hindisamay head
डाउनलोड मुद्रण

अ+ अ-

विमर्श

इसलिए विदा करना चाहते हैं, हिंदी को हिंदी के कुछ अखबार
प्रभु जोशी


दुनिया की हर भाषा की जिंदगी में एक बार कोई निहायत ही निष्करुण वक्त दबे पाँव आता है और 'उसको बोलने वालों' के हलक में हाथ डालकर उनकी जुबान पर रचे-बसे शब्दों को दबोचता है और धीरे-धीरे उनके कोमल गर्भ में साँस ले रहे अर्थों का गला घोंट देता है। एक तरफ वह 'पवित्र को ध्वंस' में धकेलता है तो दूसरी तरफ वह 'अतीत में आग' लगाता हुआ, चौतरफा भय और निराशा फैला देता है। ऐसे ही वक्त के खिलाफ अंततः मंगल पांडे की बंदूक से गोली निकलती है और 1857 का गदर (?) मच जाता है। ...आज हम फिर 1857 के ही निकट पहुँच गए हैं। वे तब ये कहते हुए आए थे : 'हम, तुम असभ्यों को सभ्य बनाने के लिए तुम्हारे देश में घुस रहे हैं।' मगर इस बार वे कह रहे हैं : 'हम, तुम कंगलों को संपन्न बनाने के लिए तुम्हारे यहाँ आ रहे हैं।' ...सुनो, हम जिस 'पूँजी का प्रवाह' शुरू कर रहे हैं, वह तुम्हारे यहाँ समृद्धि लाएगी। ...लेकिन, हकीकत में यह देश को समृद्ध नहीं बल्कि, एक किस्म के 'सांस्कृतिक-अनाथालय' में बदलने की युक्ति है। वे धीरे-धीरे आपसे आपकी बोलियाँ और भाषा छीन रहे हैं - तिस पर विडंबना यह है कि उनके इस काम में हमारे कुछ अखबार भी तन-मन-धन से जुट गए हैं।

बहरहाल, प्रस्तुत हैं इसी मुद्दे को लेकर जिरह छेड़ते कुछ ज्वलंत सवाल :


भारत इन दिनों दुनिया के ऐसे समाजों की सूची के शीर्ष पर हैं, जिस पर बहुराष्ट्रीय निगमों की आसक्त और अपलक आँख निरंतर लगी हुई है। यह उसी का परिणाम है कि चिकने और चमकीले पन्नों के साथ लगातार मोटे होते जा रहे हिंदी के लगभग सभी दैनिक समाचार पत्रों के पृष्ठों पर, एकाएक भविष्यवादी चिंतकों की एक नई नस्ल अंग्रेजी की माँद से निकलकर, बिला नागा, अपने साप्ताहिक स्तंभों में आशावादी मुस्कान से भरे अपने छायाचित्रों के साथ आती है - और हिंदी के मूढ़ पाठकों को गरेबान पकड़कर समझाती है कि तुम्हारे यहाँ हिंदी में अतीतजीवी अंधों की बूढ़ी आबादी इतनी अधिक हो चुकी है कि उनकी बौद्धिक-अंत्येष्टि कर देने में ही तुम्हारी बिरादरी का मोक्ष है। दरअस्ल कारण यह कि वह बिरादरी अपने 'आप्तवाक्यों' में हर समय 'इतिहास' का जाप करती रहती है और इसी के कारण तुम आगे नहीं बढ़ पा रहे हो। इतिहास ठिठककर तुम्हें पीछे मुड़कर देखना सिखाता है, इसलिए वह गति-अवरोधक है। जबकि भविष्यातुर रहनेवाले लोगों के लिए गरदन मोड़कर पीछे देखना तक वर्ज्य है। एकदम निषिद्ध है। ऐसे में बार-बार इतिहास के पन्नों में रामशलाका की तरह आज के प्रश्नों के भविष्यवादी उत्तर बरामद कर सकना असंभव है। हमारी सुनो, और जान लो कि इतिहास एक रतौंध है, तुमको उससे बचना है। हिस्ट्री इज बंक। वह बकवास है। उसे भूल जाओ।

बहरहाल - 'अगर मगर मत कर'। 'इधर उधर मत तक'। 'बस सरपट चल।' भविष्यवाद का यह नया सार्थक और अग्रगामी पाठ है।

जबकि, इस वक्त की हकीकत यह है कि हमारे भविष्य में हमारा इतिहास एक घुसपैठिये की तरह हरदम मौजूद रहता है। उससे विलग, असंपृक्त और मुक्त होकर रहा ही नहीं जा सकता। इतिहास से मुक्त होने का अर्थ स्मृति-विहीन हो जाना है - सामाजिक और सांस्कृतिक रूप से अनाथ हो जाना है।

लेकिन, वे हैं कि बार-बार बताए चले जा रहे हैं कि तुम्हारे पास तुम्हारा इतिहास-बोध तो कभी रहा ही नहीं है। और जो है, वह तो इतिहास का बोझ है। तुम लदे हुए हो। तुम अतीत के कुली हो और फटे-पुराने कपड़ों में लिपटे हुए अपना पेट भर पालने की जद्दोजहद में हो, जबकि ग्लोबलाइजेशन की फ्यूचर एक्सप्रेस प्लेटफार्म पर खड़ी है और सीटी बजा चुकी है। इसलिए, तुम इतिहास के बोझ को अविलंब फेंको और इस ट्रेन पर लगे हाथ चढ़ जाओ।

जी हाँ, अधीरता पैदा करने वाली नव उपनिवेशवाद की यही वह मोहक और मारक ललकार है, जो कहती है कि अब 'आगे' और 'पीछे' सोचने का समय नहीं है। अलबत्ता, हम तो कहते हैं कि अब तो 'सोचने' का काम तुम्हारा है ही नहीं। वह तो हमारा है। हम ही सोचेंगे तुम्हारे बारे में। अब हमें ही तो सब कुछ तय करना है तुम्हारे बारे में। याद रखो, हमारे पास वह छैनी है, जिस के सामने पत्थर को भी तय करना पड़ता कि वह क्या होना चाहता है - घोड़ा या कि साँड़। उस छैनी से यदि हम तुम्हें घोड़ा बनाएँगे तो निश्चय ही रेस का घोड़ा बनाएँगे। यदि हमें साँड़ बनाना होगा तो तुम्हें वो साँड़ बनाएँगे, जो अर्थव्यवस्था को सींग पर उछालता हुआ सेंसेक्स के ग्राफ में सबसे ऊपर डुँकारता हुआ दिखाई पड़ेगा।

इन्हीं चिंतकों की इसी नई नस्ल ने, हिंदी के तमाम दैनिक अखबारों के पन्नों पर रोज-रोज लिख लिखकर सारे देश की आँख उस तरफ लगा दी है, जहाँ विकास दर का ग्राफ बना हुआ है और उसमें दर-दर की ठोकरें खाता आम आदमी देख रहा है कि येल्लो, उसने छह, सात, आठ और अब तो नौ के अंक को छू लिया है। इसी दर के लिए ही तमाम दरों-दीवारों को तोड़कर महाद्वार बनाया जा रहा है। इसे ही ओपन-डोअर-पॉलिसी कहते हैं। और, कहने की जरूरत नहीं कि चिंतकों की ये फौज, इसी ओपन-डोअर से दाखिल हुई है। यही उसकी द्वारपाल है, जो घोषणा कर रही है कि तुम्हारे यहाँ मही (पृथ्वी) पाल आ रहे हैं। तुम्हारे यहाँ विश्वेश्वर आ रहे हैं। दौड़ो और उनका स्वागत करो। तुमने तो आपातकाल का भी स्वागत किया था, तो इसका 'स्वागत' करने में क्या हर्ज है? मजेदार बात यह कि इसके स्वागत में, इसकी अगवानी में, सबसे पहले शामिल है, हिंदी के अखबार। वे बाजा फूँक रहे हैं और फूँकते-फूँकते बाजारवाद का बाजा बन गए हैं। ये अखबार पहले विचार देते थे। विचार की पूँजी देते थे, लेकिन अब पूँजी का विचार देने में जुट गए हैं। एक अल्प-उपभोगवादी भारतीय प्रवृत्ति को पूरी तरह उपभोक्तावादी बनाने की व्यग्रता से भरने में जी-जान से जुट गए हैं, ताकि भूमंडलीकरण के कर्णधारों तथा अर्थव्यवस्था के महाबलीश्वरों के आगमन में आने वाली अड़चनें ही खत्म हो जाएँ और इन अड़चनों की फेहरिस्त में वे तमाम चीजें आती हैं, जिनसे राष्ट्रीयता की गंध आती हो।

