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वैचारिकी

मेरे सपनों का भारत
मोहनदास करमचंद गांधी

अनुक्रम 21 सत्याग्रह और दुराग्रह पीछे     आगे

मेरी यह दृढ़ धारणा है कि सविलय कानून-भंग वैधानिक आंदोलन का शुद्धतम रूप है। वेशक, उसमें विनय और अहिंसा की जिस विशिष्‍टता का दावा किया जाता है वह यदि दूसरों को धोखा देने के लिए ओढ़ लिया गया झूठा आवरण मात्र हो, तो वह लोगों को गिराता है और निंदनीय बन जाता है।

कानून की अवज्ञा सच्‍चे भाव से और आरदपूर्वक की जाए, उसमें किसी प्रकार की उद्धतता न हो और वह किसी ठोस सिद्धांत पर आधारित हो तथा उसके पीछे द्वेष या तिरस्‍कार का लेश भी न हो-यह आखिरी कसौटी सबसे ज्‍यादा महत्‍त्‍व की है-तो ही उसे शुद्ध सत्‍याग्रह कहा जा सकता है।

कानून की सविनय अवज्ञा में केवल वे लोग ही हिस्‍सा ले सकते हैं, जो राज्‍य द्वारा लादे गए कष्‍टप्रद कानूनों का-अगर वे उनकी धर्मबुद्धि या अंत: कारण की चोट न पहुँचाते हों तो-स्‍वेच्‍छापूर्वक पालन करते हैं और जो इस तरह की गई अवज्ञा का दंड भी उतनी ही खुशी से भोगने के लिए तैयार हों। कानून की अवज्ञा सविनय तभी कही जा सकती है, जब वह पूरी तरह अहिंसक ही। सविनय अवज्ञा के पीछे सिद्धांत यह है कि प्रतिपक्षी को खुद कष्‍ट सहकर यानी प्रेम के द्वारा जीता जाए।

सविनय अवज्ञा नागरिक का जन्‍मसिद्ध अधिकार है। वह अपने इस अधिकार को अपना मनुष्‍यत्‍व खोकर ही छोड़ सकता है। सविनय अवज्ञा का परिणाम कभी भी अहराजकता में नहीं आ सकता। दुष्‍ट हेतु से की गई अवज्ञा से ही अराजकता पैदा हो सकती है। दुष्‍ट हेतु से की जाने वाली अवज्ञा को हर एक राज्‍य बलपूर्वक अवश्‍य दबाएगा। तो वह खुद नष्‍ट हो जाएगा। किंतु सविनय अवज्ञा का दबाने का अर्थ तो अंतरात्‍मा की आवाज को दबाने की कोशिश करना है।

चूँकि सत्‍याग्रह सीधी करावाई के अत्‍यंत बलशाली उपायों में से एक है, इसलिए सत्‍याग्रही सत्‍याग्रह का आश्रय लेने से पहले और सब उपाय आजमा कर देख लेता है। इसके लिए वह सदा और निरंतर सत्‍ता‍धारियों के पास जाएगा, लोकमत को प्रभावित और शिक्षित करेगा, जो उसकी सुनना चाहते हैं उन सबके सामने अपना मामला शांति और ठंडे दिमाग से रखेगा और जब ये सब उपाय वह आजमा चुकेगा तभी सत्‍याग्रह का आश्रय लेगा। परंतु जब उसे अंतर्नाद की प्रेरक पुकार सुनाई देती है और वह सत्‍याग्रह छेड़ देता है, तब वह अपना सब-कुछ दाँव पर लगा देता है और पीछे कदम नहीं हटाता।

