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उपन्यास

सल्तनत को सुनो गाँववालो
जयनंदन


केन्द्र :

एक बुर्कापोश परिवार की लड़की और एक हलजोतवा काश्तकार के बेटे की मुहब्बत।

परिधि :

• एक गाँव का साल दर साल बदहाल और बदइंतजाम होते चला जाना।

• बयालीस साल पहले बनी एक नहर, जिसने इलाके में हरित क्रांति कर दी थी, धीरे-धीरे ध्वस्त हो गयी।

• पच्चीस साल पहले लायी गयी बिजली के सिर्फ अब गड़े हुए खम्भे बच गये हैं।

• स्टेशन पर जहाँ अनेकों गाड़ियाँ समय पर आकर आवागमन उपलब्ध कराती थीं, अब इक्की-दुक्की आती हैं और जो आती भी हैं उनका कोई टाइम-टेबुल नहीं होता। क्या अब सिर्फ वही स्टेशन आबाद रहेगा जहाँ से होकर दिल्ली, पटना अथवा अन्य महानगरों के लिए गाड़ियाँ गुजरती हैं?

• इलाके की प्रसि़द्व चीनी मिल बंद कर दी गयी, जिससे किसानों को आर्थिक संबल देने वाली गन्ने की मुख्य उपज बेमानी हो गयी।

• देश बँटा फिर भी धर्म और जाति के आधार पर तब गाँव नहीं बँटे। अब आजादी के पचास साल बाद और नयी सहस्राब्दी के दरवाजे पर गाँव मजहब ही नहीं बल्कि अगड़े-पिछड़े और विभिन्न जातियों के आधार पर बनने-बँटने लगे।

• प्यार करने वाली लड़की नहर को दुरुस्त करने की माँग को लेकर आमरण अनशन पर बैठ गयी। बुर्के की सरहद से निकलकर सार्वजनिक हित में नेतृत्व की इस पहल पर पूरा इलाका एक हर्षमिश्रित आश्चर्य से भर उठा। वह मरणासन्न स्थिति पर पहुँच गयी, फिर भी प्रशासन या सरकार के किसी गुर्गे में कोई सुगबुगाहट नहीं हुई। लड़के ने कहा, 'अनशन तोड़ दो, सल्तनत। यह अंग्रेजों का राज नहीं है जब गांधी जी के उपवास और असहयोग अवज्ञा आंदोलन की भी नोटिस कर ली जाती थी। पिछले दस-पन्द्रह सालों में ऐसे बहुत कम उदाहरण हैं कि माँगें बिना टेरर और मिलिटेंसी के, बिना भारी नुकसान हुए पूरी हो गयी हों। आखिर अब हमारे पास बेहिसाब गोली, बम, बारूद है.....इनसे जब तक रेल की पटरी न उड़े, विस्फोट न हो, लोग न मरें...सरकार को क्यों जागना चाहिए?'

वृत :

सल्तनत ने पहली बार सुई-धागा पकड़कर एक रूमाल सिला था और उसमें क्रोशिए द्वारा उर्दू एवं हिन्दी के बूटेदार हरूफों में कशीदाकारी करके लिखा था - भैरव ।

भैरव को वह रूमाल भेंट करते हुए एक दिव्य अनुभूति से उसका चेहरा खिल उठा था। भैरव को लगा था जैसे सल्तनत रूमाल नहीं अपनी कोई बड़ी सल्तनत सौंप रही है। उसने रूमाल को चूम लिया था तो सल्तनत को लगा जैसे उसे सचमुच की आज कोई बड़ी सल्तनत मिल गयी।

दोनों ने एक-दूसरे को मुग्ध एवं आसक्त होकर यों निहारा जैसे एक दिल हो तो दूसरा धड़कन।

