इन दिनों।

कई बार बंटी मम्मी-पापा की आँख मुँदते ही चुपके से चारपाई से खिसक जाता है और दूसरे कमरे में ड्राइंग करता हुआ मिलता है - आत्मविभोर। डूबा हुआ। कभी गमलों की मिट्टी में कुछ कुरेदता हुआ।

कैलेंडर में बने जंगल में रोज एक नई चीज खोजता।

'दादीजी, इसका क्या नाम है?' बंटी ने उँगली रख दी।

दादी अपनी आँखों को कैलेंडर के पास ले आई, 'कोई जिनावर है, बेटा।'

'जिनावर या जानवर?' बंटी इस उच्चारण से चौंका।

'हंबै, कुछ भी कह लो।'

स्कूल से लौटने पर बाबाजी बंटी से दिन-भर दादी के जिनावर, हंबै, माट्टरनी जैसे शब्दों को बुलवाते हैं और खिलखिलाते हैं।

मम्मी के लौटते ही जैसे कफर्यू।

'मम्मी, दादीजी हाँ को हंबै बोलती हैं। क्यों बोलती हैं ऐसे?'

'तेरा सिर! तू भी यही सीखेगा।'

मन कुछ कहता है बंटी का, मम्मी कुछ। दादी कुछ भाषा बोलती है तो स्कूल कुछ। बंटी उनके लिए पहेली है तो वे सब बंटी के लिए।

दादी की बात सच्ची है। इन सब पाटों के बीच बेचारे का मुँह निकल आया है चिपनियाँ-सा।

पापा का ट्रांसफर हो गया है।

'वहाँ बहुत खेलने की जगह है।' मम्मी बंटी को बताती है।

'दादीजी भी साथ जाएँगी न?'

मम्मी ने कोई जवाब नहीं दिया।

नया शहर बंटी को एकदम भा गया।

पहली मंजिल पर घर था। खूब खुला आकाश। बरामदे से सामने देखता तो लगता कि उसका घर पेड़ों की टहनियों के बीच टिका है।

ऊपर खुली छत और पीछे आम के बड़े-बड़े पेड़।

न चप्पलें गंदी होने का डर, न धुआँ। 'पापा एक बात बताऊँ, शहर के लोगों को गाँवों में नहीं जाना चाहिए। ये गाँवों को भी गंदा कर देंगे।'

पापा सन्नाटा खा गए। ये मौलिक बात थी। 'कैसे?'

'इतने सारे लोग इतनी सारी कार्बन डाइआक्साइड छोड़ेंगे। इतने सारे टॉयलेट बनाने पड़ेंगे। इतनी सारी गा‎ड़ियाँ, धुआँ। गाँव गंदा नहीं हो जाएगा?'

आजकल बंटी 'हमारा वातावरण' पढ़ रहा है। केंद्रीय विद्यालय है। विज्ञान व सभी विषय मातृभाषा में पढ़ाते हैं। हिंदी बोलने पर कोई दंड नहीं। इतनी अच्छी, इतनी अच्छी उनकी मैडम है कि कभी भी नहीं डाँटती। कोई बच्चा गलती भी करता है तो उसे बुलाकर समझाती हैं। कल मुश्ताक पर डाँट पड़ी, क्योंकि उसकी कापी पर उसकी मम्मी की हैंडराइटिंग में लिखा था। मैम कहती हैं, 'चाहे काम पूरा न हो, पर मम्मी-पापा से नहीं कराओगे। अपना काम स्वयं।'

खूब बोलने लगा है आजकल बंटी। एक-एक बात बताता है और पूछता है।

'पापा, आर्मी क्या होती है? मुश्ताक कह रहा था, उसके पापा आर्मी में हैं। साल में बस एक बार आते हैं। कल उसके पापा आए हैं, इसीलिए वह नहीं आया। मैम ने उसे डाँटा भी नहीं। इतनी अच्छी हैं।'

जो बच्चा मुश्किल से तैयार किया जाता था, आजकल अपने-आप तैयार होता है।

'नहीं मम्मी मैं पॉलिश खुद करूँगा। हमारे प्रिंसिपल सर कह रहे थे - गांधीजी अपना सारा काम खुद ही करते थे। अपना बाथरूम भी साफ करते थे। आपको पता है, मम्मी?'

मम्मी का बी.पी. धीरे-धीरे नीचे आ रहा है। हालाँकि अब भी जब-तब उसकी कमजोर अंग्रेजी उन्हें उदास कर जाती है। 'बंटी, अंग्रेजी भी पढ़ लिया करो।'

'फर्स्ट आता हूँ, ‎तब भी पढ़ लो! पढ़ लो! मैं नहीं पढ़ता।' बंटी खेलने भाग गया।

बंटी नीचे खेल रहा है एडवर्ड के साथ। केरियों को बीन रहे हैं। कभी इकट्ठा करके जामुन बेचने वाले की तरह लगा लेते हैं। कभी बराबर में बैठकर आलू की तरह तोलने लगते हैं। घर के एक कोने में कुछ ईंटें इकट्ठी कर ली हैं। उनमें उन्होंने घर बनाए हैं - कुतिया के पिल्लों के लिए। भूरे-भूरे पाँच पिल्ले हैं। बिल्कुल गुड्डे जैसे। दोनों बच्चे उन्हें केरी खिलाने की कोशिश कर रहे हैं।

