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वैचारिकी

मेरे सपनों का भारत
मोहनदास करमचंद गांधी

अनुक्रम 75 स्फुट वचन पीछे    

आदिवासी

'आदिवासी' नाम उन लोगों को दिया गया है, जो कि पहले से ही इस देश में बसे हुए थे। उनकी आर्थिक स्थिति हरिजनों से शायद ही अच्‍छी होगी। लंबे अरसे से अपने-आप को 'ऊँचे वर्गों' के नाम से पुकारने वाली हमारी जनता ने उनके प्रति जो बेपरवाही बताई है, उसका परिणाम उन्‍हें भोगना पड़ा है। आदिवासियों के प्रश्‍न को रचनात्‍मक कार्यक्रम में खास स्‍थान मिलना चाहिए। सुधारकों के लिए-प्रचारकों ने ही यह काम किया है। यद्यपि उन्‍होंने इस काम में बहुत मेहनत की है, तो भी उसका काम जैसे चाहिए था वेसा फल-फूला नहीं; क्‍योंकि उनका अंतिम हेतु आदिवासियों को ईसाई बनाना था और उन्‍हें हिंदुस्‍तानी मिटाकर अपने-जैसा परदेशी बना लेने का था। जो भी हो, परंतु अगर हम अहिंसा के आधार पर स्‍वराज्‍य चाहते हैं, तो कनिष्‍ठ-से-कनिष्‍ठ वर्ग की तरफ से भी हम बेपरवाह नहीं हो सकते। परंतु आदिवासियों की तो संख्‍या इतनी बड़ी है कि उनको कनिष्‍ठ गिना ही नहीं जा सकता।


अनुशासन

आजादी के सर्वोच्‍च रूप के साथ ज्‍यादा-से-ज्‍यादा अनुशासन और नम्रता होनी चाहिए; दोनों का अटूट संबंध है। अनुशासन और नम्रता से आई हुई आजादी ही सच्‍ची आजादी है। अनुशासन से अनियंत्रित आजादी, आजादी नहीं स्‍वेच्‍छाचारिता है; उससे स्‍वयं हमारे और हमारे पड़ोसियों के खिलाफ अभ्रदता सूचित होती है।

हमें दृढ़तापूर्वक कठोर अनुशासन का पालन करना सीखना चाहिए। तभी हम कोई बड़ी और स्‍थायी वस्‍तु प्राप्‍त कर सकेंगे। और यह अनुशासन कोरी बौद्धिक चर्चा करते रहने से या तर्क और विवेक-बुद्धि को अपील करते रहने से नहीं आ सकता। अनुशासन विपत्ति की पाठशाला में सीखा जाता है। और जब उत्‍साही युवक बिना किसी ढाल के जिम्‍मेदारी के काम उठाएँगे और उसके लिए अपने को तैयार करेंगे, तब वे समझेंगे कि जिम्‍मेदारी और अनुशासन कया हैं।


डॉक्‍टर

डॉक्‍टर हमें धर्म से भ्रष्‍ट करते हैं, यह साफ और सीधी बात है। वे हमें स्वच्छंद बनने को ललचाते हैं। इसका परिणाम यह आता है कि हम नि:सत्‍त्‍व और नामर्द बनते हैं।

सामान्‍य तौर पर इस धंधे से मेरा जो विरोध है, उसका कारण यह है कि उसमें आत्‍मा के प्रति कुछ भी ध्‍यान नहीं दिया जाता; और इस शरीर जैसे नाजुक यंत्र को सुधारने का प्रयत्‍न करने में जो श्रम किया जाता है, वह न-कुछ जैसी वस्‍तु के लिए ही किया जाता है। इस प्रकार आत्‍मा का ही इनकार करने से यह धंधा मनुष्‍यों को दया के पात्र बना देता है और मनुष्‍य के गौरव और आत्‍म -संयम को घटाने में मदद करता है।


