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निबंध

श्रीलंका में रामकथा और शिव आराधना के पुण्य प्रसंग
श्रीराम परिहार


जीवन का पुण्य प्रगट हुआ। भारत से श्रीलंका की यात्रा पर जा सका। अखिल भारतीय साहित्य परिषद के देश के जाने-माने विद्वानों के ग्यारह सदस्यीय दल में, मैं भी एक हूँ। मन में उमंग है कि बचपन से रामचरितमानस में जिन रामकथा के प्रसंगों को पढ़ता-गुनता-कल्पना करता रहा हूँ, उन स्थलों को भर आँखों से देखने का अवसर है। उन स्थलों पर पाँव-पाँव चलने का सुख है। यात्राएँ उत्साहित करती हैं। यात्राएँ समृद्ध करती हैं। यात्राएँ आमंत्रित करती हैं। यात्राएँ स्वागत करती हैं। यात्राएँ भावों से आर्द्र करती हैं। यात्राएँ विचारों से संबल देती हैं। यात्राएँ निरंतर हैं। यात्राएँ कभी समाप्त नहीं होती हैं। समाप्त होने के बाद भी यात्राएँ मानस में जारी रहती हैं। यात्राएँ स्मृतियों में घुमड़ती रहती हैं। यात्राएँ यदा-कदा-हमेशा जीवन के आँगन में झाँकती रहती हैं। यात्राएँ संग-साथ चलती ही रहती हैं।

रामकथा मंदाकिनी, रामकथा कलि कलुष निकंदिनी, रामकथा कलि पन्नग भरनी, रामकथा सुंदर करतारी आदि-आदि पदबंधों के अरण्य-कपाट खोलने का बार-बार प्रयास करता हूँ। द्वार तक ही अटक जाता हूँ। शब्दार्थ की देहरी लाँघ, गूढ़ार्थ के अंतःकक्ष में प्रवेश नहीं कर पाता हूँ। वह अर्थ-गर्भ-कक्ष जहाँ मधुर-मधुर नीला प्रकाश दसों दिशाओं में फैला हुआ है। उस नील सरोरुह, नीलमणि, नील नीरधर श्याम-आलोक के वृत्त के भीतर सूरज-चाँद पृथ्वी-समुद्र, जल-थल-नभ, जीव-जंतु, कृमि-कीट, दग्गड़-पत्थर-वनस्पति जड़-चेतन, अग-जग सब कुछ समाया हुआ है। अरण्य-कपाट खुल भी जाते हैं, तो भी देहरी लाँघकर भीतर जाने में औत्सुक्य भय सामने आ जाता है। तब लगता है उस नीलाग्नि प्रस्फुटित अपरिमित ज्योति को दो भौतिक नेत्रों से क्या झेल पाऊँगा? बिनु गुरु होई कि ज्ञान, ज्ञान कि होई विराग बिनु।

देश और काल के ध्रुवों के बीच रामकथा के अन्वय को देखा और अनुभव किया जा सकता है। देश के संबंध में रामकथा के प्रसार को संकेतित करते हुए कहा है - 'रामकथा कै मिति जग नाहीं।' काल के संबंध में कही गई प्रमाणक बात को पढ़कर मति भौंचक रह जाती है - 'कलपभेद हरिचरित सुहाए'। आगे कहा गया है - 'राम अनंत अनंत गुन, अमित कथा विस्तार'। 'कल्प-कल्प लगि प्रभु अवतरहूँ।' यह एक युग, एक कल्प की कथा नहीं है। यह सृष्टि की सनातन कथा है। सृष्टि के रचियता का लीला विस्तार है। इसकी व्यापकता देश-काल में अवस्थित और उपस्थित समस्त जीव-सृष्टि में भी प्रमाणित की है - आकर चार लाख चौरासी, जाति जीव जल थल नभ वासी। सीय राम मय सब जग जानी। यह भाव भेद को मिटाकर 'आत्मवत् सर्वभूतेषू' की अखंड अद्वैतता प्रतिपादित करता है। इसलिए काल की निरंतरता के साथ-साथ रामकथा निरंतर हैं। यह इतिहास के कोट-कँगूरों के भीतर बँधकर साँस-उसाँस लेने वाली कथा नहीं है। यह सिंधु का संतरण कर देश की सीमाओं का अतिक्रमण करती राष्ट्र-बोध और राष्टधर्म की कथा है।

