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वैचारिकी

मेरे सपनों का भारत
मोहनदास करमचंद गांधी

अनुक्रम 51 प्रांतीय भाषाएँ पीछे     आगे

हमने अपनी मातृभाषाओं के मुकाबले अँग्रेजी से ज्‍यादा मुहब्‍बत रखी, जिसका नतीजा यह हुआ कि पढ़े-लिखे और राजनीतिक दृष्टि से जागे हुए ऊँची तबके के लोगों के साथ आम लोगों का रिश्‍ता बिलकुल टूट गया और उन दोनों के बीच एक गहरी खाई बन गई। यही वजह है कि हिंदुस्‍तान की भाषाएँ गरीब बन गई हैं, और उन्‍हें पूरा पोषण नहीं मिला। अपनी मातृभाषा में दुर्बोंध और गहरे तात्तिव विचारों के प्रकट करने की अपनी व्‍यर्थ चेष्‍टा में हम गोते खाते हैं। हमारे पास विज्ञान के निश्‍चय पारिभाषिक शब्‍द नहीं है। इस सबका नतीजा खतरनाक हुआ है। हमारी आम जनता आधुनिक मानस से यानी नए जमाने के विचारों से बिलकुल अछुती रही है। हिंदुस्‍तान की महान भाषाओं की जो अवगणना हुई है और उसकी वजह से हिंदुस्‍तान को जो बेहद नुकसान पहुँचा है, उसका कोई अंदाज या माप आज हम निकाल नहीं सकते, क्‍योंकि हम इस घटना के बहुत नजदीक हैं। मगर इतनी बात तो आसानी से समझी जा सकती है कि अगर आज तक हुए नुकसान का इलाज नहीं किया गया, यानी जो हानि हो चुकी है उसकी भरपाई करने की कोशिश हमने न की, तो हमारी आम जनता को मानसिकों मुक्ति नहीं मिलेगी। वह रूढ़ियों औार वहमों से घिरी रहेगी। नजीता यह होगा कि आम जनता स्‍वराज्‍य के निर्माण में कोई ठोस मदद नहीं पहुँचा सकेगी। अहिंसा की बुनियाद पर रचे गए स्‍वराज्‍य की चर्चा में यह बात शामिल है कि हमारा हर एक आदमी आजादी की हमारी लड़ाई खुीद स्‍वतंत्र रूप सं सीधा हाथ बँटायें। लेकिन अगर हमारी आम जनता लड़ाई के हर पहलू और उसकी हर सीढ़ी से परिचित न हो और उसके रहस्‍य को भलीभाँति न समझती हो, तो स्‍वराज्‍य की रचना वह अपना हिस्‍सा किस तरह अदा करेगीᣛ? और जब तक सर्व-साधारण की अपनी बोली में लड़ाई के हर पहलू व कदम को अच्‍छी तरह समझाया नहीं जाता, तब तक उनसे यह उम्‍मीद कैसे की जाए कि वे उसमें हाथ बँटाएँगे?

मेरा मातृभाषा में कितनी ही खामियाँ क्‍यों न हों, मैं उससे उसी तरह चिपटा रहूँगा जिस तरह अपनी माँ की छाती से। वहीं मुझे जीवनदाई दूध से सकती है। में अँग्रेजी को भी उसकी जगह प्‍यार करता हूँ। लेकिन अगर अँग्रेजी उस जगह को हड़पना चाहती है जिसकी वह हकदान रहीं है, तो मैं उससे सख्‍त नफरत करूँगा। यह बात मानी हुई है कि अँग्रेजी आज सारी दुनिया की भाषा बन गई है। इसलिए मैं उसे दूसरी जबान के तौर पर जगह दूँगा-लेकिन विश्‍वविद्यालय के पाठ्यक्रम में,स्‍कूलों में नहीं। कुछ लोगों के सीखने की चीज हो सकती है, लोखों-करोड़ो की नहीं। आज जब हमारे पास प्राइमरी शिक्षा को भी मुल्‍क में लाजिमी बनाने के जरिए नहीं है, तो हम अँग्रेजी सिखाने के जरिए कहाँ से जुटा सकते हैं? रूस ने बिना अँग्रेजी के विज्ञान में इतनी उन्‍नति की है। आज अपनी मानसिक गुलामी की वजह से ही हम यह मानने लगे हैं कि अँग्रेजी के बिना हमारा काम चल नहीं सकता। मैं इस चीज को नहीं मानता।

अगर सरकारों और उनके दफ्तर सावधानी नहीं लेंगे, तो मुमकिन है कि अँग्रेजी भाषा हिंदुस्‍तानी की जगह को हड़प लें। इससे हिंदुसतान के उन करोड़ो लोगों को बेहद नुकसान होगा, जो कभी भी अँग्रेजी समझ नहीं सकेंगे। मेरे खयाल में प्रांतीय सरकारों के लिए यह बहुत आसान बात होनी चाहिए कि वे अपने यहाँ ऐसे कर्मचारी रखें, जो सारा काम प्रांतीय भाषाओं में और अंतर-प्रांतीय भाषा में कर सकें। मेरी राय में अंतर-प्रांतीय भाषा सिर्फ नागरी या उर्दू लिपि में लिखी जाने वाली हिंदुस्‍तानी ही हो सकती है।

