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कविता

गुलामगिरी
अनुज लुगुन


गुलाम खरीद रहे हैं
चावल सौ रुपये किलो
तेल सौ रुपये किलो
प्याज सौ रुपये किलो
टमाटर अस्सी रुपये किलो
आलू पच्चास रुपये किलो
कपड़ा हजार रुपये जोड़े
खपड़ा सौ रुपये जोड़े
स्कूल फीस पाँच हजार रुपये प्रति
अस्पताल फीस पाँच हजार रुपये प्रति
जो नहीं खरीद सक रहे हैं वे मर रहे हैं,

मालिक बाजार में खड़ा है
हँस रहा है -
टमाटर अस्सी रुपये किलो...?
हँसता है, कहता है -
'कोल्ड स्टोरेज में रखवा लो'
आलू, प्याज, दाल, चावल, ...सड़ रहा है...?
हँसता है, कहता है -
'कुत्ते को दे दो...!'
गुलाम ही तो हैं
सब्जी खरीदने वाले
मोल भाव करने वाले...?
कीमत चुकाने वाले...?
चुप रहने वाले...?

मेरा हम-उम्र राजकुमार था
राजा हो गया, मालिक हो गया
मेरा पड़ोसी लोहार था
सांसद हो गया, मालिक हो गया
मेरा भाई मेरे साथ
कचरा ढोता था
अफसर हो गया, मालिक हो गया

एक मैं था -
किसान था, गुलाम हो गया
मजदूर था, गुलाम हो गया
बेरोजगार था, गुलाम हो गया
क्लर्क था, गुलाम हो गया
शिक्षक था, गुलाम हो गया
सिपाही था, गुलाम हो गया
मैं एक देश था
अपने ही देश में गुलाम हो गया

कुछ गुलाम जिन्होंने
आजादी का मतलब जान लिया है
वे विद्रोही हो गए हैं
वे बगावत पर उतर आए हैं
वे छापामारी कर रहे हैं
वे मारे जा रहे हैं
कुछ गुलाम उन्हें मारने में
मालिक का सहयोग कर रहे हैं

गुलाम हैं, गुलामगिरी को
जिंदा किए हुए हैं
कुछ देर में गुलाम
मालिक के कहने पर
सड़कों पर आएँगे वोट डालेंगे
और जश्न मनाएँगे -
"लोकतंत्र... लोकतंत्र... लोकतंत्र..."

 


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