डाउनलोड मुद्रण

अ+ अ-

कहानी

लाल बुरांस तो एक बहाना है
मिथिलेश प्रियदर्शी


जेएनयू के पेरियार छात्रावास के कमरा नं. 141 में बहैसियत अतिथि सुस्ताता हुआ जब मैं अपनी समूची शिमला यात्रा को 'फ्लैश बैक' में ले जाकर उसमें से जरूरी प्रसंगों को स्याहीबद्ध कर रहा था, बाहर कड़ाके की गर्मी पसरनी शुरू हो रही थी। मेरा पोर-पोर असीम दर्द में डूब-उतरा रहा था, जैसे देह को जमकर पीटा गया हो और एक बेचैन कर देने वाले ज्वर की तपिश ने मुझे चारों ओर से घेर रखा था।

शिमला और दिल्ली के मौसम के मिजाज में व्याप्त स्थायी फर्कों की वजह से मुझे ये नतीजे मिले थे। मैदानों में चलने वाली गर्म हवाओं से दूर, पहली बार पहाड़ों पर जाना, चकित होना और फिर अतिउत्साह में अथक मस्ती करना याकि पहली दफा किसी विशुद्ध गैर-एल्कोहलिक आदमी का पीने के आम मानकों की अनदेखी कर खूब सारी शराब घोंट लेना, दोनों घटनाएँ नतीजे में एक-सा गुल खिलाती हैं। शिमला के स्थानीय मित्र अनिल घामटा की हजार आगाहों के बाद भी मैंने जमकर मनमानियाँ कीं। स्वेटर और शाल से दूर रहा। बारिश हुई तो जमकर नाचा-कूदा। हरेक ऊँचाई को दौड़-दौड़ कर नापा। थकने और चूर हो जाने की परवाहों के पार जाकर पल-दर-पल मजे करता गया। रेफ्रीजरेटर की-सी कनकनी समाए पानी से रोज अल्लसुबह नहाता गया। और जब दिल्ली आकर मेरी खुमारी टूटी, ज्वर के महासमुंदर ने मुझे गहरे तक डुबो लिया था। अनायास मिले इस अवकाश और पेरियार के पड़ाव में बेहद आराम से ज्वर के बीच ही सफर की यादों के साथ हिचकोले ले रहा था। अपने अनाड़ीपने को याद कर कोसने के लिए गर्म बुदबुदाहटें और बचे-खुचे मजे की वजह से निकल रही नर्म मुस्कराहटों का सिलसिला जारी था।

'मुझ पर यकीन जताने वालों की संख्या में
बेहिसाब इजाफा हुआ है
इधर उनके यकीन को सँभालने की
मेरी काबिलियत जाती रही है'

यदि आपके पास समय हो और एक अनजान आदमी पर भरोसे की क्षमता भी, तो आप मेरी ऊँगली थाम सकते हैं, मैं आपको पीछे लिए चलता हूँ। पीछे, तकरीबन साल-सवा साल पीछे।

हम तीन थे और तब ठंड थी। कालेजों और विश्वविद्यालयों में टीचरी का काम दिला सकने वाली, दिसंबर के जाड़े में होने वाली राष्ट्रीय पात्रता परीक्षा हमें शामिल किए बगैर ही आहूत हो ली थी। पर्याप्त सूचनाओं-कागजातों और पूरे माप के पैसों से बने कीमती ड्राफ्ट साथ भेजे जाने के बावजूद हमारा आवेदन राँची से घूम-फिरकर बैरंग आ गया था। लौटे लिफाफे की पीठ पर घोषित से एक अधिक तारीख पर आवेदन पहुँचने की बात दंडनुमा तरीके से दर्ज थी। बीस-तीस फीसदी वाली अपने हिस्से की गलतियों को भूलकर, हम पूरी उतरती सर्दियाँ राँची विश्वविद्यालय में नेट का आवेदन देखने वाले कर्मियों को गालियाँ पढ़ते हुए बिता रहे थे।

इसी बीच एक शुभचिंतक ने खबर दी थी कि हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग ने राज्य पात्रता परीक्षा के लिए आवेदन माँगे हैं। बस अगले ही पल करोड़ों बेरोजगारों के बीच हरेक हफ्ते असंख्य रोजगार उपलब्ध होने का नियमित भ्रम फैलाने में जुटा रोजगार समाचार हमारे हाथों में था। खबर खरी थी, इसलिए हमें तुरंत हिमाचल प्रदेश के किसी स्थानीय मित्र की जरूरत समझ में आई। बेहद नाउम्मीदी के साथ यह बात हमने अपने मित्रों के बीच फैला दी। इनकार के दसियों जवाबों के बीच एक जवाब 'देखना पड़ेगा -पूछना पड़ेगा' के अंदाज में आया। आशा बँधी और हम अपने मित्र से 'देखो-पूछो कि क्या हो सकता है' की रट लगाने लग गए। पता पड़ा, बात न हुई, अंगद दादा की पूँछ हो गई। मित्र ने देहरादून की अपनी सखी से संपर्क साधा। सखी ने शिमला की अपनी सखी को बताया। शिमला के किसी दूर देहात में बसी उस सखी ने अपने ममेरे भाईसाहब (शिमला के अनिल घामटा जी) को परेशान कर हमारी परेशानी बताई। और इस कड़ी के आखिरी आदमी बनकर भलेमानस भाईसाहब ने उसी दिन तीन आवेदन खरीद कर हमें भेज दिए। आह, हम उछल पड़े।

शिमला किताबों के पन्नों और 70 एम.एम. की सफेदी से निकलकर दिलोदिमाग में साकार होने लगा था। आवेदन डाले जाने के वक्त से ही हमने आगामी गर्मी से राहत पा लेने के खुशनुमा मंसूबे पोसने शुरू कर दिए थे। दिन में एकाध बार जरूर हिसाब मिलाते, जनवरी, फरवरी, मार्च अप्रैल। अप्रैल और फिर बेतरह गर्मी। गर्मी और फिर शिमला। शिमला और मजा। आह-वाह, मौज, ठंडा, हा-हू-ही, बरफ, ला-ला-ला।

ओह। ओह। भगवंता मौके पर धोखा। गर्मी आई। परीक्षा आई पर दोनों दोस्त पलटी मार गए। कहने लगे, 'सेट से क्या होता है, नेट में बैठो। नेशनल परमिट मिलेगा। फिर पढ़ाने शिमला जाओ या तिलैया। कोई रोक-टोक नहीं।'

हिस्स्स। धत्त सालों की। संसार के सारे निकम्मे एक ही काम में अपना श्रेष्ठ देते हैं, कुतर्कियाने में। न जाएँ अपनी बला से। और 9 अप्रैल की दहकती दोपहरी से मैं भारतीय रेल सेवा का ग्राहक था।

'इंतजाररतों की इस दुनिया में
देख रहा हूँ सबसे ज्यादा
जरूरतमंद कौन हैं'

डिब्बे में टिकट निरीक्षक ने मेरा टिकट देखा, जो अब तक बर्थहीन था। उसने अपने कागजात मिलाए और मेरे टिकट पर आखिरी स्थिति लिख दिया। प्रतीक्षा सूची में पहला। बचपन के दिन साफ-साफ घूम आए। राशन की दुकान में चीनी के लिए लंबी कतार लगती। कतार में ठीक-ठाक स्थिति होने के बावजूद, लाख चौकन्ने रहने पर भी सारे बच्चे न जाने कैसे धीरे-धीरे पीछे कर दिए जाते। हम कतार का भ्रम पाले खड़े रहते। बारह बजते-बजते भीड़ जब थोड़ी सिमटने लगती और डेढ़-दो बजते-बजते जब मेरी बारी आती, चीनी बोरे की तली में जा लगती। राशन वाला लँगड़ा बुड्ढा इत्मीनान से खैनी मलने लगता। हम घिघियाती नजरों से ताकते हुए खड़े रहते। वह रजिस्टर बंद करता और थूक से लबालब मुँह से कहता, 'देखाई नहीं देता। जाओ। चीनी खतम।'

हम घर पर मिलने वाली डाँटों के लिए खुद को तैयार करते, खाली झोला झुलाते, पैर घिसटने लगते। दो-तीन दफे ऐसा हुआ कि मेरी बारी आते ही लँगड़ा बुड्ढा, अब वह खाने जा रहा है या पखाना के लिए घर जा रहा है या उसे बड़ा अस्पताल जाना है कहकर, दुकान बंदकर चला गया था।

बचपन में क्या, किशोरवय में भी। नए चढ़े सिनेमा की टिकट काउंटर से पाने के लिए सुबह दस बजे से ही धक्कम-पेल वाली लाइन में डटा रहता। आमतौर पर ऐसी लाइनें बाजुओं की मछलियों की जोर-आजमाइश वाली होतीं। मैं किसी तरह एक बार खिड़की के लोहे को पकड़ता तो जोंक की तरह पकड़े रहता। बारह बजने के 15 मिनट पहले खिड़की का छोटा छेद खुलता। कलाई कई जगहों से छिल जाती, उँगलियाँ मोच खा जातीं, बावजूद किसी तरह यदि मैं हाथ भीतर करने में सफल हो जाता तो भीतर से ही उसे बड़ी बेदर्दी से ठेल दिया जाता। फिर वह छोटा छेद बंद हो जाता। दो-तीन टिकटें कटती और ब्लैक का नंगा खेल शुरू हो जाता। अपनी हल्की जेबों में हाथ डाले हम गाली-गलौज करते कमरे पर लौट आते। खूब याद है मुझे कि सुबह से ही खिड़की पर डेरा डालने के बावजूद कटने वाली 2-4 टिकटों में एक भी मेरे हिस्से कभी नहीं आई।

और अब रेल की टिकट में भी एक बार फिर से मुझे इंतजार के लिए चुन लिया गया। किशोरवय से आगे निकल जाने पर भी यह सिलसिला बदस्तूर जारी है। रोजगार की टिकट पा लेने के लिए लगी लाइन में भी वेटिंग की ही स्थिति है। यह ठीक भी है, संयोग का सिलसिला यदि इसी तरह चलता रहा तो मौत की बारी आने पर दिलचस्प रोमांच होगा, यह जानने के लिए कि शायद मेरी बारी आते ही मौत का काउंटर बंद हो जाए या फिर संभव है वेटिंग में डाल दिया जाऊँ।

खैर, तब का तब। अभी तो दिल्ली पहुँच जाऊँ बस।

भैया-चाचा करके दिन तो इधर-उधर की खानाबदोशी में निकल गया। पर सफर में गहराती रात बड़ी नशेदार होती है। खाना खाते ही जबड़े अपनी आखिरी सीमा तक चौड़े होकर जमुहाइयाँ फेकने लगे। रात, नींद और रोटियों का मिश्रित नशा गजब तरीके से तारी होने लगा। अब तक लोगबाग अपनी सीटों पर पसर गए थे। बैठकर झपकियाँ लेने का विकल्प भी मारा गया था। नींद लगातार जब असहनीय होने लगी, मैंने लेटने के लिए दोनों निचली सीटों की बीच की जगह पर अखबार फैला दिया। ऊपर से अँगोछे को डालकर लेट गया। 5-7 मिनट आँखें मिटमिटाता लेटा रहा, फिर लगा यह जगह दुरुस्त नहीं है। घोड़े निलाम कर सोने के मामले में आश्वस्त नहीं हुआ जा सकता है। रात में पेशाब-पैखाने का मारा कोई भी नींद में बावला होकर लात-जूतों से मेरे नाक-मुँह को कूचल सकता है। डर से सिहरकर तुरंत मैंने अपना अखबारी बिस्तर समेटा और उसे दरवाजे के सामने की खाली जगह पर डाल दिया।

अब ठीक था।

सामने के दरवाजे से सटकर उकड़ूँ बैठे एक खेतिहर दंपति ने मुझे इस तरह लेटता जान उस खाली जगह को बड़ी हसरत भरी निगाहों से देखा, जहाँ मेरा बिस्तर बिछ चुका था। उनकी इच्छाओं को भाँपकर, दोनों शौचालयों के बीच की जगह की ओर इशारा करता हुआ मैंने कहा, 'सीट नहीं मिली न, अब पूरी रेल अपनी है। कहीं भी लुढ़क लीजिए।' और सचमुच उन्होंने चादर फैलाकर उस खाली जगह को भर दिया। अचानक मुझे जुगुप्सा की तरह कुछ हुआ कि जानूं कि उन्हें प्रतीक्षा सूची में कितने नंबर पर रखा गया है। सोचता रहा, सोचता रहा फिर पूछ बैठा। पति ने अपने अंगरक्खे की चोर पैकेट से टिकट निकाल कर मेरी ओर बढ़ा दिया। मैं चौंका। दोनों आर.ए.सी. की स्थिति पाए हुए थे। बताया तो वे कहने लगे कि टिकट देखने वाले ने कहा है कि अब कुछ नहीं हो सकता। मैंने मोबाइल निकाला और उनकी हालिया स्थिति देखी। एस आठ में इक्यावन-बावन। 'ओह। आप लोग जाइए वहाँ। आपकी सीट तो पक्की हो चुकी है।' उन्होंने एक दूसरे का मुँह देखा। दोनों असहाय जान पड़े। लगा सीट खोजना और उसे खाली करवाना उनके बस का नहीं है। मैंने कहा, 'टीटी को आने दें, उससे करवा लिया जाएगा।' वो लेट गए। और शायद आपस में बुदबुदाए भी कि अब रात में कहाँ जाया जाए।

इस बातचीत को हुए 5 मिनट गुजरे होंगे कि एक 35-40 की उम्र का बेढब तरीके से तोंदियाया आदमी शौचालय की ओर आया। वह लगभग ऊँघ रहा था और शायद स्वप्न-दोष का मरीज था, क्योंकि उसके पैंट की बाईं ओर की सामने वाली जेब के आसपास का हिस्सा बुरी तरह भीगा हुआ था। लोगों को रास्ते में इस तरह लेटा देख वह नीम नींद में ही बडबड़ाता हुआ गालियाँ देने लगा। हम उसे कुछ बोलते तब तक वह शौचालय में घुस चुका था। थोड़ी देर बाद बाहर आया तो सँभल कर चलने की बजाय बेफिक्री में औरत के पैरों की उँगलियों को हल्के से कुचलता हुआ निकलने लगा। औरत ने एक साथ चौंकते और कराहते हुए कहा, 'आंधडा झाला का... दिसत नाहीं का...?'

