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अनुक्रम चौथा सप्तक की भूमिका पीछे     आगे


काव्य का सत्य और कवि का वक्तव्य

दूसरों की रचनाओं के लिए भूमिका लिखने का काम मुझे हमेशा कठिन जान पड़ा है। साधारणतया उसका कारण यह होता है कि वह एक औपचारिक काम होता है। प्रस्तुत संकलन की भूमिका औपचारिक काम तो नहीं है; चयन और संकलन स्वयं मैंने अपनी रुचि और योजना के अनुसार किया है और यदि संकलित कवि मुझे महत्त्वपूर्ण लगे हैं, उनकी रचनाएँ मुझे अच्छी लगी हैं तो उनके बारे में कुछ कहने में औपचारिकता अनावश्यक है। इसके बावजूद भूमिका लिखने का काम अत्यन्त दुष्कर जान पड़ रहा है। इसके कुछ कारण व्यक्तिगत हैं। फिर भी उनकी चर्चा से बचना उचित अथवा संगत नहीं होगा क्योंकि उससे संपादक के प्रति ही नहीं संकलित कवियों के प्रति भी अन्याय हो जाएगा।

पहले तीन सप्तकों के बाद यह चौथा सप्तक अपेक्षया लम्बे अन्तराल से प्रकाशित हो रहा है। इस लम्बी अवधि में हिन्दी में कविता प्रचुर मात्रा में लिखी गयी है। सब अच्छी नहीं है यह कहना किसी रहस्य का उद्घाटन करना नहीं है। और शायद अगर यह भी कहूँ कि प्रकाशित कविता का अधिकांश घटिया रहा है तो उसे पाठक एक अनावश्यक स्पष्टोक्ति भले ही मान लें, गलत नहीं मानेंगे। किसी भी युग के काव्य के बारे में ऐसा ही कहा जाता सकता है-अच्छा काव्य अनुपात की दृष्टि से थोड़ा ही रहता है। लेकिन इस लम्बे अन्तराल की रचना में एक अंश छाँटना- सैकड़ों कवियों में से केवल सात चुनना और फिर उनकी रचनाओं में से चयन करना-केवल इसलिए कठिन नहीं है कि कवियों की बहुत बड़ी संख्या में से सात कवि चुनने हैं। कठिनाई जितनी बाहर प्रस्तुत सामग्री में है उतनी ही चयन करने वाले के आभ्यन्तर परिवर्तनों में और उनके कारण कवियों के बदले हुए सम्बन्धों में भी है। निस्सन्देह प्रत्येक सप्तक के साथ यह कठिनाई कुछ बढ़ती गयी। तार सप्तक का जब प्रकाशन हुआ तो उसमेंकलित अन्य कवि सभी प्राय: मेरे समवयसी और साथी थे उनकी रचनाओं के चयन में एक सहजता थी। उनके बारे में कुछ कहना भी इसी कारण कम कठिन था। जब दूसरा सप्तक प्रकाशित हुआ तब भी परिस्थिति में कुछ परिवर्तन आ गया था, और तीसरा सप्तक में तो परिस्थिति स्पष्टत: बदली हुई थी। तार सप्तक एक हद तक सहयोगी प्रकाशन था जिसे सहयोगियों ने एक न एक दिशा देने के लिए संयोजित किया था; तीसरा सप्तक स्पष्टतया एक संपादक की काव्य-दृष्टि और उसके काव्य-विवेक का प्रतिफलन था।

