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कविता

कुआँ
अर्पण कुमार


कुआँ कब का सूख चुका
देखते-देखते बहुत नीचे जा चुका है
जल-स्तर हमारे गाँव का
खेतों में पटवन के लिए
जैसे-तैसे पैसों का इंतजाम करके
करवाए गए बोरिंग भी
एक-एक करके कब के फेल हो गए हैं
दो-दो साल लगातार
बारिश भी तो नहीं हुई
अपने इलाके में

रिटायरमेंट के बाद पिता
गाँव में ही रहना चाहते थे
मगर किसी का चाहा
पूरा हो ही जाए
यह इतना आसान और अपने वश में कहाँ है...
पित्ताशय का कैंसर
अपनी अंतिम अवस्था में प्रकट होकर
ऐसा जानलेवा साबित हुआ कि
बमुश्किल छह महीनों के भीतर
एक भरे-पूरे व्यक्ति को
उसके परिजनों की उपस्थिति में
पूरी ढीठता और निर्ममता के साथ
या कहें कुछ अप्रत्याशित और रहस्यमय ढंग से
कुछ यूँ निगल गया
जैसे हमारी आँखों के सामने
घर की दीवारों पर चुपचाप चलती छिपकली
कीट-पतंगों को झट अपने भीतर उतार लेती है

पिता छूटे, गाँव छूटा और चारों भाइयों को
आपस में जोड़े रखने वाली कड़ी छूटी
माँ की दोनों आँखों में मोतियाबिंद हुआ...
दृष्टि और जिंदगी दोनों में
धुँधलापन आना शुरू हुआ
कुआँ क्या सूखा
एक-एक कर कई चीजें
खुश्क और वीरान होती चली गईं
मसलन मिट्टी का चुल्हा भी
अब अपने अवशेष के साथ
पहचाना भर जा सकता है
कभी उस पर तड़के सुबह से
धुआँ उठने लगता था और देर तक
कुछ न कुछ पकता ही रहता था
कभी चावल तो कभी दाल की खुशबू से
घर का अंदर और बाहर दोनों
महमह करता था
और फिर गोधूली की बेला में
पुनः उसकी आँच से पूरा आँगन
एक मद्धम रोशनी से भर जाता था
चुल्हे के पास बैठी माँ, बहन
तो कभी बुआ के चेहरे थके दिखकर भी
एक उजास और संतोष से भरे होते थे
उससे ही कुछ ही कदम दूर
पूरब दिशा में सगर्व बैठे कुएँ तक
देर रात तलक
किसी न किसी का आना-जाना
लगा ही रहता था

छपाक की ध्वनि करके हर बार बाल्टी
कुएँ के सतह को भेदती और
अपने सामर्थ्य भर पानी ऊपर लाती...
कभी पिताजी शाम की पूजा के लिए
नहा रहे होते तो कभी माँ
अपने चूल्हे-चौके के लिए
पानी ले लेने की हड़बड़ी में होती
हरेक को अपना काम
दूसरे की तुलना में
ज्यादा महत्वपूर्ण लगता
कुआँ अपनी किस्मत पर इतराता
गृहस्थी की इस नोंक-झोंक का
भरपूर रस लेता
कभी कोई पड़ोसी अपने बड़े-बड़े
दो बाल्टे के साथ नमूदार होता
हल्के अँधेरे में भी पानी भरकर जाते उसके चेहरे पर
हमारे लिए और हमसे अधिक कहीं हमारे कुएँ के लिए
एक खामोश कृतज्ञता का भाव
जरूरदिख जाता
तब सबके बस में कहाँ था अपने-अपने आँगन में
अपना निजी कुआँ खुदवा लेना
मगर... आज पक्की ईंटों से बना वही कुआँ
साँय-साँय करता एकदम बेजान
और उपयोगहीन पड़ा है

महीने-दो-महीने में जब थकी-हारी
अनुत्साहित माँ बेकसूर होकर भी
गाँव वालों से अपना चेहरा छुपाए
मुख्य रास्ते को छोड़
पिछवाड़े से घर में आती है
तो सबसे पहले अपने काँपते हाथों
से धूल के अंबार को हटाती है
और फिर घर में कब्जा जमाए
अँधेरा दूर भाग खड़ा होता है
मानों डरता हो आज भी घर की मालकिन से
बेशक बूढी और अकेली ही सही
पहले जैसी जान और गति कहाँ रही उसकी
रुक-रुक कर ही सही मगर माँ
धूप-दीया दिखला देती है पूरे घर को
और कुएँ को भी

साफ-सफाई के काम से निवृत्त होकर
माँ कुएँ की जगत के पास आकर
उस पर अपनी कुहनी टिकाए
देर तक आँखें बंद किए खामोश बैठी रहती है
जाने क्यों कुएँ के पास खड़ी माँ की आँखों से
आँसू की दो लकीरें लुढ़क पड़ती हैं
फट पड़ना चाहता है उसका हृदय
मगर तभी अपने पति के कई अधूरे काम
याद आते हैं उसे और
सँभाल लेती है वह अपने-आप को

कुआँ शायद उसे किसी अतीत में
लेकर चला जाता है...
तब वह नई-नवेली दुल्हन बनकर
इस घर में आई थी
इस कुएँ का पानी ही यहाँ ससुराल में
उसने सबसे पहले ग्रहण किया था
इसी के सहारे वह अपने बाल-बच्चों को बड़ा और
और कमाने-धमाने के लायक बना सकी...
मगर हाय रे समय का चक्र
पति संसार छोड़ गया और बच्चे यह घर
माँ इन सभी की ओर से कुएँ से माफी माँगती है
माँ को याद आता है कुएँ का अवदान
जो इसने किया
उसके बनते-पनपते घर के लिए
जरा सा कम नहीं स्वयं उससे
अपने लिए माँ की इस निःशब्द भावना को देख
कुआँ पसीज जाता है...
एक सतह के ऊपर और दूसरा सतह के नीचे
भीगा-अधभीगा अपने-अपने एकांत में देर तक
डूबता ‌उतराता रहता है

कुआँ खाली है
जैसे माँ की माँग
दोनों के अपने-अपने दर्द हैं
दोनों एक दूसरे के सूनेपन को जानते-समझते हैं
दोनों को समय ने एक ही तलछट पर
लाकर पटक दिया है
एक ने इस घर को पानी दिया और दूसरे ने दूध
मगर आज ये दोनों स्रोत सूख चुके हैं
और अपने निचाट अकेलेपन में चुपचाप
निःशब्द और निश्चेष्ट पड़े रहने को
अभिशप्त हैं

 


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