'ऐसे सोओगी, तो ये सब होगा ही।' उसने उल्टे डाँटते हुए कहा। खेतिहर दंपति को देखकर उनके सामने उसका अभिजात्यपन नई ठाँठे मारने लगा था। भागती गाड़ी की आवाज में वह और भी कुछ बके जा रहा था।

मुझे भरपूर गुस्सा आ चुका था। मैंने उसे ललकारने के भाव में जवाब दिया, 'ऐसा है कि अभी इस गाड़ी में आपमें और हममें कोई फर्क नहीं है। हम सबने एक-सा टिकट लिया है। और जाना हमलोगों को भी है।'

वह मेरे बोलने के बीच में ही कूदा, 'टिकट लेने भर से क्या होगा। पहले और बाद में लेने का कोई मतलब होता है कि नहीं? मैंने 17 दिन पहले लिया था। बर्थ पक्की नहीं हुई तो बैल-भैस की तरह नहीं चढ़ना चाहिए लोगों को।' और वह बाहर के नल से मुँह में पानी भरकर जोर-जोर से कुल्ला करने लगा, जिसकी छींटे हम तक आ रही थी। उठकर बैठते हुए और आवाज की ऊँचाई बढ़ाते हुए मैंने कहा, 'सुनिए, जिस समय आप टिकट लेने में मशगूल थे, हम देश का सकल घरेलू उत्पाद बढ़ाने में लगे हुए थे। समझे क्या? और अभी हम कोई आपकी लिखाई हुई जगह पर नहीं जमे हुए हैं।'

उसने मुझे सुना और नहीं भी। मुँह में पानी भरे-भरे सिर धुनता हुआ न जाने वह क्या गों-गाँ करता रहा और फिर चला गया। मैंने देखा, नींद उसकी आँखों और दिमाग से चू चुकी थी।

इस वाकए से उबरते ही नींद ने रेल की रफ्तार पकड़ी और मैं दिन-दुनिया के पार चला गया।

नींद के साथ अभी बहुत दूर तक जाना नहीं हो पाया था कि शौचालय के आसपास से उठ रहे शोर की वजह से आँखें मिचमिचाती हुई खुल गईं। पुलिस थी। खाकी वर्दी और उस पर लगे इक्के-दुक्के सितारों और कमर से लटक रही रिवाल्वर वाली। बात-बात में बेशुमार गालियों की जुगाली करने वाली। वे बदहवासों की तरह नीचे सोए-बैठे सभी लोगों को अपने सरकारी जूतों से ठोकरें मार रहे थे। उन्हें जगा रहे थे और उनका टिकट माँग रहे थे। जिनके पास टिकट नहीं थी या सामान्य डब्बे की थी, और जो इस एकबएक हुई कार्रवाई से डरकर मटमैले पड़ रहे थे, उनमें से दो-तीन अपेक्षाकृत ज्यादा कमजोर, गरीब और निरीह से दिखने वाले लोग इन पुलिसियों से माँ-बहनों की गालियों के अलावे एक-दो तमाचे भी खा चुके थे। एक डर भरी अफरा-तफरी मच गई थी। पुलिस वाले उन पर चिल्ला रहे थे कि भाग जाओ या फिर कूद जाओ। नहीं तो रेले जाओगे। और आइंदा इन रिजर्वेशन वाले डिब्बों की ओर ताकना भी मत।

रात और रेल अपनी-अपनी रफ्तार में थी। मैं उठकर बैठ गया। मुझसे अब तक टिकट नहीं माँगा गया था। सँभलकर याद करूँ तो उस सिपाही का नाम संतोष जैसा कुछ था, जो उसके सीने पर लटके 'नेमप्लेट' पर गौर करने पर मैंने जाना था। वह सबसे ज्यादा जोश में दिख रहा था। और सबसे ज्यादा सक्रिय था। उसने शौचालय का दरवाजा भिड़ा हुआ देखा तो उस पर ताबड़तोड़ लातें मारने लगा। लगा जैसे तोड़ ही डालेगा। वह भीतर वाले को गालियाँ बक रहा था कि कौन है और जो भी है, तुरंत बाहर निकल आए।

ज्यादा शोर-शराबा बरपने से आरक्षित सीटों पर सोए पड़े लोग भी जागने लगे थे और तमाशबीन बन रहे थे। एक युवक जो लंबा-तगड़ा था और उसकी दाहिनी कलाई पर किसी पूजा के बाद के लाल धागे चौडाई में बँधे थे, वह शुरू से ही पुलिसियों को चुगलीनुमा भाव में बताने में जुटा था कि कैसे कोई भी ऐरा-गैरा इन आरक्षित बोगियों में मुँह उठाए घुसा चला आता है। वह किसी जासूस की मानिंद बता रहा था कि सीट से अधिक घुसे यही लोग तमाम अपराधों को अंजाम देते हैं। बंद दरवाजे पर मुक्का मारने में उस सिपाही की तरफ से यह युवक भी शामिल था।

कि एकदम आहिस्ते-आहिस्ते शौचालय का दरवाजा खुल गया। हाथ में केतलीनुमा लोटा लिए एक मुस्लिम युवक सौ फीसदी डरा हुआ खड़ा था। बिल्कुल सिमटी सी मूँछ के साथ आधे बित्ते की दाढ़ी, सिर पर सफेद टोपी और लुंगी-कुर्ता।

'क्या कर रहा था बे अंदर, और उधर क्या छिपा रहा था?' भरपूर रोब, अडिग सख्ती और जालिमाना कड़क के साथ एक रिवाल्वरधारी ने सवाल दागा।

'लैट्रिंग... ये... ये...।' वह डर से डोलता हुआ जवाब के दो शब्द भर उच्चार पाया। उसने लोटा आगे की ओर झुला दिया था।

'दरवाजा खोलने में देर क्यों हो रही थी? हग रहा था कि कुछ और कर रहा था?'

'लैट्रिंग...'। और इस बार भी वह इससे अधिक कुछ नही बोल पाया। उस रिवाल्वरधारी ने युवक को परे धकेलता हुआ बाहर से ही शौचालय में झाँकने लगा। अपनी नाक पर हाथ रखकर उसने थूका और कहा, 'साला'।

लंबा-तगड़ा युवक पास खड़ा मुस्करा रहा था। शायद उसे इस मजमे में खूब मजा आ रहा था। वह एक अन्य सिपाही के नजदीक आकर उसके कान में कुछ फुसफुसाया, जिसे सुनकर सिपाही तुरंत जोर से बोल पड़ा, 'साला अभी मेरे को समझ में आया। अंदर हगना और सिगरेट दोनों चल रहा था। गंध तो आ रही है?'

'नहीं, नहीं, ये लोग नहीं पी रहे। नागपुर से जब से ट्रेन चली है, एक नेता या सेठ टाइप का आदमी बार-बार यहाँ सिगरेट पीकर जा रहा है। ये तो चेन्नई से चढ़े हैं। और ये हिंदी नहीं जानते।'

मेरे मुँह से जवाब की शक्ल में यह बात अनायास निकल पड़ी थी। और इसी के साथ सारे के सारे पुलिसिए अचानक से मेरी ओर घूम गए। कड़क आवाज निकालने वाले पहले रिवाल्वरधारी ने फड़कती आवाज में पूछा, 'ए-ए, तुम पहले अपना टिकट दिखाओ, तब बात करना।'

मैं अपनी जेबें तलाशने लगा तो वे मरखंड बैलों की तरह मेरे नजदीक आने लगे। मैंने अपना टिकट उनकी ओर बढ़ा दिया। टिकट गौर से देखने के बाद गहरे हुंकार के साथ फिर वही फड़कती आवाज, 'कहाँ से चढ़े हो?'

'सेवाग्राम से।'

'सेवाग्राम कहाँ, गुजरात में?'

'नहीं महाराष्ट्र में।'

'जाना कहाँ है?'

'दिल्ली।'

'दिल्ली में कहाँ?'

'दिल्ली से सीधे शिमला।'

'शिमला क्या करने?'

'परीक्षा देने सेट की।'

'हूँ। हूँ।'

फिर टिकट मुझे लौटा दिया गया। शौचालय के दरवाजे पर खड़ा मुस्लिम युवक अब तक जा चुका था। क्योंकि उसके सगे-संबंधी इकट्ठे हो गए थे। लंबा-तगड़ा साँड़ की तरह दिख रहा युवक अब भी मुस्करा रहा था। वह लगातार कहे जा रहा था कि न जाने कहाँ से इस बोगी में केवल मियाँ लोग भर गए हैं। उसने जाते हुए मुझे घूरा भी था। (कोई बात नहीं, कभी मेरे घर तरफ मिल जाए।)

पुलिस वाले आगे की बोगी की ओर रुख कर रहे थे। जाते-जाते एक दूसरे सिपाही ने अपनी नाक दबाकर उस शौचालय में फिर से झाँका और आसानी से सुनी जा सकने वाली आवाज में कहा, 'स्साला कौन ठिकाना है, कहाँ बम फिट कर दें। कोई भरोसा है इनका।'

सब कुछ शांत हुआ तो मैंने देखा, मेरे आसपास फर्श पर कोई सोने-बैठने वाला नहीं था। वह खेतिहर दंपति भी नहीं। घड़ी में दो बजे के बाद का वक्त भागा जा रहा था। दिल्ली दूर नहीं थी पर अभी-अभी गुजरा हाहाकारी वाकया नींद से बिल्कुल चिपट सा गया था। अलग ही नहीं हो रहा था। और मैं धड़धड़ाती रेल में किसी उल्लू की भाँति आँखें चिहारे देखे जा रहा था।

कब झपकी लगी, और कब बारी-बारी से एक-एक कर सपने में रिवाल्वरधारी, डर से मटमैला हुआ मुस्लिम युवक और कलाई पर लाल धागे बांधे वह साँड़ आए-गए, इल्म ही नहीं हुआ। बुरी रात बीत गई और मैं दिल्ली पहुँच गया।

'नाहक में दिखाई हड़बड़ी
और जी ली जिंदगी
जैसे निपटाया कोई बोझिल अध्याय
छाँव देखकर एकबारगी सुस्ताना ठीक होता'

वह एक अनजान सुबह थी। रेलों के 'अस्तबल' के भीतर की सुबह। बिल्कुल अपरिचित। उस सुबह में सूरज कहीं नहीं था। थी तो बस रेलें, भीड़, कोलाहल और बदबू। ओह, मैं एक दूसरी जगह की सुबह में आश्चर्यजनक तरीके से मौजूद था। सचमुच ये रेलें जादू हैं। एकदम ताज्जुबअंगेज। इसके साथ एक बड़ी भीड़ हमेशा गतिमान होती है। ये जहाँ रुकती है, भीड़ पैदा हो जाती है। दानवीय शक्ति का हू-ब-हू पर्याय रेल।

गंतव्य शेष था और चंडीगढ जाने के लिए रेल तीन घंटे बाद थी। यानी एक सिनेमा देख लेने भर से ज्यादा की फुरसत। पर यहाँ सिनेमा कहाँ, ठलुवाँ होने और इंतजार करने के सिवाय। खैर, मेरे पास इंतजार के असरों को काटने के लिए एक शर्तिया नुस्खा है। बिना हींग-फिटकरी वाला जिसमें मैं आँख मूँदकर शरीर के हर तंतुओं पर से अपना नियंत्रण वापस ले लेता हूँ। फिर मन में तितली पैदा करता हूँ और अनूठी बेतरतीबियों के सहारे किसी भी सोच के साथ निःसंकोच उड़ जाता हूँ। उड़ता जाता हूँ और मनमाफिक हवाई मटरगश्तियाँ करता हूँ। यकीनन इसे कोई भी सफलतापूर्वक आजमा सकता है। तितली हुआ जा सकता है और भरपेट संतोष बटोरा जा सकता है। बस ध्यान रहे उड़ते-उड़ते नींद के बाड़े में न घुस जाएँ।

