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कविता

खूँटी
अर्पण कुमार


एक

मुझे जरूरत थी
एक खूँटी की
टाँग सकता था जिस पर
स्वप्न, यौवन, मुखौटा,
और दर्द भी अपना
मैंने पार की
दीवारें कई
मगर
सपाट थीं सभी
नहीं मिलनी थी
नहीं मिली
कोई खूँटी कहीं


दो

दिखते हैं एक से
कुछ-कुछ उखड़े हुए अक्सरहाँ
कवि, राजनेता और अपराधी
और दिख जाती हैं खूँटियाँ
जब-तब
उनके चेहरे पर तो कभी
उनके स्वभाव में

चरित्र और कार्य-व्यापार
बेशक भिन्न-भिन्न हों इन तीनों का
मगर चेहरे पर उगी खूँटियों के लिए
इनका चेहरा तो एक सतह मात्र है
जिस पर साम्राज्य
फैलाए होती हैं अपना
बेहिचक और बेखौफ
ये खूँटियाँ ही
और कहीं भीतर बहुत गहरे से
पैठकर उनके रक्त में
ले रही होती हैं
अपना पोषण
प्रकटतः दिखती इन खूँटियों की लघुता
हकीकत में सुदीर्घ और घनी होती है अक्सरहाँ

जिन्हें हम इन व्यक्तियों का उखड़ना
या उनका हरदम खिन्न रहना
तो कभी किसी ख्याल में
उनका गुम रहना समझते हैं
और उनसे डरते तो
कभी नफरत करते हैं हम
या उन्हें कोई महान आत्मा समझ
उनका आदर करते हैं हम...
अगर गौर से देखें तो वे स्वयं
दरअससल इन्हीं खूँटियों के
गुलाम हैं


तीन

फसल आ पहुँचती है
खलिहान में
अनाज चला जाता है
मंडी में
छोड़ दी जाती हैं
या फिर जला दी जाती हैं
यूँ ही
खेतों में
खूँटियाँ

 


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