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वैचारिकी

मेरे सपनों का भारत
मोहनदास करमचंद गांधी

अनुक्रम 5 भारत और समाजवाद पीछे     आगे

पूँजीपतियों द्वारा पूँजी के दुरुपयोग की बात लोगों के ध्‍यान में आई, तब समाजवाद का जन्‍म हुआ यह ख्‍याल गलत है। जैसा कि मैंने पहले भी प्रतिपादित किया है समाजवाद, और उसी तरह साम्‍यवाद भी, ईशोपनिषद् के पहले श्‍लोक में स्‍पष्‍ट रूप से मिल जाता है। हाँ, यह बात सही है कि जब सुधारकों ने हृदय-परिवर्तन की क्रिया द्वारा आदर्श सिद्ध करने की प्रणाली में विश्‍वास खो दिया, तब जिसे वैज्ञानिक समाजवाद कहा जाता है उसकी पद्धति ढूँढ़ी गई। मैं उसी समस्‍या को हल करने में लगा हुआ हूँ, जो वैज्ञानिक समाजवादियों के सामने है। अलबत्‍ता, काम का मेरा ढँग शुद्ध अहिंसा के अनुसार प्रयत्‍न करने का है। यह हो सकता है कि मैं इस सिद्धांत का जिसमें मेरा विश्‍वास प्रतिनिदि बढ़ रहा है, अच्‍छा व्‍याख्‍याता न होऊँ। अखिल भारत चरखा-संघ और अखिल भारत ग्रामोद्योग-संघ ऐसी संस्थाएँ हैं, जिनके द्वारा अहिंसा की कार्य-पद्धति का अखिल भारतीय पैमाने पर प्रयोग कि जा रहा है। वे कांग्रेस के द्वारा बनाई गई ऐसी स्‍वतंत्र संस्‍थाएँ हैं, जिनकाउद्देश्‍य कांग्रेस जैसी लोकतांत्रिक संस्‍था की नीति में हमेशा जिन परिवर्तनों के होने की संभावना है उन परिावर्तनों से बंधे बिना मुझे अपने प्रयोग अपनी इच्‍छा के अनुसार करते रहने का मौका देना है।

सच्‍चा समाजवाद तो हमें अपने पूर्वजों से प्राप्‍त हुआ हैं, जो हमें यह सिखा गए हैं कि 'सब भूमि गोपाल की है; इसमें कहीं मेरी और तेरी की सीमाएँ नहीं हैं। ये सीमाएँ तो आदमियों ने बनाई हैं और इसलिए वे इन्‍हें तोड़ भी सकते हैं। गोपाल यानी कृष्‍ण यानी भगवान। आधुनिक भाषा में गोपाल यानी राज्‍य यानी जनता। आज जमीन जनता की नहीं है, यह बात सही है। पर इसमें दोष उस शिक्षा का नहीं है। दोष तो हमारा है जिन्‍होंने उस शिक्षा के अनुसार आचरण नहीं किया। मुझे इसमें कोई संदेश नहीं कि इस आदर्श की जिस हद तक रूस या और कोई देश पहुँच सकता है उसी हद तक हम भी पहुँच सकते हैं, और वह भी हिंसा का आश्रय लिए बिना। पूँजीवालों से उनकी पूँजी हिंसापूर्वक छीनी जाए, इसके बजाय यदि चरखा और उस‍के सारे फलितार्थ स्‍वीकार कर लिए जाएँ तो वही काम हो सकता है। चरखा हिंसक अपहरण की जगह ले सकने वाला अत्‍यंत प्रभावकारी साधन है। जमीन और दूसरी सारी संपत्ति उसकी है, जो उसके लिए काम करे। दु:ख इस बात का है कि किसान और मजदूर या तो इस सरल सत्‍य को जानते नहीं हैं, या यों कहो कि उन्‍हें इस जानने नहीं दिया गया है।