यह जरूरी फेरफार करने में एक दिन भी खोना देश को भारी सांस्‍कृतिक नुकसान पहुँचना है। सबसे पहली और जरूरी चीज यह है कि हम अपनी उन प्रांतीय भाषाओं का संशोधन करें, जो हिंदुस्‍तान को वरदान की तरह मिली हुई हैं। यह कहना दिमागी आलस के सिवा और कुछ नहीं है कि हमारी अदालतों, हमारे स्‍कूलों और यहाँ तक कि हमारे दफ्तरों में भी यह भाषा-संबंधी फेरफार करने के लिए कुछ समय, शायद कुछ बरस चाहिए। हाँ, जबतक प्रांतोंका भाषा के आधार पर फिर से बँटवारा नहीं होता,तब तक बंबई और मद्रास जैसे प्रांतों में,जहाँ, बहुत-सी भाषाएँ बोली जाती हैं,थोड़ी मुश्किल जरूर होगी। प्रांतीय सरकारों ऐसा कोई तरीका खोज सकती हैं, जिससे उन प्रांतों के लोग वहाँ अपनापन अनुभव कर सकें। जब तक हिंदुस्‍तानी संघ इस सावाल को हल न करे लें कि अंतर-प्रांतीय भाषा नागरी या उर्दू लिपि में लिखी जाने वाली हिंदुस्‍तानी हो, या सिर्फ नागरी लिपि में लिखी जाने वाली हिंदी, तब तक प्रांतीय सरकारें ठहरी न रहें। इसकी वजह से उन्‍हें जरूरी सुधार करने में देर न लगानी चाहिए। भाषा के बारे में यह बिलकुल गैर-जरूरी विवाद खड़ा हो गया है, जिसकी वजह से हिंदुस्‍तान में अँग्रेजी भाषा घुस सकती है। और अगर ऐसा हुआ तो इस देश के लिए वह ऐ ऐसे कलंक की बात होगी,जिसे धोना हमेशा के लिए असंभव होगा। अगर सारे साकारी दफ्तरों में प्रांतीय भाषा इस्‍तेमाल करने का कदम इसी वक्‍त उठाया जाए, तो अंतर-प्रांतीय भाषा का उपयोग तो उसके बाद तुरंत ही होने लगेगा। प्रांतों को केंद्र से संबंध रखना ही पड़ेगा। और अगर केंद्रीय सरकार ने शीघ्र ही यह महसूस करने की समझदारी कि कि उन मुटठीभर हिंदुस्तानियों के लिए हिंदुस्‍तान की संस्‍कृति को नुकसान नहीं पहुँचाना चाहिए, जो इतने आलसी हैं कि जिस भाषा को किसी भी पार्टी या वर्ग का दिल दुखाए बगैर सारे हिंदुस्‍तान में आसानी से अपनाया जा सकता है उसे भी नहीं सीख सकते, तो ऐसी हालत में प्रांतीय सरकारें केंद्रीय सरकार से अँग्रेजी में अपना व्‍यवहार रखने का सहास नहीं कर सकेंगी। मेरा मतलब यह है कि जिस तरह हमारी आजादी को जबरदस्‍ती छीनने वाले अँग्रेजों की सियासी हुकूमत को हमने सफलतापूर्वक इस देश से निकल दिया, उसी तरह हमारी संस्‍कृति को दबाने वाली अँग्रेजी भाषा को भी हमें यहाँ से निकाल बाहर करना चाहिए। हाँ, व्‍यापार और राजनीति की अंतर-राष्‍ट्रीय भाषा के नाते समृद्ध अँग्रेजी का अपना स्‍वाभाविक स्‍थान हमेशा कायम रहेगा।

संस्‍कृत का स्‍थान

मेरी राय में धार्मिक बातों में संस्‍कृत का उपयोग करना छोड़ा नहीं जा सकता। अनुवाद कितना ही शुद्ध क्‍यों न हो, किंतु वह मूल मंत्रों का स्‍थान नहीं लें सकता। मूल मंत्रों में अपनी एक विशेषता है, जो अनुवाद में नहीं आ सकती। इसके सिवा यदि हम इन मंत्रों को, जिनका पाठ शताब्दियों तक संस्‍कृत में ही होता रहा है, अब अपनी देशी भाषाओं में दुहराने लगें, तो इससे उनकी गंभीरता में कमी आएगी। लेकिन साथ ही मेरा स्‍पष्‍ट मत हैं कि मंत्र का पाठ और विधि का अनुष्‍ठान करने वाले मंत्र का अर्थ और विधि का तात्‍पर्य अच्‍छी तरह समझाया जाना चाहिए। हिंदू बालक की शिक्षा सस्‍कृत साहित्‍य का अध्‍ययन यथेष्‍ट मात्रा में न चलता रहा तो हिंदू धर्म का नाश हो जाएगा। मौजूदा शिक्षा-पद्धति की कमियों के कारण ही संस्‍कृत सीखना कठिन मालूम होता है; असल में वह कठिन नहीं है। लेकिन कठिन हो तो भी धर्म का आाचरण और ज्‍यादा कठिन है। इसलिए जो धर्म का आचरण करना चाहता है,उसे अपने मार्ग की तमाम सीढ़ियों को फिर वे कितनी भी कठिन क्‍यों न दिखाई दें,आसा नही समझाना चाहिए।


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