सत्‍याग्रह शब्‍द का उपयोग अक्‍सर बहुत शिथिलतापूर्वक किया जाता है और छिपी हुई हिंसा को भी यह नाम दे दिया जाता है। लेकिन इस शब्‍द के रचयिता के नाते मुझे यह कहने की अनुमति मिलनी चाहिए कि उसमें छिपी हुई अथवा प्रकट सभी प्रकार की हिंसा का, फिर वह कर्म की हो या मन और वाणी की हो, पूरा बहिष्‍कार है। प्रतिपक्षी का बुरा चाहना या उसे हानि पहुँचाने के इरादे से उससे या उसके बारे में बुरा बोलना सत्‍याग्रह का उल्‍लंघन है। सत्‍याग्रह एक सौम्‍य वस्‍तु है, वह कभी चोट नहीं पहुँचाता। उसके पीछे क्रोध या द्वेष नहीं होना चाहिए। उसमें शोरगुल, प्रदर्शन या उतावली नहीं होती। वह जबरदस्‍ती से बिलकुल उलटी चीज है। उसकी कल्‍पना हिंसा से उलटी परंतु हिंसा का स्‍थान पूरी तरह भर सकते वाली चीज के रूप में की गई है।

दुराग्रह

[अप्रैल 1919 में पंजाब जाते हुए जब गांधी जी को गिरफ्तार कर लिया गया, उस समय उनकी गिरफ्तारी की खबर फैलते ही बंबई में और दूसरी जगहों में हिंसात्‍मक उपद्रव शुरू हो गए थे। बाद में जब पुलिस की निगरानी में उनहें बंबई वापिस लाया गया और 11 अप्रैल को छोड़ा गया, तब उन्‍होंने एक संदेश दिया था जो शाम को होने वाली सभाओं में पढ़ा जाना था। इस संदेश का एक अंश इस प्रकार था :]

मेरी गिरफ्तारी पर इतना क्षोभ और इतनी गड़बड़ क्‍यों हुई, इसका कारण मैं नहीं समझ सका हूँ। यह सत्‍याग्रह तो नहीं है; इतना ही नहीं, यह दुराग्रहों से भी बुरा है। जो लोग सत्‍याग्रह से संबंधित प्रदर्शनों में भाग लेते हैं, वे - उन्‍हें खतरा हो तो भी - हिंसा न करने के लिए, पत्‍थर आदि न फेंकने के लिए, किसी को किसी भी तरह चोट न पहुँचाने के लिए बंधे हुए हैं। लेकिन बंबई में हमने पत्‍थर फेंके हैं और रास्‍तों में रुकवटें डालकर ट्रम-गाड़ियाँ रोकी हैं। यह सत्‍याग्रह नहीं है। हमने हिंसक प्रवृत्तियों के कारण गिरफ्तार किए गए पचास आदमियों के छोड़े जोने की माँग भी की है। हमारा कर्त्‍तव्‍य तो मुख्‍यता: अपने को गिरफ्तार करवाना है। जिन्‍होंने हिंसा की प्रवृत्तियाँ की है उन्‍हें छुड़वाने की कोशिश करना धार्मिक कर्त्‍तव्‍य का उल्‍लंघन है। इसलिए गिरफ्तार लोगों की रिहाई की माँग करना हमारे लिए किसी भी आधार पर उचित नहीं है।

मैंने ये असंख्‍य बार कहा है कि सत्‍याग्रह में हिंसा, लूटमार, आगजनी आदि के लिए कोई स्‍थान नहीं है; लेकिन इसके बावजूद हमने मकान जलाए हैं, बलपूर्वक हथियार छीने हैं, लोगों को डरा-धमकाकर उनसे पैसा लिया है, रेलगाड़ियाँ रोकी हैं, तार काटे हैं, निर्दोष आदमियों की हत्‍या की है और दुकानें तथा लोगों के निजी घरों में लूटमार की है। इस तरह के कामों से मुझे जेल या फाँसी के तख्‍ते से बचाया जा सकता हो तो भी मैं इस तरह बचाया जाना पसंद नहीं करूँगा।