कहना न होगा कि इसमें इतिहास, संस्कृति और सभी भारतीय भाषाएँ शीर्ष पर हैं। फिर हिंदी से तो 'राष्ट्रीयता' की सबसे तीखी गंध आती है। नतीजतन भूमंडलीकरण की विश्व-विजय में सबसे पहले निशाने पर हिंदी ही है। इसका एक कारण तो यह भी है कि यह हिंदुस्तान में संवाद, संचार और व्यापार की सबसे बड़ी भाषा बन चुकी है। दूसरे इसको राजभाषा या राष्ट्रभाषा का पर्याय बना डालने की संवैधानिक भूल गांधी की उस पीढ़ी ने कर दी, जो यह सोचती थी कि कोई भी मुल्क अपनी राष्ट्रभाषा के अभाव में स्वाधीन बना नहीं रह सकता। चूँकि भाषा संप्रेषण का माध्यम भर नहीं, बल्कि चिंतन प्रक्रिया एवं ज्ञान के विकास और विस्तार का भी हिस्सा होती है। उसके नष्ट होने का अर्थ एक समाज, एक संस्कृति और एक राष्ट्र का नष्ट हो जाना है। वह प्रकारांतर से राष्ट्रीय एवं जातीय-अस्मिता का प्रतिरूप भी है। इस अर्थ में, भाषा उस देश और समाज की एक विराट ऐतिहासिक धरोहर भी है। अतः उसका संवर्द्धन और संरक्षण एक अनिवार्य दायित्व है।

जब देश में सबसे पहले मध्यप्रदेश के एक स्थानीय अखबार ने विज्ञापनों को हड़पने की होड़ में, बाकायदा सुनिश्चित व्यावसायिक रणनीति के तहत अपने अखबार के कर्मचारियों को हिंदी में 40 प्रतिशत अंग्रेजी के शब्दों को मिलाकर ही किसी खबर के छापे जाने के आदेश दिए और इस प्रकार हिंदी को समाचार पत्र में हिंग्लिश के रूप में चलाने की शुरुआत की तो मैंने अपने पर लगने वाले संभव अरोप मसलन प्रतिगामी, अतीतजीवी अंधे, राष्ट्रवादी और फासिस्ट आदि जैसे लांछनों से डरे बिना एक पत्र लिखा। जिसमें, मैंने हिंदी को हिंग्लिश बना कर दैनिक अखबार में छापे जाने से खड़े होने वाले भावी खतरों की तरफ इशारा करते हुए लिखा - 'प्रिय भाई, हमने अपनी नई पीढ़ी को बार-बार बताया और पूरी तरह उसके गले भी उतारा कि अंग्रेजों की साम्राज्यवादी नीति ने ही हमें ढाई सौ साल तक गुलाम बनाए रक्खा। दरअसल, ऐसा कहकर हमने एक धूर्त - चतुराई के साथ अपनी कौम के दोगलेपन को इस झूठ के पीछे छुपा लिया। जबकि, इतिहास की सचाई तो यही है कि गुलामी के विरुद्ध आजादी की लड़ाई लड़ने वाले नायकों को, अंग्रेजों ने नहीं, बल्कि हमीं ने मारा था। आजादी के लिए 'आग्रह' या 'सत्याग्रह' करने वाले भारतीयों पर क्रूरता के साथ लाठियाँ बरसाने वाले बर्बर हाथ, अंग्रेजों के नहीं, हम हिंदुस्तानी दारोगाओं के ही होते थे। अपने ही देश के वासियों के ललाटों को लाठियों से लहू-लुहान करते हुए हमारे हाथ जरा भी नहीं काँपते थे। कारण यह कि हम चाकरी बहुत वफादारी से करते हैं और यदि वह गोरी चमड़ी वालों की हुई तो फिर कहने ही क्या?

पूछा जा सकता है कि इतने निर्मम और निष्करुण साहस की वजह क्या थी? तो कहना न होगा कि दुनिया भर के मुल्कों के दरमियान 'सारे जहाँ से अच्छा' ये हमारा ही वो मुल्क है, जिसके वाशिंदों को बहुत आसानी से और सस्ते में खरीदा जा सकता है। देश में जगह-जगह घटती आतंकवादी गतिविधियों की घटनाएँ, हमारे ऐसे चरित्र का असंदिग्ध प्रमाणीकरण करती हैं। दूसरे शब्दों में हम आत्म-स्वीकृति कर लें कि 'भारतीय', सबसे पहले 'बिकने' और 'बेचने' के लिए तैयार हो जाता है और, यदि वह संयोग से व्यवसायी और व्यापारी हुआ तो सबसे पहले जिस चीज का सौदा वह करता है, वह होता है उसका जमीर। बाद इस सौदे के, उसमें किसी भी किस्म की नैतिक-दुविधा शेष नहीं रह जाती है और 'भाषा, संस्कृति और अस्मिता' आदि चीजों को तो वह खरीददार को यों ही मुफ्त में बतौर भेंट के दे देता है। ऐसे में यदि कोई हिंसा के लिए भी सौदा करे तो उसे कोई अड़चन अनुभव नहीं होती है। फिर वह हिंसा अपने ही 'शहर', 'समाज', या 'राष्ट्र' के खिलाफ ही क्यों न होने जा रही हो।

बहरहाल, मेरे प्यारे, भाई अब ऐसी हिंसा सुनियोजित और तेजगति के साथ हिंदी के खिलाफ शुरू हो चुकी है। इस हिंसा के जरिए भाषा की हत्या की सुपारी आपके अखबार ने ले ली है। वह भाषा के खामोश हत्यारे की भूमिका में बिना किसी तरह का नैतिक-संकोच अनुभव किए खासी अच्छी उतावली के साथ उतर चुका हैं। उसे इस बात की कोई चिंता नहीं कि एक भाषा अपने को विकसित करने में कितने युग लेती है। (डेविड क्रिस्टल तो एक शब्द की मृत्यु को एक व्यक्ति की मृत्यु के समान मानते हैं। अंग्रेजी कवि ऑडेन तो बोली के शब्दों को इरादतन अपनी कविता में शामिल करते थे कि कहीं वे शब्द मर न जाएँ - और महाकवि टी.एस. एलियट प्राचीन शब्द, जो शब्दकोष में निश्चेष्ट पड़े रहते थे, को उठाकर समकालीन बनाते थे कि वे फिर से साँस लेकर हमारे साथ जीने लगे।) आपको, 'शब्द' की तो छोड़िए, 'भाषा' तक की परवाह नहीं है, लगता है आप हिंदी के लिए हिंदी का अखबार नहीं चला रहे हैं, बल्कि अंग्रेजी के पाठकों की नर्सरी का काम कर रहे हैं। आप हिंदी के डेढ़ करोड़ पाठकों का समुदाय बनाने का नहीं, बल्कि हिंदी के होकर हिंदी को खत्म करने का इतिहास रचने जा रहे हैं। आप 'धंधे में धुत्त' होकर जो करने जा रहे हैं, उसके लिए आपको आने वाली पीढ़ी कभी माफ नहीं करेगी। आपका अखबार उस सर्प की तरह है, जो बड़ा होकर अपनी ही पूँछ अपने मुँह में ले लेता है और खुद को ही निगलने लगता है। आपका अखबार हिंदी का अखबार होकर, हिंदी को निगलने का काम करने जा रहा है। जो कारण जिलाने के थे, वे ही कारण मारने के बन जाएँ, इससे बड़ी विडंबना भला क्या हो सकती है? यह आशीर्वाद देने वाले हाथों द्वारा बढ़कर गरदन दबा दिए जाने वाली जैसी कार्यवाही है। कारण कि हिंदी के पालने-पोसने और या कहें कि उसकी पूरी परवरिश करने में हिंदी पत्रकारिता की बहुत बड़ी भूमिका रही आई है।

जबकि, आपको याद होना चाहिए कि सामाजिक-राजनीतिक दृष्टि से उपजी 'भाषा-चेतना' ने इतिहास में कई-कई लंबी लड़ाइयाँ लड़ी हैं। इतिहास के पन्ने पलटेंगे तो आप पाएँगे कि आयरिश लोगों ने अंग्रेजी के खिलाफ बाकायदा एक निर्णायक लड़ाई लड़ी, जबकि उनकी तो लिपि में भी भिन्नता नहीं थी। फ्रेंच, जर्मन, स्पेनिश आदि भाषाएँ अंग्रेजी के साम्राज्यवादी वर्चस्व के विरुद्ध न केवल इतिहास में, अपितु इस 'इंटरनेट युग' में भी फिर नए सिरे से लड़ना शुरू कर चुकी हैं। इन्होंने कभी अंग्रेजी के सामने समर्पण नहीं किया।

बहरहाल मेरे इस पत्र का उत्तर अखबार मालिक ने तो नहीं ही दिया, और वे भला देते क्या? और देते भी क्यों? सिर्फ उनके संपादक और मेरे अग्रज ने कहा कि हिंदी में कुछ जनेऊधारी तालिबान पैदा हो गए हैं, जिससे हिंदी के विकास को बहुत बड़ा खतरा हो गया है। यह संपादकीय चिंतन नहीं अखबार के कर्मचारी की विवश टिप्पणी थी। क्योंकि उनसे तुरंत कहा जाएगा कि श्रीमान आप अपने हिंदी प्रेम और नौकरी में से कोई एक को चुन लीजिए।

बहरहाल, अखबार ने इस अभियान को एक निर्लज्ज अनसुनी के साथ जारी रखा और पिछले सालों से वे निरंतर अपने संकल्प में जुटे हुए हैं। और अब तो हिंदी में अंग्रेजी की अपराजेयता का बिगुल बजाते बहुराष्ट्रीय कंपनियों के दलालों ने, विदेशी पूँजी को पचा कर मोटे होते जा रहे, हिंदी के लगभग सभी अखबारों को यह स्वीकारने के लिए राजी कर लिया है कि इसकी नागरी-लिपि को बदल कर, रोमन करने का अभियान छेड़ दीजिए और वे अब इस तरफ कूच कर रहे हैं। उन्होंने इस अभियान को अपना प्राथमिक एजेंडा बना लिया है। क्योंकि बहुराष्ट्रीय निगमों की महाविजय, इस सायबर युग में रोमन लिपि की पीठ पर सवार होकर ही बहुत जल्दी संभव हो सकती है। यह विजय अश्वों नहीं, चूहों की पीठ पर चढ़कर की जानी है। जी हाँ, कंप्यूटर माऊस की पीठ पर चढ़कर।