इतनी बात तो चौथा सप्तक के बारे में भी सच है। और भी स्पष्ट कर के कहूँ कि यह घोषित रूप से, एक संपादक की काव्य दृष्टि, साहित्यिक रुचि और साहित्यिक विवेक का प्रतिफलन है। लेकिन तीसरा सप्तक के समय की अपेक्षा आज यह काम कितना कठिनतर हो गया इसकी ओर पाठक का ध्यान दिलाना आवश्यक है। शायद उस कठिनाई को स्पष्ट कर देने का सबसे अच्छा तरीका यही हो कि मैं यह स्वीकार करूँ कि पहले तीन सप्तकों का संपादन करते हुए मैं यह अनुभव करता रहा था कि मैं काव्य में कुछ ऐसी नयी प्रवृत्तियों का व्याख्याता और वकील हूँ, जिनके साथ मेरी पूरी सहानुभूति है। अर्थात् पहले तीन सप्तक मेरी दृष्टि में एक तरह के साहित्यिक आन्दोलन और युग-परिवर्तन के अंग थे। तीसरा सप्तक के बाद मुझे ऐसा जाना पड़ा कि वे नयी प्रवृत्तियाँ काव्यप्रेमी समाज में पूरी तरह स्वीकृति पा गयी हैं। ऐसी स्थिति में उनके लिए और आन्दोलन अथवा वकालत की कोई आवश्यकता नहीं रही। और मन ही मन मैं इस परिणाम पर भी पहुँच चुका था कि अब सप्तकों के क्रम में और कोई संकलन जोडऩा अनावश्यक हो गया है। बल्कि उसके बाद के कुछ वर्षों में तो ऐसा अनुभव हुआ कि स्वीकार की प्रक्रिया इतनी आगे बढ़ गयी है कि नयी रचनाओं का दोष देखना भी कठिन हो गया है : उस धारा में बह कर आने वाला सभी कुछ स्वीकार कर लिया जाता है और यहाँ तक कि पत्र-पत्रिकाओं के संपादकों को अपने विवेक से काम लेते डर लगता है! मैंने कहा कि किसी भी युग का समूचा काव्य-साहित्य समान रूप से अच्छा नहीं होता; कुछ अच्छी रचनाओं के साथ बहुत ही साधारण कोटि की या उससे भी निचले स्तर की रचनाएँ प्रकाश में आती रहती हैं। जिस स्थिति में पत्रिकाओं की बाढ़ हो और उसके साथ-साथ प्रतिमान सामने रखने वाली कोई सर्वमान्य पत्रिका न हो, साधारण और घटिया रचनाओं का प्रसार और भी बढ़ जाता है। लेकिन यह मान लेने के साथ इस बात का उल्लेख भी आवश्यक है कि तार सप्तक के संपादक को तीसरा सप्तक के बाद के युग की स्थिति से कुछ अतिरिक्त क्लेश इसलिए भी होने लगा कि वय के अन्तर के साथ संवेदन का अन्तर भी स्वभावत: बढऩे लगा। मैं नहीं जानता कि तार सप्तक के जो कवि आज जीवित हैं वे सभी इस बात को स्वीकार करेंगे या नहीं; लेकिन उन के स्वीकार न करने पर भी मैं तो यही मानूँगा कि यह बात उनके बारे में भी उतनी ही सच होगी।