जैसे वायुमंडल में हवाओं के साथ रज-कण उड़ते चले जाते हैं - दूर-दूर, देश-विदेश तक। जैसे सुमनों की सुगंध दौड़ती चली जाती है - बागों, उपवनों, वनों, वतांतों, खेतों, पहाड़ों तक। जैसे माँ की ममता की यादें चली आती हैं - दूर देश-विदेश में सिसकते एकांतिक क्षणों तक। जैसे विद्वानों की कीर्ति फैलती चली जाती है - भौगोलिक सरहदों को लाँघती दूर-दूर तक सर्वत्र। जैसे सिंधु की सतह से उठकर बादल चला जाता है - पर्वतों-पहाड़ों, वनखंडों को पार करता हुआ - सूखी-प्यासी धरती तक। जैसे ऋतु का संदेश पाकर कोकिल कूकती है और भारतवर्ष की भूमि के पार तक आम्रपल्लवों से बौर झाँकने लगते हैं। वैसे ही रामकथा जनभावों की लहरियों पर आसीन होकर जन-गण-मन को जोड़ती हुई समुद्र पार तक चली जाती है।

समुद्र पार श्रीलंका है। यह भारतवर्ष का ही सुंदर अंग रहा है। अब स्वतंत्र देश है। श्रीलंका दक्षिण बिंदु है रामकथा का और अंतिम प्रसंग भी। राम की यात्रा, कीर्तियात्रा, जययात्रा, मर्यादायात्रा पुरुषोत्तमी यात्रा अयोध्या से प्रारंभ होती है और अपना उत्कर्ष श्रीलंका में प्राप्त करती है। अनगिनत काँकर-पाथर, सिकता-कण और माटी-कण श्रीलंका में रामकथा और शिव आराधना के पुण्य-प्रसंग उद्भाषित कर रहे हैं। उन्हीं के मुख से निस्रत मर्मकथा को सुनने के लिए मैं ठौर-ठौर ठिठक रहा हूँ। आर्द्र हो रहा हूँ। पूरित हो रहा हूँ। धन्य हो रहा हूँ।

ऊँ नमः शिवाय और श्रीराम शरणं मम् के साथ ही सर्वत्र बुद्धं शरणं गच्छामि, धम्मं शरणं गच्छामि के प्रार्थना-स्वर सुनाई देते हैं। इस पार भारत में रामेष्वरम् है। धनुषकोटि और मन्नारतलाई के तटों को रामसेतु जोड़ता है। मन्नारतलाई से भारत तक समुद्र में एक हल्की पतली-सी रेखा जल के तल में दिखाई देती है। यहाँ समुद्र उथला है। कहीं-कहीं भूमि के टुकड़े जल में डूबते-निकलते देखे जा सकते हैं। यहीं रामसेतु का स्थल है। यहीं रामसेतु के अवषेष हैं। यहीं समुद्र-पथ है। मन्नार श्रीलंका का वह तट है जहाँ रामसेना समुद्र पार कर पहली बार श्रीलंका की भूमि पर गर्जना करती है। अब यहाँ श्रीलंका की नौसेना का छोटा-सा किंतु सतर्क अड्डा है। यहाँ से रामेष्वरम् की दूरी मात्र 18 किलोमीटर है। समुद्र पार यहाँ से हल्का-हल्का भारत दिखाई देता है। प्रकाश-स्तंभ दिखाई देते हैं। समुद्र का विस्तार है। भारत-श्रीलंका दो भूमि-खंड हैं। समुद्र उन्हें जोड़ रहा है। एक हाथ से भारत और दूसरे हाथ से श्रीलंका को थपथपा रहा है। जल के मन में दीवार नहीं है। वह तरल है। इसलिए अभेद-अफाँक है। रामसेतु दोनों देशों का सांस्कृतिक सेतु भी है। सीताजी आकाश-मार्ग से रावण के द्वारा श्रीलंका ले जाई जाती हैं। राम भूमि मार्ग से सेतु पर चलकर श्रीलंका पधारते हैं।

