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कविता

पिता के लिए
अमरसिंह रमण


बाप हमारे प्‍यारे-प्‍यारे, दुनिया भर से न्यारे हैं
लूला हैं या लंगडा़ हैं, अंधा है या बहरा हैं।
फिर भी बाप हमारे हैं। बाप हमारे प्‍यारे हैं। निर्धन हैं...

बडे़ प्‍यार से गोद खिलाया, पाला-पोसा दुनिया दिखावा
लाखों मुसीबत झेल-झाल के, अच्‍छी बातें हमें सिखाया
निर्धन हैं या काले हैं, गोरे हैं या भूरे हैं, फिर भी जनक हमारे हैं।
कोई कहता है बाबू इनको, कोई कहता है बाबा
कोई कहता है बाप-पिता और कोई कहता है दादा। निर्धन हैं...

फादर, पापा, दादा, बाबा, हैं एक समान।
अपने बाप को मानो सब कोई, इस धरती का है भगवान। निर्धन है...

 


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