अंग्रेजों की बौद्धिक चालाकियों का बखान करते हुए एक लेखक ने लिखा था - 'अंग्रेजों की विशेषता ही यही होती है कि वे आपको बहुत अच्छी तरह से यह बात गले उतार सकते हैं कि आपके हित में आप स्वयं का मरना बहुत जरूरी है। और, वे धीरे-धीरे आपको मौत की तरफ ढकेल देते हैं। ठीक इसी युक्ति से हिंदी के अखबारों के चिकने और चमकीले पन्नों पर नई नस्ल के ये चिंतक यही बता रहे हैं कि हिंदी का मरना, हिंदुस्तान के सामाजिक-आर्थिक हित में बहुत जरूरी हो गया है। यह काम देश सेवा समझकर जितना जल्दी हो सके करो, वर्ना, तुम्हारा देश ऊपर उठ ही नहीं पाएगा। परिणाम स्वरूप वे हिंदी को विदा कर देश को ऊपर उठाने के लिए कटिबद्ध हो गए हैं।

ये हत्या की अचूक युक्तियाँ भी बताते हैं, जिससे भाषा का बिना किसी हल्ला-गुल्ला किए 'बाआसानी संहार' किया जा सकता है।

वे कहते हैं कि हिंदी का हमेशा-हमेशा के लिए खात्मा करने के लिए आप अपनाइए... 'प्रॉसेस ऑफ कॉण्ट्रा-ग्रेज्युअलिजम'। अर्थात, बाहर पता ही नहीं चले कि भाषा को 'सायास' बदला जा रहा है। बल्कि, 'बोलने वालों' को लगे कि यह तो एक ऐतिहासिक प्रक्रिया है और म.प्र. के कुछ अखबारों की भाषा में, यह परिवर्तन उसी प्रक्रिया के तहत हो रहा है। बहरहाल, इसका एक ही तरीका है कि अपने अखबार की भाषा में आप हिंदी के मूल दैनंदिन शब्दों को हटाकर, उनकी जगह अंग्रेजी के उन शब्दों को छापना शुरू कर दो, जो बोलचाल की भाषा में शेयर्ड - वकैब्युलरी की श्रेणी में आते हैं। जैसे कि रेल, पोस्ट कार्ड, मोटर, टेलिविजन, रेडियो, आदि-आदि।

इसके पश्चात धीरे-धीरे इस शेयर्ड वकैब्युलरि में रोज-रोज अंग्रेजी के नए शब्दों को शामिल करते जाइए। जैसे माता-पिता की जगह छापिए पेरेंट्स / छात्र-छात्राओं की जगह स्टूडेंट्स / विश्वविद्यालय की जगह युनिवर्सिटी / रविवार की जगह संडे / यातायात की जगह ट्रेफिक आदि-आदि। अंततः उनकी तादाद इतनी बढ़ा दीजिए कि मूल भाषा के केवल कारक भर रह जाएँ। क्योंकि कुल मिलाकर रोजमर्रा के बोलचाल में बस हजार-डेढ़ हजार शब्द ही तो होते हैं।

यह चरण, 'प्रोसेस ऑव डिसलोकेशन' कहा जाता है। यानी की हिंदी के शब्दों को धीरे-धीरे बोलचाल के जीवन से उखाड़ते जाने का काम।

ऐसा करने से इसके बाद भाषा के भीतर धीरे-धीरे 'स्नोबॉल थियरी' काम करना शुरू कर देगी - अर्थात बर्फ के दो गोलों को एक दूसरे के निकट रख दीजिए, कुछ देर बाद वे घुल-मिलकर इतने जुड़ जाएँगे कि उनको एक दूसरे से अलग करना संभव नहीं हो सकेगा। यह थियरी (रणनीति) भाषा में सफलता के साथ काम करेगी और अंग्रेजी के शब्द हिंदी से ऐसे जुड़ जाएँगे कि उनको अलग करना मुश्किल होगा। यहाँ तक 'कि वे मूल से कहीं ज्यादा अपनी उपस्थिति का दावा करेंगे।'

इसके पश्चात शब्दों के बजाय पूरे के पूरे अंग्रेजी के वाक्यांश छापना शुरू कर दीजिए। अर्थात इनक्रीज द चंक ऑफ इंग्लिश फ्रेजेज। मसलन 'आऊट ऑफ रीच / बियांड डाउट / नन अदर देन / आदि आदि। कुछ समय के बाद लोग हिंदी के उन शब्दों को बोलना ही भूल जाएँगे। उदाहरण के लिए हिंदी में गिनती स्कूल में बंद किए जाने से हुआ यह है कि यदि आप बच्चे को कहें कि अड़सठ रुपये दे दो, तो वह अड़सठ का अर्थ ही नहीं समझ पायेगा, जब तक कि उसे अंग्रेजी में सिक्सटी एट नहीं कहा जाएगा। इस रणनीति के तहत बनते भाषा रूप का उदाहरण एक स्थानीय अखबार से उठाकर दे रहा हूं।

'मार्निंग अवर्स के ट्रेफिक को देखते हुए, डिस्ट्रिक्ट एडमिनिस्ट्रेशन ने जो ट्रेफिक रूल्स अपने ढंग से इंप्लीमेंट करने के लिए जो जेनुइन एफर्ट्स किए हैं, वो रोड को प्रोन टू एक्सीडेंट बना रहे हैं। क्योंकि, सारे व्हीकल्स लेफ्ट टर्न लेकर यूनिवर्सिटी की रोड को ब्लॉक कर देते हैं। इन प्रॉब्लम का इमीडिएट सोल्यूशन मस्ट है।'

इस तरह की भाषा के लगातार पाँच-दस वर्ष तक प्रिंट माध्यम से पढ़ते रहने के बाद होगा यह कि अखबार के ख़ासकर युवा पाठक की यह स्थिति होगी कि उसे कहा जाय कि वह हिंदी में बोले तो वह गूँगा हो जाएगा। उनकी इस युक्ति को वे कहते हैं 'इल्यूजन ऑफ स्मूथ ट्रांजिशन'। अर्थात हिंदी की जगह अंग्रेजी को निर्विघ्न ढंग से स्थापित करने को सफल छद्म की अंतिम और अचूक पायदान - हिंदी का हिंग्लिश में बदल जाना।

हिंदी को इसी तरीके से हिंदी के अखबारों में 'हिंग्लिश' बनाया जा रहा है। समझ के अभाव में लोग इस सारे सुनियोजित एजेंडे को भाषा के परिवर्तन की ऐतिहासिक प्रकिया ही मानने लगे हैं और हिंदी में यह होने लगा है। गाहे-ब-गाहे लोग बाकायदा इस तरह इसकी व्याख्या भी करते हैं। अपनी दर्पस्फीत मुद्रा में वे बताते हैं, जैसे कि वे अपनी एक गहरी सार्वभौम प्रज्ञा के सहारे ही इस सचाई को सामने रख रहे हों कि हिंदी को हिंग्लिश बनना अनिवार्य है। उनको तो पहले से ही इसका इल्हाम हो चुका है और ये तो होना ही है। यह नियति है, निर्विकल्प। इससे बचा नहीं जा सकता। इससे बचने का अब कोई रास्ता ही नहीं है। यह टेक्नोलॉजिकल-डिटरमिनिज्म की तरह बनाया और बताया जा रहा है कि इंटरनेट के सामने तुम्हारी वही स्थिति है, जो शेर के सामने बकरी की। अब साहित्य को कसाईखाना कहने और बताने के दिन लद गए। अब तो यह इंटरनेटी युग ही कसाईखाना है। तुम केवल हलाक होने की विधि जरूर चुन सकते हो। या तो 'हलाल' या फिर 'झटका'। 'झटका' विधि यही है कि पहली कक्षा से अंग्रेजी शुरू कर दो।

आप को यह याद ही होगा कि एक भली चंगी भाषा से उसके रोजमर्रा के साँस लेते शब्दों को हटाने और उसके व्याकरण को छीन कर उसे बोली में बदल दिए जाने को क्रियोल कहते हैं। अर्थात हिंदी का हिंग्लिश बनाना एक तरह से उसका क्रियोलीकरण करना है। और कांट्रा-ग्रेजुअलिज्म के हथकंडों से, बाद में उसे डि-क्रियोल किया जाएगा। डिक्रियोल करने का अर्थ, उसे पूरी तरह अंग्रेजी के द्वारा विस्थापित कर देना।