वे दो जिस्म एक जान होने की मंजिल के सफर में आगे बढ़ चले। उनके सपने...उनकी कल्पनाएँ...उनकी भावनाएँ क्रमशः अंतरंग, एकाकार और अविभाज्य होती चली गयीं। आपस में सुख-दुख का वार्तालाप तथा दुनियादारी का विमर्श एक राग की प्रतीति देने लगा जैसे तबले और सितार की लयात्मक जुगलबंदी हो। जिंदगी हसीन है, इसका एहसास और भरोसा एक बड़ा आकार लेने लगा...बावजूद इसके कि उनके अपने-अपने खाते में कई निजी तकलीफें और रुकावटें थीं तथा गाँव के सामूहिक खाते में भी कई तरह की परेशानियाँ और नाइंसाफियाँ थीं।

इन्हें ऐसी ही बेसुरी और खुरदरी चीजें जोड़कर रखने लगीं। इन्हें इन सबसे जूझना था और इनके समाधान के लिए जद्दोजहद करना था। जद्दोजहद ही इनकी मुहब्बत की बुनियाद थी।

यह बुनियाद वहाँ से शुरू हुई जब सल्तनत के मझले मामू कामरेड तौफीक मियाँ ने भैरव के भीतर निहित उस ऊष्मा को पहचान लिया जो एक ईमानदार और जुझारू आदमी के भीतर होती है।

सल्तनत की तेज-तर्रार और तीक्ष्ण मेधा को परखते हुए उन्होंने पढ़ाई के प्रति एकाग्रचित होने की सलाह देते हुए कहा था, 'प्रभुदयाल का बेटा भैरव तुम्हें मैट्रिक पास कराने में मदद कर सकता है। मैंने उसे जाँचकर देखा है, उसकी सलाहियत और शराफत का अपना एक अलग अंदाज है।'

सल्तनत को जैसे मुँह माँगी मुराद मिल गयी हो। खुश होते हुए उसने इसरार किया, 'मुझे किसी भी तरह मैट्रिक पास करना है, मामू। बड़े मामू की बंदिशों से मुझे निजात दिलाइए। वे कहते हैं कि मैं जवान हो गयी हूँ, स्कूल नहीं जा सकती। मुझे समझ में नहीं आता मामू कि हमारा जवान होना गुनाह क्यों बन जाता है कि हम कहीं खुलेआम आने-जाने के काबिल नहीं रह जाते। कितना बुरा हुआ कि आपा, अम्मी, खाला, ममानी आदि सभी जवान हो गयीं। ये सभी घर में बंद रहती हैं और अब मैं भी....।'

कामरेड तौफीक ने कहा था, 'बुर्का और बंदिशें हमारी तंगदिली का सरंजाम हैं, सल्तनत। बड़े भाई अब इस उम्र में इस जहनियत से शायद ही निकल पायें। तुम उनको लेकर मगजपच्ची में न पड़ो। तुम पढ़ना चाहती हो, पढ़ो। मैं तुम्हारे साथ हूँ।'

'तो भैरव मेरी मदद कर देगा...बड़े मामू इसकी इजाजत दे देंगे?' सल्तनत भैरव को अब तक काफी जान चुकी थी कि पढ़ने में वह काफी जहीन है और दुनियादारी की गहरी समझ रखता है।

'मैं उन्हें समझा दूँगा और भैरव भी मेरा कहा नहीं टालेगा।' तौफीक ने आश्वस्त किया।

यहीं से भैरव और सल्तनत एक-दूसरे को किताबों के जरिये समझने लगे और करीब आने लगे। शफीक मियाँ जिद्दी, खुर्राट, दकियानूस और दीनपरस्त इंसान थे, इसलिए भैरव का आना उन्हें नागवार गुजर जाता था। गाहे-ब-गाहे वे बिदक पड़ते थे कि आखिर सल्तनत और कितना पढ़ेगी?

सल्तनत अदब से कह देती, 'छोटे मामू से पूछ लीजिए, जिस दिन वे मना कर देंगे, मैं पढ़ाई छोड़ दूँगी।'

शफीक मियाँ की यह मजबूरी थी। वे तौफीक के कहे को नकार नहीं सकते थे, चूँकि सभी भाइयों में एक यही थे जो उनका एहतराम करते थे और हर आड़े वक्त में रुपये-पैसे तथा इ