मम्मी ऊपर से झाँक रही हैं।

'बंटी, तुमने तो परेशान करके रख दिया। पूरी दोपहर तुम्हारी आवाज आ रही थी। पता नहीं कब चुपके से सरक जाते हो। चलो जल्दी।'

बंटी अब आदी हो चुका है माँ की हिदायतों का - ये मत करो, वो मत करो, कहाँ गए थे, कहाँ से आए हो, हाथ धोए या नहीं। देखो, हाय राम! आज फिर घुटना फोड़ लिया। देखों, घुटना कितना काला पड़ रहा है। तुम कब नहाना सीखोगे? तुम कब बड़े होओगे! तुम्हें कब अक्ल आएगी! बंटी हम तुम्हें होस्टेल भेज देंगे। हम तुमसे परेशान हो गए...।

बंटी झटपट जूते पहनने में मस्त है तुरंत निकल भागने को। नीटू, चीटू, आयुष इंतजार कर रहे होंगे। आज सब पेड़ पर चढ़कर छुआछुई जो खेलेंगे!

'ये देखों, ये क्या है?' कत्थई रंग की गुठलीनुमा चीज थी। साथ ही दो छोटे-छोटे पत्थर। मम्मी ने सोते हुए बंटी की जेबें खाली कीं। जाने कहाँ का कबाड़ी घर में आ गया।

आजकल बंटी वैज्ञानिक बनने पर उतारू हैं। उसकी अलमारी भरी पड़ी है ऐसी चीजों से - बल्ब, कागज के जहाज, मेज-कुर्सी, कोट-पैंट, बिजली के तार, सेल जिनकी मियाद खत्म हो चुकी है या जो प्रयोग में आ चुके हैं; सूई-धागा, चाकू, काँच का गिलास, जिसमें भरी मिट्टी में आड़ू के बीज बोए गए हैं; पतंगे, रंगीन कागज, पत्थर के अनेक किस्म के टुकड़े, कंप्यूटर की फ्लॉपी, गेंद और खेल-खेल में विज्ञान की किताब। इस अलमारी का पूरा रहस्य या तो बंटी जानता है या आयुष।

पापा ने उन्हें एक पुरानी घड़ी और कैमरा दे दिया था। बंटी की आँखों की चमक देखने लायक थी। वह दौड़ा-दौड़ा आयुष के पास गया। और पिछले एक हफ्ते से वे छत पर सुबह-शाम उसी में व्यस्त रहते हैं।

'पापा, एक बात बताओ! जब सूर्य के पास ऑक्सीजन नहीं है तो वह जलता कैसे है?' उसके प्रश्नों में अभूतपूर्व आत्मविश्वास है मानो आज पापा को निरुत्तर करके ही छोड़ेगा।

पापा ने समझाया।

पता नहीं कितना समझा, पर उसकी आँखें अभी भी खुली हुई हैं। उसे नींद इतनी आसानी से नहीं आती।

'रोज एक नया धंधा सीख लेता है।' मम्मी उसे दुलराती हुई बगल में लेट गईं।

'इसने अचानक ड्राइंग क्यों बंद कर दी?'

'बड़ा मनमौजी है। जबसे ड्राइंग की क्लास में भेजा है, ड्राइंग की तरफ देखता भी नहीं। पहले दिन-भर बनाता रहता था। अब सब उठाकर रख दिया।'

'म्यूजिक में भी इसने यही किया था। एक-दो दिन तो क्लास में गया, फीस भी भरी, पर फिर गया नहीं तो नहीं ही गया। म्यूजिक टीचर बेचारी खुशामद करती रही। यह पढ़ पाएगा या नहीं? इसका पढ़ने में दीदा नहीं लगता। और चाहे जो करा लो।'

'आखिर स्कूल का काम तो अब अपने-आप करता ही है। नंबर भी अच्छे आ रहे हैं। और क्या चाहिए?'

'अरे, एक बात तो बताना भूल ही गई। पूछ रहा था, ये 'अंधों में काना' क्या होता है? मैं कहती हूँ न इसे कि तू जो फर्स्ट आया है, 'अंधों में काने' की तरह है। आजकल बातें तो देखो इसकी! कह रहा था, जब मुझे अमेरिका में वैज्ञानिक का पुरस्कार मिलेगा तो सब लोग टेलीविजन पर कहेंगे, अरे यह तो इंडियन है!'