भाषा की हत्या के एक नव-उपनिवेषी योजनाकार ने, अगले और अंतिम चरण को कहा है कि फायनल असाल्ट ऑन हिंदी बनाम हिंदी को नागरी लिपि के बजाय रोमन-लिपि में छापने की शुरुआत करना। अर्थात हिंदी पर अंतिम प्राणघातक प्रहार। बस हिंदी की हो गई अंत्येष्टि। चूँकि हिंदी को रोमन में लिख पढ़कर बड़ी होने वाली पीढ़ी के लिए, वह नितांत अपठनीय हो जाएगी। इसी युक्ति से गुयाना में जहाँ 43 प्रतिशत लोग हिंदी बोलते थे को फ्रेंच द्वारा डि-क्रियोल कर दिया गया और अब वहाँ देवनागरी की जगह रोमन-लिपि को चला दिया गया है। यही काम त्रिनिदाद में इस षड्यंत्र के जरिए किया गया है। नतीजतन, वहाँ नागरी लिपि अपाठ्य हो जाने वाली है।

जबकि, विडंबना यह है कि बहुराष्ट्रीय कंपनियों के धूर्त दलालों के दिशा निर्देश में, संसार की इस दूसरी बड़ी बोले जाने वाली भाषा से उसकी लिपि छीन कर, उसे रोमन लिपि थमाने की दिशा में हिंदी के ही सभी अखबार जुट गए हैं। वे हिंदी का क्रियोलीकरण कर रहे हैं। उन्होंने यह स्पष्ट धारणा बना ली है कि वे अब हिंदी के लिए हिंदी का अखबार नहीं निकाल रहे हैं, बल्कि अंग्रेजी के अखबार की नर्सरी का काम कर रहे हैं। क्योंकि, देर-सबेर इसी को ही तो भारत की राष्ट्रभाषा बनाना है। प्राथमिक शिक्षा के लिए विश्व-बैंक द्वारा प्राप्त धन का यही तो आखरी सुफल है, क्योंकि आगे जाकर समूची आरंभिक शिक्षा के कायांतरण के कर्मकांड को पूरा किया जाना एक अघोषित शर्त है, जिसमें हिंदी के कई अखबार मिल-जुलकर आहुतियाँ दे रहे हैं। वे स्वाहा-स्वाहा करते हुए हिंदी की आहुति चढ़ा रहे हैं। उन्होंने अपने हिंदी-समाचार पत्रों में, बच्चों के लिए निर्धारित पृष्ठों पर अंग्रेजी सिखाने का श्रीगणेष कर दिया है। यह एजुकेशन फॉर ऑल का उद्घोष, वस्तुतः 'इंगलिश फॉर ऑल' ही है। क्योंकि, आज इ.एल.टी. (इंग्लिश लर्निंग और टीचिंग) उद्योग की धनराशि रक्षा बजटों के आसपास पहुँचने की तैयारी में है।

वे आजादी मिलने के साथ ही गांधी-नेहरू की पीढ़ी द्वारा कर दी गई महाभूल को वे दुरुस्त करने में लगे हैं, जिसके चलते अंधराष्ट्रवादी उन्माद में हिंदी को राष्ट्रभाषा की जगह बिठा दिया था - जबकि, यह तो सत्ता की भाषा बनने के लायक ही नहीं थी। यह तो अपढ़ गुलामों और मातहतों और अज्ञानियों की भाषा थी और उसे वैसा ही बने रहना चाहिए। इसी किस्म की इच्छा और संकल्प की अनुगूँज गुरुचरणदास एवं अमेरिका की बर्कली विश्वविद्यालय की प्रोफेसर गेल ओमवेत जैसे लोगों के प्रायोजित लेखों से सुनाई देती है, जो इन अखबारों के संपादकीय पृष्ठों पर छपते रहते हैं। वे बार-बार कहते हैं कि जल्द ही हिंदुस्तान, दुनिया की आने वाले दो सौ वर्षों के लिए 'भाषाशक्ति' बनने वाला है - जबकि वे जानते हैं कि इससे बड़ा धोखा और कोई हो ही नहीं सकता। वास्तव में वे भारत को 2000 बरस के लिए गुलाम बनाने के लिए ठेके का काम ले चुके हैं। वे उसे उस दिशा में घेरने की निविदा हाथिया चुके हैं। इस घेरने के काम में अखबार सबसे सुंदर और सुविधाजनक लाठी है।

पिछले दिनों, अमेरिका में गरीब मुल्कों की आँखें खोल देने वाली एक पुस्तक छप कर आई है, जिसे न लिखने के लिए सी.आई.ए. ने एक मिलियन डॉलर रिश्वत देने की पेश की थी - लेकिन, लेखक ने उनके इस प्रस्ताव को ठुकरा दिया और साहस जुटा कर प्रायश्चित के रूप में लिख ही डाली यह पुस्तक : 'कन्फेशन ऑव एन इकोनोमिक हिटमैन'। नोम चोमस्की और डेविड सी. कोर्टन जैसे बुद्धिजीवियों ने, लेखक को उत्साहित करते हुए कहा कि इसका प्रकाशन शेष संसार का तो हित करेगा ही, बल्कि, इससे अमेरिका का भी हित ही होगा। इसलिए इसका छपना जरूरी है।

बहरहाल, पुस्तक के लेखक जॉन पार्किन्स ने उसमें विस्तार से बताया कि किस तरह बहुराष्ट्रीय निगमों के जरिए अमेरिका ने तीसरी दुनिया के गरीब मुल्कों के आर्थिक ढाँचे को तहस-नहस कर दिया कि नतीजतन वे सामाजिक-सांस्कृतिक स्तर पर भी विपन्न हो गए। कहने की जरूरत नहीं कि ऐसे ही बहुराष्ट्रीय निगमों और विश्व-बैंक के पूर्व कर्मचारी हिंदी के अखबारों के 'तथाकथित-संपादकीय पृष्ठों' पर कब्जा करते जा रहे हैं। वे इन दिनों हमारे हिंदी के समाचार पत्रों द्वारा इस भूमंडलीय युग के चिंतक और राष्ट्र निर्माता बन गए हैं। भारत में अंग्रेजी के अश्वमेध में भिड़े ये लोग, अंग्रेजी की अपराजेयता का इतना बखान करते हैं कि सामान्यजन ही नहीं, कई राजनेताओं और शिक्षाविदों को लगता है, जैसे आर्थिक प्रलय की घड़ी सामने है और उसमें अब केवल अंग्रेजी ही मत्स्यावतार हैं। अतः हमें लगे हाथ उसकी पीठ पर इस आर्यभूमि को चढ़ा देना चाहिए, वर्ना यह रसातल में डूब जाएगी। ये सब देश को बचाने वाले लोग हैं। वे कहते हैं, एक ईस्ट इंडिया कंपनी ने तुम्हें सभ्य बनाया। अब जो आ रही हैं, वे तुम्हें संपन्न बनाएँगी। माँ तो माँगने पर ही रोटी देती है, ये तुम्हें बिना माँगे माल देंगी। तुम्हें मालामाल कर देंगी। फिर भी तुम 'माँगोगे मोर'। इसलिए हिंदी को छोड़ो और अंग्रेजी का दामन थामो।

अंग्रेजी की विरुदावली गा-गाकर गला फाड़ते ये किराए के कोरस गायक, यह क्यों भूल जाते हैं कि चीनी (जिसमें ढाई हजार चिह्ननुमा अक्षर हैं) - और जापानी जैसी चित्रात्मक लिपियों वाली भाषाओं ने अंग्रेजी की वैसाखी के बगैर ही बीसवीं सदी के सारे ज्ञान-विज्ञान को अपनी उन्हीं चित्रात्मक लिपियों वाली भाषा में ही विकसित किया और आज जब संसार में व्यापार, तकनॉलाजी या आर्थिक क्षेत्रों के संदर्भ खुलते हैं तो कहा जाता है, लिंचपिन ऑव वर्ल्ड-इकोनॉमी एंड टेकनोलॉजी हेज शिफ्टेड फ्रॉम अमेरिका टू जापान। हालाँकि, कुछ लोग अब जापान के साथ चीन का भी नाम लेने लगे हैं और यह किसी से छुपा नहीं है कि अब अमेरिका चीन से भी चमकने लगा है। क्योंकि वह शीघ्र ही सूचना प्रौद्योगिकी पर कब्जा करने वाला है। क्योंकि, अमेरिका में पढ़ रहा एक चीनी छात्र, यदि वहाँ रहकर कोई कंप्यूटर सॉफ्टवेअर विकसित करता है तो साथ ही साथ उसे वह अपनी चीनी भाषा में विकसित करता है और अपने देश में पहुँचते ही वह उसे स्थापित कर देता है। जबकि, हिंदी की नागरी लिपि, जो संसार भर की तमाम भाषाओं की लिपियों में श्रेष्ठ और वैज्ञानिक है, को अंग्रेजी का रास्ता साफ करने के लिए निर्दयता के साथ मारा जा रहा है। वे अपने धूर्त मुहावरे में बताते हैं कि अखबार इस तरह हिंदी को नष्ट नहीं कर रहे हैं, बल्कि ग्लोबल बना रहे हैं। वे हिंदी को एक फ्रेश-लिंग्विस्टिक लाइफ दे रहे हैं। हम जानना चाहते हैं कि भैया आप किसे मूर्ख बना रहे हैं - जिस हिंदी को राष्ट्र संघ की भाषा सूची में शामिल नहीं करवा सके, उसे 'हिंग्लिश' बनाकर ग्लोबल बनाएँगे? और 'हिंग्लिश' बन कर, हिंदी ग्लोबल होगी कि वह अंग्रेजी के 'महामत्स्य' के पेट में पहुँच जाएगी? यह भाषा के विकास के नाम पर खेला जाने वाला शताब्दी का सबसे बड़ा छल है।