ऐसी बढ़ती हुई दूरी अनिवार्य है और उसके साथ-साथ इच्छा रहते भी समानता का कठिनतर होते जाना भी स्वाभाविक है। इससे एक परिणाम तो यह निकलता ही है कि आज जो कविता लिखी जा रही है उसे अगर एक मुकदमे के रूप में प्रस्तुत करना है तो उसका वकील उसी में से निकलना चाहिए-आज जो लिखा जा रहा है उसका सच्चा वकील आज का लिखने वाला ही होना चाहिए। वैसे संकलन प्रकाशित होते भी रहे हैं, अभी हाल में दो-तीन हुए हैं। मुकदमे का विचार जिन्हें करना हो उन्हें अवश्य ही वे संग्रह देखने चाहिए और उनकी भूमिकाओं में अथवा कवियों के वक्तव्यों में दी गयी दलीलों का विचार करना ही चाहिए। लेकिन अगर मैं उस दरजे का वकील नहीं हो सकता तो इसमें एक अनिवार्यता है जिसे मैंन केवल स्वीकार करना चाहता हूँ बल्कि जिसकी ओर पाठक का ध्यान भी दिला देना चाहता हूँ। क्योंकि यह बात स्पष्ट हो जानी चाहिए कि चौथा सप्तक में जिन कवियों की रचनाएँ मैं चुन कर प्रस्तुत कर रहा हूँ उन का मैं प्रशंसक तो अवश्य हूँ, लेकिन उन्हें पाठक के सामने प्रस्तुत करते हुए उनके साथ एक दूरी, एक तटस्थता का भी बोध मुझमें है। मैं उन प्रशंसक हॅँ, मैं उनमें से एक नहीं हूँ-या हूँ तो उसी अर्थ में जिस अर्थ में किसी भी युग का कोई भी कवि किसी दूसरे युग के कवि के साथ होता है। कवियों की बिरादरी में भी किसी भी दूसरी बिरादरी की तरह एक बन्धन समकालीनता का होता है तो एक अनुक्रमिकता का। मैं नहीं चाहूँगा कि मेरी इस लाचारी का दंड संकलित कवियों को मिले। इस मामले में मेरी सतर्कता और बढ़ जाती है क्योंकि मैं जानता हूँ कि उनका जोखिम अधिक है। तीसरा सप्तक के बाद के लम्बे अन्तराल का एक परिणाम यह भी हुआ है कि चौथा सप्तक में रखे गये कवियों के बीच वयस की दृष्टि से काफ़ी अन्तर है। यह तो सम्भव था कि इससे बचने के लिए सभी कवि युवतर वर्ग में से चुने जाते; लेकिन उससे भी एक दूसरे प्रकार का अन्याय हो जाता-केवल बीच की पीढ़ी के छूट जाने वाले कवियों के प्रति नहीं बल्कि संकलित कवियों के प्रति भी, इसलिए कि पाठक उनकी रचनाओं का मूल्यांकन करते हुए उन कवियों को भी सामने रखता तो बीच के अन्तराल के प्रमुख कवि थे। यों तो अब भी यह सम्भावना बनी ही रहेगी क्यों कि सात की संख्या को सीमा बना लेने से कई कवि छूट जाते हैं। लेकिन यह बात तो पाठक बहुत आसानी से समझ सकेंगे।

पाठक को एक और बात याद दिला देना उचित होगा। कवियों का चयन करते समय एक बात यह भी मेरे ध्यान में थी कि जिन कवियों के एक से अधिक स्वतन्त्र संग्रह प्रकाशित हो चुके हैं उन्हें छोड़ भी दिया जा सकता है क्यों कि वे तो पाठक के सामने मौजूद हैं। मुझे यह प्रयत्न करना चाहिए कि जो अच्छे रचनाकार सभी अपेक्षया कम प्रसिद्ध हुए हैं उन्हें सामने लाया जाये। चौथा सप्तक के संकलित कवियों में से दो-तीन की रचनाएँ पुस्तकाकार छप चुकी थीं, लेकिन कारण चाहे जो रहा हो काव्यप्रेमी जनता के सामने नहीं आ सकी थीं। यह भी सम्भव है कि चयन की प्रक्रिया आरम्भ होने से लेकर इस पुस्तक के प्रकाशन तक की अवधि में संगृहीत और भी दो-एक कवियों के एकल संग्रह प्रकाशित हो जाएँ। मैं नहीं समझता कि उससे मेरा प्रयत्न दूषित होगा। मुझे तो प्रसन्नता होगी कि जिन कवियों को मैं उल्लेख्य मानता हूँ उनके नये स्वतन्त्र संग्रह सामने आ रहे हैं।

(2)

