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वैचारिकी

मेरे सपनों का भारत
मोहनदास करमचंद गांधी

अनुक्रम 6 भारत और साम्यावाद पीछे     आगे

मुझे स्‍वीकार करना चाहिए कि बोलशेविज्‍म शब्‍द का अर्थ मैं अभी तक पूरा-पूरा नहीं समझा हूँ। मैं इतना ही जानता हूँ कि उसका उद्देश्‍य निजी संपति की संस्‍था को मिटाना है। यह तो अपरिग्रह के नैतिक आदर्श को अर्थ के क्षेत्र में प्रयुक्‍त करना हुआ; और यदि लोग इस आदर्श को स्‍वेच्‍छा से स्‍वीकार कर लें, तो इससे अच्‍छा कुछ हो ही नहीं सक‍ता। लेकिन बोलशेविज्‍म के बारे में मुझे जो कुछ जानने को मिला है, उससे ऐसा प्रतीत होता है कि‍ वह न केवल हिंसा के प्रयोग का समर्थन करता है, बल्कि निजी संपत्ति के अपहरण के लिए और उसे राज्‍य के स्‍वामित्‍व के अधीन बनाए रखने के लिए हिंसा के प्रयोग की खुली छूट देता है। और यदि ऐसा है तो मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं कि बोलशेविक शासन अपने मौजूदा रूप में ज्‍यादा दिन तक नहीं टिक सकता। कारण, मेरा दृढ़ विश्‍वास है कि हिंसा की नींव पर किसी भी स्‍थायी रचना का निर्माण नहीं हो सकता। लेकिन, वह जो भी हो, इसमें कोई संदेश नहीं कि बोलशेविक आदर्श के पीछे असंख्‍य पुरुषों और स्त्रियों के - जिन्‍होंने उसकी सिद्धी के लिए अपना सर्वस्‍व अर्पण कर दिया है - शुद्धतम त्‍याग का बल है, कभी व्‍यर्थ नहीं जा सकता। उनके त्‍याग का उज्‍ज्‍वल उदाहरण चिरकाल तक जीवित रहेगा और समय ज्‍यों-ज्‍यों बीतेगा त्‍यों-त्‍यों वह इस आदर्श को अधिकाधिक शुद्धि और वेग प्रदान करता रहेगा।

समाजवाद और साम्‍यवाद आदि पश्चिम के सिद्धांत जिन विचारों पर अधारित हैं वे हमारे तत्‍संबंधी विचारों से बुनियादी तौर पर भिन्‍न हैं। ऐसा एक विचार उनका यह विश्‍वास है कि मनुष्‍य-स्‍वभाव में मूलगामी स्‍वार्थ-भावना है। मैं इस विचार को स्‍वीकार नहीं करता; क्‍योंकि मैं जानता हूँ कि मनुष्‍य और पशु में यह बुनियादी फर्क है कि मनुष्‍य अपनी अंतर्हित आत्‍मा की पुकार का उत्‍तर दे सकता है, उन विकारों के ऊपर उठ सकता है जो उसमें और पशुओं में सामान्‍य रूप से पाए जाते हैं और इसलिए वह स्‍वार्थ-भावना और हिंसा के भी ऊपर उठ सकता है। क्‍योंकि स्‍वार्थ-भावना और हिंसा पशु-स्‍वभाव के अंग हैं, मनुष्‍य में अंतर्हित उसकी अमर आत्‍मा के नहीं। यह हिंदू धर्म का एक बुनियादी विचार है और इस सत्‍य की शोध के पीछे कितने ही तपस्वियों की अनेक वर्षों की तपस्‍या और साधना है। यही कारण हैं कि हमारे यहाँ ऐसे संत और महात्‍मा तो हुए हैं, जिन्‍होंने आत्‍मा के गूढ़ रहस्‍यों की शोध में अपना शरीर घिसा है और अपने प्राण दिए हैं, परंतु पश्चिम की तरह हमारे यहाँ ऐसे लोग नहीं हुए, जिन्‍होंने पृथ्‍वी के सुदूरतम कोनों या ऊँची चोटियों की खोज में अपने प्राणों की बलिदान किया हो। इसलिए हमारे समाजवाद या साम्‍यवाद की रचना अहिंसा के आधार पर और मजदूरों तथा पूँजीपतियों या जमींदारों तथा किसानों के मीठे सहयोग के आधार पर होनी चाहिए।