पोशाक

किसी भारतीय के लिए उसकी राष्‍ट्रीय पोशाक ही सबसे ज्‍यादा स्‍वाभाविक और शोभाप्रद है। मैं ऐसा मानता हूँ कि हमारा यूरोपीय पोशाक की नकल करना हमारे पतन की चिह्न है; उससे हमारा पतन, हमारा अपमान और हमारी दुर्बलता सूचित होती है। अपनी ऐसी पोशाक को छोड़कर, जो भारतीय जलवायु के सबसे ज्‍यादा अनुकूल है, जो सादगी, कला और सस्‍तेपन में दुनिया में अपनी जोड़ नहीं रखती और जो स्‍वास्‍थ्‍य तथा स्‍वच्‍छता की आवश्‍यकताओं को पूरा करती है, हम एक राष्‍ट्रीय पाप कर रहे हैं।

मेरा संकीर्ण राष्‍ट्रप्रेम टोप का विरोध करता है, किंतु मेरा छिपा हुआ विश्‍व-प्रेम उसे यूरोप की इनी-गिनी बहुमूल्‍य देनों में से एक मानता है। टोप के खिलाफ इस देश में इतनी उग्र‍ विरोध-भावना न होती, तो मैं टोप के प्रचार के लिए संघटित संस्‍था का अध्‍यक्ष बन जाता।

भारत के शिक्षित लोगों ने (यहाँ की जलवायु में) पतलून जैसे अनावश्‍यक, अस्‍वास्‍थ्‍यकर और असुंदर परिधान को अपनाकर तथा टोप को स्‍वीकार करने में आम तौर पर हिचकिचाहट प्रकट करके भूल की है। लेकिन मैं जानता हूँ कि राष्‍ट्रीय रुचियों और अरुचियों के पीछे कोई विवेक नहीं होता।


झंडा

झंडे की जरूरत सब देशों को होती है। उसके लिए लाखों-करोड़ों ने अपने प्राण दिए हैं। इसमें संदेह नहीं कि यह एक प्रकार की मूर्तिपूजा है, जिसे नष्‍ट करना पाप-जैस होगा करण, झंडा अमुक आदर्शों का प्रतीक होता है। जब यूनियन जैक फहराया जाता है तब अँग्रेजों के हृदय में जो भाव उठाते हैं, उनकी गहराई और तीव्रता को मापना कठिन है। अमेरिका के रेखाओं और तारकों से अंकित झंडे में अमेरिका वालों को जाने कितना गहरा अर्थ मिलता है। इसी तरह इस्‍लाम के अनुयायियों में उनका चंद्र और तारों से अंकित झंडा उत्‍तम वीरता के भाव जगाता है। हम भारतीयों को याली हिंदुओें, मुसलमानों, ईसाइयों, यहूदियों, पारसियों और भारत को अपना देश मानने वाले अन्‍य सब लोगों को अपना एक सर्व स्‍वीकृत झंडा तक करना चाहिए, जिसके लिए हम मरें और जिएँ।


वकील

वकील का कर्त्‍तव्‍य हमेशा न्‍यायाधीशों के सामने सत्‍य को रखना और सत्‍य पर पहुँचने में उनकी मदद करना है। उनका काम अपराधियों को निरपराधी सिद्ध करना कदापि नहीं है।


नेतृत्‍व

अगर हम टोलाशाही की स्थिति को टालना चाहते हैं और यह इच्‍छा रखते हैं कि देश की व्‍यवस्थित प्रगति हो, तो लोग जनता का नेतृत्‍व करने का दावा करते हैं उन्‍हें जनता का नेतृत्‍व मानने से यानी जनता जो कहे वैसा करने से दृढ़तापूर्वक इनकार कर देना चाहिए। मैं मानता हूँ कि महज अपने मत की घोषणा करना और फिर लोगों के सामने झुक जाना पर्याप्‍त नहीं है। यदि महत्‍त्‍व के मामलों में लोगों का मत नेताओं की बुद्धि को पटता न हो, उन्‍हें चाहिए कि वे उसके खिलाफ काम करें।

