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कविता

दिन बौना हो गया
गिरिधर करुण


दिन बौना हो गया
सुबह-शाम की दूरी
नापता हुआ सूरज
कछुवा था,
मृगछौना हो गया।

लंबी पतली सुई की तरह
तनी हुई चुभती थी जो किरन
अगहन आते ही
उसका गौना हो गया।

पलिहर के बानर को
सूझता नहीं नर्तन
ऊधो के निरगुन की
फॅसरी में है गरदन,
नदी-ताल गीत हुए
छठ के संगीत हुए
ओस चाट कर गेंहुवन
अब तो अतीत हुए,
धूप दूर से कनखी मारती
गतर-गतर सिहरावन दागती,
शीत के प्रकोप से बचाने में
गिरवी घर का गहना हो गया!

 


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