मैं सदा से यहा मानता आया हूँ कि नीचे-से-नीचे और कमजोर-से-कमजोर के प्रति हम जोर-जबरदस्‍ती से सामाजिक न्‍याय का पालन नहीं कर सकते। मैं यह भी मानता आया हूँ कि पतित-से-पतित लोगों को भी मुनासिब तालीम दी जाए, तो अहिंसक साधनों द्वारा सब प्रकारके अत्‍याचारों का प्रतिकार किया जा सकता है। अहिंसक असहयोंग ही उसका मुख्‍य साधन है। कभी-कभी असहयोग भी उतना ही कर्तव्‍य-रूप हो जाता है जितना कि सहयोगा। अपनी विफलता या गुलामी में खुद सहायक होने के लिए कोई बंधा हुआ नहीं है। जो स्‍वतंत्रता दूसरों के प्रयत्‍नों द्वारा-फिर वे कितने ही उदार क्‍यों न हों-मिलती हैं, वह उन प्रयत्‍नों के न रहने पर कायम नहीं रखी जा सकती। दूसरे शब्‍दों में, ऐसी स्‍वतंत्रता सच्‍ची स्‍वतंत्रता नहीं है। लेकिन जब पतित-से-पति‍त भी अहिंसक असहयोग द्वारा अपनी स्‍वतंत्रता प्राप्‍त करने की कला सीख लेते है, तो वे उसके प्रकाश का अनुभव किये बिना नहीं रह सकते।

मेरा यह पक्‍का विश्‍वास है कि जिस चीज को हिंसा कभी नहीं कर सकती, वहीं अहिंसात्‍मक असहयोग द्वारा सिद्ध की जा सकती है। और अंत में जाकर उससे अत्‍याचारियों का हृदय-परिवर्तन भी हो सकता है। हमने हिंदुस्‍तान में अहिंसा को उसके अनुरूप मौका अभी तक दिया ही नहीं। फिर भी आश्‍चर्य है कि अपनी इस मिलावटी द्वारा भी हम इतनी शक्ति प्राप्‍त कर सके हैं। प्रतिष्ठित जीवन के लिए जितनी जमीन की आवश्‍यकता है, उससे अधिक किसी आदमी के पास नहीं होनी चाहिए। ऐसा कौन है जो इस हकीकत से इनकार कर सके कि आम जनता की घोर गरीबी का कारण आज यही है उसके पास उसकी अपनी कही जाने वाली कोई जमीन नहीं है?

लेकिन यह याद रखना चाहिए कि इस तरह के सुधार तुरंत नहीं किए जा सकते। अगर ये सुधार अहिंसात्‍मक तरीकों से करने हैं, तो जमींदारों और गैर-जमींदारों को यह सिखाना और समझाना होगा कि उनसे उनकी मरजी के खिलाफ जबरन कोई काम नहीं ले सकता, और यह कि कष्‍ट-सहने या अंहिसा की कला को सीखकर वे अपनी स्‍वतंत्रता प्राप्‍त कर सकते है। अगर इस लक्ष्‍य को हमें प्राप्‍त करना है, तो ऊपर मैंने जिस शिक्षा का जिक्र किया है उसका आरंभ अभी से हो जाना चाहिए। इसके लिए पहली जरूरत ऐसा वातावरण तैयार करने की है, जिसमें पारस्‍परिक आदर और सद्भाव का सुमेल हो। उस अवस्‍था में वर्गों और आम जनता के बीच किसी प्रकार का हिंसात्‍मक संघर्ष हो ही नहीं सकता।

समाजवादी कौन है?