नेता का पद समान पदवालों में प्रथम माने गए व्‍यक्ति का पद है। किसी-न-किसी को प्रथम स्‍थान देना ही पड़ता है, लेकिन श्रृंखला की सबसे कमजोर कड़ी से ज्‍यादा शक्तिशाली न तो वह होता है, न उसे होना चाहिए। एक बार नेता का चुनाव करने के बाद हमारा कर्त्‍तव्‍य हो जाता है कि हम उसका अनुसरण करें। यदि ऐसा न किया जाए तो श्रृंखला टूट जाती है और सारा संघटन शिथिल हो जाता है।


संगीत

संगीत वस्‍तुत: एक पुरानी और पवित्र कला है। सामदेव के सूक्‍त संगीत का भंडार हैं और कुरान की किसी भी आयत का पाठ संगीत का आश्रय लिए बिना नहीं हो सकता। डेविड के भाक्तिपूर्ण गीत हमें आनंद के लोग में पहुँचा देते हैं और सामवेद के सूक्‍तों का स्‍मरण कराते हैं। हमें इस कला को पुनर्जीवित करना चाहिए और उसका प्रचार करने वालों संस्‍थाओं को आश्रय देना चाहिए।

हम संगीत-सम्‍मेलनों में हिंदू और मुसलमान संगीतज्ञों को साथ-साथ बैठे हुए और उसमें हिस्‍सा लेते हुए देखते हैं। अपने राष्‍ट्रीय जीवन के दूसरे क्षेत्रों में हम भाईचारे की यही भावना कब देखेंगे ऐसा होगा? उस समय हमारे होठों पर राम और रहमान का नाम एक साथ होगा।


दलों की अनेकता

यदि हममें उदारता और सहिष्‍णुता न हो, तो हम आपने मतभेद कभी भी मित्रतापूर्वक नहीं सुलझा सकेंगे; ओर उस हालत में हमें हमेशा ही तीसरे पक्ष का फैसला स्‍वीकार करने के लिए यानी विदेशी सत्‍ता की गुलामी अपनाने के लिए लाचार होना पड़ेगा।

किसी भी विचारधारा के अनुयायी यह दावा नहीं कर सकते कि उनके ही निर्णय हमेशा सही होते हैं। हम सबसे गलतियाँ हो सकती हैं और हमें अक्‍सर ही अपने निर्णय बाद में बदलने पड़ते हैं। हमारे इस विशाल देश में सब ईमानदार विचारधाराओं के लिए गुंजाइश होनी चाहिए। और इसलिए अपने प्रति और दूसरों के प्रति हमारा कम-से-कम यह कर्त्‍तव्‍य तो है ही कि हम अपने विरोधी का दृष्टिकोण समझने की कोशिश करें; और यदि हम उसे स्‍वीकार न कर सकते हों तो उसका उतना आदर अवश्‍यक करें जितना हम चाहेंगे कि वह हमारे दृष्टिकोण का करे। यह चीज स्‍वस्‍थ सार्वजनिक जीवन का और इसलिए स्‍वराज्‍य की योग्‍यता का एक अनिवार्य प्रमाण है।


राजनीति

ऐसे व्‍यापक सत्‍य-नारायण के प्रत्‍यक्ष दर्शन के लिए जीवमात्र के प्रति आत्‍मवत् प्रेम की परम आवश्‍यक है। और जो मनुष्‍य ऐसा करना चाहता है, वह जीवन के किसी भी क्षेत्र से बाहर नहीं रह सकता। यही कारण है कि सत्‍य की मेरी पूजा मुझे राजनीति में खींच लाई है। जो मनुष्‍य यह कहता है कि धर्म का राजनीति से कोई संबंध नहीं है वह धर्म को नहीं जानता, ऐसा कहने में मुझे संकोच नहीं होता और न ऐसा कहने में मैं अविनय करता हूँ।