मैंने इसे विश्वसनीय विशेषज्ञता के साथ साध लिया है। बस जहाँ होता हूँ, ढीली पलकों के साथ आँखें मूँदकर अँधेरे का परिवेश रचता हूँ। उस स्याह अँधेरे के पार एक जिंदा जिंदगी अपने में कई झलकियों को समेटे प्रदीप्त होती दिखाई पड़ती है। वह मेरा अपना और अपनी मर्जी का संसार होता है। उसमें केवल मैं और मेरे अभीष्ट होते हैं। प्रेमिका दिख पड़ती है तो उसे आवाज देता हूँ। वह आती है, कुछ भी चटपटा लेकर। आम के कुचाले, पकौड़ियाँ और इमली की चटनी, चनाचूर, झालमुढ़ी, खीरा-मशाला, भूने भुट्टे, आमलेट या ऐसे ही कुछ और। हम खाते हैं, बतियाते हैं, गलबहियाँ करते हैं। मैं उसे गुदगुदाता हूँ और उसकी हँसी अँजुरियों में भरकर गुल्लकों में सँजोता जाता हूँ, ताकि गाढ़े वक्तों में काम आएँ। खूब सारा समय सरक जाता है और भान भी नहीं होता।

प्रेमिका विदा लेती है तो निपट अँधेरे से नर्गिस की हँसी दिखने लगती है। पहले वह मुझे गौर से तकती है, फिर आहिस्ता मुस्कराती है और फिर तो हँसती जाती है, हँसती जाती है। मैं उछाह में दौड़ता हूँ। कंठ की गहराइयों से एक तान निकालता हूँ। खूब ऊँची। खूब गुंजायमान। घर, गलियाँ, नुक्कड, खेत, खलिहान। 'अरे, नर्गिस आई रे $$$$...।' जमावड़ा ही लग जाता है। राजकपूर आ जाते हैं, गुरुदत्त आ जाते हैं, जानी वाकर आ जाते हैं, मुकेश आ जाते हैं। संगीत ही संगीत बरसने लगता है, प्रेम ही प्रेम छा जाता है, हँसी ही हँसी मच जाती है, दुख ही दुख फैल जाता है। आँसू ही आँसू भर जाते हैं। मैं और लंबू विजय राज पेट पकड़े हँसे जाते हैं और हँसी चुकने पर वे रग्घू रोमियो बन जाते हैं और जार-जार हो रोने लगते हैं। मैं उकड़ूँ बैठ उनके आँसुओं के सफेदपन को लगातार देखता जाता हूँ। धीरे-धीरे सिनेमा गाढ़े अँधेरे के साथ कृष्ण विवर में बदल जाता है और मैं उसमें गायब हो जाता हूँ।

सिनेमाई कृष्ण विवर से बाहर निकलने के लिए अपनी बूढ़ी माँ को आवाज लगानी पड़ती है। कब की रोशनी खो देने वाली उनकी नजरें मुझे अँधेरे में भी तलाश लेती हैं और उमड़कर प्यार करती हैं। वे सत्तासी साल पुरानी अपनी जर्जर हथेलियाँ मेरी ओर बढ़ाती हैं। उन्हें थाम मैं बाहर आ जाता हूँ। और उनसे समय पूछता हूँ। वे आसमान देखती हैं। धूप देखती हैं। छायाएँ देखती हैं। और फिर गहरे यकीन से कहती हैं, समय अब भी शेष है बच्चे। मैं उनके सफेद बालों को प्यार करता हूँ, उनकी बुजुर्ग हथेलियाँ चूमता हूँ और एक आसमानी घोड़े पर बैठ 'टब्बक-टुब्बक' तुरंत विदा लेता हूँ।

खुद को ज्यादा तरोताजा और आवारा पाकर एक दफा दुश्मनों के मोहल्ले से हो लेता हूँ। दुश्मनी में बुरी तरह लिथड़े उन वाकयों को दुहराता हूँ, ताकि नफरतें जिंदा रहें। समय पर किसी को शिकायत का मौका दिए बिना अपनी भर ताकत से दुश्मनियाँ निभा सकूँ, इसके लिए नई-नई साजिशें सोचता हूँ। लड़ाई में कौन-कौन मरने-जीने की परवाह किए बगैर मेरे साथ आ सकते हैं, उन्हें याद करता हूँ। उनका आह्वान करता हूँ। हम मिलकर शपथें लेते हैं। हम इतने जोश में होते हैं कि निजी दुश्मनियों को उनके परिणाम तक पहुँचाकर सार्वजनिक दुश्मनों की ओर रुख करने की हिम्मत कर लेते हैं। अपनी हालत के लिए जिम्मेदार देश के नेताओं, अफसरशाहों, पुलिसों और भ्रष्टाचारियों को चुन-चुनकर और गिन-गिन कर पदाते हैं। अधमरा करते हैं और फिर गोबर सुँघाकर जिंदा करते हैं। फिर अधमरा करते हैं और फिर गोबर सुँघाते हैं। गालियों के इस्तेमाल की जरूरत पडने पर हम पहले से तैयार की गई रचनात्मक गालियाँ बकते हैं जो इनकी माँ-बहनों से जुडी हुई तो कतई नहीं होती हैं। हम उन्हें दिल्ली की सबसे बड़ी प्रयोगशाला से चुराकर लाई हुई लाफिंग गैस सुँघाते हैं। उन्हें बेहद चुटकुले सुनाते हैं। बेहद गुदगुदी लगाते हैं। बेहद हँसाते हुए उनसे उनके कुकर्मों की स्वीकोरोक्ति लेते हैं। वे हँसते जाते हैं, हँसते जाते हैं और हँस-हँस कर बेहोश हो जाते हैं। और तब सारे पीड़ितों की ओर से हमें अभूतपूर्व सुकूनदायी मजा आता है। हा-हा-हा-हा। नीममौत भोग रहे भगंदर वाले कटखने कुत्ते, रेल पटरियों का पखाना खाने वाले, सुस्ती से रेंगने वाले लद्धड़, घिनौने मोटे चूहे। और इस तरह दर्जनों रचनात्मक गालियाँ देते हुए अंत में हम उन चुटकुलों पर खूब लोट-लोट कर हँसते हैं, जिन्हें सुनाते हुए हमें शुरू में रत्ती भर भी हँसी नहीं आई थी।

दुश्मनों को जबर्दस्त पदाने के बाद भी समय बच गया तो मैं बंसी लेकर मुक्तिबोध और नागार्जुन के लिए चतरा के फाँसी तालाब से छोटी-ताजी ललछ्हूँ रेहू मछलियाँ बझाने निकल पड़ता हूँ। लौटने पर वे चटाई पर बैठकर हौले-हौले अपनी कविताएँ सुनाना शुरू करते हैं। मैं जोश और रौ में चिल्लाने लगता हूँ, बाबाओं मुझे कविता से सचमुच बहुत प्यार है। सचमुच बहुत। स्टोव की कर्कश आवाज के बीच मैं कविताओं से निकलते संगीत में रमा हुआ सरसो तेल में तवे पर धीमी आँच में मछलियों को भूरा होने तक भूनता जाता हूँ। लाल-भूरी गरम तीखी मछलियाँ तवे से सीधे उनके प्लेट में जाती हैं और वे उन्हें कुरकुराते हुए ठहर-ठहर कर अपनी कविताएँ सुनाना जारी रखते हैं। खालिस कविताएँ ही नहीं, हँसी ठट्ठे भी। भूनी जाती हुई मशालेदार मछलियों के तेज गंध और कविताओं की ऊँची लयबद्ध राग से मोहल्ले वाले कई-कई बहानों से जुटने लगते हैं। आँगन भर जाता है, महफिल खिंच जाती है।

इतनी व्यस्तताओं के बाद भी मुट्ठी में यदि वक्त रह गया तो नानीघर जाने की बात सोचता हूँ। सोचता क्या हूँ, चला ही जाता हूँ। मेरा नानीघर शहर कहे जाने वाले किसी भी जगह से बहुत दूर है। बियाबान में। भारत का प्रधानमंत्री कहलाने वाले आदमी और उनके नुमाइंदों की जानकारी से बहुत दूर। एक बड़ा गाँव है। नाम का उल्लेख अनावश्यक है, क्योंकि नानीघर वालों की ओर से ऐसा करने की मनाही है, क्योंकि तब नाम पूछते-पूछते सिपाही, शहर, उसके धनिक गुंडे और बुराइयाँ खरामा-खरामा राह की टोह लेकर गाँव की सीमा लाँघ जाएँगे और सब खातिमा हो जाएगा। दुनिया का कोई खालिक हमारे जंगलों-पहाड़ों को नहीं सहेज पाएगा और न ही गाँव को शहर या कस्बे में तब्दील होने से बचा पाएगा।

हाँ, आपको यह मानने के लिए मजबूर होना पड़ेगा कि वह एक जादुई संसार है और उसका बचा रहना बेहद जरूरी है, क्योंकि वहाँ अद्भुत रंग हैं, अथाह मस्तियाँ हैं, इतनी कि हिलोरते-हिलोरते आदमी की उम्र चुक जाए।

गर्दो-गुबार से बेहाल हुआ मैं खेतों-बागीचों में उन मस्तियों को पीने निकल पड़ता हूँ। जंगलों से घिरे इस गाँव का रंग कच-कच हरा है। मैं अपनी आँखों से उस हरियाली को पीता हूँ, आँखों का रंग हरा हो जाता है। वहाँ पत्तियाँ और फूल सुगंधित हवाएँ तैयार करती हैं। मैं जोर-जोर से साँसें लेता हूँ और ताजी हवाओं को भीतर भरता जाता हूँ, जुगालीबाज ऊँट, भैंस और बकरियों के मानिंद, कि बाद में आराम से ठहरकर हवाओं को पगुरा सकूँ।

सचमुच पकड़ लेने के लिए नहीं, बस यूँ ही जोश में बावला होकर खरहों के पीछे भागता हूँ। उनकी आँखें, चपल छलाँगें और मासूमियत दिल के कोने में समा जाती है।

आम और जामुन के पेड़ों पर कूकते कोयलों को चिढ़ाता हूँ। वे बौड़मों की तरह कूकती जाती हैं, होड़ लेती हैं और उनका गला छील जाता है।

उमगते फसलों के आजू-बाजू गड्ढों में जमे पानी में से खूब थक-थक कर केकड़े पकड़ता हूँ कि मामी को खुश कर दूँगा। वो तनिक ज्यादा मिर्च और लहसुन डालकर मजेदार झोल तैयार करेगी। झोल-भात। यमयम।

पेट में हरारत होती है तो सब्जियों की क्यारियों से गाजर-मूली, हरे मटर और खूब इठला कर पके टमाटर तोडता हूँ। कुएँ के ठंडे पानी से उनकी मिट्टियाँ धोता हूँ और इत्मीनान से खाता हूँ। नसों में आहिस्ता-आहिस्ता खनिज-लवण और विटामिन तैरने लगता है। मैं अदम्य ऊर्जा से भरने लगता हूँ। जोश में मैं अपने दुश्मनों को एक बार फिर ललकारता हूँ। ठीक कह रहा हूँ, मैं बौराने सा हो आता हूँ।

मैं मकई के खेतों में बने ऊँचे मचान पर चढ़ जाता हूँ। पुराने रेडियो में नई बैटरी डाल तेज आवाज में विविध भारती के गाने सुनता हूँ और बेसुरा कोरस करता हूँ। सियारों को भगाने के लिए मौज मे आ गानों की धुन पर नाचता हुआ जोर-जोर से टीन का डिब्बा पीटता हूँ। खेत के सारे तोते और कौवे हैरान हो उड़ जाते हैं।

अब इतने पर भी फाजिल समय कायम रह सकता है भला। इन बंद पन्नों में क्या-क्या बताऊँ कि क्या-क्या किया जा सकता है और कहाँ-कहाँ उड़ा जा सकता है। उडने के लिए तो इतनी अनगिन उड़ानें भरी जा सकती हैं कि सचमुच सुबह से शाम हो जाए या शाम से सुबह। सारा आकाश अपना है। पर तितली की कतई एक सीमा है। उसके पंख उड़ते-उड़ते थक जा सकते है। उसे भूख लग सकती है। वह नींद में जा सकती है। और तब यकीनन कुछ नहीं किया जा सकता।

और एकदम अक्षरशः, मैंने रेलों के अस्तबल में भीड़ से दबी एक बेंच पर बैठे और दुनिया की नजरों में सोए हुए, अपने इंतजार के फाजिल वक्तों को मौजी अंदाज में जी लिया। कुछ यूँ कि अँगूठे और तर्जनी के मेल से आवाजें निकली और क्षणांश में गायब हो गई।

भगदड़ मची तो देखा चंडीगढ़ जाने के लिए एक नीली रेल तैयार है और एक बड़ी भीड़ उसमें पैवस्त होने के लिए लगभग झपट ही पड़ी है। जेब में कैद हरियाली को हाथ से कसकर दबाए हुए मैंने खुद को उस भीड़ के हवाले कर दिया। तीन-चार मिनटों के विश्वसनीय दबावों को झेलने के बाद मैं अपनी हरियाली सहित सुरक्षित भीतर था। शायद बहुत सारे लोग चंडीगढ़ जा रहे थे। शायद उस शहर में बहुत सारे लोग रहते हों। और यह भी हो कि इसमें से कोई न कोई या कई शिमला तक जा रहे हों और मजा तो तब आ जाए, जब इसमें से कोई न कोई या कई मेरे साथ परीक्षा केंद्र तक जाने वाले निकल जाएँ। हालाँकि मुझे यह चंडीगढ में बहुत कम बचे लोगों के साथ रेल से उतरते हुए और आश्चर्य में पड़ते होते हुए मालूम होना था कि दिल्ली में चढ़ी भीड़ का एक बड़ा हिस्सा बीच में फैले दर्जनों छोटे-बड़े स्टेशनों पर छितर गई।

