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कविता

महुवे चुनता हूँ
अनुज लुगुन


सुनो...!
चलो चलें हाट
कुछ महुआ बेच आएँ
तेल नमक का खर्चा नहीं है
मदाईत वालों के लिए
हँड़िया की भी तो व्यवस्था करनी होगी
तुम दऊरी भर लो
मैं बहिंगा ठीक करता हूँ

ओह...! नाराज क्यों होती हो
सूखे महुवे की तरह मुँह बना रही हो...?
जब हमने पहली बार एक-दूसरे को देखा था
तब तो तुम महुवे की तरह मादक लग रही थी
क्या तुमने मुझे रिझाने के लिए ऐसा किया था...?

ठीक है, इस बार हम चूड़ियाँ भी खरीदेंगे
काँच की रंग-बिरंगी खनकती हुई चूड़ियाँ
और दे भी क्या सकता हूँ
एक यही तन है कमाने खाने के लिए
इसमें उगे पेड़, पौधे, जंगल, नदियाँ, तुम्हारे ही तो हैं
अगर कोई तुमसे यह छीन ले तो...?
ओ... ओ... अरे... मारो मत... छोडो... मुझे...
अब से ऐसी अपसगुन बातें नहीं करूँगा
मुझे पता है तुम्हारे होते ऐसा कभी हो ही नहीं सकता

चलो अपना दऊरी उठाओ
मैं बहिंगा ढोता हूँ
देख रहा हूँ अब तुम्हारे अंदर
महुवे टपक रहे हैं...

 


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