तिरुकोणेश्वर समुद्र तट पाषाण-पर्वत पर घने वटों की छाया में बना शिव मंदिर है। इसके तीन तरफ गहरा-नीला समुद्र सोया हुआ है। समुद्र जब जागता है तो पाषाण-पहाड़ी के पैरों पर, कमर पर, जंघाओं पर थपेड़-थपेड़ चोट करता है। पहाड़ी अनादि काल से अडिग-अविचल है। महादेव गर्भगृह में बैठे हैं। दुनिया का दस्तूर और करतूत देख रहे हैं। शांत-निमग्न। लेकिन सब खबर है उन्हें। कौन किस भाव से आ रहा है। कौन दबे पाँव जा रहा है। कौन समर्पण पूजा लिए है। कौन आचमन तटस्थ भाव से है। कहते हैं यहाँ रावण की माताजी नित प्रति शिव-पूजन हेतु आती थी। माता चाहे रावण की हो या हमारी-आपकी; सबके मन की झबरिया में आस्था, श्रद्धा, विश्वास के पान, फूल, दधि, दूर्बा, अक्षत धरे रहते हैं। मंदिर में प्रशांत-शांति है। दीप जल रहे हैं। नंदी ध्यान मुद्रा में है। पुजारी आस्था से झुके-झुके हैं। परम शांत वातावरण है। कोई-पंडा-पुजारी की झिड़की नहीं। कोई चुटैया-दुपप्पा का आतंक नहीं। कोई दान-चढ़ोत्री की लूट-खसोट नहीं। दान की पेटी रखी है। श्रद्धा-धुले हाथ खीसे में जाते हैं। दान-पेटी में ठन्न से सिक्का ठनकता है। दो हस्तक सहज जुड़ जाते हैं। मस्तक सहज झुक जाता है। मंदिर में देववाणी गूँजती हैं - 'नमामीषमीषान निर्वाण रूपं, विभुं व्यापकं ब्रह्म वेद स्वरूपम्।

मन्नार के शिव मंदिर हो या तिरुकोणेश्वर का देवालय या कोलंबो का बाणेश्वर शिवालय हो, सबकी एक संस्कृति है। एक-सी पूजा-विधि है। बहुत शांत वातावरण है। भक्ति का अरथ इन मंदिरों में समझा जा सकता है। ईष्वर के व्यापकत्व का अनुभव किया जा सकता है। शिव मंदिरों में अधोवस्त्र में ही प्रवेश कर सकते हैं। ऊपरी वस्त्र को उतारना पड़ता है। पूजा-सामग्री में भारत के मंदिरों जैसा नारियल, प्रसाद, धूपबत्ती जैसा वहाँ कुछ नहीं है। बस फूल-फल हैं और संपूर्ण श्रद्धा-भक्ति है।

पूरा वातावरण शांत और स्वच्छ है। स्वस्थ और प्रशांत है। मंदिर प्रवेश के साथ ही देह भक्ति-भाव से रोमांचित हो जाती है। भक्ति मन से होती है। देह उस मन का भौतिक आधार है। श्रद्धालु सब अपने जैसे लगते हैं। भारतीय मुखमुद्राएँ, मुखाकृतियाँ, देहयष्टि और देहसौंदर्य से श्रीलंका के लोग-लुगाइयों की संरचना भिन्न नहीं है। तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, आंध्र और विशेष कर उड़ीसा के लोगों का रूप-रंग-स्वरूप जैसा ही तो श्रीलंका के लोगों का है। भेद राजनैतिक है। मनुष्य की आकृति और प्रकृति तथा संस्कृति में बहुत अंतर नहीं है। तमिल हिंदुओं के सारे जीवन-संस्कार सनातन धर्म के सोलह संस्कारों के अनुसार हैं। आकृति-प्रकृति देखकर सहज नहीं जान सकते कि श्रीलंका का यह भाई सिंहली है और यह हिंदू है।