मैं कह आया कि तीन सप्तकों के प्रकाशन से मुझे वह प्रक्रिया पूरी हो गयी जान पड़ी थी जो नयी काव्य-प्रवृत्तियों की प्रतिष्ठा के लिए आवश्यक थी। मैंने यह भी कहा कि उसके बाद कभी-कभी ऐसा भी अनुभव हुआ कि गुण-दोष-विवेक अपना आधार खो बैठा है। ऐसा लगने लगा कि एक पक्ष की वकालत कर चुकने के बाद अब प्रतिपक्ष की ओर से भी कुछ कहना आवश्यक हो गया है। लेकिन कविता के प्रतिपक्ष का मेरे लिए तो कुछ अर्थ नहीं है-मैं सदैव सत्काव्य का समर्थक हूँ और बना रहना चाहूँगा। समकालीन काव्य के दोषों अथवा उसकी त्रुटियों का उल्लेख करूँगा तो प्रतिपक्षी भाव से नहीं, वरन् उसके श्रेष्ठ कर्तव्य को सामने लाने के लिए ही। और उसमें यह भी कहना उचित होगा कि काव्य के गुण-दोष की ओर ध्यान दिलाते हुए समकालीन आलोचना की त्रुटियों और उसकी एकांगिता को भी अनदेखा न करना होगा। इस एकांगिता ने नयी रचना का बहुत अहित किया है। उसने नये रचनाकार को दिग्भ्रमित किया है और पाठक को भी इसलिए पथभ्रष्ट किया है कि उसने पाठक के सामने जो कसौटियाँ दी हैं वे स्वयं झूठी हैं। नयी कविता ने एक बार फिर रचयिता और गृहीता समाज का सम्बन्ध स्थापित किया था, संचार की प्रणलियाँ बनायी थीं और खोली थीं। संकीर्ण और मताग्रही आलोचना ने फिर उन्हें अवरुद्ध कर दिया है। कवियों की संख्या कम नहीं हुई-हो सकता है कि कुछ बढ़ ही गयी हो-लेकिन कवि समुदाय पाठक अथवा श्रोता समाज के न केवल निकटतर नहीं आया है बल्कि उस समाज में उसने फिर एक उदासीनता का भाव पैदा कर दिया है। इसके कारणों की कुछ पड़ताल अपेक्षित है।

यह तो कहा जा सकता है कि आज की कविता में जो प्रवृत्तियाँ मुखर हुई हैं उन के बीज उससे पहले की कविता में मौजूद थे-उस कविता में भी जिसे प्रयोगवादी कहा जाता है और उसमें भी जिसे प्रगतिवादी नाम दिया जाता है। (दोनों ही नाम गलत हैं, लेकिन उस बहस में अभी न पड़ा जाए।) यह बात वैसे ही सही होगी जैसे यह बात कि प्रयोगवादी अथवा प्रगतिवादी प्रवृत्तियों के बीज छायावादियों में थे और छायावाद के बाद उससे पहले के इतिवृत्तात्मक काव्य में इत्यादि। ऐसा तो होता ही है क्यों कि कविता कविता में से ही निकलती है, लेकिन इसके कारण हम किसी एक युग अथवा धारा अथवा आन्दोलन की प्रवृत्तियों के गुण-दोष का विवेचन करते समय सारी जिम्मेदारी उसके पूर्ववर्तियों पर नहीं थोप देते। किसी भी युग के आग्रह उसी युग के होते हैं और उनकी जिम्मेदारी उसी पर होती है।

आज की कविता में वक्तव्य का प्राधान्य हो गया है। उसके भीतर जो आन्दोलन हुए हैं और हो रहे हैं वे सभी इस बात को न केवल स्वीकार करते हैं बल्कि बहुधा इसी को अपने दावे का आधार बनाते हैं। कविता में वक्तव्य तो हो सकता है और वक्तव्य होने से ही वह अग्राह्य हो जाए ऐसा भी नहीं है। लेकिन वक्तव्य के भी नियम होते हैं और उनकी अपेक्षा काव्य के लिए खतरनाक होती है। यह बात उतनी ही सच है जितनी यह कि काव्य में कवि वक्ता के रूप में भी आ सकता है, लेकिन उत्तम पुरुष के प्रयोग की जो मर्यादाएँ हैं उनकी अपेक्षा करने से कविता का मैं कवि न होकर एक अनधिकारी आक्रान्ता ही हो जाता है। आज कविता पर एक दावे करने वाला मैं बुरी तरह छा गया है। कविता में मैं भी निषिद्ध नहीं है, दावे भी निषिद्ध नहीं हैं, कविता प्रतिश्रुत और प्रतिबद्ध भी हो सकती है, लेकिन कहाँ अथवा कहाँ तक इन सबका काव्य में निर्वाह हो सकता है और कहाँ ये काव्य के शत्रु बन जाते हैं यह समझना आवश्यक है।