पंडे और पुजारी

यह एक दु:खदायी हकीकत है, किंतु इतिहास इसकी गवाही देता है कि पंडे और पुजारी ही, जिन्‍हें कि धर्म के सच्‍चे रक्षक होना चाहिए था, अपने-अपने धर्म के पतन और नाश कारण सिद्ध हुए हैं।


सार्वजनिक कोष

अगर हम मिले हुए पैसे की पाई-पाई का हिसाब नहीं रखते और कोष का विचारपूर्वक उचित उपयोग नहीं करते, तो सार्वजनिक जीवन से हमें निकाल दिया जाना चाहिए।

सार्वजनिक धन भारत की उस गरीब जनता का है, जिससे ज्‍यादा गरीब इस दुनिया में और कोई नहीं है। इस धन के उपयोग में हमें बहुत ज्‍यादा सावधान तथा सजग रहना चाहिए और जनता से हमें जो पैसा मिलता है उसकी पाई-पाई का हिसाब देने के लिए तैयार रहना चाहिए।


सार्वजनिक संस्थाएँ

अनेकानेक सार्वजनिक संस्‍थाओं की उत्‍पत्ति और उनके प्रबंध की जिम्‍मेदारी संभालने के बाद मैं इस दृढ़ निर्णयपर पहुँचा हूँ कि किसी भी सार्वजनिक संस्‍था को स्‍थायी कोष पर निभने का प्रयत्‍न नहीं करना चाहिए। इसमें उसकी नैतिक अधोगति का बीज छिपा रहता है। ... देखा यह गया है कि स्‍थायी संपति के भरोसे चलने वाली संस्‍था लोकमत से स्‍वतंत्र हो जाती है, और कितनी ही बार वह उलटा आचरण भी करती है। हिंदुस्‍तान में हमें पग-पग पर इसका अनुभव होता है। कितनी ही धार्मिक मानी जाने वाली संस्‍थाओं के हिसाब-किताब का कोई ठिकाना नहीं रहता उनके ट्रस्‍टी ही उनके मालिक बन बैठे हैं और वे किसी के प्रति उत्‍तरदायी भी नहीं हैं। जिस तरह प्रकृति स्‍वयं प्रतिदिन उत्‍पन्‍न करती और प्रतिदिन खाती है, वैसी ही व्‍यवस्‍था सार्वजनिक संस्‍थाओं की भी होनी चाहिए, इसमें मुझे कोई शंका नहीं है। जिस संस्‍था को लोग मदद देने के लिए तैयार न हों, उसे सार्वजनिक संस्‍था के रूप में जीवित रहने का अधिकार ही नहीं है।

मैं इस दृढ़ निश्‍चय पर पहुँचा हूँ कि कोई भी सुपात्र संस्‍था जनता से मिलने वाली मदद के अभाव के कारण नहीं मरती। मरने वाली संस्‍थाओं के मरने का कारण या तो रहा है कि उनमें ऐसी कोई उपयोगिता शेष नहीं रह गई थी, जिससे आकर्षित होकर जनता उनकी मदद करती, अथवा उनके संचालकों ने अपनी श्रद्धा या दूसरे शब्‍दों में अपनी जीवन-क्षमता खो दी थी।

हमारी आर्थिक स्थिति नहीं, बल्कि हमारी नैतिक स्थिति ही अनिश्चित है। अपने कार्यकर्ताओं की चारित्रिक पवित्रता की दृढ़ नींव पर खड़े हुए किसी भी कार्य या आंदोलन को अर्थाभाव के कारण नष्‍ट हो जाने का डर कभी नहीं होता। ... हमें पेसे के लिए सामान्‍य जनता के पास पहुँचना चाहिए। हमारे मध्‍यम वर्गों और गरीब वर्गों के लोग कितने भिखारियों को, कितने मंदिरों को सहायता देते हैं; ये लोग चंद अच्‍छे कार्यकर्ताओं का भरण-पोषण क्‍यों नहीं करेंगे? हमें घर-घर जाकर भीख माँगनी चाहिए, अनाज माँगना चाहिए; और कुछ न मिले तो चंद पैसे ही माँगना और स्‍वीकार कर लेना चाहिए। इस मामले में हमे वैसा ही करना चाहिए, जैसा कि बिहार और महाराष्‍ट्र में किया जा रहा है। ...लेकिन याद रखिए कि सफलता आपकी ध्‍येयनिष्‍ठा पर, कार्य के प्रति आपकी भक्ति पर और आपके चरित्र की पवित्रता पर निर्भर करेगी। ऐसे कार्यों के लिए लोग तब तक नहीं देंगे जब तक उन्‍हें हमारी नि:स्‍वार्थता का निश्‍चय न हो जाएगा।