बड़ा अनुपम प्रभाव है शिव का। कहाँ कैलाश मानसरोवर और कहाँ श्रीलंका दक्षिण तट स्थित बाणेश्वर। सब जगह शिव अपने शिवत्व से प्रकृति और मनुष्य की संस्कृति में दूज के चंद्रमा की आभा भर रहे हैं। चंद्रमौलि का यह देश चंद्रमा-सा उज्ज्वल और शीतल-शांत है। प्रकृति ने तो अवतार ही धर लिया है। श्रीलंका का चमत्कारिक प्रकृति परिवेश है। सघन और हराकच्च है पूरा देश। जनसंख्या का दबाव नहीं है। जितनी भूमि है उसी आदर्श अनुपात में आबादी है। कुल दो करोड़ लोग हैं यहाँ। इनमें से लगभग एक करोड़ तीस लाख सिंहली हैं। लगभग 40 लाख हिंदू (तमिल) हैं। शेष इस्लाम को मानने वाले, ईसामसीह को मानने वाले और अन्य हैं। मतलब कि यहाँ भगवान बुद्ध की, भगवान शिव की, भगवान राम की, अल्लाह की और ईसामसीह की आराधना के स्वर फूटते रहते हैं। अद्भुत शांत श्रद्धा भाव जन-मन में है। सब अपने-अपने पंथों के पूजा-स्थलों में मत्था टेकते हैं। जीवन का परम पा जाने के प्रयास में हैं।

श्रीलंका की हरित-तृण भूमि पर शिव-परिवार के सारे देवी-देवताओं के अनेक जगह मंदिर हैं। महामंगेश्वरम् में मीनाक्षी देवी (माता पार्वती) सुशोभित हैं। कतरगामम् के विशाल प्रांगण स्थित मंदिर में भगवान कार्तिकेय माता देवयानी और वलीअम्मा के साथ विराजित हैं। माणिक्य गंगा सरिता के तीर भगवान गणेश पूर्वाभिमुख होकर विशाल, सुंदर और वास्तुकला का अनुपम प्रतीक गणेश मंदिर में आसीन हैं। कार्तिकेय के क्षेत्र में मयूर बहुत हैं। घर, चौगान, मैदान, खेत, वन सब कहीं मयूर विहार करते देखे जा सकते हैं और कहीं भी, कभी भी उनकी कुहुक वाणी सुनी जा सकती है। बड़ा सम्मोहन होता है - जब पंख-पसार मयूर नाचता है। देवों ने प्रकृति को वाहन बनाया। देवों की गति सहज-सुलभ हुई। प्रकृति धन्य हो गई। पर्यावरणीय संस्कृति पुष्ट हुई। रे मनुष्य! यह सब देख; और अब भी चेत सके तो चेत रे मूरख।