पाँच बजे के निकले हैं बंटी अपनी टीम के साथ। संचार के नए साधनों की सवारी करने का पहला मौका बच्चों को ही मिला है। स्कूल से लौटते ही जूते बाद में खोलेंगे, कॉर्डलेस पर प्रोग्राम बनने पहले शुरु हो जाते हैं।

मम्मी झींक रही हैं - आठ बज गए... साढ़े आठ... कहीं पता नहीं।

'आज इसकी धुनाई न की तो मेरा नाम नहीं। इतना बिगाड़ रखा है तुमने। कुछ कहूँ तो उसका पक्ष लेने लगते हैं।'

लेट बंटी होता है, डाँट पापा पर पड़ती है उन्होंने जान-बूझकर नहीं बताया कि शाम को बंटी किले के पास खेल रहा था। बताएँ तो और डाँट पड़े कि घर आने के लिए भी नहीं कह सकते थे। उसके इम्तहान सिर पर हैं।

बंटी पेड़ पर चढ़े हुए थे। तीन बच्चे भी साथ थे। मम्मी की छिपाई टाफियों का पैकेट उनके हाथ में था।

'अंकल, अंकल! बंटी भइया ने मुझे एक ही टाफी दी, नीटू को दो दी।'

बंटी या तो अपनी उम्र के छोटे बच्चों के साथ खेलते हैं या लड़कियों के साथ। छोटे बच्चों के सामने उन्हें अपनी मनमानी करने को जो मिलती है।

बंटी ने आज छुट्टी की है। घर पर ही पढ़ना है। इम्तहान नजदीक जो है। पापा ने तारीख डालकर बीस सवाल दिए। मम्मी ने संस्कृत का पाठ। साइंस का काम स्कूल में मिला था।

'बंटी, मैं आज जल्दी आ जाऊँगी, तब तक काम पूरा हो जाना चाहिए। तुम भी जरा डाँटकर कह दो।'

बाप और बेटे दोनों को आदेश देकर मम्मी ऑफिस चली गईं।

आज कुछ ज्यादा काम इसलिए भी मिला है कि उसकी चोरी पकड़ी गई थी। गणित की एक कापी को उसने सोफे की गद्दी के नीचे ऐसा छिपाया था कि कल तीन महीने के बाद मिली।

पिछले कई बार की तरह बंटी ने कान पकड़कर फिर ऐसा न करने का वायदा किया। चलते-चलते मम्मी ने कल की गलती का उसे फिर से स्मरण कराया।

'मैंने कल छोड़ दिया है तुम्हें।'

मम्मी जल्दी आ गई हैं - काम को जल्दी निपटाकर या बॉस को पटा पटू कर। लेकिन बंटी का कहीं पता नहीं।

कॉपी का जो पन्ना मम्मी खोलकर गई थीं वही खुला है - एकदम कोरा।

किताबें भी बिल्कुल वैसी ही। सिर्फ बंटी उड़ गए हैं।

उन्होंने दूसरे-तीसरे कमरे में देखा, क्या पता सो गया हो। फिर उन्हें याद आया कि ताला तो उन्होंने खुद खोला था।

कहाँ फोन करें वे? इस गर्मी में दोपहर के दो बजे तलाशें भी तो कहाँ-कहाँ? आज नहीं छोड़ूँगी इसे। मम्मी दाँत पीसे जा रही हैं।

अगले ही पल कई तरह की दुश्चिंताएँ भी उन्हें घेरने लगती हैं। वैसे इस कॉलोनी में कोई डर नहीं है, फिर भी किसी के साथ साइकिल पर ही चला गया हो। दुर्घटनाएँ तो कहीं भी हो सकती हैं।

बंटी धड़धड़ाते हुए घुसे। बेखबर। 'मम्मी, आज आप जल्दी आ गईं?'

'तू आ जा आज।' मम्मी ने उसे बाजू से पकड़ लिया।

बंटी के चेहरे से अब लग रहा है कि उसे सुबह के वादे याद आ रहे हैं।

'बोल, कहाँ था?‎ मैं तुझसे क्या कह गई थी?' मम्मी ने तड़-तड़-तड़ झापड़ धर दिए। बंटी सिसकने लगे।

सिसकते-सिसकते खाना खाया और फिर अपने काम पर बैठ गए।

'आज तू यहाँ से उठा भी तो तेरी खैर नहीं। आज पापा से शिकायत करूँगी।'

'वैसे तो पापा से लड़ती हो। पढ़ाने के लिए उनकी चमची बन जाती हो।'

मम्मी की हॅंसी छूटने वाली है। इसलिए दूसरी तरफ मुँह फेर लिया - 'लड़वा लो बस इससे।'

'कहती हैं, फर्स्ट आती थी, फर्स्ट।' बंटी ने मुँह बिराया। 'एक यूनिट टेस्ट में कभी आ गई होंगी तो बस उसी को कहती फिरती हैं।'

शाम के साढ़े छह बज रहे थे जब पापा ने घर में प्रवेश किया। मम्मी की डाँटों के दबाव में आज वे सीधे घर आ गए थे।

मम्मी नींद में बेखबर थीं। उन्होंने हल्के से हिलाया।

'बंटी कहाँ है?'

'ऐं! फिर चला गया?' वे ठगी-सी माथे पर हाथ रखकर बैठ गईं। उनके चेहरे से कोई नहीं कह सकता कि अभी दो सेकंड पहले सोकर उठी हैं।

बंटी एडवर्ड के साथ नीचे कुतिया के पिल्लों में मस्त थे - सारी चिंताओं से मुक्त।


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