मंच पर हम नाटक देखते हैं तो उसमें आने वाला प्रत्येक चरित्र वक्ता होता है, उत्तम पुरुष में अपना वक्तव्य देता है, प्रतिश्रुत और प्रतिबद्ध होता है; हमारे सामने अभिनेता होता है, लेकिन हम देखते हैं तो अभिनेता को नहीं, उसके माध्यम से प्रस्तुत होते हुए चरित्र को। हम यह कभी नहीं भूलते कि हमारे सामने एक अभिनेता है, लेकिन फिर भी देखते हैं हम चरित्र को ही। अभिनेता कहता है मैं लेकिन वह मैं हमारे लिए चरित्र के वक्तव्य का स्वर होता है। ऐसी स्थिति में नाटक के डायलाग अत्यन्त काव्यमय भी हो सकते हैं। लेकिन उन्हीं शब्दों में वही वक्तव्य यदि अभिनेता द्वारा प्रस्तुत किये गये चरित्र का न होकर स्वयं अभिनेता का होता, मंच पर बोलने वाला मैं यदि वह चरित्र न होता जो होकर भी वहाँ नहीं है, उसके बदले में स्वयं अभिनेता होता तो बिलकुल $ज़रूरी नहीं है कि वही वक्तव्य उस स्थिति में भी हमें काव्यमय जान पड़ता या हमें सहन भी होता। अभिनेता द्वारा प्रस्तुत किये गये चरित्र को हम अपना वक्तव्य उत्तर पुरुष एक वचन में देने का अधिकार देते हैं; अभिनेता को वह अधिकार हम नहीं देते, यानी एक चेहरा, मास्क और पर्सोना हमें स्वीकार है, स्वयं नट हमें स्वीकार नहीं है।

वाक्य में इस बात का महत्त्व है। संस्कृत में काव्य का एक दृश्य रूप था और एक श्रव्य; काव्य दोनों ही थे। और पर्सोना अथवा अभिनेय चरित्र के साथ सम्बन्ध दृश्य काव्य में ही नहीं, श्रव्य काव्य में भी अपना महत्त्व रखता है। काव्य में बोलने वाला हर मैं पर्सोना होता है, अभिनेय चरित्र होता है। जब कवि स्वयं अपनी बात भी कहता है तो वह हमें तभी स्वीकार होती है-मैं कह सकता हूँ कि तभी सह्य भी होती है-जब वह कथ्य अथवा वक्तव्य प्रत्यक्ष रूप से कवि का न होकर एक पर्सोना अथवा अभिनेय चरित्र के रूप में उसका हो।

और इस अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात को आज की कविता के अधिसंख्य कवि भूल गये हैं और विस्मृति में आज के आलोचक ने उनकी सहायता की है। मास्क अथवा चेहरे अथवा मुखौटे के प्रति जिस अवज्ञा भाव को इतना बढ़ावा दिया गया है उसने यह भी भुला देने में हमारी मदद की है कि मुखौटे केवल धोखा देने के लिए नहीं बल्कि सच्चाई को प्रस्तुत करने के लिए भी लगाये जाते हैं। साधारण जीवन में मुखौटा फ़रेब है, लेकिन नाटक में वही मुखौटा एक वृहत्तर यथार्थ में हमें लौटा लाने में सहायक हो सकता है- ऐसे वृहत्तर यथार्थ में जिसका सामना शायद हम बिना मुखौटे के कर ही न सकें। सारे संसार के नाट्य से हम इस बात का प्रमाण पा सकते हैं-जहाँ भी साधारण सच्चाइयों से आगे बढ़ कर विराट् को स्थापित करने का प्रयत्न होता है, वहाँ मुखौटे आते हैं।

