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कविता

परदे से झाँकता डर
अर्पण कुमार


एकदम से
नहीं खिल उठता कोई फूल
संगीत का आलाप भी
क्रमशः उठान लेता
पहुँचता है शिखर तक
नशा, सौंदर्य, गंध और नाद
जिसका हो
सर चढ़कर बोलता है
मगर हौले-हौले
सूखा पहले तो
अधगीला ही होता है न!
और फिर भींगता है
कण-कण
सराबोर
पानी की बौछारों को
समाकर अपनी सूखी चादर में
खेत पहुँचाते हैं
मिट्टी की सोंधी महक
हमारे नासिका-पुटों तक
मगर इसमें भी
कुछ देर का इंतजार तो
लाजिमी ही है न!
इनसान हो या धरती
बारिश भी
एक झटके में सराबोर नहीं करती
किसी को
पानी को चीरना
हवा में तैरना
और पहाड़ को
लाँघना भी हमें आया
तो सदियों की
मानवीय उर्वरता का उद्विकास
उसके पीछे है
और उसमें निरंतर
बेहतरी की गुंजाइश
बची है आज भी

नफरत प्रेम में
और प्रेम नफरत में
बदलता चला जाए
कब किस तरह
इसका अंदाजा भी
अक्सरहाँ देर से ही होता है

ये जगजाहिर दृष्टांत हैं
और अपने बचाव में
मैं इनका कोई आलंबन नहीं ले रहा
हाँ, हवाला दे इनका
मैं अपने आस-पास
किसी एक बाजू
थोड़ी जगह
कोरी रखना चाहता हूँ
अछूती और अनजान

अगर मैं
अपने साए से भी
यह उम्मीद करता हूँ कि
वह हरदम
मेरा हमकदम बनकर न चले
तो ऐसा नहीं कि
मैं झूठा या अविश्वसनीय हो उठा
हाँ, गोपनता को
मैं थोड़ी पसंद करता हूँ
या यूँ कहें कि
मैं किसी के सामने
धीरे-धीरे खुलना चाहता हूँ
या यूँ कहें कि
मैं किसी के सामने
धीरे-धीरे खुलना चाहता हूँ
और संभव है कि
ऐसा करते हुए
कहीं मेरे अंदर का 'कायर' भी
कदाचित एक संरक्षण
महसूस करता हो
बेशक उसका सुरक्षा-बोध
उस कछुए का ही
क्यों न हो
जो अपने ही खोल में छुपकर
स्वयं को निरापद
समझने के
एक भोले भ्रम में जीता है

कई चीजों में
कई लोगों के सामने
संभव है
मैं एकदम से
नहीं खुलता
नहीं खुलना चाहता,
मुझे अच्छा लगता है
अपने दाएँ और बाएँ हाथ के बीच
अपनी गर्दन घुसा लेना
यूँ झुकी गर्दन को
मेरी परदादारी समझें
या मेरा डर -
यह आपके ऊपर है

 


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