पृथ्वी के मानचित्र में श्रीलंका एक छोटी-सी सुंदर नाव-सरीखा ही तो लगता है। चारों ओर उदधि और बीच में वानस्पतिक संपदा से समृद्ध श्रीलंका का भूमिखंड। श्रीलंका के माझी ने मनुष्य और प्रकृति को एक साथ समय की नौका पर बैठाकर सृष्टि-सिंधु के संतरण हेतु समझ की पतवार देकर भविष्य के प्रति आगाह और आष्वस्त कर दिया है। नौका महोदधि की तंरगों से अठखेलियाँ करती नील जलधि की सतह पर नीलगगन के नीचे हौले-हौले तैर रही है। अपने तट-लक्ष्य की ओर बढ़ रही है। प्रकृति और मनुष्य के संवादों को सुनना बहुत अच्छा लगता है। नारियल न होता तो पूजा अधूरी रह जाती। कदली फल न होता तो प्रसाद का पात्र सूना रह जाता। अक्षत (चावल) न होते तो देवता के भाल पर लगा तिलक मोतियों-सा न चमकता। आम न होता तो रस की गागर रीती रह जाती। कटहल और मुनगा न होते तो सांभर-सब्जी की कटोरी खाली रह जाती। चावल न होते तो भोजन की थाली सूनी रह जाती। अनन्नास, बेर, सीताफल और अमरूद न होते तो फलों की टोकरी अपने भाग्य को कोसती रह जाती। श्रीलंका के घर-आँगन में ये सब लहलहा रहे हैं। हरी सब्जियों की खेप की खेप खेतों-उद्यानों-बगीचों से आती हैं और बचपन के गालों पर लाली और पाँवों में गति भर देती है। प्रकृति ने अपने घर से श्रीलंका को जो अन्न और फल-सब्जियों का उपहार दिया उसे ही श्रीलंका ने नाना व्यजंनों और चटनी-अचार में अपने कौशल से रूपांतरित कर पेट के पोषण में देववस्तु के रूप में ग्रहण कर लिया। सचमुच ना! प्रकृति कितनी उदार है। धरती कितना देती है। बहुत-बहुत! खूब सारा! प्रकृति देवी को प्रणाम है। श्रीलंका की वनदेवी को अभिवादन है।

उस दिन अगहन सुदी पूर्णिमा थी। जिज्ञासा हुई आज इतने सारे लोग, लुगाई, बूढ़े, बच्चे पान-फूल आस्था लेकर देवालयों की ओर जा रहे हैं। पता चला प्रत्येक मास की पूर्णिमा को श्रीलंका में अवकाश रहता है। यह भी ज्ञात हुआ कि श्रीलंका और भारत के पंचाग, तिथियों और समय में कोई अंतर नहीं है। सब कुछ संवत्सर के अनुसार ही संस्कार संपन्नता होती है। भारत और श्रीलंका के घड़ी समय में और दिन-रात के चक्र में कोई अंतर नहीं है। भारतीय संवत्सर की तिथियों के अनुसार ही तिथियाँ और उससे जुड़े अनुष्ठान हैं। काल की एक ही सरणी में दोनों देशों के भावानुष्ठान और सामाजिक संदर्भ पूर्णता पाते हैं। समय और मानव प्रकृति की अनेक समानताएँ दोनों देशों को बड़े-छोटे भाई सिद्ध करती हैं। देवालयों में दर्शन की लालसा और अपने देव के प्रति मौन समर्पण भी दोनों को मंदिर परिसर की एक ही पाँत में खड़ा करता है। भारत के दक्षिण की मिट्टी और श्रीलंका की माटी का रंग-रूप एक-सा है। प्रकृति एक-सी है और बहुत कुछ संस्कृति भी एक-सी है।

श्रीलंका में भ्रमण करते कहीं ऐसा नहीं लगता कि हम भारत से बाहर हैं। घर-द्वार, आँगन-चौगान, खेत-वन, पर्वत-नदी, समुद्र-पेड़-पौधे, हाथी-घोड़े, चिड़ी-चिड़कली, रेल-मोटर, सड़क-पगडंडी, मंदिर-मूर्ति सब कुछ, बहुत कुछ भारत जैसा ही है। वट वृक्षों के समूह, बोधिवृक्षों (पीपल) का दिगंतव्यापी शाखा-प्रशाखीय विस्तार, नीमों की शीतल पर्यावरणीय विशुद्ध औषधीय प्रस्तुति भारत-श्रीलंका की समान वानस्पतिक वंशावली प्रकट करते हैं। श्रीलंका के व्यक्ति की सिधाई प्रणम्य है। सहयोग और सहकार मन को जीत लेता है। गौमाता देशी भी हैं और जरसी भी। ऊतरी श्रीलंका में कहीं-कहीं जरसी गायें है; मध्य और दक्षिण श्रीलंका में झटक देशी गायें ही हैं। दक्षिण श्रीलंका में बकरियों-गाडरों के रेवड़ भी हैं और भैसों के समूह भी। साँझ ढले चरवाहा उसी तरह गायों-भैसों को चराकर वापस लाता है, जैसा भारत में; पर श्रीलंका में साँझ के समय गोधूलि नहीं उडती, क्योंकि यहाँ की मिट्टी रेतीली है और सड़क तथा पैदल पथ को छोड़कर एक अंगुल धरती भी हरियाली से रहित नहीं है। या तो वानस्पतिक हरियाली है या जलीय प्रसार। नदी, नद, सरोवर, समुद्र बार-बार यात्रा में भुजभर भेटने को आतुर-आकुल से खड़े हैं। मन इनमें खो जाता है। सम्मोहन के बिंदु पर स्थिर होकर पाता हूँ कि यह सब एक ज्योति का सकल पसारा ही तो है। राम की सुध आती है। नयन भर-भर आते हैं।

