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कविता

गंगाराम कलुंडिया
अनुज लुगुन


गंगाराम कलुंडिया भारतीय सेना के देशभक्त सैनिक थे। 1971 ई. के भारत-पाकिस्तान युद्ध में उन्होंने लड़ाई लड़ी और राष्ट्रपति वीरता पुरस्कार से सम्मानित भी हुए। तत्पश्चात सूबेदार होकर सेवानिवृत्त हुए। अपने क्षेत्र पं. सिंहभूमि के कोल्हान में खरकई नदी में सरकार की ईचा बाँध परियोजना से विस्थापित हो रहे आदिवासियों का इन्होंने नेतृत्व किया तथा विस्थापन के विरुद्ध आंदोलन चलाया। प्रतिरोध के बढ़ते तेवर को देख पुलिस ने 3 अप्रैल 1982 ई. को शीर्ष नेतृत्वकर्त्ता गंगाराम कलुंडिया की गोली मारकर हत्या कर दी और आंदोलन दबा दिया गया।

यह कविता गंगाराम कलुंडिया और उन्हीं की तरह अपने अस्तित्व और अस्मिता की रक्षा के लिए संघर्ष करने वाले आदिवासियों को समर्पित।



1. देश

गंगाराम !
तुम कहाँ मरने वाले थे
पुलिस की गोली से
तुम्हें तो दुश्मन की सेना भी
खरोंच नहीं पाई थी सीमा पर।
दनदनाते गोलियों
धमकते गोलों और क्षत-विक्षत लाशों के बीच
सीमा पर
लुढ़कते-गुढ़कते-रेंगते
अपनी बंदूक थामे रहने वाले योद्धा थे
तुम कहाँ मरने वाले थे
पुलिस की गोली से।

खून के छीटों के बीच याद आता रहा होगा तुम्हें
बेर की कँटीली डालियों पर
फुदकते गाँव के बच्चे
औरतों के साथ
चट्टान के ओखल में मडुवा कूटती
पत्नी का सँझाया चेहरा
और देश के करोड़ों लोगों की
आँखों में तैरती मछरी की बेबसी
दुश्मनों के गोला-बारूद की
लहरों को रोकने के लिए
गंगाराम, तुम बाँध थे
तुम कहाँ मरने वाले थे
पुलिस की गोली से।

गंगाराम !
तुमने बाँध दिया था बाँध
अपनी छाती की दीवार से
और उसमें अठखेलियाँ करने लगी थीं
देश के मानचित्र की रेखाएँ
उनकी अठखेलियों में
तुम्हें याद आता था
अपने बच्चे की शरारत
उनकी शरारतों के लिए
तुम जान देने वाले पिता थे
पिता की भूमिका में
देश के वीर सपूत थे
तुम कहाँ मरने वाले थे
पुलिस की गोली से।


2. देशभक्ति

गंगाराम !
तुम कहाँ मरने वाले थे
पुलिस की गोली से
लेकिन आ धमके एक दिन
पुलिसिया दल-बल के साथ
तुम्हारी छाती पर बाँध-बाँधने,
तुम्हारी छाती -
जिसकी शिराओें में होती हैं नदियाँ
अस्थियों में वृक्षों की प्रजाति
मास-पिंडों में होते हैं
मौसमों के गीत
अखाड़ों की थिरकन
तुम्हारी छाती में होती है पृथ्वी
और उसकी संपूर्ण प्रकृति,
तुम्हारी छाती पर आए मूँग दलने
तुम्हारे ही देश के लोग।

गंगाराम !
तुम देश के लिए हो
या, देश तुम्हारे लिए
संसदीय बहसों और
अदालती फैसलों में नहीं हुआ है निर्णय
जबकि तुमने तय कर लिया था कि
तुम लड़ोगे अपने देश के लिए।
सलामी देते झंडे के
हरेपन के लिए
तुम लड़े थे
जंगलों के लिए
जिसको सींच जाती थी पहाड़ी नदी
पहाड़ी नदी की सलामी को
बंधक बना कर रोक देना
देशभक्त सिपाही की तरह
तुम्हें कतई स्वीकार नहीं था
तुम नहीं चाहते थे
देसाउली और सरना से उठकर
हमारे जीवन में उतर जाने वाली ठंडी हवा
उस बाँध में डूबकर निर्वात हो जाए
उस निर्वात को भेदने के लिए
तुम चक्रवात थे
तुमने आह्वान किया शिकारी बोंगा से
तीर के निशाने से न चूकने के लिए
तुमने याद किया
पुरखों का आदिम गीत
तुम्हारी आवाज कोल्हान में फैल गई
निकल पड़े बूढ़े-बच्चे औरत सभी
धान काटती दरांती
और लकड़ी काटती कुल्हाड़ी लेकर
सदियों से बहती आ रही
अपनी धार बचाने
गंगाराम !
तुम मुर्गे की पहली बाँग थे
तुम कहाँ मरने वाले थे
पुलिस की गोली से।


3. देशांतरण

गंगाराम !
तुम कहाँ मरने वाले थे
पुलिस की गोली से
तुम्हें तो मृत्यु ने
ले लिया था आकस्मिक अपनी गोद में
जिसके सामने हर कोई मौन है मगर तुम सदैव
इस मौन से अजेय संवाद करते रहे
तुम्हारा अजेय संवाद
आज भी बहस करता है
उनके गिरेबान से
जब भी वो
कदम उठाते हैं तुम्हारे देश की ओर।

गंगाराम !
तुम्हारे मरने पर
नहीं झुकाया गया तिरंगा
नहीं हुए सरकारी अवकाश
और न ही बजाई गई
शोकगीत की धुन
तुम्हारे बंधुओं के अलावा
किसी के घर अँधेरा नहीं हुआ
तुम्हारे मरने से ही ऊँचा हो सकता था
देश का मान
बढ़ सकती थी उसकी चमक
विज्ञापनों में वे कह सकते थे
अपने प्रोडक्ट का नाम।
गंगाराम !
तुम मरे ऊँचे आसनों पर बैठे
लोगों की कागजी फाँस से
जहाँ हाशिए पर रखे गए हैं
तुम्हारे लोग
देशांतर है जहाँ
तुम्हारे ग्लोब का मानचित्र तुम्हारी आखिरी तड़प ने
उनके सफेद कागजों पर कालिख पोत दी है
मरते हुए भी हुए
देशी हितों के अखबार निकले
गंगाराम !
तुम कहाँ मरने वाले थे
पुलिस की गोली से
तुम्हें तो दुश्मनों की सेना भी
खरोंच नहीं पाई थी सीमा पर।

 


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