समाजवाद एक सुंदर शब्‍द है। जहाँ तक मैं जानता हूँ, समाजवाद में समाज के सारे सदस्‍य बराबर होते हैं, न कोई नीचा और न कोई ऊँचा। किसी आदर्श के शरीर में सिर इसलिए ऊँचा नहीं है कि वह सबसे ऊपर है और पाँव के तलुवे इसलिए नीचे नहीं हैं कि वे जमीन को छूते हैं। जिस तर मनुष्‍य के शरीर के सारे अंग बराबर हैं, उसी तरह समाजरूपी शरीर के सारे अंग भी बराबर है। यही समाजवाद है।

इस वाद में राजा और प्रजा, धनी और गरीब, मालिक और मजदूर सब बराबर हैं। इस तरह समाजवाद यानी अद्वैतवाद। उसमें द्वैत या भेदभाव की गुंजाइश ही नहीं है।

सारी दुनिया के समाज पर नजर डालें तो हम देखेंगे कि हर जगह द्वैत-ही-द्वैत है। एकता या अद्वैत कहीं नाम को भी नहीं दिखाई देता। वह आदमी ऊँचा है, वह आदमी नीचा है। वह हिंदू है, वह मुसलमान है, तीसरा ईसाई है, चौथा पारसी है, पाँचवाँ सिक्‍ख है, छठा यहूदी है। इनमें भी बहुत सी उप-जातियाँ हैं। मेरे अद्वैतवाद में ये सब लोग एक ही जाते हैं; एकता में समा जाते है।

इस वाद तक पहुँचने के लिए हम एक-दूसरे की तरफ ताकते न बैठें। जब तक‍ सारे लोग समाजवादी न बन जाएँ तब तक हम कोई हलचल न करें, अपने जीवन में कोई फेरफर न करके हम भाषण देते रहें, पार्टियाँ बनाते रहें और बाज पक्षी की तरह जहाँ शिकार मिल जाए वहाँ उस पर टूट पड़ें-यह समाजवाद हरगिज नहीं हे। समाजवाद जैसी शानदार चीज झड़प मारने से हमसे दूर ही जाने वाली है।

समाजवाद की शुरुआत पहले समाजवादी से होती है। अगर एक भी ऐसा समाजवादी हो तो उस पर सिफर बढ़ाये जा सकते हैं। पहले सिफर से उसकी कीमत दस गुना बढ़ती जाएगी। लेकिन अगर पहला सिफर ही हो, दूसरे शब्‍दों में अगर कोई आरंभ ही न करे, तो उसके आगे कितने ही सिफर क्‍यों न बढ़ाये जाएँ उनकी कीमत सिफर ही रहेगी। सिफरों को लिखने में मेहनत और कागज की बरबादी ही होगी।

यह समाजवाद बड़ी शुद्ध चीज है। इसलिए इसे पाने के साधन भी शुद्ध ही होने चाहिए। गंदे साधनों से मिलने वाली चीज भी गंदी ही होगी। इसलिए राजा को मारकर राजा और प्रजा एक से नहीं बन सकेंगे। मालिक का सिर काटकर मजदूर मालिक नहीं हो सकेंगे। यही बात सब पर लागू की जा सकती है।

कोई असत्‍य से सत्‍य को नहीं पा सकता। सत्‍य की तो जोड़ी है नᣛ? हरगिज नहीं। सत्‍य में अहिंसा छिपी हुई है और अहिंसा में सत्‍य। इसलिए मैंने कहा है कि सत्‍य और अहिंसा एक ही सिक्‍के के दो रूप हैं। दोनों की कीमत एक ही है। केवल पढ़ने में की फर्क है; एक तरफ अहिंसा है, दूसरी तरफ सत्‍य। संपूर्ण पवित्रता के बिना अहिंसा और सत्‍य निभ ही नहीं सकते। शरीर या मन की अपवित्रता को छिपाने से असत्‍य और हिंसा ही पैदा होगी।

इसलिए केवल सत्‍यवादी, अहिंसक और पवित्र समाजवादी ही दुनिया में या हिंदुस्‍तान में समाजवाद फैला सकता है। जहाँ तक मैं जानता हूँ, दुनिया में ऐसा कोई भी देश नहीं है जो पूरी तरह समाजवादी हो। मेरे बताए हुए साधनों के बिना ऐसा समाज कायम करना असंभव है।


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