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कविता

आर्टस फैकल्टी
अर्पण कुमार


एक बड़ा सा समूह था...
कुछ लोग मौके-बेमौके
खेमे बनाते चले गए...
इस तरह छोटे-छोटे कई उपसमूह हो गए

अब हमारा भी एक उपसमूह है
लेकिन ठहरिए
यह अलगाव की नीयत से बना
कोई उप-समूह नहीं है
यह उसी बड़े से समूह का अवशेष है
जिसके कुछ लोग
किसी भी खेमे में नहीं गए

 


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हिंदी समय में अर्पण कुमार की रचनाएँ