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कविता

बनानी बनर्जी
ज्ञानेंद्रपति


वह सो गई है बनानी बनर्जी !
लंबी रात के इस ठहरे हुए निशीथ-क्षण में
डूबी हुई अपने अस्तित्व के सघन अरण्य में एक भटकी हुई
मुस्कान खोजने
कमरे के एक कोने में टेबुल पर रखे उसके बैग में
छोटे गोल आईने कंघी और लिपिस्टिक से
लिपट कर सोई है उसकी हँसी दिन-भर हँस कर थकी हुई

उसकी सैंडिल अपने टूटे हुए फीते को
चादर की तरह ओढ़ कर
दरवाजे के पास लंबी पड़ी है
वह अभी कहाँ है क्यों है उसकी माँ नहीं जानती
इसके सिवा कि वह अभी सोई है कमरे के सबसे अच्छे कोने में
वह अभी कहाँ है कैसी है उसकी चिंतित दादी नहीं जानती
उसके सयाने हो रहे भाई नहीं जानते

उसकी नींद में वे नहीं झाँकते
अपने स्वप्न में सहमे वे देखते हैं उसे अपने स्वप्न में टहलते पशुओं को खदेड़ते
लेकिन अपने दुःस्वप्न को दुःस्वप्न की तरह झेल जाते हैं वे
उसकी नींद से अपनी नींद को बचा कर सोते हुए
उसके और उनके बीच की हाथ-भर दूरी में
रोटी, रजाई, ठंड और उमस है
उसकी नींद में सारी लोकल ट्रेनें स्थगित हो गई हैं
लोहे की पटरियों पर बर्फ गिर रही है
घर के भीतर उल्लास की तरह अँगीठी जल रही है
कुहरे में डूबी-लंबी-खाली बस को ड्राइवर गीत से भर रहा है
शरत बाबू से प्रार्थना करती है एक साँवली लड़की मुझ पर लिखो कहानी
कविता पढ़ती आँखें कहती हैं मुझ में हाँ मुझ में
सजल मेघ और उज्ज्वल रौद्र मिलते हैं
ट्राम में जगह मिल जाती है बैठने की
दो युवक खड़े हो जाते हैं
ठीक तभी दस्ताने में ढँका एक हाथ उठता है बटन दबाने को
सफेद दस्ताने में ढँका एक हाथ
वह देखती है उसे चीखती है नहीं-नहीं
आज दाँतों से वह भँभोड़ देगी उस हाथ को
आज अपने मन की करेगी

अपने स्वप्न से दबी उसकी छाती धड़कती है थोड़ी देर
उसकी छत के ऊपर चले आए हैं सप्तर्षि
उसकी लंबी साँस रात की लय में मिल जाती है
जिन बेटों को वह जन्म देगी वे उसकी नींद में मचलते हैं।

 


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