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कविता

महुवाई गंध
अनुज लुगुन


(कामगरों एवं मजदूरों की ओर से उनकी पत्नियों के नाम भेजा गया प्रेम-संदेश)

ओ मेरी सुरमई पत्नी !
तुम्हारे बालों से झरते हैं महुए।

तुम्हारे बालों की महुवाई गंध
मुझे ले आती है
अपने गाँव में, और
शहर के धूल-गर्दों के बीच
मेरे बदन से पसीनों का टपटपाना
तुम्हें ले जाता है
महुए की छाँव में
ओ मेरी सुरमई पत्नी !
तुम्हारी सखियाँ तुमसे झगड़ती हैं कि
महुवाई गंध महुए में है।

मुझे तुम्हारे बालों में
आती है महुवाई गंध
और तुम्हें
मेरे पसीने में

ओ मेरी महुवाई पत्नी !
सखियों का बुरा न मानना
वे सब जानती हैं कि
महुवाई गंध हमारे प्रेम में है।

 


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