कविता के लिए-काव्य के श्रव्य रूप के लिए-इस बात का क्या महत्त्व है? यही कि वक्तव्य वक्तव्य होने के नाते अग्राह्य नहीं है, तब अग्राह्य हो जाता है जब उसमें केवल कवि-रूपी इकाई का मैं अथवा अहम् बोलता है। अग्राह्य नहीं तो महत्त्वहीन तो वह हो ही जाता है क्यों कि हमारा प्रयोजन कविता से है, कवि से नहीं, या कवि से है तो बिलकुल साधारण-सा।

और हर युग के महान् कवि इस बात को पहचानते रहे हैं। यह नहीं है कि कवियों ने अपनी भावनाएँ, अपने राग-विराग, अपनी लालसाएँ और आकांक्षाएँ व्यक्त नहीं कीं, लेकिन जब की हैं और काव्य रूप में की है तो किसी दूसरे चरित्र पर उनका आरोप करके। भक्त कवियों ने प्रेम अथवा विरह की जिन अवस्थाओं का वर्णन कृष्ण और राधा अथवा गोपियों के माध्यम से इतने मार्मिक ढंग से किया है, ऐसा नहीं है कि उन भावनाओं से वे अपने जीवन में अपरिचित रहे होंगे, लेकिन उन्हीं भावनाओं को वे अपनी, कवि की निजी, भावनाओं के रूप में प्रस्तुत करते तो वे न केवल श्रेष्ठ काव्य की कोटि में न आतीं वरन् असमंजस का कारण भी बनतीं-लगभग अश्लील जान पडऩे लगतीं। और भक्त कवियों तक ही क्यों सीमित रहें-कोई कह सकता है कि भक्ति की बात तो लौकिक और अलौकिक के बीच के सम्बन्ध की है-शुद्ध लौकिक स्तर पर रह कर हम रीति के कवियों का भी उदाहरण लें : वहाँ भी मैं कभी नहीं आता, नायक अथवा नायिका आती है, यद्यपि उन पर आरोपित भावनाएँ बिलकुल मानवीय हैं और माना जा सकता है कि कवि अथवा कवयित्री के निजी जीवनानुभव से सम्बद्ध रही हैं। वक्तव्य वहाँ है निजी और अन्तरंग, ऐसे भावों की अभिव्यक्तिभी है जो साधारण जीवन में सामने आने पर असमंजस का, अस्वस्ति भाव पैदा कर सकते हैं, लेकिन रीति काव्य के छन्दों में क्यों वे इतने ग्राह्य, इतने आकर्षक, इतने मार्मिक हो जाते हैं? क्यों कि वहाँ कवि मैं के रूप में आपके सामने नहीं आता। वह यह दावा नहीं करता कि यह मेरा भोगा हुआ यथार्थ है। भोगा हुआ तो वह अवश्य है, लेकिन जिसका भोगा हुआ है वह दावेदार बन कर आपके सामने नहीं आता, वह उसे एक-दूसरे को सौंप देता है।

इस सौंप देने का एक विशेष महत्त्व हैं। यह सौंप दे सकना अपने-आप में साधारणीकरण की एक कसौटी है। कवि जहाँ मैं के रूप में पाठक अथवा श्रोता के समक्ष होकर अपना वक्तव्य देता है वहाँ इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि वह वक्तव्य या उसमें प्रकट किये गये भाव अथवा विचार एक सार्वभौम सत्ता पा चुके हैं। दूसरे शब्दों में यह सिद्ध नहीं हुआ है कि वे बहुजन-संवेद्य हो गये हैं, सम्प्रेष्य हो गये हैं। उन्हीं को जब हम दूसरे चरित्र के माध्यम से-नायक अथवा नायिका अथवा पर्सोना के माध्यम से-प्रस्तुत करते हैं, तब इस कसौटी पर हम अपनी परीक्षा करवा चुके होते हैं।

