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कविता

लालगढ़
अनुज लुगुन


ऐसा तो नहीं है, साहब !
कोई ईंट फेंके
और आप चुप रहें
ऐसा तो नहीं है, साहब !
कोई आपके जमीर को चुनौती दे
और आप कुछ न कहें

ऐसा तो नहीं है, साहब !
कोई दखलअंदाजी करे
और आप उसकी आरती उतारें
ऐसा तो नहीं है, साहब !
धुआँ उठे और आग न रहे
ऐसा तो नहीं है
है न, साहब !
कुछ तो है जरूर, साहब !
जो वातानुकूलित कमरे में
रहते हुए आप महसूसते नहीं

कुछ तो है जरूर, साहब !
जो रोबड़ा सोरेन
पिछले कई सालों से
नाम बदल कर फिरता है

कुछ तो है जरूर, साहब !
जो आदिम जनों की
आदिम वृत्ति को जगाता है
कुछ तो है
कुछ तो है जरूर, साहब !

आप ही के गिरेबान में
वरना कोई भी 'गढ़'
यूँ ही 'लाल'
नहीं होता

और आप हैं कि
बड़ी बेशर्मी से कह देते हैं कि
बद‍अमनी के जिम्मेवार
रोबड़ा सोरेन को जिंदा या मुर्दा
गिरफ्तार किया जाए।

 


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