नावेरा एलिया में अशोक वाटिका है। माता सीता निर्झरणी के तीर वन में उदास प्रतीक्षारत बैठी हैं। हनुमान जी विषण्ण मुख मर्यादित खड़े हैं। आगे वह स्थल है जहाँ माँ वैदेही को अग्नि-परीक्षा देना पड़ी है। वह स्थल अभी भी लगता है कि माता की अग्नि-परीक्षा का साक्ष्य दे रहा है। सीता की खोज करने आए पवनतनय जिस पर्वत पर प्रथमतः उतरे; वह अभी भी 'पवनतनय बल पवन समाना' की कथा बाँच रहा है। श्रीलंका के दक्षिण का सिंधु-तट हनुमान जी की पूँछ बुझाते समय जल गए, काले स्याह पड़ गए पत्थरों, चट्टानों, शिलाखंडों की अग्नि-कथा कह रहा है। समुद्र बार-बार उन्हें पानी में डुबोता है, मानों उनकी जलन, तपन, पीड़ा को शीतलता से शांत कर रहा हो। उपचार कर रहा हो। यह पयोधि तब से लेकर आज तक उस धरती, उन शिला-ढूहों का शाप-ताप शमन कर रहा है। युद्ध के बाद रावण चिरनिद्रा में रावणगुफा में सो रहा है। रावण-प्रपात रावण के समय से अब तक न जाने कितनी जलराशि समुद्र को सौंप चुका है। शिवगिरि का पाषाण-पर्वत अभी भी रावण के महल, रनिवास, राजदरबार के खंडहर-अवशेष को धारण किए हुए है। वन, बाग, उपवन, वापिका, सर, कूप, वापी, खाई, चौहद्दी, कोट-परकोट के शेष-अवशेष रावण के वैभव की अशेष कहानी कह रहे हैं। उस हजारों मीटर उच्च पाषाण शिखर पर से चारों ओर दृष्टि दौड़ती है, तो लगता है संपूर्ण लंका द्वीप में ही रावण की लंका का विस्तार रहा होगा। 'गिर त्रिकूट ऊपर तँह लंका' समूचा द्वीप ही त्रिकूट पर्वत कहलाता होगा। यहाँ से चहुँ ओर दृष्टि जाती है तो दूर-दूर तक फैली सघन हरितिमा आच्छादित ऊँची-ऊँची पहाड़ियों और पर्वत शिखरों से सहज ही प्राकृतिक रूप से सुदृढ़ और सुरक्षित राजमहल, राजवंश, राजसत्ता सामरिक प्रभुता का प्रतिभास होता है। रामकथा से संदर्भित श्रीलंका में स्थित स्थलों का रूप-स्वरूप भले ही समय की झोंक और झकोरों में बदल गया हो, पर यह सुनिश्चित है कि स्थल वही हैं। प्रत्यक्ष दर्शन से अनुभव भी यही होता है और अनुभूति मुखर हो उठती है - 'लंका कोट समुद्र-सी खाई, जात पवनसुत बार न लाई।' कोलंबो स्थित विभीषण मंदिर के पृष्ठ भाग पर लक्ष्मण जी इसी लंका का विभीषण को राज्य सौंपते हुए राज्याभिषेक कर रहे हैं।