तो एक बार अपनी बात मैं दोहरा दूँ। आज की कविता का बहुत बड़ा और शायद सबसे बड़ा दोष यह है कि उस पर एक ‘मैं’ छा गया है, वह भी एक अपरीक्षित और अविसर्जित मैं। आज की कविता बहुत बोलती है, जब कि कविता का काम बोलना है ही नहीं।

(3)

यदि यह कहा जाए कि आज कवि के पास सामान्यतया पिछली पीढ़ी के कवि से अधिक जानकारी होती है और वह साधारण जीवन की व्यावहारिक परिस्थितियों और आवश्यकताओं के बारे में अधिक सजग और सतर्क होता है तो इसे कोई आश्चर्यजनक स्थापना नहीं समझा जाएगा क्योंकि यह समूचे समाज के विकास की दिशा के अनुरूप ही है, और यदि इस व्यापकतर व्यावहारिक जागरूकता का एक पहलू राजनीतिक जागरूकता है तो वह भी स्वाभाविक है क्योंकि व्यावहारिक जीवन में राजनीति का स्थान और महत्त्व लगातार बढ़ता गया है। लेकिन जो बात चिन्त्य है वह यह कि कवि की राजनीतिक चेतना के साथ राजनीतिक मतवाद का आरोप कहाँ तक उचित है? क्या कविता को अनिवार्यतया किसी राजनीतिक सन्देश की वाहिका होना चाहिए? और जो कविता संकल्पपूर्वक किसी राजनीतिक मत का प्रतिपादन करने नहीं चलती वह क्या इसीलिए अनिवार्यतया घटिया हो जाएगी? क्या काव्य केवल एक साधन है?

सप्तकों की परम्परा में कभी इस बात को आवश्यकता से अधिक महत्त्व नहीं दिया गया कि संकलित कवियों के राजनीतिक विचार क्या हैं। राजनीतिक पक्षधरता को कभी कसौटी नहीं बनाया गया। चौथा सप्तक में भी उस कसौटी से काम नहीं लिया गया है और पाठक जानेंगे-जैसा कि संपादक भी जानता है-कि संकलित कवियों के राजनीतिक विचार और उनके राजनीतिक सम्पर्क अथवा आस्थाएँ बिलकुल अलग-अलग हैं। लेकिन इस बात पर बल देकर इस ओर भी ध्यान देना चाहिए कि आज का राजनीतिक और साहित्यिक वातावरण पहले से बहुत बदला हुआ है और राजनीति में मतवादों के साथ-साथ साहित्य में मतवादी चिन्ता का दावा बढ़ता गया है। शायद राजनीति में भी उसके कुछ दुष्परिणाम हुए हैं, लेकिन उनकी चर्चा को विषयान्तर मान कर छोड़ दें तो यह कहना होगा कि मतवादी साहित्य-चिन्तन ने काव्य का अहित ही किया है। साहित्य और राजनीति के सम्बन्धों की चर्चा तो पचास वर्ष पहले शुरू की गयी थी, लेकिन अपने प्रारम्भिक दिनों में प्रगतिशीलता का आन्दोलन उन सभी लोगों को साथ लेकर चलने का प्रयत्न कर रहा था जिनके विचारों को साधारण तौर पर प्रगतिशील कहा जा सके। उस दौर के कवियों को भी नये चिन्तन से प्रेरणा मिली और उनकी काव्य-रचना ने भी राजनीतिक आन्दोलन को बल दिया। उसके बाद कैसे बढ़ती हुई वैचारिक संकीर्णता और असहिष्णुता के कारण प्राय: सभी बड़े साहित्यकार एक-एक कर के निकाल दिये गये या स्वयं अलग हट गये और इसमेंसे कैसे आन्दोलन ही मृतप्राय हो गया, ये बातें समकालीन साहित्य के इतिहास का अंग हो गयी हैं। जिस काल की रचनाओं से चौथा सप्तक के कवि और उनकी कविताएँ ली गयी हैं उसमें फिर राजनीतिक पक्षधरता के आन्दोलन एक से अधिक दिशाओं में आरम्भ हुए और ध्रुवीकरण के नाम पर फिर एक व्यापक असहिष्णुता का वातावरण बन गया। आपातकाल ने एक लगभग देशव्यापी आतंक की सृष्टि की तो उसकी परिधि के भीतर विभिन्न प्रकार की असहिष्णुताएँ आतंक के छोटे-छोटे मंडल बनाती रहीं। आपातकाल की समाप्ति से आतंक का तो अन्त हो गया, लेकिन मतवादी असहिष्णुताओं के ये वृत्त अभी कायम हैं। चौथा सप्तक के सभी कवि इस परिस्थिति से न केवल परिचित रहे हैं बल्कि उसके दबाव का तीखा अनुभव भी करते रहे हैं और कुछ ने उसके कारण कष्ट भी सहा है। इसलिए अगर मैं कहूँ कि संकलित कवियों के राजनीतिक विचारों के अलग होते हुए भी एक स्तर पर वे एक सामान्य अनुभव की बिरादरी में आ जाते हैं तो यह कथन अनुचित न होगा और वह सामान्य अनुभव है एक स्वातंत्र्य का अनुभव। कवि के संसार की स्वायत्तता का एक बोध संकलित सभी कवियों की रचनाओं में मिलता है- कुछ में अधिक परिपक्व तो कुछ में कम, लेकिन सर्वत्र काव्य के स्वर में अपनी एक विशेष गूँज मिलाए हुए। यह कदाचित चौथा सप्तक के कवियों का-और उनके युग की अच्छी कविता का-विशेष गुण है। और आशा की जा सकती है कि एक सार्वभौम मौलिक मूल्य के इस आग्रह के कारण चौथा सप्तक की कविताएँ न केवल स्वयं लोकप्रिय हो सकेंगी वरन् कविता के प्रति जिस उदासीनता की बात मैंने पहले की है उसे भी कुछ कम कर सकेंगी।

