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कविता

कुछ और
संतोष कुमार चतुर्वेदी


धीरे धीरे शामिल हो गई हो तुम
मेरी जिंदगी में कुछ इस तरह
कि मेरी जिंदगी कुछ और जिंदगी हो गई है
तुम्हारे हाथों की फीकी चाय में
कुछ और ही मिठास आ गई है
तुम्हारे छूने भर से
भात कुछ और भात
और रोटियाँ कुछ और रोटियाँ हो गई हैं

जब से आई हो मेरे जीवन में तुम
मेरे दिन कुछ और दिन हो गए हैं
मेरी रातें कुछ और सपनीली
मेरा लिखना कुछ और लिखना
मेरा दिखना कुछ और दिखना
मेरी बातें कुछ और बातें हो गई हैं

एक तुम्हारे होने भर से
कितना भर गया है मुझमें
तुम्हारा यह कुछ और
कि मेरी ऋतुएँ कुछ और ऋतुएँ हो चली हैं
मैं खुद कुछ और मैं हो चला हूँ
मेरी आवारगी कुछ और आवारगी हो चली है
मेरा मुस्कुराना कुछ और मुस्कुराना हो चला है

जो कुछ था पहले मुझमें मैं
छीजता जा रहा है धीरे धीरे वह
अब तो मैं कुछ और मैं हुआ जा रहा हूँ
तुम्हारी दुनिया में मैं कुछ और खोया जा रहा हूँ
मेरा विश्वास कुछ और विश्वास
मेरा घर लौटना कुछ और लौटना हुआ जा रहा है

तुम्हारे होने भर से
यह हरियाली कुछ और हरी-भरी हो गई है
दिशाएँ कुछ और दिशाएँ लगने लगी हैं

आसमान कुछ और आसमान हो गया है
रंग कुछ और चटकार होने लगे हैं
जुड़ने लगे हैं मेरे
बादलों में कुछ और बादल
बारिश में कुछ और फुहारें
उम्मीद में कुछ और उम्मीद
और नींद में कुछ और नींद

जब कभी
नहीं होते हो तुम मेरे पास
मेरी उदासी कुछ और गाढ़ी हो जाती है
मेरा अकेलापन कुछ और सघन हो जाता है
मेरी बेचैनी मुझे कुछ और बेचैन कर जाती है
मेरा सूनापन कुछ और गहरा जाता है

मेरी जिंदगी कैसे ला दिया है तुमने
मेरी जिंदगी में यह दौर
कि मैं जो था पहले कुछ और ही
अपने हर पहलू में
होता जा रहा हूँ दिन ब दिन
कुछ और... कुछ और... कुछ और...
देखो न...
मेरी पत्तियों में भरने लगी है
अब टहाटह हरियाली
और मेरी हर शाखों पर अब पल-प्रतिपल
सजने लगे हैं हुलास के बौर

 


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