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कविता

जूते और आदमी
अंजू शर्मा


कहते हैं आदमी की पहचान
जूते से होती है
आवश्यकता से अधिक
घिसे जाने पर स्वाभाविक है
दोनों के ही मुँह का खुल जाना,
बेहद जरूरी है
आदमी का आदमी बने रहना,
जैसे जरूरी है जूतों का पाँवों में बने रहना,
जूते और आदमी दोनों ही
एक खास मुकाम पर भूल जाते हैं याददाश्त
आगे के चरण में
आदमी बन जाता है मुंतजर अल जैदी,
जूते भूल जाते हैं पाँव और हाथ का
बुनियादी फर्क

 


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