दरअस्ल, श्रीमान जी, आप आग लगा कर, उस पर आग के आगे पर्दा खींच रहे हैं और हमें समझा रहे हैं कि 'बेवकूफो! हिंदी सकुशल है और वह जिंदा बची रहेगी।' अंग्रेजी की लपट में स्वाहा नहीं होगी। यदि हो भी गई तो बाद उसके वह राख के रूप में रहेगी, पर रहेगी जरूर। भाषा की भस्म को कपाल पर पोत कर तुम प्रसन्न रहना। ठीक है, हिंदी तुम्हारी जबान पर रहे न रहे पर वह तुम्हारे ललाट पर तो रहेगी ही। पहले हिंदी 'ललाट की बिंदी' भर थी, अब तो तुम उससे पूरा ललाट लीप लेना। फिर तुम तो आत्मावादी हो। वासांसि जीर्णानि यथा विहाय वाले हो, इसलिए भलीभाँति जानते हो कि आत्मा अमर होती है। हिंदी की आत्मा अमर है और रहेगी। वो सिर्फ पुराने कपड़े बदल रही है। उसके पुराने कपड़ों की हालत नौ गज साड़ी फिर भी जाँघ उघाड़ी वाली उक्ति की तरह हो चुकी थी (शब्द का बहुत बड़ा जखीरा अर्थात मोटे-मोटे शब्दकोश, लेकिन फिर भी लफ्जों के लाले।) हिंदुस्तान की एक बुकराई हुई अंग्रेजी लेखिका ने कहा - 'बताइए हिंदी के पास 'एटम' के लिए कोई शब्द ही नहीं है फिर भला उसमें विज्ञान की शिक्षा कैसे संभव है?' बहरहाल तुम्हारी हिंदी जींस पहन रही है। उसे स्मार्टनेस की तरफ जाना है। वह फिलहाल ग्रीन रूम में है। लद्धड़ता छोड़कर एक फ्रेश-लिंग्विटक लाइफ को हासिल करने की तरफ बढ़ रही है।

डेविड. सी. कार्टन ने वैश्वीकरण की हकीकत उजागर करते हुए ठीक ही कहा है कि ग्लोबलाइजेशन का अर्थ सरकारों और बहुराष्ट्रीय निगमों का पारस्परिक संबंध भर है। वह कहता है कि इसीलिए ग्लोबलाइजेशन की प्राथमिक कार्रवाई यही होती है कि जिस किसी चीज से भी 'राष्ट्रीयता' की बू आए, उसे अविलंब हटाइए। इस 'सैद्धांतिकी' के मुताबिक निश्चय ही 'हिंदी' ग्लोबलाइजेशन के पहले निशाने पर है, चूँकि इससे राष्ट्रीयता की बहुत तीखी और बरदाश्त बाहर गंध आती है। वजह यह कि हिंदी का रिश्ता राष्ट्रभाषा के रूप में नाथ देने से यह भारत के कुछ प्रदेशों की जनता की नजर में राष्ट्रीय-अस्मिता का पर्याय बन गई है। नतीजतन, इस पर चढ़े राष्ट्रीयता के इस कवच को हटाना जरूरी है, वर्ना यह मारे जाने में काफी समय लेगी। बहुत मुमकिन है कि लोग इसकी हत्या के प्रकट पैंतरों को देख कर हो-हल्ला करते हुए एकमत होने लगें। लेकिन भूमंडलीकरण की सफलता तभी है जब लोग भाषा और भूगोल को लेकर एकमत होना छोड़ दें। राष्ट्र राज्य की बात करने वाले को, लगे हाथ मूर्ख बताने के लिए अविलंब आगे आएँ।

इसी संभावित संकट को भाँप कर दलाल लोग यह कहते फिरते हैं कि हिंदी को राजभाषा या राष्ट्रभाषा के पाखंड से मुक्त करके 'जनता की गाढ़ी कमाई से खींचे गए' पैसों का बहाया जाना अविलंब रोका जाए। क्योंकि इससे उसे अकारण ही ऑक्सीजन मिलती रहती है। जबकि उसकी ब्रेन-डेथ हो चुकी है। उसमें सोचने समझने की क्षमता ही नहीं है। राजभाषा के नाम पर धन उड़ेलने से एक और समस्या पैदा हो जाती है, वह यह कि एक ओर, भाषा के जिस पुराने रूप को अखबार नष्ट करने में मेहनत करते हैं, दूसरी ओर राजभाषा के नाम पर धन उड़ेलने से, भाषा का वह पुराना रूप, एक मानक के रूप में जिंदा बना रहता है।

अंग्रेजी इस बात में तो आरंभ से सतर्क रही और उसने हिंदी का अन्य भारतीय भाषाओं से सहोदरा संबंध बनाने ही नहीं दिया, उलटे वैमनस्य और अदम्य वैरभाव को बढ़ाए रखा - लेकिन, हिंदी की, अपनी बोलियों से जड़ें इतनी गहरी बनी और रही आईं कि उसको वहाँ से उखाड़ना मुश्किल रहा। बहरहाल, ये काम अब मीडिया ने अपने हाथ में ले लिया है। बोलियों का संहार करने में, जो काम इलेक्ट्रॉनिक-मीडिया कर रहा है, उसे दस कदम आगे जाकर हिंदी के अखबार कर रहे हैं। जो अखबार साढ़े तीन रुपये में बिकते हुए जानलेवा आर्थिक कठिनाई का रोना रो रहे थे, वे अब एक या डेढ़ रुपये में चौबीस पृष्ठों के साथ अपनी चिकनाई और रंगीनी बेच रहे हैं। स्पष्ट है, यह विदेशी चंचला धनलक्ष्मी है। क्या ये लोग नहीं जानते कि यह पूँजी 'अस्मिताओं' का 'विनिमय' नहीं, बल्कि अस्मिताओं का सीधा-सीधा 'अपहरण' करती हैं। यह अखबारों को अपनी 'हवाई सेना' बनाकर, 'विचारों का विस्फोट' करती है, और विस्फोट वाली जगह पर थल-सेना कब्जा कर लेती है। इसी के चलते अखबार 'बाजारवाद' के लिए जगह बनाने का काम कर रहे हैं। वे पहले 'विचार' परोसते थे, अब 'वस्तु' परोस रहे हैं - अलबत्ता, खुद 'वस्तु' बन गए हैं। इसी के चलते अखबारों में संपादक नहीं, ब्रांड-मैनेजर बरामद होते हैं। अखबारों की इस नई प्रथा ने, 'मच्छरदानी' की 'सैद्धांतिकी' का वरण कर लिया है। कहने को वह 'मच्छर-दानी' होती है परंतु उसमें मच्छर नहीं होता। वह बाहर ही बाहर रहता है। ठीक इसी तरह अखबार में अखबारनवीस को छोड़कर, सारे विभागों के भीतर सब वाजिब लोग होते हैं। बस संपादकीय विभाग में संपादक नहीं होता। इसीलिए, आपस में पत्रकार बिरादरी एडिटोरियल को एडव्हरटोरियल विभाग कहती है। अब इस मार्केट-ड्राइवन पत्रकारिता में संपादकीय'-विभाग, विज्ञापन-विभाग का मातहत है। यहाँ तक कि प्रकाशन योग्य सामग्री भी वही तय करता है। यों भी संपादकीय पृष्ठ दैनिक अखबारों में अब बुद्धिजीवियों के वैचारिक अभिव्यक्ति के लिए नहीं, राजनीतिक दलों के 'व्यू-पाइंट' (?) के लिए आरक्षित होते जा रहे हैं। वे राजनीतिक जनसंपर्क हेतु सुरक्षित पृष्ठ हैं। यह उसी पूँजी के प्रताप का प्रपात है, जो बाहर से आ रही है।

ऐसे में निश्चय ही वे हड़का कर पूछना चाहें कि बताइए भला यह कैसे हो सकता है कि आप पूँजी तो हमारी लें और 'भाषा और संस्कृति' आप अपनी विकसित करें? यह नहीं हो सकता। हमें अपने साम्राज्य की सहूलियत के लिए 'एकरूपता' चाहिए। सब एक-सा खाएँ। एक-सा पीएँ। एक-सा बोलें। एक-सा लिखें-लिखाएँ। एक-सा सोचें। एक-सा देखें। एक-सा दिखाएँ। तुम अच्छी तरह से जान लो कि यही संसार के एक ध्रुवीय होने का अटल सत्य है। हमारे पास महामिक्सर है - हम सबको फेंट कर 'एकरूप' कर देंगे। बहरहाल, उन्होंने भारत के प्रिंट और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया को अपना महामिक्सर बना लिया। इसलिए, अब अखबार और अखबार के बीच की पहले वाली यह स्पर्धा जो धीरे-धीरे गला काट हो रही थी अब क्षीण हो गई है। चूँकि अब वे सब एक ही अभियान में शामिल, सहयात्री हैं। उनका अभीष्ट भी एक है और वह है, 'वैश्वीकरण' के लिए बनाए जा रहे मार्ग का प्रशस्तीकरण। सो आपस में बैर कैसा? हम तो आपस में कमर्शियल-कजिन्स हैं। आओ, हम सब मिलकर मारें हिंदी को। अब भारत की असली हिंदी पत्रकारिता हिंदी की ऐसी ही आरती उतार रही है।