रेल को हरी रोशनी दिखा दी गई थी और उसमें हरकत होने लगी थी। उम्मीद के मुताबिक इस बार भी मुझे बर्थ के लिए इंतजाररतों की सूची में शामिल होना था। लेकिन तब तक एक खाली सीट देखकर मैंने खिड़की के पास बैठे आदमी से पूछा, 'जी बैठ सकता हूँ क्या?' आह, वो तो एक जिंदादिल इनसानपसंद निकला। चेहरे पर कायम स्थायी किस्म की मक्खनी हँसी, जलेबिया रंग की टी-शर्ट और घी के रंग की पतलून में कम लंबाई वाला कद जो बैठे होने की दशा में और भी कम लग रहा था और उसकी उम्र मुझसे कतई बहुत बढ़कर नहीं होने वाली थी। उसने कुछ कहा नहीं, बस अपेक्षाकृत ज्यादा मात्रा में हँसा और मुझे समान के साथ लगभग लपक सा लिया। बगल में बिठाया और लगभग हँसते हुए ही तुरंत परिचयों की अदला-बदली में लग गया। वो हँसता जा रहा था और बोलता जा रहा था और मैं औपचारिक और जवाबी मुस्कान देते हुए उसकी शक्ल जेहन में पैठ चुके एक गुमशुदगी वाले इश्तहार से मिलाने की बेकार कोशिश में लगा हुआ था। बात का सिरा पकड़कर शुरू करने और उसे उलझाने और फिर खुद ही निपटा देने में गजब की महारत हासिल थी उसे। बातचीत को आगे बढ़ाने के लिए सामने वाले की फीडबैक की उसे कोई जरूरत ही महसूस नहीं हो रही थी।

उसको बोलते हुए तकरीबन दस मिनट गुजर गए थे और रेल तकरीबन पाँच मिनट चल चुकी थी। इस बीच हमारे अगल-बगल एक-दो और लोग भी जम गए थे। पर सच तो यह है कि मेरा ध्यान अब तक सीट की अनिश्चितता में ही उलझा हुआ था और मैं सहज रुप से बातचीत में भागीदार नहीं बन पा रहा था। बोलना जारी रखते हुए ही उसने मुँह में एक पेठा डाल लिया। गों-गों,गों-गों। और फिर डब्बा मेरी ओर भी बढ़ा दिया। मैंने उसे देखा, फिर उसके डिब्बे को। जान सकते में आ गई। चेतना में एक ही शब्द गूँजा, जहरखुरानी। मेरा सिर अनियंत्रित रुप से न-न करता हुआ हिलने लगा और चेहरे पर जाहिर हो जाने वाली डरी हँसी फैल गई।

बिलासपुर जंक्शन के रिटायरिंग रूम में चिपका चेतावनी वाला पंफलेट कौमा और पूर्णविरामों सहित घुम गया कि सावधान, जहरखुरानों की टोली के लोग बहुत बातूनी हो सकते हैं, वे भरोसा हासिल करने के लिए आपके गंतव्य को ही अपना भी गंतव्य बता सकते हैं, वे साधु, हकीम, वकील किसी के भेष में हो सकते हैं, वो महिला भी हो सकती है और उसके गोद में बच्चा भी हो सकता है, ये टोली खैनी, सिगरेट, केला, बिस्किट, प्रसाद कुछ में भी बेहोशी की दवा या जहर मिला सकती है। अपनी असंयत नजरों को उसकी ओर फिराए बगैर ही मैं कहने लगा, 'पेठा... उहूँ... उहूँ... कभी नहीं। एक बार जो खाया था कि ऐसी खाँसी हुई कि सबने कह दिया कि बस टीबी हो गई। टीबी। सोचने वाली बात है। तब से नानी मरे जो पेठा निगलूँ।' इस करारी झूठ के सहारे मैंने अपना पिंड वापस पाया।

अब और बात आगे न जाने पाए, यह निश्चय कर मैंने अपने बैग से 'एक महान प्रेम' निकाला और उसमें डूबने की कोशिश करने लगा। घटनाओं-दुर्घटनाओं को पीछे छोड़ने और कहानी के साथ गति पकड़ने में मुझे आधे घंटे से उपर लग गए। रेल सरपट्टा मारे जा रही थी और मेरी बेख्याली का आलम ये था कि बगल में बैठा वह जिंदादिल मनोमस्तिष्क से हवा हो गया था। कौन कहाँ बैठ रहा है, कहाँ से उठ रहा है, अलेक्जेंडर कोलंताई ने मुझे इस बेवजह की फिक्र से लगभग उबार लिया था।

'कौन किताब है?' ठीक सामने बैठे प्रौढ़ ने पूछा। इस प्रश्न में कहीं से भी कुछ जानने-समझने या उत्सुकता वाला भाव नहीं था। लग रहा था यह सवाल सिर्फ मुझे टोकने के लिए या फिर अपनी उपस्थिति जाहिर करने के लिए पूछा गया है। या शायद मेरी तल्लीनता में उन्हें दिखावे का भान हुआ हो और वे परेशान होकर यह पूछ बैठे हों। चेहरे और कपड़ों की व्यवस्थित भंगिमा देखकर लग रहा था, कोई उच्च सरकारी मुलाजिम होंगे या फिर ठीक-ठाक पढ़ा-लिखा कोई घुटा व्यवसायी।

'लाल किताब इसी को कहते हैं क्या?' मेरे जवाब सुने बिना उसी लहजे में उन्होंने अपना दूसरा सवाल कर दिया था।

मैंने गौर किया संवाद प्रकाशन से आई इस किताब की जिल्द पूरी तौर पर लाल थी। दूसरे सवाल के अहमकपने से मैं एकदम से चिढ़ गया। किताब में सिर गड़ाए हुए ही सपाट आवाज में कहा, 'मुझे नहीं जानकारी है।' यह बात मैंने कुछ इस अंदाज में कहा कि उस अहमक को यह इल्म हो जाए कि मुझे यह अनचाहा व्यवधान कतई नागवार लगा है। पर वह एक सचमुच का बदतमीज प्रौढ़ था। उसे मेरे तल्ख अंदाजे-बयाँ से कोई फर्क नहीं पड़ा और उसने अगला सवाल उछाल दिया। ठीक पहले सवाल के अंदाज में। 'वैसे क्या है इस किताब में?'

इस बार मैंने अपनी चिढ़ को जाहिर हो जाने दिया और ठेठपन पर उतर कर बोला, 'लभ स्टोरी है, एक लड़का-लड़की की।'

'हाँ-हाँ।' वह सहमति में सिर ऊपर-नीचे कर रहा था। और मैं वापस किताब में आने की जद्दोजहद में लग गया था।

मैं शर्तिया अहमकों के बीच में था।

वह सज्जननुमा दिखता बदतमीज प्रौढ़ अब खिड़की के पार दिख रहे फसलों पर बातचीत कर था। बाकी के लोग उससे प्रभावित होते हुए उसकी हाँ में हाँ मिला रहे थे। मैंने देखा, खिड़की से चिपका वह जिंदादिल भी इसी काम में मुस्कराता हुआ लगा हुआ था। उनका शोर बढ़ रहा था और मेरा कहानी में वापस लौटना मुश्किल होता जा रहा था।

बतकही सुनने वालों में एक युवा सरदार, जिसका पहनावा ऐसा था, जैसे किसी कपड़े के शोरूम से सीधे चला आ रहा हो, एक वरिष्ठ पेंशनयाफ्ता टाइप बुजुर्ग और तीन किसी राष्ट्रीय बैंक के कर्मचारी, जिन्होंने अपना परिचय पहले ही सज्जननुमा बदतमीज को बड़े ठाठ भाव में सुना दिया था। और इन सबके बीच सदाबहार अंदाज में किसी भी बात पर खींसे निपोरते हुए वो जिंदादिल तो जिंदाबाद था ही।

बच गया मैं जो कभी किताब में देखता कभी खिड़की के पार।

वो कह रहा था, 'ये जो खेतों में मजदूर दिख रहे हैं, सब के सब बिहार से आए हुए हैं। वहाँ इतनी भयानक बेरोजगारी है कि खाना मिलना मुश्किल है। नक्सलवाद के डर से लोग भाग कर इधर आ रहे हैं। पिछले कई सालों से बिहार को खाना खिलाने का काम दिल्ली, पंजाब, हरियाणा को करना पड रहा है।' समवेत स्वर से सब हामी भर रहे थे। बैंक का एक कर्मचारी कहने लगा, 'साहब, दुनिया में सबसे ज्यादा बैंक बिहार में लूटा जाता है। नक्सलवादियों के पास पैसा कहाँ से आता है? बैंक लूटकर।' थोड़ा ठहरकर फिर उसने जोड़ा, 'वहाँ नौ बजे रात के बाद से ही मारकाट शुरू हो जाता है और सबेरा होने के पहले तक चलता रहता है। और वहाँ इतने रेपिस्ट हैं कि दुनिया में महिलाएँ सबसे ज्यादा असुरक्षित वहीं हैं।' सब कान गड़ाए सुन रहे थे। इसी बीच उस अहमक ने मुझसे सीधे पूछ लिया, 'आप कहो जी कुछ, आपका घर तो उधर ही लगता है?' किताब में नजरें टिकाए हुए मैं उनकी बकवाद पिछले बीस मिनट से सुन रहा था। इस तरह अचानक सीधे-सीधे पूछे जाने पर मेरा दिमाग भन्ना गया। बावजूद संयत होकर मैंने कहा, 'जी, मैं झारखंड से हूँ। पर आपके पास की इन सूचनाओं का स्रोत क्या है?' मेरी बात अधूरी रह जानी थी, क्योंकि मुझे बोलता जान सब बीच में ही बोलने को आतुर गए थे।

'हाँ-हाँ, बिहार और झारखंड कोई अलग थोड़े ही है। सब एक हैं। वहाँ के आदिवासी तो और मजेदार चीज हैं। मैं बता रहा हूँ कि एक मेरे पड़ोसी का बेटा झारखंड में ही है। किसी स्कूल में टीचर है। उसका जब ट्रांसफर एक गाँव के स्कूल में हुआ तो उसने पहले दिन लड़कों से पूछा कि पहले जो टीचर आए थे वो कैसे थे तो आदिवासी लड़के बोले, 'स्वादिष्ट थे।' 'हाहाहाहा...।' वह ठठाने लगा और बाकी भी अपनी-अपनी साइज की हँसी लेने लगे। वह फिर चालू हो गया, 'रोना देखो कि झारखंड में मुख्यमंत्री भी आदिवासी ही बन रहा है। अब सोचने की बात है कि ऐसे में क्या डेवलप करेगा कोई स्टेट? मधु कोड़ा तो बड़ा डकैत निकला। यही होगा, जब भूखे-नंगों को पावर मिलेगा। मैं तो साफ-साफ कहता हूँ, पावर उसके पास जाना चाहिए जिसके पास पहले से ही अनलिमिटेड रुपया-पैसा और प्रोपर्टी हो। ऐसा आदमी थोड़ा कम चोरी करता है। सोचने कि बात है, वो क्या लेगा, उसके पास तो पहले से ही सब कुछ है।'

सब मंत्रमुग्ध थे।

'हाँ, और स्रोत की क्या बात है, ये बातें कोई रहस्य है? आज टीवी के जमाने में कहाँ की कौन-सी बात नहीं पता चल जाती है? सब पता चल जाता है, कह रहा हूँ न सब।' बैंक कर्मचारियों में से एक, जो सबसे उम्रदराज था, पहली बार बेहद महीन, गंभीर और थोड़ी सुस्ती में बोला था। जिस पर सरदार युवक ने उत्साह दिखाते हुए और ज्यादा गंभीरता लाने की गरज से हामी दी थी, 'ठीक बात है जी। अब तो लंडन-पैरिस की छोटी बात भी पता चल जाती है। हमारे अपार्टमेंट के दूसरे तल्ले पर रहने वाले पड़ोसी ताऊजी की चार लड़कियाँ कैनेडा गईं। अपार्टमेंट में चर्चा-बेचर्चा सबको जना दिया गया कि वे बड़ी-बड़ी कंपनियों में जाब करती हैं। काफी पैसे मिलते हैं, एक दिन टीवी के एक फौरन चैनल पर अमरूदों की खेती के बारे में प्रोग्राम आ रहा था। और सच्ची जी, वो चारों लड़कियाँ न उसी प्रोग्राम में एक अमरूद के बगान में अमरूद तोड़ रही थीं।'