(4)

मैं नहीं जानता कि संकलित सातों कवियों के बारे में अलग-अलग कोई समीक्षात्मक टिप्पणी अथवा संस्तुति मुझसे अपेक्षित है या नहीं। लेकिन अपेक्षित हो भी तो वह काम मैं अभी नहीं करने जा रहा हूँ। यों भी यही उचित है कि पाठक इन कवियों से साक्षात्कार करते समय और उनके काव्य-संसार में प्रवेश करते समय मेरे पूर्वग्रहों का बोझ न लेकर चले, मेरे चश्मे से न देखे। इसके अलावा मैं यह भी नहीं चाहता कि मेरी संस्तुतियों की प्रतिकूल प्रतिक्रिया का दंड इन कवियों को मिले-और मैं कटु अनुभव से जानता हूँ कि ऐसा प्राय: होता आया है! निश्चय ही जिस पीढ़ी या जिन दशकों से ये कवि चुने गये हैं उनमें और भी अच्छी रचनाएँ हुई हैं, पर उनका अथवा उनके कवियों का यहाँ न पाया जाना इस बात का द्योतक नहीं है कि मैं उनकी अवमानना करना चाहता हूँ। मेरा दावा इतना ही होगा कि संकलित कवि इस अवधि की अच्छी कविता का प्रतिनिधित्व करते हैं, कि उनकी रचनाएँ किसी बिन्दु पर आकर ठहर नहीं गयी हैं, बल्कि उनकी काव्य-प्रतिभा का अभी और विकास हो रहा है, कि इसीलिए मेरा विश्वास है कि निकट भविष्य में इन कवियों के कृतित्व की छाप समकालीन हिन्दी काव्य पर और गहरी पड़ेगी।

और यह बात संकलित कवियों के प्रति मेरी शुभाशंसा भी है, चौथा सप्तक के पाठक को मेरा आश्वासन भी।


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