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कविता

तालमेल
संतोष कुमार चतुर्वेदी


सफेद पड़ा रहा जब तक पन्ना
कभी उलटा पुलटा नहीं गया
किसी जिज्ञासा के लिए

जैसे ही काले अक्षरों ने डेरा जमाया
पन्ने की दुनिया हो गई गुलजार
मिला पन्ने को नया क्षितिज
पाई पन्ने ने खुद की आवाज

फिर उलटा पुलटा उसे
न जाने कितनी अँगुलियों ने
कितनी कितनी बार

याददाश्त के लिए लगाया गया
ठीक उसी के पास निशान
या फिर कभी कभार
किनारे को मोड़ कर ही
स्मृति को रख लिया गया ताजा

यह तालमेल का जादू था
रंगीन बना दिया जिसने
रंगहीन को भी

 


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