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कविता

गमछे की गंध
ज्ञानेंद्रपति


चोर का गमछा
छूट गया
जहाँ से बक्सा उठाया था उसने,
      वहीं - एक चौकोर शून्य के पास
गेंडुरियाया-सा पड़ा चोर का गमछा
जो उसके मुँह ढँकने के आता काम
कि असूर्यम्पश्या वधुएँ जब, उचित ही, गुम हो गई हैं इतिहास में
चोरों ने बमुश्किल बचा रखी है मर्यादा
अपनी ताड़ती निगाह नीची किए

देखते, आँखों को मैलानेवाले
उस गर्दखोरे अँगोछे में
गंध है उसके जिस्म की
जिसे सूँघ
पुलिस के सुँघनिया कुत्ते
शायद उसे ढूँढ़ निकालें
दसियों की भीड़ में
हमें तो
उसमें बस एक कामगार के पसीने की गंध मिलती है
खटमिट्ठी
हम तो उसे सूँघ
केवल एक भूख को
बेसँभाल भूख को
ढूँढ़ निकाल सकते हैं
दसियों की भीड़ में

 


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