उनकी कहानियों और टिप्पणियों से मेरा मिजाज बुरी तरह भिनक रहा था। न जाने मुझे क्यों लग रहा था कि ये सब बतियाने को तो बतिया रहे हैं, पर कहीं न कहीं इनके दिमाग में मैं भी हूँ, और जिसकी शुरुआत बहुत अनुभवी और बुद्धिमान समझ रहे उस तीसमारखाँ ने की है। मैं मन ही मन भिड़ने के लिए तैयार हो रहा था। सोच रहा था कि बोलने देता हूँ। फिर जब इनकी बकवास बंद होगी, तब मैं शुरू होऊँगा। मैंने यह भी सोच लिया था कि कतई उत्तेजित हुए बिना बात करनी है और एक-एक से करनी है, नहीं तो सब एकसाथ लुझ जाएँगे। फिर बात इनके खोपड़े में पैवस्त होने की बजाय कनपटियों दहकती हुई आ जाएगी और मामला बिलावजह बिगड़ जाएगा। लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। हाथ में कलम घुमाते दो टीटीई आ पहुँचे। उन्हें देखते ही सबसे पहले वो पेठा खवैया उठा और उनसे आग्रह करने लगा कि कोई बर्थ खाली हो तो सीट कन्फर्म कर दें सर। यह सुन एकदम से मेरा ध्यान इस बात पर गया और यही बात उनसे मैंने भी दोहराया। शायद काफी बर्थ खाली रहे होंगे, इसलिए हमें बर्थ आसानी से मिल गई।

युवा सरदार बिना उनके टोके अपना टिकट दिखा रहा था। सामने बीच वाली बर्थ उसकी थी। बैंक कर्मचरियों की ओर मुखातिब होते ही दोनों एक साथ कहने लगे कि वे स्टाफ हैं स्टेट बैंक के। बस इसी स्टेशन पर उतरना है। इस बीच उनका तीसरा साथी कहीं खिसक लिया था। वे लगातार अपने स्टाफ होने और अगले स्टेशन पर ही उतरने की निरर्थक दुहाई दे रहे थे। पर दोनों टीटीई बहुत ही ज्यादा चिर परिचित गंभीर मुद्रा में जुर्माने की रसीद बनाने में लगे थे। आह, मुझे सुखद तसल्ली मिली। अब बारी थी उस सज्जननुमा बदतमीज की। उसके चेहरे पर तेरह बजता हुआ देखकर मैं समझ गया कि असली ड्रामा का असली मजा अब आने वाला है।

'हूँ, आपका टिकट?'

और उसने झिझकते हुए एक मुड़ा-तुड़ा टिकट, जो दूर से ही सामान्य दर्जे का लग रहा था, बढ़ा दिया। महाशय चंडीगढ जा रहे थे। बिना किसी तरह की कोई जिरह में फँसे टिकट चेकर फाइन काटने लगा। महोदय रिरियाते रहे कि ट्रेन चलने लगी थी, इसलिए वे इस डिब्बे में आ गए। कसम से, उस वक्त उस अहमक का चेहरा देखने लायक था। एक करारी मुस्कराहट मैंने उस पर छोडी और बैग उठाकर अपनी बर्थ की ओर चल दिया।

अपनी सीट पर बैठे हुए, किताब खोले मैं सोच रहा था कि उन्हें जवाब दिए बगैर मुझे वहाँ से नहीं आना चाहिए था। गुस्सा इतना आ रहा था कि लगा जाकर उन्हें सुना ही आऊँ। वाहियातपने के साथ कितनी बड़ी-बड़ी हाँक रहे थे, और जब बेईमानी करते साफ धरे गए तो सारी हेकड़ी पीछे समा गई। खींसे निपोरते हुए खिड़की के पास वाले भाईजी भी अपनी सीट खोजते हुए आ पहुँचे थे। मैंने उस बदतमीज प्रौढ़ की बात उससे पूछी कि वह कहाँ गया तो कहने लगा, 'अरे छोड़िए, ऐसे-ऐसे कई मिलते रहते हैं। किससे क्या-क्या कहेगा आदमी?' मुझे लगा कि और इस आदमी को देखो, अभी वहाँ सबकी बात पर हिहियाए जा रहा था और यहाँ रामायण बतिया रहा है। खैर मैंने ज्यादा उसे तवज्जो नहीं दी और इत्मीनान से पसरकर पढ़ने लगा। पढ़ता रहा, पढ़ता रहा, फिर जाने कब सो गया।

और सोया भी ऐसा कि लगभग तीन घंटे बाद उसी आदमी के जगाने पर उठा। नींद गई नहीं थी पूरी। मन खिसिया गया कि कमाल होते है कुछ लोग भी, जगा-जगाकर दिमाग खाते हैं। मैंने उसे गहरे देखा और फिर से सो गया। कोई घंटे बाद जब खुद से जागा तो वह कहने लगा कि कुछ खाने के लिए जगाया था। आगे अच्छी चीजें नहीं मिलती हैं। उसकी बात सुनकर तनिक अफसोस हुआ, क्योंकि भूख तो लग ही आई थी। बहुत देर तक उसको अपने ही आसपास देखकर मेरे दिमाग से जहरखुरानी वाली बात निकल चुकी थी और उसकी जगह उस आदमी ने बतिया-बतिया कर भरोसा भर दिया था। मेरे सो जाने पर वह शायद मेरी किताब पढ़ रहा था, क्योंकि अब भी वह उसके बर्थ पर करीने से खुली पड़ी थी। प्यास से गला सूख रहा था। मैंने पानी की बाबत पूछा तो उसने अपना बोतल बढ़ा दिया, और इस बार मैंने निःसंदेह उसकी बोतल का सारा पानी हलक के नीचे उतार लिया। तब उसने पहली दफा पूछा कि मैं कहाँ जा रहा हूँ। और इसके बाद तो उसकी गप्प सर्र निकल पड़ी। वह हैदराबाद में किसी कंपनी में काम करता है और जीवन जमकर जीने में भरोसा रखता है। वह अधिक लिखा-पढ़ा नहीं है पर रगड़कर मेहनत करता है ताकि बढ़िया जगह पर पाँच-छह कमरों वाला एक बड़ा घर बना पाए और एक नैनो कार खरीद सके। उसने बताया कि अभी-अभी उसकी शादी हुई है। और वह पत्नी से मिलने चंडीगढ़ जा रहा है। उसने गप्पों-गप्पों में ही पेठे और पत्नी की कहानी भी बता दी कि उसकी पत्नी को पेठे बहुत पसंद हैं और वह उसके लिए चार डिब्बे पेठे ले जा रहा है। उसे यह बात शादी की पहली रात को ही पता चली थी कि प्यारी पत्नी की जान पेठे में बसती है। शादी में पेठे बने भी थे, पर पत्नी उसे खा नहीं पाई थी। दूसरों को खाते देखी थी और तब ही से उसका मन ललचा रहा था। देर रात जब उसकी पत्नी से मुलाकात हुई, वह बहुत गुमसुम थी। उसने खूब पूछा-खूब पूछा, तब जाकर बताई कि उसे भूख लगी है और उसका पेठे खाने को मन कर रहा है। भोर होने को रहा होगा। सारे अतिथि और घरवाले बेसुध पड़े थे और वह पेठे वाला हंडा तलाश रहा था। और जब पेठे मिले, वह पूरी एक थाली भरकर पत्नी के पास ले गया। वह बता रहा था कि उस रात उसे अनंत संतोष हुआ था। वह पत्नी की बात करते हुए बार-बार भावुक हो जा रहा था। कह रहा था कि जीवन में प्यार तो कभी किसी से नहीं हुआ पर अब पत्नी को ही प्रेमिका मानकर प्यार करेगा। ऐसी कई फिल्मों और उसके नायक-नायिकायों का जिक्र भी उसने किया। पिछली बार जब वह घर आया था, उसका लौटने का जी ही नहीं कर रहा था। पूरे ग्यारह बेहतरीन दिन बिताकर जब वह घर से निकला पत्नी दरवाजे पर खड़ी थी। आँखों में बेसब्र आँसू थे। बस में दरवाजे से लगती हुई सीट पर खिड़की की ओर बैठे वह लगातार प्यारी पत्नी की यादों को बुन रहा था। आते समय मिलन की चहक में रास्ता कैसे-कहाँ गया था, कुछ पता नहीं चला था और वही जाते वक्त एक-एक मिनट झिलाऊ लग रहा था। एक जगह कुछ हिलते हाथों को देखकर बस रुक गई। एक आदमी अपना बड़ा सा बैग लिए बस के दरवाजे की ओर बढ़ा, पर पहले पायदान पर पैर रखते-रखते लौट गया, जहाँ उसकी पत्नी और संभवतः उसका छोटा भाई खड़ा था। उसने बैग रखा और पत्नी को सबके सामने अँकवार लिया। फड़फड़ाती आवाज में आशा और रुआँसा के बीच वाले भाव से कहा 'बाय बाबू, पहुँचकर फोन करूँगा। परेशान न होना। याद करना। बाय।' बस के बाहर-भीतर के लोग ताकते रह गए। विषाद में ढीली पड़ती उस औरत की आँखों में वैसे ही आँसू अब-तब ढलकने को हो रहे थे। ओह, घर से निकलने के बाद दोबारा ये सब देखकर दिल में समाया हूँक दोहरा मार गया था। और तब से अब तक वो हूँक वैसे का वैसे ही बसा हुआ है दिल में कि चलते समय एक बार पत्नी को भरपेट अँकवार क्यों नहीं लिया था। मरते समय मुँह में दो बूंद गंगाजल डालने जैसा संतोष हो जाता। उस दिन तो एक बार लगा था, कि हट अब उतर ही जाया जाए, अगली गाड़ी देखी जाएगी। लेकिन खैर। अब इस दफा।

उसने दार्शनिक अंदाज में बताया कि किसी से कितना भी झगड़ा-झंझट हो जाए, रुसा-फुली हो जाए, लेकिन जब वो जाने लगता है तो उसे गाड़ी बिठाने जरूर से जरूर जाना चाहिए। दिल का सब मैल निकल जाता है और आदमी को यही बात सबसे ज्यादा याद रह जाती है।

मैंने गौर किया था, उसके हाथ में मेरी किताब थी, 'एक महान प्रेम', जिसके बारे में वह मेरे मुँह से सुन चुका था कि इसमें लभ स्टोरी है और शायद उसने उसके कुछ पन्ने पढ़े भी होंगे। वह दिल की रौ में बहते हुए अपने पत्नी-प्रेम की बाबत कहे जाता था और अपने हाथों से किताब को बेहद कोमलता से सहलाए जाता था।

उसने मुझे जितनी भी बातें बताईं, खुद बताईं। हाँ-हूँ, अफसोस, अच्छा और दुख के अलावे मैंने अपनी ओर से एक भी सवाल नहीं किया। उसने अपनी पूरी कहानी उलटकर रख दी। वह मुझसे बहुत खुल गया था। चंडीगढ़ नजदीक आ रहा था और मुझे लग रहा था, वह अपने जज्बातों में जिस गहराई तक उतर आया है, अचानक रेल से उतरने की बारी आने पर सामान्य कैसे हुआ जाएगा। अचानक कोई बात कैसे की जाएगी? हकीकत तो यह रही कि अब उसकी बातें मुझे सुखकर लगने लगी थीं और मैंने भरपूर तौर पर मुस्कराते हुए उससे माँगकर दो पेठे खाए थे। जहरखुरानी, मन ही मन हँसी आ गई थी। मन किया, बता दूँ, पर विश्वास का रंग चटक जा सकता था। बिल्कुल पक्की बात, हमारी दोस्ती जम गई थी। वह वाकई जहीनी रूप से जिंदादिल था। पहुँचते-पहुँचते उसने अपनी बातें समेट ली थी और उस अवस्था से उबर भी गया था। स्टेशन छोड़ते हुए वह पहले की मानिंद लग रहा था।

शहर में जोरदार शाम उतरी हुई थी, जब हम रेल से उतरे थे। अब हमें अलग होना था, अलग-अलग बसों पर, अलग-अलग जगहों के लिए। और यह हम दुखी-दुखी कर रहे थे। एक बेगाना सा भावुकपन हमें कुरेद रहा था। अलबत्ता हमने एक दूसरे के पते और संपर्क नंबर जरूर ले लिए थे, इस वायदे के साथ कि राह चलते अनायास निश्चित तौर पर खत्म हो जाने के लिए बनने वाले संबंधों के उलट हम इस ताजादम संबंध के स्थायित्व पर सायास काम करेंगे। मौका मिलते ही हम एक दूसरे के रिहाइश पर मेहमानी के लिए जमेंगे। तो ठीक है, विदा। हाँ, अलविदा।

और बस में सवार मैं शिमला के रास्ते पर था।
'एक शहर ऐसा जो फैलाता है बाँहें
तपाक लेता आगोश में
हर बार अबूझ रह जाती हैं
उसकी थाहें'

एक परदेसी के लिए किसी शहर की अजनबीयत रात गए गाढ़ी होती जाती है और शिमला पहुँचते-पहुँचते काफी रात हो जानी थी। खैर, नया शहर, नई रात, नया मौसम, नई बात। बढ़िया है।

