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कविता

अंतरंग सौंदर्य
मार्तिन हरिदत्त लछमन श्रीनिवासी


मैं नहीं सुन रहा हूँ
संतुलन के विघटन को
लेकिन, मेरे समूचेपन में
संतुलन रखने का अंतरंग सौंदर्य
तुझमें है।

 


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