हिंसा के उपायों के प्रयोग से मुझे तो भारत के लिए नाश के सिवा और कुछ नजर नहीं आता। अगर मजदूर लोग अपना गुस्‍सा देश में प्रचलित कानून को दुष्‍ट भाव से तोड़कर प्रगट करें, तो मैं कहूँगा कि वे आत्‍म घात कर रहे हैं ओर भारत को उसके फलस्‍वरूप अवर्णनीय कष्‍ट भोगने पड़ेंगे। जब मैंने सत्‍याग्रह और सविनय अवज्ञा का प्रचार शुरू किया, तो उसका यह उद्देश्‍य कदापि नहीं था कि उसमें कानूनों की दुष्‍ट भाव से की जाने वाली अवज्ञा का भी समावेश होगा। मेरा अनुभव मुझे सिखाता है कि सत्‍य का प्रचार हिंसा के द्वार कभी नहीं किया जा सकता। जिन्‍हें अपने ध्‍येय के औचित्‍य में विश्‍वास है, उनमें असीम धीरज होना चाहिए। और कानून की सविनय अवज्ञा के लिए केवल वे ही व्‍यक्ति योग्‍य माने जा सकते हैं, जो अविनय अवज्ञा (क्रिमिनल डिसओबीडियंस) या हिंसा किसी तरह कर ही न सकते हों। जिस तरह कोई आदमी एक ही समय में संयम और कुपित नहीं हो सकता, उसी तरह कोई सविनय अवज्ञा और अविनय अवज्ञा, दोनों एक साथ नहीं कर सकता। और जिस तरह आत्‍म -संयम की शक्ति अपने मनोविकारों पर पूरा नियंत्रण पा चुकने के बाद ही आती है उस तरह जब हम देश के कानूनों का खुशी से और पूरा-पूरा पालन करना सीख चुके हों, तभी हम उनकी सविनय अवज्ञा करने की योग्‍यता प्राप्‍त करते हैं, फिर, जिस तरह किसी आदमी को हम प्रलोभनों की पहुँच के ऊपर तभी कह सकते हैं, जब कि वह प्रलोभनों से घिरा रहा हो और फिर भी उनका निवारण कर सका हो, उसी तरह हमने क्रोध को जीत लिया है ऐसा तभी कहा जा सकता है जब क्रोध का काफी कारण होने पर भी हम अपने ऊपर काबू रखने में कामयाब सिद्ध हों।

कुछ विद्यार्थियों ने धरना देने के पुराने जंगलीपन को फिर से जिंदा किया है। मैं इसे 'जंगलीपन' इसलिए कहता हूँ कि यह दबाव डालने का भद्दा ढँग है। इसमें कायरता भी है, क्‍योंकि जो धरना देता है वह जानता है कि उसे कुचलकर कोई नहीं जाएगा। इस कृत्‍य को हिंसात्‍मक कहना तो कठिन है, मगर वह इससे भी बदतर जरूर है। अगर हम अपने विरोधी से लड़ते हैं तो कम-से-कम उसे बदले में वार करने का मौका तो देते हैं। लेकिन जब हम उसे अपने को कुचलकर निकलने की चुनौती देते हैं - यह जानते हुए कि वह ऐसा नहीं करेगा - तब हम उसे एक अत्‍यंत विषम और अपमानजनक स्थिति में रख देते हैं। मैं जानता हूँ कि धरना देने के अत्‍यधिक जोश में विद्यार्थियों ने कभी सोचा भी नहीं होगा कि यह कृत्‍य जंगलीपन है। परंतु जिससे यह आशा की जाती है कि वह अंत:करण की आवाज पर चलेगा और भारी विपत्तियों का अकेले ही सामना करेगा, वह विचारहीन नहीं बन सकता। इसलिए असहयोगियों को हर काम में पहले से ही सचेत रहना चाहिए। उनके काम में कोई अधीरता, कोई जंगलीपन, कोई गुस्‍ताखी और कोई अनुचित दबाव नहीं होना चाहिए।

यदि हम लोकशाही की सच्‍ची भावना का विकास करना चाहते हैं, तो असहिष्‍णु नहीं हो सकते। असहिष्‍णुता से अपने ध्‍येय में हमारे विश्‍वास की कमी प्रगट होती है।

शासन के खिलाफ विवेकरहित विरोध चलाया जाए, तो उससे अराजकता की, अनियंत्रित स्‍वच्‍छंदता की स्थिति पैदा होगी और समाज अपने ही हाथों अपना नाश कर डालेगा।