लोकमत

लोकमत ही एक ऐसी शक्ति है, जो समाज को शुद्ध और स्‍वस्‍थ रख सकती है।

लोकमत से आगे बढ़कर कानून बनाना प्राय: निरर्थक ही नहीं, उससे भी ज्‍यादा बुरा सिद्ध होता है।

स्‍वस्‍थ लोकमत जो प्रभाव निहित होता है, उसके महत्‍त्‍व को अभी हमने पूरा-पूरा पहचाना नहीं। लेकिन जब लोकमत हिंसापूर्ण और आक्रामक बश्‍न जाता है तब वह असह्य हो जाता है।


सार्वजनिक कार्यकर्ता

आधुनिक सार्वजनिक जीवन में ऐसी एक प्रवृत्ति रूढ़ हो गई है कि जब तक कोई सार्वजनिक कार्यकर्ता अमुक व्‍यवस्‍था-तंत्र के अंग की तरह अपना काम बखूबी करता हो तब उसके चरित्र की ओर दृष्टिपात न किया जाए। कहा जाता है कि चरित्र हर एक व्‍यक्ति की निजी वस्‍तु है, उसकी चिंता वही करेगा। मैंने लोगों को अक्‍सर इस तम का समर्थन करते हुए देखा है। लेकिन मुझे कभी उसका औचित्‍य समझ में नहीं आया, उसे अपनाना तो दूर रहा। जिन संस्‍थाओं ने अपने कार्यकर्ताओं के वैयक्तिक चरित्र को महत्‍त्‍व की वस्‍तु नहीं माना है, उन्‍हें अपनी इस नीति के भयंकर परिणाम भुगतने पड़े हैं।


समय की पाबंदी

हमारे नेता और कार्यकर्ता वक्‍त के पाबंद बनें, तो राष्‍ट्र को उससे निश्चित लाभ होगा। कोई आदमी वस्‍तुत: जितना काम कर सकता है, उससे ज्‍यादा करने की उससे आशा नहीं की जा सकती। दिनभर के काम के बाद भी अगर काम पूरा न हो, या अपना खाना छोड़कर अथवा नींद या आमोद-प्रमोद की उपेक्षा करके उसे काम करना पड़े, तो समझना चाहिए कि कहीं-न-कहीं कोई अव्‍यवस्‍था जरूर है। मुझे तो इसमें कोई शक नहीं कि अगर हम अपने कार्यक्रम के अनुसार नियमित रूप से कार्य करने की आदत डालें, तो राष्‍ट्र की कार्य-क्षमता बढ़ेगी, अपने ध्‍येय की ओर हमारी प्रगति तेज गति से होगी और कार्यकर्ता ज्‍यादा तंदुरुस्‍त और दीर्घजीवी होंगे।


घुड़दौड़

घोड़ों की परवरिश के लिए शर्त बदना और उसके बारे में लोगों को उत्‍तेजित करना बिलकुल अनावश्‍यक है। घुड़दौड़ की शर्त से मनुष्‍य के दुर्गुणों का पोषण होता है और अच्‍छी खेती के लायक जमीन तथा पैसे का बिगाड़ होता है। शर्त बदलकर जुआ खेलने वाले अच्‍छे-अच्‍छे लोगों को मैंने पामाल और तबाह होते देखा है। ऐसे लोगों को किसने नहीं देखा है? यह मौका पश्चिम के दुर्गुणों को छोड़कर उसके सद्गुण स्‍वीकार करने का है।


