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कविता

हत्या
अरुण देव


उसकी हत्या हुई थी। सड़क से गाँव के रास्ते का एक हिस्सा सुनसान था। खेतों से होकर गुजरता था। वहीं से वह गायब हुई। वहीं गन्ने के खेत के पीछे उसका शव मिला, कई दिनों बाद। चेहरा झुलसा हुआ। कपड़ों से पहचानी गई।

पिता ने जोर देकर कहा कपड़ों से पता चलता है उसके साथ दुष्कर्म नहीं हुआ है। लड़की ने मरते मरते भी कुटुंब की लाज बचाई।

कहीं बाहर नौकरी करता भाई आया था। चेहरे पर थकान। जैसे किसी झंझट में पड़ गया हो।

घर के लोग अब जो हो गया सो गया का भाव लिए कुछ आगे करने के बारे में संशय में थे। एक पड़ोसी ने यह भी कहा कि क्या जरूरत थी जवान लड़की को पढ़ाने की।

वह सिपाही बनना चाहती थी। कोचिंग करने समीप के नगर में जाती थी। अंत समय उसने मोबाइल से जिनसे बातें की वे भी उसके मौसरे भाई, चचेरे भाई थे। ऐसा उस लड़की की जाति-बिरादरी के लोग कह रहे थे। बार-बार।

अगर लड़की किसी के प्रेम में होती और तब उसकी हत्या होती तो इसे स्वाभाविक माना जाता, उसके इस स्वेच्छाचार का अंत यही होना था, इसी किस्म से कुछ कहा जाता। और कुटुंब के लिए यह बदनामी की बात होती।

उसकी बस हत्या हुई थी। उसका किसी से प्रेम या शारीरिक संबंध नहीं था। यही राहत की बात थी।

एक लड़की जो स्त्रीत्व की ओर बढ़ रही थी
इसी के कारण मार दी गई

उसके लंबे घने काले केश जो इसी दुनिया के लिए थे

उसका चमकता चेहरा
जिसकी रोशनी में कोई न कोई अपना दिल जलाता

वह एक उम्मीद थी
उसे अपना भी जीवन देखना था

अगर वह प्रेम में होती, बिनब्याही माँ बनने वाली होती, उसके बहुत से प्रेमी होते
या वह एक बेवफा महबूब होती
तो क्या उसकी हत्या हो जानी चाहिए थी

क्या अब हम हत्या और हत्या में भी फर्क करेंगे।

 


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