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कविता

पानी का रंग
संतोष कुमार चतुर्वेदी


गौर से देखा एक दिन
तो पाया कि
पानी का भी एक रंग हुआ करता है
अलग बात है यह कि
नहीं मिल पाया इस रंग को आज तक
कोई मुनासिब नाम

अपनी बेनामी में भी जैसे जी लेते हैं तमाम लोग
आँखों से ओझल रह कर भी अपने मौसम में
जैसे खिल उठते हैं तमाम फूल
गुमनाम रह कर भी
जैसे अपना वजूद बनाए रखते हैं तमाम जीव
पानी भी अपने समस्त तरल गुणों के साथ
बहता आ रहा है अलमस्त
निरंतर इस दुनिया में
हरियाली की जोत जलाते हुए
जीवन की फुलवारी में लुकाछिपी खेलते हुए

अनोखा रंग है पानी का
सुख में सुख की तरह उल्लसित होते हुए
दुख में दुख के विषाद से गुजरते हुए
कहीं कोई अलगा नहीं पाता
पानी से रंग को
रंग से पानी को
कोई छननी छान नहीं पाती
कोई सूप फटक नहीं पाता
और अगर ओसाने की कोशिश की किसी ने
तो खुद ही भीग गया वह आपादमस्तक

क्योंकि पानी का अपना पक्का रंग हुआ करता है
इसलिए रंग छुड़ाने की सारी प्रविधियाँ भी
पड़ गईं इसके सामने बेकार

किसी कारणवश
अगर जम कर बन गया बर्फ
या फिर किसी तपिश से उड़ गया
भाप बन कर हवा में
तब भी बदरंग नहीं पड़ा
बचा रहा हमेशा एक रंग
प्यास के संग-संग
अगर देखना हो पानी का रंग
तो चले जाओ
किसी बहती हुई नदी से बात करने

अगर पहचानना हो इसे
तो किसी मजदूर के पसीने में
पहचानने की कोशिश करो
तब भी अगर कामयाबी न मिल पाए
तो शरद की किसी अलसायी सुबह
पत्तियों से बात करती ओस की बूँदों को
ध्यान से सुनो

अगरचे बेनाम से इस पनीले रंग को
इसकी सारी रंगीनियत के साथ
बचाए रखना चाहते हो
तो बचा लो
अपनी आखों में थोड़ा सा पानी
जहाँ से फूटते आए हैं
रंगों के तमाम सोते

 


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