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कविता

विज्ञान-शिक्षक से छोटी लड़की का एक सवाल
ज्ञानेंद्रपति


एक बहुत छोटा-सा सवाल पूछा था विज्ञान-कक्षा की सबसे छोटी लड़की ने
पूछा था कि सारे आदमी जब
एक से ही आदमी हैं
जल और स्थल पर एक साथ चलकर ही
बने हैं इतने आदमी
तो एक आदमी अमीर
एक आदमी गरीब क्यों है
एक आदमी तो आदमी है
दूसरा जैसे आदमी ही नहीं है...

सारी कक्षा भौंचक रह गई थी
खटाखट उड़ने लगे थे फ्यूज
किवाड़ों में का लोहा बजने लगा था
विज्ञान-शिक्षक की आत्मा हाथ में लपलपाती छड़ी की तरह
दुबली हो गई थी
उनका मुँह खुल गया था              गुस्से में दुख में
एक पल को उन्होंने अपने भीतर शून्य देखा था
उम्र बीत गई आदमी की हड्डी-हड्डी को नस-नस को
उनके नाम से जानते
आदमी के दिल के दिमाग के जोड़-जोड़ को
भरी कक्षा में टुकड़े-टुकड़े खोलते
आदमी के रोम-रोम में झाँकते
उम्र बीत गई इस सवाल को कंठ में तेज प्यास की तरह
अचानक महसूस करते
पर दबा जाते घुड़क कर घुटक लेते
किसी आदमी से अकेले में भी कभी पूछ नहीं पाते

अपने भीतर के जिस सवाल को देखने से वे डरते रहे थे
अपने निर्भीक हाथों से
उसी सवाल को उनके रक्त से खींचकर
उस छोटी लड़की ने भरी कक्षा में
उनके आगे कर दिया था

वे एक पल को भयभीत हुए थे
उनका गला रुँध गया था
तभी अपने भीतर उन्होंने वह तड़प महसूस की थी
आदमी के बारे में पढ़ाते हुए
कक्षा को जिसके बारे में उन्होंने
कभी एक शब्द नहीं कहा था ।

 


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