अनुराधापुरम् श्रीलंका की प्राचीन राजधानी रहा है। सम्राट अशोक के द्रवित होने और बुद्ध की करुणा से एकमेक होने के बाद अपने बेटे महेंद्र और बेटी संघमित्रा को बोधिवृक्ष की शाखा लेकर श्रीलंका भेजता है। महेंद्र-संघमित्रा बोधिवृक्ष को श्रीलंका में लाकर रोपते हैं, वह स्थल यही अनुराधापुरम है। सैकड़ों एकड़ विस्तार है - परिसर का। इसमें विशाल और विराट बौद्ध स्तूप है। मैंने अपने जीवन में प्रत्यक्षतः और चित्रों में इतना आत्मबोध-आत्मशांति प्रदायक स्तूप इससे पहले नहीं देखा। धन्य भाग्य जो इन स्थलों को नयन भर देख रहा हूँ। पुण्य भाग जो इन स्थलों तक चलकर पाँव आए हैं। भगवान बुद्ध की अमरवाणी चारों ओर गूँज रही है। सूर्य अस्ताचलगामी हो रहा है। स्तूप पर से नीले सांध्य पीताभ आकाश में पश्चिम की ओर सरकता-डूबता दिनकर चेतना को अपने से जोड़ लेता है। भीतर पीली-झिलमिल आलोकाभा अनुभव करता हूँ। भगवान बुद्ध को नमन और भगवान भास्कर को प्रणाम। चित्त संपूर्ण परिसर में पसर जाता है। उस पुरातन किंतु चिरनवीन बोधिवृक्ष की परिक्रमा का पुनश्चरण पूरा करता हूँ। भगवान बुद्ध की करुणा धरती पर बिछ जाती है। उनका संदेश संपूर्ण आकाश में भर उठता है - 'संसार दुखमय है। दुःख का कारण तृष्णा है।' संपूर्ण मानव जाति को नया आत्मबोध हुआ। धर्म की नई व्याख्या मिली। बुद्धवाणी का धम्मपद में प्राकट्य हुआ। मानव जाति नए पंथ पर चल पड़ी। पुराना-निरर्थक पीछे छूट गया। भगवान बुद्ध की वाणी से करुणा की सरिता बह चलती है। बह रही है।

ग्यारह प्रसिद्ध कल-कल निनादिनी नदियों का वह देश। गिरि शिखरों, निर्झरो-गह्वरों, वन-खेतों का वह देश। सिंधु का आशीर्वाद और दुलार पाता वह देश। जलनिधि के अनेक-अनेक सौंदर्यं-बिंदु और अनेक रूप-स्वरूप से स्वयं को शृंगारित करता वह देश। चाय के बागानों की चादर ओढ़े वह देश। अपने श्रम और सद्भाव में ठोस और साफ-सुथरा, स्वस्थ-स्वच्छ वह देश। अपने विश्वविद्यालय में तमिल, सिंहली, हिंदी की त्रिवेणी सहित अनेक मानविकी विषयों की जलधाराओं से ज्ञान-क्षेत्रों को सिंचित करने वाला वह देश। सिंधु सिकता के बिछौने पर पाँव-पाँव चलने वाला वह देश। नौका पर सवार होकर दिन-दिन भर मछरियों की चाहत में जल की सतह पर तैरने वाला वह देश। आधुनिक विश्व की तरह ही स्वयं को भी हर क्षेत्र में विकसित-समृद्ध करने वाला वह देश; वहीं रह जाता है, जहाँ वह सैकड़ों-हजारों वर्षों से है। इतना बड़ा-सुंदर वह देश मेरे मन की मंजूषा में, स्मृतियों के साथ समा गया है। हवाई जहाज ने उड़ान भर ली है। मेरे साथ ही रामकथा के स्थल-प्रसंगों को लेकर वह स्वर्णाभ वाला देश संग साथ चला आया है। वह कह रहा है - हमारी भूमि और हमारी संस्कृति बहुत-बहुत समान हैं। आओ साथ बैठते हैं। फिर साथ-साथ चलते हैं - नई दिशाओं की ओर।

इति शुभम्।


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हिंदी समय में श्रीराम परिहार की रचनाएँ