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कविता

गीत नहीं गा पाता हूँ मैं
गिरिधर करुण


अब तो अपने गीत नहीं गा पाता हूँ मैं।
जाना चाहूँ जहाँ नहीं जा पाता हूँ मैं।।

         सहज नहीं रह गया
         रोज का मिलना-जुलना,
         बेहद मुश्किल लगता है
         कुछ कहना-सुनना,
अपनी इस परवशता पर पछताता हूँ मैं।

         चुपके-चुपके सबकुछ
         कितना बदल गया है,
         अचरज है दरपन
         शबनम सा पिघल गया है,
अपनी ही परछाई से डर जाता हूँ मैं।

         किसको किससे मतलब
         किसको किसका गम है,
         मेरा मन वृंदावन
         उनका तो संगम है,
मेहँदी रची गदोरी सा सुख पाता हूँ मैं।

         कहने को तो सब अपने हैं
         कौन पराया,
         अपना होने का किसने
         विश्‍वास दिलाया,
अपनी इस तनहाई से घबराता हूँ मैं।

 


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