मैं एक लंबी थकान के साथ बेतरह अकेला हो गया था। गर्मी और पसीने से बेकार और बेजार होकर बस में इस उम्मीद में खिड़की से चिपका था कि पहाड़ों से उतरकर नम हवा के बड़े-बड़े गुच्छे अब मुझे राहत देने के लिए आते ही होंगे। पर उन्होंने बहुत देर की। रात की छायाएँ बस में चारों तरफ अट गईं, वे तब भी नहीं आए। वे तब आए, जब उनके इंतजार के पार जा मैं सो गया था। पर जब वे आए, रात के जर्रे-जर्रे में अपनी गीली ठंढक भर दी। शायद कहीं बुरांस खिला था। नहीं, किताबों में बुरांस जाड़े में खिलता है। पर यहाँ तो चारों ओर जाड़ा ही जाड़ा मालूम होता है। बेमौसम ठंढ के अद्भुतपने के एहसास की यह शुरुआत थी। उनींदे मन को नम हवा की सरगोशियाँ और पहाड़ी सड़कों की हिंडोलियाँ बचपन के झूले की तरह लग रही थी। भीतर का थकान पस्त हो रहा था। रह-रह कर आरामतलबी छा जाने को होती थी। बावजूद दिल गंतव्य पर टँगा था।

इस बीच अनिल घामटा जी, वही, जिन्होंने आवेदन प्रपत्र भेजकर शिमला आने की नींव तैयार की थी, दो दफे संपर्क कर चुके थे, और कितनी देर टलने वाली है हमारी मुलाकत? बस एक घंटा, बस आधा घंटा, नहीं-नहीं पौन घंटा करीब, पर ये बस न जाने कब बस करने वाली थी। और जब बस अड्डे पर यह बस हुई, 12 बजने में 50 मिनट की कसर बाकी थी मात्र।

आह... बस से नीचे उतरकर एक जबरिया अँगड़ाई। आधी सच्ची, आधी झूठी। फिल्मी टाइप।

एकदम सही का शिमला है। मस्त जगह लाए हो भाई। अँधेरा, घाटी, ठंढ। पर रुइया बरफ कहाँ है भाई, और सेब का बगीचा? सब दिखेगा-सब दिखेगा, सुबह हो जाए एक बार और परीक्षा ठीक से हो जाए एक बार। फिर देखो मजा। किसी मासूम बच्चे सरीखे मुस्कान मचल गई।

देर समय गुजरे भी बस अड्डे पर धीमी पर चमकीली चहल-पहल थी। पहाड़ और उसके पेड़ रात के अँधेरे में ठंढ से सिकुड़ कर सुस्ता रहे थे। पहाड़ की मेरी पहली रात और उस पर हो रही हल्की बूँदा-बाँदी। तईं उमग रहे हुलासपन से लंबी राह की उकताहट घुलने लगी थी।

कान से मोबाइल चिपकाए मेहमान और मेजबान उसी बूँदा-बाँदी और भीड़ में एक दूसरे को बड़ी बेसब्री से खोज रहे थे। हम अपने कपड़ों का रंग और उसकी छापें एक दूसरे को बता रहे थे। हम अपनी लंबाई और मोटाई और मूँछ-दाढ़ियों की स्थिति भी बता रहे थे। हम मोबाइल पर बात करते हुए हरेक शख्स के बारे में एक दूसरे के होने का अंदाजा ले रहे थे और बार-बार असफल हो रहे थे। हमारे इस खेल में बेसब्री और मजा दोनों था। जानबूझ कर छकने जैसा। खुश बिल्ली और अधमरे चूहे के खेल जैसा, कि आखिर जाएँगे कहाँ?

बस अड्डे की शेड में एक आधुनिक और खूबसुरत टेलीविजन पर बीस-बीस ओवरों वाला क्रिकेट चल रहा था और वहाँ एक खासी संख्या जमी थी। मैं पीछे खड़ा हो गया, लगभग सबसे पीछे, कुछ इस तरह कि टीवी देखने वालों की भीड़ में सबसे पीछे के दो-चार लोगों में सुभिता से पहचान लिया जाऊँ। और मैंने मेजबान को अपनी स्थिति बता दी। मैंने खेल खतम कर दिया। उपाय आसानी से कारगर रहा और हमने बात करते हुए ही एक दूसरे को चीन्ह लिया।

एक युवक, जैसे कि मैं, उम्र में लगभग वैसे। लंबा कद, लंबी नाक, सधी आवाज पहाड़ की गोराई और गालों पर पके सेब की ललाई। कुल जमा एक आकर्षक व्यक्तित्व। नई दोस्ती की पहली मुलाकात, बताइए क्या बात करेंगे? एक-ब-एक मुट्ठी के मुट्ठी गप्प और एक-ब-एक बुद्ध वाला मौन। ऐसे ही न? हाँ, ठीक ऐसे ही। अव्यवस्थित और अनियंत्रित। कुछ औपचारिक और कुछ अनौपचारिक। मतलब कि मिलते ही तुरंत की जाने वाली बातों का एक अंबार लगा हुआ था हम दोनों के पास, ऐसी बातें, जिनकी बाद में कोई प्रासंगिकता नहीं रह जानी थी। सवाल टकरा जा रहे थे, कई खाली चले जा रहे थे, कई का जवाब बेसमय हो जा रहा था, हालीवुड की पायरेटेड डब फिल्मों की तरह, आवाज पहले, ऐक्शन बाद में या एक्शन पहले, आवाज बाद में। हम दोनों साथ चलते हुए नए मिलन की खुशमिजाजी में कुछ इस तरह हँस-हँस कर बतिया रहे थे कि कोई तीसरा यह संभावना तक नहीं जता सकता था कि किसी भी कोण से हमारी यह पहली मुलाकात भी हो सकती है।

हँसते-बतियाते रोटी-दाल की जबर्दस्त तलब महसूस होने लगी थी, इसलिए तय हुआ कि इससे पहले कि भोजन की दुकानों के शटर गिर जाएँ, उस ओर से हो ही लिया जाए। बस स्टैंड से थोड़ी दूर निकलने पर हम एक होटल में पहुँचे, जिसमें जमें फकत पाँच-सात लोग अपनी-अपनी थाली का भोजन लगभग निपटा चुके थे। बुजुर्ग नौकर थकान से दोहरे हो रहे थे। नींद उनकी आँखों की तलछट पर आया हुआ था। काउंटर पर बैठा मालिक ललाट के कई शिकनों को घटाता-बढ़ाता हुआ दिन भर के मैराथनी हिसाब में जुटा था। दुकान बढ़ाने के वक्त के आसपास आने वालों ग्राहकों में शायद उसकी रुचि नहीं थी। चार-पाँच थालियों भर का बचा-खुचा खाना कुत्ते खाएँ या कोई और। अब कौन माथापीरी लेगा। उसने हमारी तरफ आँखें भी नहीं उठाईं। ऐसे आदमियों के लिए कई तजुर्बेकारों का मानना है कि इन्हें अभी दुकानदारी सीखनी बाकी है जी।

हम थकान में डूबे नौकरों की घोर इच्छाशक्ति के जिम्मे थे। सारे नौकर, जो-जो दिख रहे थे, सब साठ के उपर, वर्धा के रामभरोसे होटल की तरह। वर्धा में रहते हुए, समोसे-कचौरियों और मिठाइयों के मामले में मैंने हमेशा इसी होटल की सेवाएँ ली, इसलिए रामभरोसे होटल का चलते रहना जरूरी है। मैं तो कहता हूँ, जहान के ऐसे सभी दुकानों-संस्थानों का कयामत तक चलते रहना जरूरी है, जहाँ दुनिया की परिभाषा में नाकाबिल करार दिए जा चुके पागल, बुजुर्ग, रोगी और विकलांग रोजगारी हों।

उस रात खाने की मेज पर भोजन का लंबा इंतजार करते हुए लगा, हम परोपकारित किए जा रहे हैं। और हमें जो मिले, जैसा मिले, जितना मिले अन्नदाता प्रभु का प्रसाद समझकर खा लेना चाहिए और खुशी से अपनी धन वाली थैली मालिक के पैरों पर अर्पित कर आभारपूर्ण और अश्रुपूर्ण आँखों से उसके दोनों हाथों का बोसा लेकर कहना चाहिए, 'ईश्वर परम शक्तिशाली है और वही हमें भोजन कराता है। आमीन।'

अनिल घामटा खाना खाए हुए थे, इसलिए एक ही थाली आई। एक नहीं अधूरी। तली को निचोड़ कर लाई गई चीजों से थाली को भरी-पूरी बनाने का एक असफल और हास्यास्पद मुजाहिरा। बुजुर्ग नौकरों के लिए काम बढ़ गया था। कुछ माँगने पर वे अपनी जाहिर झुँझलाहट के साथ सब कुछ चुका हुआ बता दे रहे थे। और समझ लीजिए कि यदि मेरे खाने में प्याज और हरी मिर्च न हो तो जाफरानी पुलाव भी अपने स्वाद से जा सकता है। चचा-दादा के बाद भी नासपीटों ने प्याज और मिर्च के लिए 'अंठिया' दिया। उन्हें डर सता रहा था, मैं ज्यादा देर जमा रह गया तो मुझे खाता देख कोई और भी टपक सकता है, ये जानकर 'होटल खुला है शायद।' मालिक अपनी धुन में था और नौकरों को मेरी उपस्थिति अखर रही थी, इसलिए वहाँ से जल्दी ठूँस-ठाँस कर भागा।

ये कोई आफत नहीं थी। उसकी शुरुआत तो अब होनी थी।

रात लगभग अकेली हो गई थी और स्ट्रीट बल्बों की रोशनी सुनसान सड़कों पर बिखरकर यूँ ही जाया हो रही थी। इक्के-दुक्के पान दुकान और सड़कों पर इधर-उधर करते चंद लोगों के अलावे कुछ निजी वाहन दौड़ रहे थे। ये चंद गतिविधियाँ इसलिए भी बची हुई थीं कि मौसम गर्मियों वाला था और भौगोलिक नियम-कायदों से इन महीनों की रातों को लंबी होना था।

उन्होंने बस अड्डे की ओर वापस लौटते हुए रास्ते में बताया कि हमें जल्दी से एक कमरा तलाशना होगा, रात निकलती जा रही है, आगे मुसीबत हो जाएगी। हालाँकि कमरे अब बचे होंगे, कम ही गुंजाइश है।

'अच्छा... हाँ...' पर ये शब्द बड़े धोखेबाज निकले। ये मुझे भौंचक किए हुए बिना निकल जाते तो वाजिब था। लेकिन ये तो अनायास ऐसे निकल गए थे जैसे आगे के शब्द हों, 'मैंने सोचा कि हम लोग घर जा रहे हैं।' कमबख्त।

वो बात ताड़ गए। 'कुछ दिक्कतों को झेलने के बाद हमारे पास घर चलने का भी विकल्प है, दिक्कत से मतलब है गाड़ी की। पर सुबह आपकी परीक्षा है, और घर इतनी दूर नीचे में है कि टाइम पर सेंटर तक पहुँचना संभव नहीं है। इसलिए रिस्क लेना ठीक नहीं है।'

'हाँ, हाँ। आपका सब देखा-ताका हुआ है, जैसा ठीक माने आप। यदि परीक्षा सेंटर यहाँ से जल्दी पहुँचा जा सकता है, तो इधर ही रहना ठीक होगा।'

हम एक खान भाई के पास गए जो बस अड्डे के पास ही खड़े बीड़ी की गर्मी ले रहे थे। खान भाई या सिरमौरी भाई, एक ही बात। यहाँ इन्हें इनके पहनावे से असानी से पहचाना जा सकता है। भूरे और मटमैले रंग का लबादानुमा कुर्ता और उससे मिलता-जुलता पैंट या पैजामा। गैर-चटख रंगों का ही स्वेटर या शाल और उस पर अँगोछे जैसा कोई कपड़ा। पैरों में जूते। चेहरे पर थकान और आँखों में तत्परता। ये इन पहाड़ों के सर्वहारा चरित्र हैं। स्थानीय बाशिंदे और मजदूर। यहाँ के व्यवसायी इनकी पीठ का इस्तेमाल मालों की ढुलाई के लिए करते हैं। नगर निगम अपने कई कामों में इनकी सहायता लेता है। इसके अलावे पर्यटकों को होटल दिलाना, गाड़ियाँ किराए पर दिलाना जैसे काम भी ये करते हैं। बेहद ईमानदार और कर्मठ। स्थानीय संस्कृति का प्रतिनिधित्व सँभालने वाले कमासुत।

बीड़ी धोंकना रोककर उन्होंने कमरे की बात पर इनकार में सिर हिला दिया, हान्जी, रात बहुत हो गई है, लगभग कमरे भर गए हैं।

'सिरमौरी भाई लगभग न, सब नहीं न।' अनिल भाई मिन्नत की सीमा छूकर उनसे कहीं और देखने की बात कर रहे थे।

वे बीड़ी कुचलकर उठे और चलने लगे। हम उनके पीछे हो लिए। खान भाई हमें लेकर एक पतली गली में सीढ़ियाँ उतर रहे थे। गजीब, किसी खुले सुरंग से गुजरने का एहसास। पेट भर जाने के बाद ठंढी हवाओं के बीच मुझे तो जोश आ रहा था, गाना सूझ रहा था। जरा सँभल के जी, अनिल भाई हिदायत दे रहे थे।

वहाँ कमरा खाली नहीं था। दोनों निराश। दोनों माने, अनिल भाई और खान भाई। मैं बेफिकिर, घूमने और चौहद्दी एहसासने में मगन। रात, खेल, ख्वाब, मजा, खुशुसियत। हहा।

अब तलाश के लिए दूसरी ओर जाना था। पर इस बार ढलान नहीं, ऊँचाई की ओर। सीढ़ियाँ, सीढ़ियाँ और सीढ़ियाँ। कोई अभ्यास नहीं, कोई तजुर्बा नहीं, कोई अंदाजा नहीं।

