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कविता

मकर संक्रांति के दिवस का शीर्षक
ज्ञानेंद्रपति


मकर संक्रांति के दिवस का शीर्षक
रात को मिलता है
देर से घर लौटते
जब सरे राह
स्ट्रीट लाईट की रोशनी का पोचारा पुते फलक पर
एक परछाईं प्रसन्न हाथ हिलाती है

वह एक पतंग है
बिजली के तार पर अटकी हुई एक पतंग
रह-रह हिलाती अपना चंचल माथ
नभ को ललकती
एक वही तो है इस पृथ्वी पर
पार्थिवता की सबसे पतली पर्त
जो अपने जिस्म से
आकाश का गुरुत्वाकर्षण महसूस करती है

 


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