यहाँ यह याद दिलाना जरूरी है कि आज जिस हिंदी को हम देख रहे हैं - उसे 'पत्रकारिता' ने ही विकसित किया था। क्योंकि, तब की उस पत्रकारिता के खून में राष्ट्र का नमक और लौहतत्व था जो बोलता था। अब तो खून में लौह तत्व की तरह एफडीआई (फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट) बहने लगा है। अतः वही तो बोलेगा। उसी लौहतत्व की धार होगी जो हिंदी की गर्दन उतारने के काम में आएगी। हालाँकि, अखबार जनता में मुगालता पैदा करने के लिए वे कहते हैं, पूँजी उनकी जरूर है, लेकिन चिंतन की धार हमारी है। अर्थात सारा लोहा उनका, हमारी होगी धार। अर्थात भैया हमें भी पता है कि धार को निराधार बनाने में वक्त नहीं लगेगा। तुम्हीं बताओ, उन टायगर इकनॉमियों का क्या हुआ, जिनसे डरकर लोग कहने लगे थे कि पिछली सदी यूरोप या पश्चिम की रही होगी, यह सदी तो इन टायगरों की होगी। कहाँ गए वे टायगर? उनके तो तीखे दाँत और मजबूत पंजे थे। नई नस्ल के ये कार्पोरेटी चिंतक रोज-रोज बताते हैं - हिंदुस्तान विल बी टायगर ऑफ टुमॉरो।

भैया ये जुमले सुनते-सुनते हमारे कान पक गए। हमें टुमॉरो का कुछ नहीं बनना, बल्कि जो कुछ बनना है आज का बनना है। हम कल के टायगर होने के बजाय आज की गाय होने और बने रहने में संतुष्ट हो लेंगे। गाय घास खाएगी तथा दूध और गोबर देगी और उससे हमारी खेतियों की सेहत ठीकठाक बनी रहेगी। हमारे किसान आत्महत्या करने से बच जाएँगे। लेकिन तुम हो कि थोड़े से चमड़े के लिए पूरी की पूरी जिंदा गाय को मार रहे हो।

तब की पत्रिकारिता में अपने देश और समाज को गढ़ने-रचने का साहस था, संकल्प था, समझ और स्वप्न भी था (बेशक उसमें राष्ट्रीय-पूँजीवाद की एक बड़ी व ऐतिहासिक भूमिका भी थी।)। वह जख्मी कलम के साथ बारूद और बंदूक की बर्बरता के खिलाफ लड़ी थी। इस कारण वह भाषा के मसले को गहरे ऐतिहासिक विवेक के साथ देख रही थी। यहाँ गांधी का प्रसंग उल्लेखनीय लगता है। वे भी पत्रकार थे। आजादी की घोषणा के बाद जब बी.बी.सी. ने उन्हें बुलाया तो उन्होंने प्रस्ताव को ठुकराते हुए कहा था, 'संसार को कह दो गांधी को अंग्रेजी नहीं आती। गांधी अंग्रेजी भूल गया है।' यह एक नवस्वतंत्र राष्ट्र के निर्माण के बड़े स्वप्न का उत्तर था। यह वाक्य नहीं, एक भावी महासमर के प्रारूप का खुलासा था। उन्हें यह अहसास था कि अपनी भाषा के अभाव में, राष्ट्र फिर से गुलामी के नीचे चला जाएगा। उन्होंने स्वयं को वर्गच्युत करके, जिस तरह भारतीय समाज के आखिरी आदमी के बीच खुद को नाथ लिया था, उसने उन्हें इस बात के लिए और अधिक दृढ़ कर लिया था कि अंग्रेजी की औपनिवेशिक दासता से मुक्त नहीं हुए तो इतनी लंबी लड़ाई के बाद हासिल की गई आजादी का कोई अर्थ नहीं रह जाएगा। उन्होंने ये बात कई-कई जगह और अपनी चिट्ठियों तथा पर्चों में भी बार-बार लिखी और छापी।

मगर, आज सबसे बड़ी त्रासदी तथा विसंगति यही है कि हमारी पत्रकारिता, नई तथा कभी खत्म न हो सकने वाली गुलामी खोलने का रास्ता सिर्फ अपनी धंधई बुद्धि की व्यावसायिक अधीरता के कारण कर रही है। इस पत्रकारिता में, अखबार जो 'माल' की तरह उत्पादित और वितरित हो रहा है। कहीं कहीं तो छापकर प्रेस से सीधे गोदामों में भरा जा रहा है। क्योंकि उन्हें अब सर्कुलेशन नहीं केवल प्रिंट आर्डर को देखना है। क्योंकि, वह विज्ञापनों की दर तय करता है। उसमें न तो अतीत के आकलन का गहरा विवेक रहा है - और, न ही 'भविष्य में झाँक सकने वाली दृष्टि'। एक किस्म का धंधई-उन्माद है, जिसे पूँजी का प्रवाह पैदा कर रहा है। इसलिए, वह केवल अपने व्यावसायिक साम्राज्य के लिए अराजक होने की हद तक, भाषा, संस्कृति और समाज को विखंडित करने से भी संकोच नहीं कर रहे हैं। यों भी उनके लिए अब समाज को मात्र एक उपभोक्तावर्ग की तरह देखने की लत पड़ गई है। अब उनके लिए देश की जनता राष्ट्र की नागरिक नहीं बल्कि उसके प्रॉडक्ट (?) की ग्राहक है। इसके साथ विडंबना यह भी है कि संपूर्ण हिंदी भाषाभाषी समाज भी, भाषा के साथ किए जा रहे ऐसे विराट छल को पांडुपुत्रों की मुद्रा में गूँगा बन कर देख रहा है।

यहाँ यह पुनर्स्मरण कराना जरूरी है कि हिंदी का 'समकालीन-भाषा-रूप' आज विकास की जिस सीढ़ी तक पहुँचा है, उसे गढ़ने और विकसित करने में निःसंदेह हमारी हिंदी पत्रकारिता की भूमिका बहुत बड़ी रही है, लेकिन दुर्भाग्यवश वही पत्रकारिता, जिसे भाषा अभी तक का अपना सबसे अधिक विश्वसनीय माध्यम मानते आ रही थी, आज सबसे बड़ा धोखा उसी से खा रही है। उसके लिए सर्वाधिक संदिग्ध वही बन गया है। आज दैनिक-पत्रकारिता, उस मादा-श्वान की तरह है, जो अपने ही जन्मे को भी खा जाती है।

अब यह भ्रम हमें दूर कर लेना चाहिए कि भाषा बोले जाने वाले लोगों की संख्या से बड़ी है। यह मूर्ख मुगालता है। बोला जाना 'कामचलाऊ संप्रेषण' का संवादात्मक रूप है, चिंतनात्मक नहीं। वह हमेशा ही 'आज' 'अभी' 'ताबड़तोड़' बनाम अनियंत्रित अधीरता से भरा होता है। नतीजतन, उसे इस बात की कोई जरूरत और फुरसत नहीं होती कि वह अंग्रेजी के किसी नए शब्द का पर्याय ढूँढ़े या उसके लिए नया शब्द गढ़े। जैसे कि पिछली पीढ़ी ने मेंबर ऑफ पार्लियामेंट के लिए पहले संसद सदस्य शब्द गढ़ा फिर अंत में सांसद शब्द बनाया। लेकिन इलेक्ट्रॉनिक मीडिया अंग्रेजी को जस का तस उठाकर अपनी फौरी जरूरत पूरी कर लेता है। इसी आदत ने हिंदी में, शेयर्ड वकैब्युलरि को बढ़ाया और अखबारों ने लगे हाथ, उसे एक अभियान की तरह उठा लिया। इसलिए, भाषा के इस खिचड़ी रूप का जयघोष करते हुए, जो लोग भाषा की सुंदर सेहत का प्रचार कर रहे हैं, या तो वे इस खतरनाक मुहिम का बेशर्म हिस्सा हैं, या फिर उनकी समझ का कांकड़ ही छोटा है। मेरे खयाल से पहली बात ज्यादा सच्ची और सही है।

इसके साथ ही ऐसे महामूर्खों या फिर चालाकों की कमी नहीं है जो हर समय इस बात की डूँडी पीटते रहते हैं कि लो अब तो तुम्हारी हिंग्लिश ब्रिटेन में भी लोकप्रिय हो गई है। यह बात ऐसे महातथ्य की तरह प्रचारित की जा रही है जैसे हमारी हिंदी ने अंग्रेजी की सदियों की कुलीनता की कलाई झटक कर उसे सिंहासन से उतारकर सड़क पर ला दिया है। आभिजात्य का प्रोलेतेरीकरण कर दिया है। रॉयल को रौंद दिया है। देखो! गौरांग प्रभु ने कुलीनता के कवच को खदेड़कर तुम्हारी हिंग्लिश का झगला धारण कर लिया है। यह हिंदी की उपलब्धि नहीं, सिर्फ भारतीयों की गुलाम मानसिकता की सूचना है। यह दासी का क्वीन के करीब पहुँच जाने का मूर्ख और मिथ्या रोमांच है, जो हिंदी के हिंग्लिशियाते अखबारों की प्रथम पृष्ठों की खबर बनाता है।