जल्द ही अपनी ऊर्जा और जोश ऊँचाइयों को नजर कर मैं घिसटने लगा और पीछे पड़ने लगा। उन्हें बार-बार आगे जाकर मेरा इंतजार करना पड़ता। साँसें लोहार के दुकान की धौंकनी हो गई थी। काँख से पसीना चलने लगा था। टाँगों की मांसपेशियों में दर्द जमने लगा था।

राहत मिली, एक जगह डबल बेड का कमरा उपलब्ध था। महँगा, लेकिन मैंने हाँ कर दी। हमने सारी व्यवस्थाएँ देखी, दुरुस्त थीं। खान भाई को शुक्रिया और पैसे अदा किया। अनिल भाई पूरी तौर पर मुझे इत्मीनान कर, कल का कार्यक्रम समझाकर जाने लगे। शुभरात्रि। उनकी गर्मजोशी से मालूम हो रहा था, आने वाले दिनों में वे एक जबर्दस्त मेजबान साबित होने वाले हैं।

मैं व्यापारी, व्यवसायी नहीं हूँ या किसी तरह का काला-पीला धंधा करने वाला गुंडा, तस्कर, नौकरशाह या नेता भी नहीं। मैं अब तक किसी निजी या सार्वजनिक संस्थान में मुलाजिम भी नहीं रहा हूँ। मेरी शादी नहीं हुई है। शौकिया घुमक्क्ड़ी की लत भी नहीं है। और न ही मैं अपनी फितरत में ऐशबाज हूँ। मालदार तो कहीं से भी नहीं हूँ। सोचने वाली बात है, मैं फिर भी एक हिल-स्टेशन पर था। और वो भी दो बेड वाले बेहद आरामगाह कमरे में। बिल्कुल अकेले। धत्त, शादी हो जानी चाहिए थी जी। अरे कम से कम मौजिया किसिम के दो-तीन दोस्त ही होते। शिमला आया था, मौसम की बहार में, पहाड़ों के गुलजार में, लेकिन क्या तो बेरोजगारीवश। हाय-हाय। और उस कमबख्त ने रेल में मोहब्बत की ऐसी लरजती कहानियाँ सुना दी थी कि तब ही से दिल में प्रेम की पुकार मची थी।

कल्पनाओं में सुस्ताने के बाद मैंने नहाने की सोची, क्योंकि इसके बिना बड़ी खंडित नींद आनी थी। पानी छू कर देखा, करंट लगने के एहसास से परिचित तो नहीं हूँ, पर लगा शायद इसी तरीके का कोई तीव्रतम झंकार देह को झनझना देता होगा। अभी तीन दिन पहले मैं वर्धा के 43 डिग्री वाले तापमान में झुलस रहा था। लू के बवंडर बावेला मचाए हुए थे। दिन के 10-11 बजे से शहर में वीरानगी छा जाती थी। छत पर रखी पानी की काली टंकियों का पानी खौल जाता था। लोग नहाने के लिए म्यूनिसप्लिटी के ताजे पानी का इस्तेमाल करते थे। और करिश्मा कि यहाँ पानी के मिजाज में ये कनकनी। अद्भुत। दिमाग पर बुरी तरह काबिज वर्धा की गर्मी से बौखलाया हुआ मैं अपने ऊपर बाल्टी के बाल्टी पानी उड़ेलने लगा। शुरुआती करंटनुमा झटके झेल लेने के बाद जैसे शरीर को सुन्न मार गया। कई अंगों के होने का एहसास बंद होने लगा था। हड्डियों के भीतर रक्त का घनत्व सिकुड़ता महसूस हो रहा था। बावजूद, उस बर्फीले पानी से भरपूर प्रतिरोध में मेरा शरीर जुटा था। जब लगा कि समूचे शरीर की तासीर में बरफ घुल-घुलकर पैवस्त हो गया है, मैं नहाना छोड़, लिहाफ में आ गया। नियोजित कौतूहल से सामने की दीवार पर लटक रही किसी बीमा कंपनी के कैलेंडर को मुस्करा कर निहारने लगा। दहकते अप्रैल में ये जादू, सौगंध, पहली मर्तबा ऐसा कमाल नजरों के सामने है जी। नानीघर में किसी को ये कहानी सुनाऊँ, तो कहेंगे, बौरा गए हो का, फिलिम हो रहा है?

जो हो, मन बौराने के लिए मचल तो जरूर रहा था। लिहाफ की मस्तानी गर्मी ने उस रात जो सपना दिखाया कि मैं उड़ने लगा। पहाड़ की एक लड़की से मेरी शादी हो गई है और हम दोनों मिलकर सबसे ऊँचे पहाड़ की सबसे ऊँची चोटी पर एक शानदार कहवाघर चलाते हैं, जो चौबीसों घंटे गुलजार रहता है। लोग बादलों पर बैठकर काफी पीते हैं और बहसें करते हैं। वे बादलों को झकझोरते हैं और पानी बरसाते हैं। हम काफी के साथ मुँह में रखते ही गायब हो जाने वाले पेठे भी परोसते हैं। हम दोनों ने काम में सहायता के लिए कई बुजुर्गों को रखा है। वे हमें और हमारे ग्राहकों को खूब प्यार करते हैं। हमारी महत्वकांक्षा है कि हम इस चोटी के आसपास कोई समुद्र बसा पाएँ या मीठे जल की मीठी मछलियाँ पोसने वाली कोई खूबसूरत झील।

सपना और सपने के भीतर का सपना, पहाड़ की चोटी पर ही छूट गया। कमरे का मालिक दरवाजा पीट रहा था। उहूँ। कितनी खुशहाली थी वहाँ। सात बज गए। आपके दोस्त ने कहा था कि आपकी परीक्षा है, आपको जल्दी जगा दूँ। मालिक ने कहा।

परीक्षा में पर्याप्त रूप से तरोताजा होकर जाना चाहिए, तब दिमाग के किसी कोने में धूल खा रही चीजें भी झट-झट सामने आने लगती हैं। और अनचाहे फिक्र और बेकार किस्म के कार्य-कारण में फँसने से बचने के लिए मैंने फिर से नहा लिया। एक बार फिर से पिछले स्नान के सारे हड़कँपी अनुभव जीवित हो गए। सर्द पानी मेरे बदन के जर्रे-जर्रे को कोंच गया। पूरा देह कठुवा गया। बला से, पर मैं सचमुच ताजा हो उठा था, किसी ईमानदार और शुद्धतापसंद शेर के नथुनों से इसकी तस्दीक करवाई जा सकती थी। मेरे गोश्त की ताजगी से शर्तिया वो खुशी से दहाड़ उठता। चौबीस कैरेट ताजा गोश्त, बिल्कुल धुला हुआ।

बाहर सूरज की रोशनी फैल रही थी। अपनी कँपकँपी पर काबू पाने के लिए लिहाफ में करीब एक घंटा यूँ ही लेटे रहने के बाद मालिक को कमरे की चाबी सौंप मैं बाहर निकल पड़ा। पूछते-पूछते समय पर परीक्षा केंद्र पहुँचा। राज्य लोक सेवा आयोग की बिल्डिंग। शिमला की मेरी पहली और शानदार सुबह। परीक्षा देने आए लोग स्वेटरों में थे। कहते हैं छींक और पेशाब देख कर भी लगती है। अब इसमें जाड़े को भी जोड़ लीजिए, हाँ। उन्हें देखकर मैं ऊपर से नीचे तक कनकनाने लगा था। परिसर में खड़े देवदार के शजरों की नुकीली पत्तियों से धूप बड़ी बेपरवाही से गिर रही थी। मैं उनके नीचे चला आया और गर्म गुनगुनाहट से भर देने वाली उस रोशनी से इतना खुश हुआ कि लगा भीतर कहीं शम्मी कपूर हिलोर उठे हों, 'याहू'। चौतरफा यही अलमस्त नजारे थे। इस निराली और बेहद कुदरती लग रही दुनिया में आकर मुझे अपना पढ़ा-लिखा सब कुछ बिसरता मालूम हो रहा था। मन टँगा था, शाम हो और इन वादियों में किसी शावक की तरह कुलाँचे भरूँ। इसी मन से परीक्षा दी। चुपचाप जो आया, जितना आया, अपने सामर्थ्य भर लिखा और मुक्त हो गया।

अब मैं था और शिमला की हसीन फिजाएँ थीं।

'मैदान की सारी हरियाली
साँड़ के पेट में कैद हो गई
हरियाली के लिए इंतजार कीजिए
अब अगले साल के मोड़ तक'

अनिल भाई ने भी उस परीक्षा में शिरकत की थी, पर उनका केंद्र अलग था। परीक्षा खत्म होते ही निश्चित समय और जगह पर हमें मिलना था। और बिना किसी गड़बड़ी के उसी मुताबिक हम मिले भी।

दिन तो किसी सनकी के सवालों के जवाब देने में गुजर गया था। बच रही थी तो शाम, जिसका कत्ल करने को मैं उतावला हुआ जा रहा था। पर तजुर्बा नहीं था कि शुरू कहाँ से किया जाए। अनिल भाई ने सबसे पहले रिज की शाम को चुना।

आज से पैंसठ-सत्तर साल पहले यहाँ अंग्रेजों ने तख्तियाँ लगा रखी थी कि भारतीयों और कुत्तों का प्रवेश यहाँ वर्जित है। (कुछ और रचनात्मक गालियाँ, जो केवल लक्षित को बुरी लगती हैं, बाकी सुनने वालों को कदापि नहीं)। अजी, छोड़िए साहब, उन कुत्तों का वश चलता तो सूरज की गर्मी और चाँद की शीतलता पर भी नाकेबंदी मार देते।

पहाड़ों पर खेल के मैदान सरीखी उन्मुक्त जगह, रिज। खूब ऊँची किसी बड़े घर की फैली छत की तरह, जहाँ से फिजाँ की चौहद्दी साफ-साफ नुमाया होती हो। रिज से नजर आती पहाड़ों की विस्‍तृत हरी श्रृंखलाएँ मन को उस पार एक अलग अछूते जहाँ में लेकर जाती हैं। जहाँ सूरज, आकाश, बादल, धुंध, बारिश, पेड, पहाड़, सब मिलकर मोहिनी सतरंगी छटाएँ बिखेर रहे होते हैं। देह रिज पर छूट जाता है और आप उन हरे ओक और देवदार के पहाड़ी जंगलों में उतर जाते हैं। क्या हत्यारे, क्या अपराधी, क्या उजबक और क्या साधु, यहाँ खड़ा होकर प्रकृति को एकटक निहारते हुए सब अपनी-अपनी शैली में दार्शनिक हो उठते हैं। जोश में जरीफों की शराफत बढ़ जाती है और मोहब्बत में लिपटे दिलों की आहें। अवसादग्रस्त और आत्महत्या की जहनियत वाले इतने अधिक और लाजवाब सुसाइड प्वाइंट देखकर अफसोस से भर जाते हैं कि ऐसी शानदार जगहें उनके शहर में क्यों नहीं है। कवियों-लेखकों की अंटी से तशबीहें खिसकने लगती हैं और जुबाँ से बरबस निकलता है, आफरीन, आफरीन।

हाँ-हाँ, आफरीन, पर कोई ये पहेली बुझाए कि रसमलाई या लखनवी कबाब पर दिल आ जाए तो उसे चट कर लिया जाए, प्रेम हुलास मारने लगे तो उसमें डूब लिया जाए, लतीफें गुदगुदाएँ तो ठठा लिया जाए मगर यदि आँखों की जान किसी पर आ जाए तो! तो! तो! कोई बुझवइया आए और ईनाम ले जाए भाई। बिचारी आँखें।

र्मैं तो मैदान का आदमी हूँ जी। मैदान में जन्मा हूँ और उम्मीद, मैदान में ही मर जाऊँगा। इसलिए पहली मर्तबा पहाड़ देखकर यदि अलबल कहे जा रहा हूँ, तो नादानी मानकर इसे वाजिब लगाइएगा।

रिज से बिल्कुल सट कर खड़ा न्यू-गॉथिक वास्तुकला का नायाब उदाहरण क्राइस्ट चर्च और न्यू-ट्यूडर पुस्तकालय। पूरा परिवेश निर्मल वर्मा की कहानियों वाला। वही चर्च, वही लाइब्रेरी और वही लोहे की बेंचें, दरख्तों के सुखे पत्तियों का ढेर भी और फिर इस सूफियाने माहौल को बेतहाशा प्यार करने वाला एक आदमी।

इस जगह की शाम मुझे अपने भीतर डुबोए लिए जा रही थी। मैंने भी अपने दिलोदिमाग को बिल्कुल ढीला छोड दिया था।

'थ्री ईडिएट्स फिल्म देखी है आपने?'
'दो मर्तबे। जाहिर रूप से बेजोड़ है।'

'उसमें यही चर्च है, जिसके सामने रैंचो को तलाशने आए उसके दोस्तों की गाड़ी रुकती है। और वो... वो..., इधर आइए। वो जो आदमी दिख रहा है न, चना बेचता हुआ, उसी से वे रैंचो का पता पूछते हैं। वो हमेशा आपको इधर ही मिल जाएगा। उस फिल्म में दिखने के बाद उसकी पूछ बढ़ गई है और बिक्री भी। अभी उसका बेटा पीएमटी में टाप टेन में था और आईजीएमसी में ट्रेनिंग कर रहा है। है न मजेदार?'

