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कविता

मुआवजा
अंजू शर्मा


अगर कविता के बदले
मुआवजे का चलन हो तो
तो मुझे सोचना है कि
ये क्या हो सकता है?

संभव है मैं माँग बैठूँ
मधुमक्खियों से
कल ही बनाया गया
ताजा शहद
कि भिगो सकूँ
कुछ शब्दों को इसमें,
ताकि विदा कर सकूँ कविताओं से
कमस-कम थोड़ी सी तो तल्खी,

या मैं माँग सकती हूँ कुछ नए शब्द भी
जिन्हें मैं प्रयोग कर सकूँ,
अपनी कविताओं में बार बार आते
दुख,
छलावे,
प्रतिकार
या प्रतिरोध के बदले,

आपके लिए ये हैरत का सबब होगा
अगर मैं माँग रख दूँ कुछ डिब्बों की
जिनमें कैद कर सकूँ उन स्त्रियों के आँसू
जो गाहे-बगाहे
सुबक उठती हैं मेरी कविताओं में
हाँ, मुझे उनकी खामोश,
घुटी चीखों वाले डिब्बे को
दफ्न करने के लिए एक माकूल
जगह की भी दरकार है,

हो सकता आप कहें
कि मैं बहुत ज्यादा माँग रही हूँ
पर मेरे लिए कविता लिखते लिखते
अक्सर बदल जाने वाले अर्थ को लेकर
अपनी चिंता से छुटकारा पाना भी एक माँग है,
ताकि मैं भी लिख सकूँ पुरसुकून होकर
फूल,
सपने
खुशी
मुस्कानें
और सवेरा

क्या मिल सकता है कहीं मुझे ये मुआवजा...

 


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