पिछले ही दिनों ऐसी ही पगला डालने वाली एक खबर और रही कि हिंदी के कुछेक शब्दों को ऑक्सफर्ड डिक्शनरी ने ले लिया। ऑक्सफर्ड डिक्शनरी हिंदी-गर्भित हो गई है। ये वे शब्द थे, जिनके लिए अंग्रेजी में उपयुक्त या पर्याय असंभव था क्योंकि वे अपना विकल्प खुद थे - मसल, घी, गुड़, मंत्र, सत्याग्रह, पंडित आदि-आदि। उनको अंग्रेजी में उलथाया जाता तो वे अपना अर्थ ही खो देते। बस... क्या था? अखबार बताने लगे कि ये लो हिंदी छाने लगी अंग्रेजी पर। एक अपढ़ महान ने तो यह तक कह दिया कि आज हमने डिक्शनरी पर विजय पाई है, एक दिन ब्रिटेन पर पा लेंगे। बहरहाल, यह वैसी ही विदूषकीय प्रसन्नता थी जो मालवी की एक कहावत को चरितार्थ करती है कि एक नदीदे को किसी ने दे दी कटोरी तो उसने उससे पानी पी-पीकर ही अपना पेट फोड़ लिया। जबकि, यह ऑक्सफर्ड-डिक्शनरी की ज्ञानात्मक उदारता नहीं बल्कि नव उपनिवेशवादी बिरादरी का पूरा सुनिश्चित अर्थशास्त्र और मनोविज्ञान है, जो भारतीयों को तैयार करता है कि जब अंग्रेजी जैसी महाभाषा उदार होकर हिंदी के शब्दों को अपना रही है तो हिंदी को भी चाहिए कि वह अंग्रेजी के शब्दों को इसी उदारता से अपनाए। अंग्रेजी के शब्दकोष में हिंदी के शब्दों का दाखिला बमुश्किल एक प्रतिशत होगा। अर्थात दाल में नमक के बराबर भी नहीं। लेकिन, हमारे अखबार तो नमक में दाल मिला रहे हैं। हिंदी की विशाल हत्या को समावेशी बनाने और बताने का कैसा उदाहरण है।

जब भी अंग्रेजी द्वारा हिंदी को हिंग्लिश बनाए जाने की चिंता प्रकट की जाती है, तो कुछ लोग अपनी अज्ञानता में और चंद चालाक लोग अपनी धूर्तता में एक कविताई सच के जरिए हमें समझाने के लिए आगे आ जाते हैं कि कुछ है कि हस्ती मिटती नहीं हमारी। जबकि, हकीकत ये है कि हमारी हस्ती कभी की पस्ती में बदल चुकी है। हमारी भाषा हमारी संस्कृति कभी के घुटने टेक चुकी है। हमारा पूरा व्यक्तित्व (परसोना) पिछले दशकों में पश्चिमी हो चुका है, जो अब अमेरिकाना होने की तरफ बढ़ रहा है। किसी ने कहा था - आज लोग अमेरिका जाकर अमेरिकाना बन रहे हैं, लेकिन शीघ्र ही वह समय आएगा जबकि आपके घर में घुसकर आपको अमेरिकन बना दिया जाएगा। यह मिथ्या कथन-सी लगने वाली बात धीरे-धीरे सत्य का रूप धारण कर रही है। इसलिए अब मॉडर्निज्म एक पुराना और बासी शब्द है, जिसे छिलके की तरह उतारकर उसकी जगह नया 'अमेरिकाना' शब्द जगह ले चुका है। यहाँ तक कि विज्ञापनों में अब अमेरिकी मॉडलों का उपयोग इस तरह किया जाता है, गालिबन भारतवंशियों! ये तुम्हारे नए देव-पुरुष हैं और तुम्हें इन्हीं के सम्मुख दंडवत होना है। पूरा मीडिया गोरी चमड़ी, गोरी भाषा का जिस बेषर्मी से आदर्शीकरण कर रहा है, वह देखने लायक है।

दरअसल, 'अस्मिता' की इन दिनों एक नई और माध्यम निर्मित अवधारणा को प्रस्तुत करते हुए उसका प्रचार और वकालत की जा रही है। यूँ भी अब वही सबको परिभाषित करता है और तमाम जीवन और समाज के तमाम मूल्यों का प्रतिमानीकरण करने का औजार बन चुका है। दूसरी तरफ हम अपनी सनातन रूढ़-सांस्कृतिक आत्मछवि से इतने मोहासक्त हैं कि प्रत्यक्ष और प्रकट पराजय को स्वीकारना नहीं चाहते हैं। बर्बर उपनिवेश के विरुद्ध लड़ने की निरंतरता को जीवित बनाए रखने के लिए ऐसी अपराजय का अस्वीकार पराधीनता के दौर में, राष्ट्रवाद की नब्जों में प्राण फूँकने के काम आता था। कुछ है कि हस्ती मिटती ही नहीं - तब, यह दंभोक्ति अचूक और अमोघ बनकर काम करती थी। जन-जन को जोड़ने और जगाने का जुमला था ये कि लगे रहो भैया। निश्चय ही उस दंभोक्ति ने ब्रिटिश उपनिवेश के विरुद्ध संघर्ष में समूचे राष्ट्र को लगाए रक्खा और हमने अंग्रेजों को हकालकर बाहर कर दिया। लेकिन वह अपने दंश का जहर खून में इस कदर शामिल कर चुका था कि हम आज हिंदी को हिंदी से हिंग्लिश बनाते देख रहे हैं कि कहते हैं कि कुछ नहीं होगा, वह हर हाल में बची रहेगी। हस्ती है कि मिटती नहीं कहते हुए हम यह लांछन अपने माथे पर लेने के लिए तैयार हैं कि हमने अपनी भाषा को अपने सामने दम तोड़ते हुए देखा और कुछ नहीं किया।

कहने की जरूरत नहीं कि युद्धातुर उतावली से गुरुचरण दास जैसे लोग अपने तर्कों में बार-बार डेविड क्रिस्टल की पुस्तक लेंग्विज डेथ का हवाला इस तरह देते हैं, जैसे वह भाषा की भृगु-संहिता है, जिसमें भाषा की मृत्यु की स्पष्ट भविष्योक्ति है - अतः आप हिंदी की मृत्यु को लेकर छाती-माथा मत कूटो। जबकि इससे ठीक उलट बुनियादी रूप से वह पुस्तक भाषाओं के धीरे-धीरे क्षयग्रस्त होने को लेकर गहरी चिंता प्रकट करती है। भाषाई उपनिवेशवाद (लिंग्विस्टिक इंपीयरिलिज्म) के खिलाफ सारी दुनिया के भाषाशास्त्रियों को सचेत करती है पर हिंदी वाले हैं कि सुन्न पड़े हैं। हिंदी साहित्य संसार में विचरण करने वाले साहित्यकार तो तेरी कविता से मेरी कविता ज्यादा लाल में लगे हुए हैं या हिंदी की वर्तनी को दुरुस्त कर रहे हैं। जबकि इस समय सबको मिल-जुलकर इस सुनियोजित कूटनीति के खिलाफ कारगर कदम उठाने की तैयारी करनी चाहिए।

बहरहाल, इस सारे मसले पर एक व्यापक राष्ट्रीय-विमर्श की जरूरत है। हमें याद रखना चाहिए कि कई नव स्वतंत्र राष्ट्रों ने अपनी भाषा को अपनी शिक्षा और आधुनिक ज्ञान-विज्ञान की भाषा बनाया। इसलिए, आज उनके पास उनका सब कुछ सुरक्षित है। हमने अपनी राजनीतिक भीरुता के चलते भाषा के मसले पर पुरुषार्थ नहीं दिखाया। इसी की वजह है कि हमसे आज का ये धोखादेह समय हमारे सर्वस्व को जिबह के लिए माँग रहा है। आज हमारी आजादी वयस्क होते ही राजनीति के ऐसे छिनाले में फँस गई है कि सारा देश मीडिया में चल रहे व्यवस्था का मुजरा देख रहा है। पूरा समाज मीडिया और माफिया आपरेटेड बन गया है। अब मीडिया ही आरोप तय करता है, वही मुकदमा चलाता है और अंत में अपनी तरह से अपनी तरह का फैसला भी सुनाता रहता है और विडंबना यह कि वह यह सब जनतंत्र की दुहाई देकर करता है, जबकि अपनी आलोचना का हक वह किसी को नहीं देता और अपने आत्मावलोचन के लिए तो उसके पास समय ही नहीं है। ऐसी बातें सुनने की घड़ी में वह अपने कान से हियरिंग-एड निकाल लेता है।