कहते हैं, पहाड़ के लोग बड़े भलेमानुष होते हैं। सो स्वीट न! एकदम। अनिल भाई यह वाकया बताते हुए बच्चों की तरह किलक रहे थे। मैंने कहा, 'हान्जी।'

रिज से निकलकर हम लक्कड़ बाजर में थे। लकड़ी की बनी कलात्मक वस्तुओं का बाजार, लक्कड़ बाजार। अहा! लाजवाब कर देने वाली करामातें। आगे बढ़े तो माल रोड की शान सिमटती शाम में बड़ी अदा से मचल रही थी। माल रोड यानी फैशनपरस्तों का मेला, नई पीढ़ी का शापिंग सेंटर। चौडी सड़क के किनारे आधुनिकता से लबरेज कतारबद्ध स्थायी दुकानें, जिनमें ब्रांडेड और महँगे कपड़े, जूते, सौंदर्य प्रसाधन और बेशुमार मदहोशी भर देने वाले आबेसुर्ख सजे थे।

यहीं पास में गेयटी थियेटर, वास्तुकार हेनरी इरविन की 122 साल पुरानी गाथा, जो यादें बनकर रह गई थीं, 25 जून 2009 को जीर्णोद्धार के बाद फिर से आबाद हो गई। इस थियेटर के मंच से उच्चारी गई कोई ध्वनि बिना माइक के दर्शक दीर्घा की आखिरी कतार तक जाती है, यही यहाँ की बड़ाई है। गौथिक शैली में यह करामात, दुनिया में यहाँ के अलावे केवल फ्रांस में देखी जा सकती है।

रविवार होने की वजह से उस रोज खूब भीड़ जुटी थी। किसी मेले का भान हो रहा था। टूटकर लुत्फ लेने के बाद हम घर की ओर लौट रहे थे। मन अब तक उन हसीन मजों में डूबा हुआ था। न जाने कब बस में नींद आ गई। नींद खुली अचानक अपनी बोली-बानी कानों में पड़ने पर।

'केकरा, मइया के, का होलई?'

'... ... ...।'

'मइया के कइह दिहों, एक पाव दूधवा पिते जइतइ। देहिया कमजोर होइत जाइत हइ। एहे वास्ते जरूरी हई। आऊ मिंटुआ के माइर-पीट के भेइजभीं स्कुलवा। तोर से नइ सरियतऊ त छोटका के कहभीं।'

'... ... ...'

' नइ, नइ, स्कुलवा में काहे वास्ते खैइतइ सड़लका खनवा। बेस-बेजाय घरहीं देबहीं। सुन एकदम ओकरा नै खाय दिहें हुआँ। आऊर हिंयाँ सब बेसे हऊ। डेरा पर जाइत हिअऊ। बस में हिअऊ। फिर करबऊ। रख।'

बस की गरम बोनट पर बैठा वो मजदूर उस बसंत सरीखे मौसम में भी पसीने से लगभग लिथड़ा हुआ सा था। शायद पास ही हो रही सड़क की मरम्मती में लगा होगा। वह अब भी गरम कोलतार से हिफाजत देने वाली प्लास्टिक की ऊँची बूटें पहने हुए था, जिसकी तली से कोलतार सनी गिट्टियाँ चिपकी हुयीं थीं। झारखंड के चतरा, हजारीबाग या पलामू के आसपास की भाषा थी वह, नगपुरिया और मगही का घालमेल।

'कहाँ घर होलउ। हियाँ का काम करे लागल हीं?'

'झारखंड में।'

'हुँआँ कहाँ?'

'कटकमसांडी। हियाँ सड़क में काम करे लागल हिओ।'

मैंने कहा था न। कटकमसांडी माने हजारीबाग। वह आदमी बेतरह खुश हो आया था, जब मैंने बताया कि मैं चतरा से हूँ। अंतहीन थकावट वाले चेहरे पर से निकलती एक सजीव और पारदर्शी मुस्कान। यकीनन विरले ही देख पाए होंगे ऐसा योग, जैसा मैंने उसके चेहरे पर देखा। हम आगे भी बतियाते रहे। रास्ते भर। घर-दुआर, बाल-बुतरू, खेत-बारी। वह पिछले तीन साल से शिमला में है। बतियाते-बतियाते एक बार मन किया कि अब इसी के साथ उतर जाया जाए, पर लगा कि अनिल भाई परेशान हो जाएँगे या संभव है बुरा ही मान जाएँ।

इस जन्नत में भी एक तबका घूमने और ऐश करने के लिए नहीं, बल्कि रोटी की तलाश में आता है। सोचकर मेरी अब तक की खुमारी जाती रही, और आगे शिमला में मैंने जितनी जगहें देखी, बस अपना सामान्य ज्ञान बढ़ाने की गरज से या खुश भी हुआ तो बेहद गंभीरता के साथ, पहले दिन जैसे बौड़मों की तरह नहीं।

अनिल भाई ईश्वर भक्त आदमी हैं, इसलिए अगले रोज काली बाडी मंदिर, जाखू मंदिर ले गए। फिर समर हिल, जिसका सौंदर्य तो वाकई अपार और अप्रतिम है। ऊँचे दरख्तों से घिरी सड़कें जो सर्पीले आकार में कभी बाएँ घुमती हुई हैं तो कभी दाएँ। बेपनाह उड़ान। बेपनाह रोमांच। और ऐन इसी जगह हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय। अनिल भाई की पढ़ाई-लिखाई यहीं हुई है, इसलिए पूरा परिसर घूमना आसान रहा। इतनी ऊँचाई पर सब कुछ कितना शांत-शांत और पवित्र जान पड़ता था। लगा, अब यहीं किसी विभाग में दाखिला ले लूँ और वापस न जाऊँ। अपनी यह बेढब हसरत जब मैंने साझा की तो अनिल भाई हँसने लगे और मुझे जनसंचार विभाग में ले आए और बकायदा हेड से पूछ भी बैठे कि यहाँ से जनसंचार में पीएचडी के लिए क्या प्रोसेस है। हेड को जो बताना था, उन्होंने बताया, जिसका लब्बोलुआब ये था कि अभी निकट भविष्य में ऐसा संभव नहीं है। मारिए गोली, उस दिन विश्वविद्यालय परिसर में हम लोग काफी वक्त बिताए।

दिन भर कुछ न कुछ चटपट खाते बितता तो शाम में कम भूख रहती, जबकि रिंकी, रिन्नी या रिमीजी या ऐसा ही कुछ... (लानत भेजूँ अपने याद्दाश्त को, जो बेहद जरूरी यह नाम भूल गया। वैसे ये अनिल भाई की भाभीजी की छोटी बहन हुई, उम्मीद है, वो अपनी सजल माफी से मुझे बख्श देंगी।) हमलोगों के लिए बड़े प्यार से कई चीजें बनाकर रखती थीं। जाहिर है, जब हम आधा-अधूरा टूँग-टाँगकर खाते, उन्हें अच्छा नहीं लगता होगा। मेहनत और शौक से बनाने वाले को ये बात हमेशा नागवार लगती है। ये एहसास मुझे हुआ, पर बाद में, तब तक जाने के दिन आ गए।

खैर, अगले रोज का आकर्षण रहा था, भारतीय उच्च अध्धयन संस्थान शिमला। मेरे हिसाब से शिमला का नूर। हरी छतों वाला आलीशान भवन। उसके भीतर की भव्यता का अंदाजा बाहर से ही पर्याप्त रूप से हो रहा था। पीले अनगिनत बल्बों की रोशनी, बेशकीमती फानूस, लंबे-चौड़े लहराते राजसी पर्दे, दीवारों पर सजी अलौकिक तस्वीरें, चमकते फर्नीचर, बाहर से टुकड़ों-टुकड़ों में दिखता यह ऐतिहासिक वैभव और रौनक और कई कोणों से अजूबा किसी मर चुके अय्यार के रिहाइश का मालूम होता था। अनिल भाई ने खिड़की से दिखता एक गोलमेज दिखाया। बताया, यही वो मेज है, जिसे इतिहास की किताबों में दर्ज शिमला कांफ्रेंस के दौरान प्रयोग में लाया गया था। गोल, कुछ इस कदर कि एक ऐसे मोटे पेड़ के तने से तराशा गया कि एक साबुत बड़ी तश्तरी निकल आए। अच्छा, सच?

खरहे के रोयों की तरह मुलायम घासें चौतरफा करीने से पटी थी और उनके इर्द-गिर्द उतनी ही सलीके से सज्जनों के इंतजार में बेंचें भी। अनुशासित क्यारियों में पौधों पर रंग-बिरंगे जीवित सितारे नाच रहे थे। घूम रहे लोग कहते थे, वाह, क्या फूल हैं। 'फूल' कहीं के।

एक-ब-एक धूप गुल हो गई थी। मदमस्त बादल करीब के पहाड़ों पर इकट्ठा हो रहे थे। जाने कब शुरू हो जाएँ। बेकाबू हवाओं के अहाते के ऐतिहासिक पेड़ों से टकराने पर पैदा हुआ सुचारु संगीत उरूज पर था। इस तान पर पूरा हाता झूम रहा था। भवन के पीछे से पूरी घाटी नुमाया हो रही थी। आधी हरी, आधी अँधेरी। घाटियों में फैला एक साथ खतरनाक तरीके से संगठित इतना विराट और गहरा जंगल! खूब। जंगल के खिलाफ खड़े दुष्ट आक्रमणकारियों के लिए किसी करारे जवाब की भाँति।

यहाँ पहली बार आए लोग एक साथ हतप्रभ और भावविभोर हो रहे थे। आह्लादित और अवाक! मैं उनमें से एक था।

भवन के ठीक पीछे खड़ा पेड अपनी कचक हरियाली से बरबस मन मोह रहा था। इसके पत्ते जाने-पहचाने लग रहे हैं, नहीं क्या? कहाँ देखा है, कहाँ देखा है। 'मोहब्बतें में। शाहरुख खान इसी के पत्ते पर अपना प्रेम लिख कर ऐश्वर्या को देता है। वही चिनार का पेड़ है। बिल्कुल दुर्लभ। वो, प्लेट पर लिखा भी है। वही पत्ते हैं जी।' अनिल भाई ज्ञानी बुद्ध की तरह मुस्काए। वही तो। अब! मुझे भी चाहिए एक पत्ता जी। एक अकेला भी नहीं दिख रहा है नीचे गिरा हुआ। सूखा, हरा, पीला, नकटा कोई भी नहीं। अनिल भाई से मैंने ये सब कहा नहीं, लेकिन सबसे निचली टहनी की ओर हाथ बढ़ा उछलने लगा, कुछ चोरी से कि लोग एतराज न जताने लगें। चिनार का पत्ता, प्रेम का पत्ता। मेरे पास भी होना चाहिए। किताब में रखूँगा, सूख जाए तो प्रेम लिखकर प्रेमिका को दे दूँगा। क्या किशोरपना है जी! अनिल भाई लंबे हैं, उछले तो हाथ आ गए दो। हाय, मोती मिल गया जैसे।

और बस। शिमला का चार दिनी अध्याय इसी पत्ते के साथ खत्म। हम लौट गए। शाम की बस से दिल्ली वापिस होना था। सुबह घूमने निकलने के पहले ही इसकी तैयारी कर ली गई थी। शाम को हम अलग होते वक्त जार-जार भावुक हुए। जाहिर है।

हो आए शिमला, मिल गई कलेजे को ठंढक! मरीचिका भी कभी सच हुआ है, जो दीवाने हुए जाते हैं लोग। अरे सच मैं हूँ, समय मैं हूँ, व्यापक मैं हूँ। मुझसे कौन बाहर है और कौन होगा? मैदान की सिरफिरी गर्मी मेरा इंतजार कर रही थी और उसने मेरी सजा मुकरर्र कर दी। तेज ज्वर के साथ बदन दर्द। ले मर।

लेटे-लेटे बेहद असहाय सा मैं तभी से जिसको पा रहा हूँ, उसको आवाज लगा रहा हूँ कि कोई एक बार मेरी ये आपबीती सुन ले, पर क्या है कि सबको अपनी-अपनी पड़ी है न, अब कौन किसको सुनता है भाई? और कुछ ने थोड़ी देर मेहरबानी कर सुना भी तो कहने लगे, अरे ये क्या देखा? ये तो कुछ भी नहीं है। दिसंबर में जाओ, तब देखो मजा। बरफ नहीं देखा, छेः ठेंगा देखा। केवल शिमला गए? और मनाली, और कुल्लू? अरे मेरे पहाड़ों की तरफ चलो, ये मस्ती, ये मस्ती कि पूछो ही मत। मसूरी में जो है, कहीं नहीं। नेवर। बकवास है, असली और आखिरी जन्नत कश्मीर में ही है, कहे देता हूँ।

मुझे वो चार गपोड़ों वाला चुटकुला याद आ गया, एक गप्पी - मेरे पिताजी के पास ऐसी चादर है, ऐसी कि... रहने देता हूँ, आपने सुनी होगी।


End Text   End Text    End Text

हिंदी समय में मिथिलेश प्रियदर्शी की रचनाएँ