शरणार्थी

उन्‍हें नम्रता का पाठ सीखना चाहिए, ऐसी नम्रता जिससे वे दूसरों के दोष देखने और उनकी टीका करने के बदले अपने दोष देख सकें। उनकी टीका कई बार बहुत कड़ी होती है, कई बार अनुचित होती है और कभी-कभी ही उचित होती है। अपने दोष देखने से इंसान ऊपर उठता है, दसरों के दोष निकालने से नीचे गिरता है। इसके सिवा दु:खी लोगों को सहयोग जीवन की कला और उसमें रहने वाले गुणों को समझ लेना चाहिए। यह सीखते हुए वे देखेंगे कि सहयोग का घेरा बड़ा होता जाता है, जिससे उसमें सारे इंसान समा जाते हैं। अगर दु:खी लोग इतना करना सीख जाए, तो उनमें से कोई अपने-आपको अकेला न माने। तब सभी, चाहे वे जिस प्रांत के हों, अपने को एक मानेंगे और सुख खोजने के बदले मनुष्‍य मात्र के कल्‍याण में ही अपना कल्‍याण देखेंगे। इसका मतलब कोई यह न करे कि आखिर में सबको एक ही जगह रहना होगा। यह हमेशा असंभव वही रहेगा। और जब लाखों का सवाल है। तब तो बिलकुल असंभव है। मगर इसका मतलब इतना जरूर है कि हर एक अपने को समुद्र के एक बूँद के समान समझकर दूसरे के साथ संबंध रखे; फिर भले ही दु:ख आ पड़ने से पहले सबके दरजे अलग-अलग रहे हों, किसी का नीचा रहा हो, किसी का ऊँचा, और सभी अलग-अलग प्रांतों के हों। और फिर कोई ऐसा तो कहा ही नहीं सकता कि मुझे तो फलां जगह पर ही रहना है। तब किसी न तो अपने दिल में कोई शिकायत रहेगी और न कोई प्रकट रूप में शिकायत करेगा। ऐसी अच्‍छी व्‍यवस्‍था में वे अपंग या लाचार बनकर नहीं रहेंगे।

ऐसे सभी दु:खी खुद को दिया गया काम करेंगे और सभी के खाने, पहनने और रहने का अच्‍छा इंतजाम हो जाएगा। ऐसा करने से स्‍वावलंबी बनेंगे। स्‍त्री-पुरुष सभी एक-दूसरे को बराबर मानेंगे। कई काम तो सभी करेंगे, जैसे कि पाखाने साफ करना, कूड़ा-करकट निकालना वगैरा। किसी काम को ऊँचा और किसी काम को नीचा नहीं माना जाएगा। ऐसे समाज में कोई आवारा, आलसी या निकम्‍मा नहीं रहेगा।


नदियाँ

गंगा और यमुना नाम की इन दो नदियों के सिवा हमारे देश में और भी गंगाएँ और यमुनाएँ हैं, उनके वास्‍तविक नाम चाहे भिन्‍न हों। वे हमें उस त्‍याग की याद दिलाती हैं, जो कि जिस देश में हम रहते हैं उसके लिए हमें करना होगा। वे हमें उस शुद्धि की याद दिलाती हैं जिसके लिए निरंतर प्रयत्‍न करना चाहिए, ठीक वैसे ही जैसे नदियाँ स्‍वयं उसके लिए क्षण-प्रतिक्षण प्रयत्‍न करती हैं। आज के जमाने में तो इन नदियों से हम केवल यही काम लेना जानतें हैं कि उनमें अपनी गंदी मारियाँ बहावें और उनकी छाती पर अपनी नावें चलावें और इस प्रकार उन्‍हें और भी गंदा करें। हमारे पास इतना समय नहीं है कि... हम उनके पास जाएँ और ध्‍यानस्‍थ होकर उनका वह संदेश सुनें, जो वे हमारे कानों में धीर-धीर गुनगुनाती हैं।


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