राजनीति ने तो भाषा, शिक्षा, संस्कृति जैसे प्रश्नों पर विचार करना बहुत पहले ही स्थगित कर रखा है। भारत में राजनीति एक नया, पूँजी निवेश का क्षेत्र है। इसलिए, वह तो देश को बाजार तथा एन.जी.ओ. के भरोसे छोड़कर मुक्त हो गई है। यों भी उसमें प्रविष्टि की अर्हता, हत्या और घूस लेकर कानून के शिकंजे से सुरक्षित बाहर आ जाना हो गया है - और जो इन अर्हताओं से रहित हैं, वे देश को एक प्रबंध-संस्थान की तरह चलाने को भूमंडलीकरण की वैश्विक दृष्टि मानते हैं और वे उसके राजनीतिक प्रबंधक का काम कर रहे हैं। यह राजनीतिक संस्कृति की समाज से विदाई की घड़ी है, जिसने संस्थागत अपंगता को असाध्य बन जाने की तरफ हाँक दिया है। हम क्या थे? हम क्या हैं और क्या होंगे अभी? जैसे प्रश्नों पर बहस करना मूर्खों का चिंतन हो गया है। जबकि, ये प्रश्न शाश्वत रहे हैं और हमेशा ही उत्तरों की माँग करते रहेंगे। इसलिए, हमें अपने इतिहास को जीवित बचाकर रखना जरूरी है, क्योंकि भविष्य का जब सौदा होगा, उसमें हमारी कम, हमारे अतीत की भूमिका बहुत बड़ी होती है। वरना, वह भाषा की मृत्यु के साथ दफ्न हो जाएगा। वे हमें हालीवुड की तरह भविष्यवादी फंतासियों में जीने के लिए तैयार किए दे रहे हैं।

कुछ दिनों पूर्व विश्व हिंदी सम्मेलन हुआ, उसमें तालियाँ कूटने के बजाय इस प्रश्न पर बहुत शिद्दत से सोचा जाना चाहिए था कि क्या हम शेष संसार के मुल्क बोस्निया, जावा, चीन, आस्ट्रिया, बल्गारिया, डेनमार्क, पुर्तगाल, जर्मनी, ग्रीक, इटली, नार्वे, स्पेन, बेल्जियम, क्रोएशिया, फिनलैंड, फ्रांस, हंग्री, नीदरलैंड, पोलैंड या स्वीडन की तरह अपनी ही मूल-भाषा में शिक्षा और ज्ञान के क्षेत्र के लिए जगह बनाने के लिए क्या कर सकते हैं? क्योंकि, बकौल सेम पित्रौदा, सिर्फ एक प्रतिशत ही हैं, जो लोग अंग्रेजी जानते हैं। या कि हमें अफ्रीकी उपमहाद्वीप बन जाने की तैयारी करना है। प्रसंगवश यहाँ एक भाषिक उपनिवेश के सिद्धांतकार का पूर्वाक्त कथन याद आ रहा है - वे कहते हैं अभी तक हमारा ध्यान अफ्रीका पर केंद्रित था, अब हम एशिया पर एकाग्र कर रहे हैं। अंत में, अफ्रीका महाद्वीप में स्वाहिली लेखक की पीड़ा को भारतीय उपमहाद्वीप की पीड़ा का पर्याय बनाना है। उसने कहा कि जब ये नहीं आए थे तो हमारे पास हमारी कृषि, हमारा खानपान, हमारी वेशभूषा, हमारा संगीत और हमारी अपनी कहे जाने वाली संस्कृति थी - इन्होंने हमें अंग्रेजी दी और हमारे पास हमारा अपने कहे जाने जैसा कुछ नहीं बचा है। हम एक त्रासद आत्महीनता के बीच जी रहे हैं।

हमारी हिंदी पत्रकारिता को सोचना चाहिए कि विदेशी धन के बलबूते पर खुद को मीडिया-मुगल बनाने के बजाय वह सोचें कि अंततः भारतीय भाषाओं को आमतौर पर और हिंदी को खासतौर पर हटाकर, वह देश को आत्महीनता के जिस मोड़ की तरफ घेरने जा रही है। वह, उस कल्चरल इकोनॉमी की सुनियोजित युक्ति है, जो एक नव-उपनिवेशवाद से जन्मी हैं। इसके साथ यह भी सोचें कि कहीं ऐसा न हो कि वे केवल प्रत्यक्ष विदेशी निवेश की आरती उतारने वाले भर रह जाएँ और देवपुरुष कोई अन्य हो जाए। बाहर की लक्ष्मी आएगी तो वह विष्णु भी अपना ही लाएगी। आपके क्षीरसागर के विष्णु सोए ही रह जाएँगे।

क्या हमारी भारतीय भाषाओं के साथ, हिंदी के ये हिंग्लिशियाते अखबार इस पर कभी सोचते है कि पाओलो फ्रेरे से लेकर पॉल गुडमेन तक सभी ने प्राथमिक शिक्षा के सर्वश्रेष्ठ माध्यम को मातृभाषा ही माना है और हम हिंदुस्तानी है कि हमारे रक्त में रची बसी भाषा को उसके मांस-मज्जा सहित उखाड़कर फेंकने का संकल्प कर चुके हैं। दरअसल, औपनिवेशक दासत्व से ठूँस-ठूँसकर भरे हमारे दिमागों ने हिंदी के बल पर पेट भर सकने की स्थिति को कभी बनने ही नहीं दिया, उल्टे धीरे-धीरे शिक्षा में निजीकरण के नाम पर शहरों में गली-गली केवल अंग्रेजी सिखाने की दुकानें खोलने के लिए लायसेंस उदारता के साथ बाँटे गए। उन्हें इस बात का कतई इल्हाम नहीं रहा कि वे समाज और राष्ट्र के भविष्य के साथ कैसा और कौन सा सलूक करने की तैयारी करने जा रहे हैं। पूँजीवादी भूमंडलीकरण से देश स्वर्ग बन जाएगा, ऐसी अवधारणाएँ रखने वाले अधकचरे ग्लोबलिस्टों की हिंदी में इतनी भरमार है कि वे एक अरब लोगों के भविष्य का मानचित्र मनमाने ढंग से बनाना चाहते हैं - और दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति यह है कि पूरा देश गूँगों की नहीं अंधों की शैली में आँख मीचकर गुड़ का स्वाद लेने में लगा हुआ है, उनकी व्याख्याओं में भाषा की चिंता एक तरह का देसीवाद है जो भूमंडलीकरण के सांस्कृतिक अनुकूलन को हजम नहीं कर पा रहा है। वे इसे मरणासन्न देसीवाद का छाती-माथा कूटना कहकर उससे अलग होने के लिए उकसाने का काम करते हैं। ताकि, अंग्रेजी के विरुद्ध कहीं कोई भाषा-आंदोलन खड़ा न हो जाए।

भारत में सूचना प्रौद्योगिकी के अवतार-पुरुष होने का जो डंका पीटा जाता है, उसके बारे में एक अमेरिकी विशेषज्ञ ने एक वाक्य की टिप्पणी में हमारी औकात का आकलन करते हुए कहा कि भारत के आई.टी. आर्टिजंस तो आभूषणों की दुकानों के बाहर गहनों को पालिश करके चमकाने वाले लोग भर हैं। माइक्रोसॉफ्ट उत्पाद बनाता है और भारतीय उसे केवल अपडेट करते हैं। यह वाक्य हमारे सूचना-सम्राट होने के गुब्बारे की क्षणभर में हवा निकाल देता है और दुर्भाग्यपूर्ण और शर्मनाक बात यह है कि हम इसी के लिए (आई.टी. आर्टिजंस) के लिए अपनी भाषाओं को मार रहे हैं। हम चमड़े के लिए जिंदा गाय मारने पर आमादा है।

यदि हमें हिंदी को आमतौर पर और तमाम अन्य भारतीय भाषाओं को खासतौर पर बचाना है, तो पहले हमको प्राथमिक-शिक्षा पर एकाग्र करना होगा और विराट-छद्म को नेस्तानबूत करना होगा, जो बार-बार ये बता रहा है कि अगर प्राथमिक शिक्षा में पहली कक्षा से ही अंग्रेजी अनिवार्य कर दी जाए, तो देश फिर से सोने की चिड़िया बन जाएगा। जहाँ तक भाषा में महारत का प्रश्न है, संसार भर में हिंदुतान के ढेरों प्रतिभाशाली वैज्ञानिक उद्योगपति और रचना लेखक रहे हैं, जिन्होंने अपनी आरंभिक शिक्षा अंग्रेजी में पूरी नहीं की। इसके साथ सबसे महत्वपूर्ण और अविलंब ध्यान देने वाली बात यह है कि प्राथमिक शिक्षा के क्षेत्र में निरंतर बढ़कर विकराल होते निजीकरण पर भी सफल नियंत्रण पाना होगा। तभी हम अपना जैसा कहे जा सकने वाला थोड़ा बहुत सुरक्षित रख पाने की स्थिति में होंगे। भारतीय भाषाओं को रोमन लिपि में बदलने का परिणाम यह होगा कि आने वाले पच्चीस वर्ष बाद हमारी हजारों सालों की भारतीय भाषाएँ, बच्चों के लिए केवल जादुई लिपियाँ होंगी। इसलिए, अगर हमें अपनी भाषाओं को बचाना है तो ऐसे सुनियोजित षड्यंत्र के खिलाफ, हर उस आदमी को उन अखबारों को व्यक्तिगत और सामूहिक रूप से पत्र लिखे जाने का निरंतर अभियान चलाया जाना चाहिए और उन्हें कहना चाहिए कि वे भाषा के खिलाफ किए जा रहे इस विराट छल को अविलंब स्थगित करें अन्यथा वे उसे पढ़ना बंद कर देंगे। भाषा भी राष्ट्र की धरोहर है और उन्हें नष्ट करने की कोशिशें राष्ट्रद्रोह से कोई छोटा अपराध नहीं है। मुझे लगता है, यही आखिर वक्त है, जब उत्सवधर्मी मानसिकता के खिलाफ आंदोलनधर्मिता के लिए हम पर्याप्त अवसर और अवकाश बनाएँ।


End Text   End Text    End Text