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कविता

विषम संख्याएँ
संतोष कुमार चतुर्वेदी


जिंदगी की हरी-भरी जमीन पर
अपनी संरचना में भारी-भरकम
दिखाई पड़ने वाली सम संख्याएँ
किसी छोटी संख्या से ही
विभाजित हो जाती हैं प्रायः
वे बचा नहीं पातीं
शेष जैसा कुछ भी

विषम चेहरे-मोहरे वाली कुछ संख्याएँ
विभाजित करने की तमाम तरकीबों के बावजूद
बचा लेती हैं हमेशा
कुछ न कुछ शेष

वैसे इस कुछ न कुछ बचा लेने वाली संख्या को
समूल विभाजित करने के लिए
ठीक उसी शक्ल-सूरत
और वजन-वजूद वाली संख्या
ढूँढ़ लाता है कहीं से गणित

परंतु अपने जैसे लोगों से न उलझ कर
विषम मिजाज वाली संख्याएँ
शब्दों और अंकों के इस संसार में
बचा लेती हैं
शेष की शक्ल में संभावनाएँ

अंधकार के वर्चस्व से लड़ते-भिड़ते
बचा लेती हैं विषम-संख्याएँ
आँख भर नींद
और सुबह जैसी उम्मीद
अजब उल्लास यह जीवन का

कैसी बेचैनी भर दी है तुमने
कि अब तुमसे ही शुरू होते हैं मेरे दिन
कि अब तुमसे ही खत्म होती हैं मेरी रातें
कि आजकल चाहे जिस मुद्दे पर बात करूँ
आ जाती हैं उसमें बरबस ही तुम्हारी बातें
जुड़ जाती हैं उसमें बस तुम्हारी ही यादें

नहीं है मेरी जिंदगी में
अब एक भी ऐसा कोई पल
अब एक भी ऐसा कोई छिन
बिन तुम्हारे... तुम्हारे बिन
तुम्हारी मुस्कुराहटों में शामिल हमीं
हमारे आँसुओं में शामिल तुम्हारी नमी
कैसी यह चाहत कैसी ये बेसब्री
बढ़ती ही जा रही जो दिन ब दिन
बिन रुकी बिन थमी

सरल सहज दिखने वाला प्यार
आखिर कितना कठिन हुआ करता है
कितना निष्ठुर कितना निर्मम
देता है जो खुशियाँ कम
बढ़ाता रहता है जो गम
फिर भी अजब उल्लास यह जीवन का
अजब मिठास यह हर दिन का
चाहतों से भी ज्यादा चाहतें
प्यार से भी ज्यादा प्यार
चाहें जितना भी रोको-टोको
बढ़ता ही जाता है यह अहसास
हर बार

 


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