साम्‍यवाद के अर्थ की छानबीन की जाए तो अंत में हम इसी निश्‍चय पर पहुँचते हैं कि उसका मतलब है-वर्गहीन समाज। यह बेशक उत्‍तम आदर्श है और उसके लिए अवश्‍य कोशिश होनी चाहिए। लेकिन जब इस आदर्श को हासिल करने के लिए वह हिंसा का प्रयोग करने की बात करने लगता है, तब मेरा रास्‍ता उससे अलग हो जाता है। हम सब जन्‍म से समान ही हैं, लेकिन हम हमेशा से भगवान की इस इच्‍छा की अवज्ञा करते आए हैं। असमानता की या ऊँच-नीच की भावना एक बुराई है, किंतु मैं इस बुराई को मनुष्‍य के मन से, उसे तलवार दिखाकर, निकाल भगाने में विश्‍वास नहीं करता। मनुष्‍य के मन की शुद्धि के लिए यह कोई कारगर साधन नहीं।

रूस का समाजवाद, यानी जनता पर जबरदस्‍ती लादा जाने वाल साम्‍यवाद, भारत को रुचेगा नहीं; भारत की प्रकृति के साथ उसका मेल नहीं बैठ सकता। हाँ, यदि साम्‍यवाद बिना किसी हिंसा के आए तो हम उसका स्‍वागत करेंगे। क्‍योंकि त‍ब कोई मनुष्‍य किसी भी तरह की संपत्ति जनता के प्रतिनिधि की तरह और जनता के हित के लिए ही रखेगा; अन्‍यथा नहीं। करोड़पति के पास उसके करोड़ रहेंगे तो सही, लेकिन वह उन्‍हें अपने पास धरोहर के रूप में जनता के हित के लिए ही रखेगा और सर्व-सामान्‍य प्रयोजन के लिए आवश्‍यकता होने पर इस संपत्ति को राज्‍य अपने अधिकार में ले सकेगा।

साम्‍यवादियों और समाजवादियों का कहना है कि आज वे आर्थिक समानता को जन्‍म देने के लिए कुछ नहीं कर सकते। वे उसके लिए प्रचार भर कर सकते हैं। इसके लिए लोगों में द्वेष या वैर पैदा करने और उसे बढ़ाने में उनका विश्‍वास है। उनका कहना है कि राज्‍यसत्‍ता पाने पर वे लोगों से समानता के सिद्धांत पर अमल करवाएँगे। मेरी योजना के अनुसार राज्‍य प्रजा की इच्‍छा को पूरा करेगा, न कि लोगों को हुक्‍म देगा या अपनी आज्ञा जबरन उन पर लादेगा। मैं घृणा से नहीं परंतु प्रेम की शक्ति से लोगों को अपनी बात समझाऊँगा और अहिंसा के द्वारा आर्थिक समानता पैदा करूँगा। मैं सारे समाज को अपने मत का बनाने तक रुकूँगा नहीं, बल्कि अपने पर ही यह प्रयोग शुरू कर दूँगा। इसमें जरा भी शक नहीं कि अगर मैं 50 मोटरों का तो क्‍या , 10 बीघा जमीन का भी मालिक हूँ, तो अपनी कल्‍पना की आर्थिक समानता को जन्‍म नहीं दे सकता। उसके लिए मुझे गरीब बन जाना होगा। यही मैं पिछले 50 सालों से या उससे भी ज्‍यादा वक्‍त से करता आया हूँ।

इसलिए मैं पक्‍का कम्‍युनिस्‍ट होने का दावा करता हूँ। अगरचे मैं धनवानों द्वारा दी गई मोटरों या दूसरे सुभीतों से फायदा उठाता हूँ मगर मैं उनके वश में नहीं हूँ। अगर आम जनता के हितों का वैसा तकाजा हुआ, तो बात की बात में मैं उनको अपने से दूर हटा सकता हूँ।

हममें विदेशों के दान के बजाय हमारी धरती जो कुछ पैदा कर सकती हो उस पर ही अपना विर्वाह कर सकने की योग्‍यता और साहस होना चाहिए। अन्‍यथा हम एक स्‍वतंत्र देश की तरह रहने के हकदार न होंगे। यही बात विदेशी विचारधाराओं के लिए भी लागू होती है। मैं उन्‍हें उसी हद तक स्‍वीकार करूँगा जिस हद तक मैं उन्‍हें हजम कर सकता हूँ और उनमें परिस्थितियों के अनुरूप फर्क कर सकता हूँ। लेकिन मैं उनमें बह जाने से इनकार करूँगा।


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