कानून की सविनय अवज्ञा की पूर्ववर्ती अनिवार्य शर्त यह है कि इसमें इस बात का पूरा आश्‍वासन होना चाहिए कि अवज्ञा-आंदोलन में भाग लेने वाली की ओर से या आम जनता की ओर से कहीं कोई हिंसा नहीं होगी। हिंसक उपद्रव होने पर यह कहना कि उसके पीछे राज्‍य का या अवज्ञाकारियों का विरोध करने वाले दूसरे दलों का हाथ है उचित उत्‍तर नहीं है। जाहिर है कि सविनय अवज्ञा का आंदोलन हिंसा के वातावरण में नहीं पनप सकता। इसका यह मतलब नहीं कि ऐसी स्थिति में सत्‍याग्रही के पास फिर कोई उपाय ही नहीं रह जाता। उसे सविनय अवज्ञा से भिन्‍न दूसरे उपायों की खोज करनी चाहिए।

सत्‍याग्रह में उपवास

उपवास सत्‍याग्रह के शस्‍त्रागार का एक अत्‍यंत शक्तिशाली अस्‍त्र है। उसे हर कोई नहीं कर सकता। केवल शारीरिक योग्‍यता इसके लिए कोई योग्‍यता नहीं है। ईश्‍वर में जीती-जागती श्रद्धा न हो, तो दूसरी योग्‍यताएँ निरुपयोगी हैं। वह निरायांत्रिक प्रयत्‍न या अनुकरण कभी नहीं होना चाहिए। उसकी प्रेरणा अपनी अंतरात्‍मा की गहराई से आनी चाहिए। इसलिए वह बहुत विरल होता है।

लेकिन मैं एक सामान्‍य सिद्धांत का उल्‍लेख करना चाहूँगा। सत्‍याग्रही को उपवास अंतिम उपाय के तौर पर ही करना चाहिए, यानी तब जब कि अपनी शिकायत दूर करवाने के और सब उपाय विफल हो गए हों। उपवास में अनुकरण के लिए कोई गुंजाइश नहीं है। जिसमें आंतरिक शक्ति न हो उसे उपवास का विचार भी नहीं करना चाहिए। उपवास सफलता की आसक्ति रखकर कभी न कभी जाए। ... जिनमें उपवास का तत्‍व नहीं होता ऐसे उपहासास्‍पद उपवास बीमारी की तरह फैलते हैं और हानिकारक सिद्ध होते हैं।

बेशक, इस बात से इनकार नहीं किया जा सकता कि उपवासों में बलात्‍कार का तत्‍व कभी-कभी जरूर हो सकता है। कोई स्‍वार्थपूर्ण उद्देश्‍य प्राप्‍त करने के लिए किए जाने वाले उपवासों में यह बात होती है। किसी व्‍यक्ति से उसकी इच्‍छा के खिलाफ पैसा खींचने या ऐसा कोई वैयक्तिक स्‍वार्थ सिद्ध करने के लिए किया गया उपवास अनुचित दबाव डालना या बलात्‍कार का प्रयोग करना ही कहा जाएगा। मेरे खिलाफ किए गए उपवासों में अथवा जब मुझे अपने खिलाफ उपवास करने की धमकियाँ दी गई हैं तब-मैंने उसमें रहे अनुचित दबाव का सफल प्रतिरोध किया है। अगर यह कहा जाए कि स्‍वार्थपूर्ण और स्‍वार्थहीन प्रयोजनों की विभाजक रेखा बहुत अस्‍पष्‍ट है और इसलिए उनका ठीक निर्णय नहीं किया जा सकता, तो मेरी सलाह यह है कि जो आदमी किसी उपवास के उद्देश्‍य को स्‍वार्थपूर्वक या अन्‍यथा निदंनीय मानता है उसे उस उपवास के सामने झुकने से दृढ़तापूर्वक इनकार कर देना चाहिए, चाहे इस कारण उपवास करने वाले की मृत्‍यु ही क्‍यों हो जाए।

यदि लोग उपवासों की उपेक्षा करने लग जाएँ, जो उनके मतानुसार अनुचित उद्देश्‍यों की प्राप्ति के लिए किए गए हों, तो इन उपवासों में बलात्‍कार या अनुचित दबाव का जो दोष पाया जाता है उससे वे मुक्‍त हो जाएँगे। दूसरी मनुष्‍य-कृत कार्य-प्रणालियों की तरह उपवास के भी उचित और अनुचित दोनों प्रकार के उपयोग हो सकते हैं।


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