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कविता

दो साँप
स्वप्निल श्रीवास्तव


मेरे घर में रहते थे दो जहरीले साँप
माँ ने इन्हें देखा था
उनके सिर पर उगी हुई थी बालों की कँलगी
पिता ने इन्हें फुँफकाराते हुए देखा था

सोते समय जब वे धरन पर लटके हुए दिखाई देते थे
पिता गोहार लगा कर बटोर लेते थे गाँव

लाठी बल्लम भाला लेकर आते थे गाँव वाले
लेकिन देखते देखते गायब हो जाते थे साँप
हाथों में थमी रह जाती थी लाठियाँ

साँप छोड़ जाते थे दहशत के केंचुल

एक दिन सँपेरे आए
बीन बजाकर निकाले दो साँप

सँपेरों ने कहा - इन जहरीले साँपों के बीच
कैसे रहते थे आप लोग
ये सौ साल पुराने साँप हैं
काट ले तो न माँगे पानी
ये आदमी से भी जहरीले साँप हैं

पिता प्रसन्न हुए - चलो निकल तो आए साँप

माँ अब भी चिहा उठती है
- देखो देखो वे हैं साँप

 


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